भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ११ *८५
एवं चतुर्दशैतानि विद्यास्थानानि सत्तम।<br>चतुर्वेदैः सहोक्तानि धर्मो नान्यत्र विद्यते॥ २८२॥<br>एवं पैतामहं धर्मं मनुव्यासादयः परम्।<br>स्थापयन्ति ममादेशाद् यावदाभूतसम्प्लवम्॥ २८३॥इस प्रकार ये चौदह विद्यास्थान कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्यत्र धर्म विद्यमान नहीं है॥ २८२॥<br>इस प्रकार मनु, व्यास आदि पितामह ब्रह्माके द्वारा निर्दिष्ट श्रेष्ठ धर्मको मेरे ही आदेशसे प्रलयकालपर्यन्त स्थापित करते हैं। ब्रह्माकी आयु पूर्ण हो जानेपर प्रलय-काल उपस्थित होनेपर वे सभी पुण्यात्मा (व्यासादि) ब्रह्माके साथ ही परम पदमें प्रवेश करते हैं॥ २८३-२८४॥
ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे।<br>परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम्॥ २८४॥<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन धर्मार्थं वेदमाश्रयेत्।<br>धर्मेण सहितं ज्ञानं परं ब्रह्म प्रकाशयेत्॥ २८५॥इसलिये धर्मके (परिज्ञानके) लिये सभी प्रकारके प्रयत्नसे वेदका आश्रय ग्रहण करना चाहिये, (इससे) धर्मसहित ज्ञान और परम ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है॥ २८५॥
ये तु सङ्गान् परित्यज्य मामेव शरणं गताः।<br>उपासते सदा भक्त्या योगमैश्वरमास्थिताः॥ २८६॥जो सभी प्रकारकी आसक्तियोंका परित्याग कर अनन्यभावसे मेरी शरण ग्रहण कर लेते हैं, ईश्वर-सम्बन्धी योगमें स्थित होकर भक्तिपूर्वक सदा मेरी उपासना करते हैं, सभी प्राणियोंपर दया करते हैं, शान्त, जितेन्द्रिय, मात्सर्यरहित, मानरहित, बुद्धिमान् तपस्वी तथा व्रतपरायण हैं, मुझमें जिनका चित्त और प्राण लगा हुआ है, मेरे तत्त्व-वर्णनमें ही जो लगे हुए हैं ऐसे संन्यासी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा ब्रह्मचारी जो कोई भी हों, उन नित्य भक्तिमें लगे हुए भक्तोंके माया-तत्त्वसे उत्पन्न सम्पूर्ण अन्धकारका ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा मैं अविलम्ब ही विनाश कर देती हूँ। अद्वितीय ज्ञानके द्वारा जिनके अन्धकारका भलीभाँति विनाश हो गया है ऐसे ही मत्परायण (भक्त) सदा आनन्दित रहते हैं और संसारमें बार-बार जन्म नहीं लेते॥ २८६-२९०॥
सर्वभूतदयावन्तः शान्ता दान्ता विमत्सराः।<br>अमानिनो बुद्धिमन्तस्तपसाः शंसितव्रताः॥ २८७॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा मज्ज्ञानकथने रताः।<br>संन्यासिनो गृहस्थाश्च वनस्था ब्रह्मचारिणः॥ २८८॥
तेषां नित्याभियुक्तानां मायातत्त्वसमुत्थितम्।<br>नाशयामि तमः कृत्स्नं ज्ञानदीपेन मा चिरात्॥ २८९॥
ते सुनिर्धूततमसो ज्ञानेनैकेन मन्मयाः।<br>सदानन्दास्तु संसारे न जायन्ते पुनः पुनः॥ २९०॥
तस्मात् सर्वप्रकारेण मद्भक्तो मत्परायणः।<br>मामेवार्चय सर्वत्र मेनया सह संगतः॥ २९१॥इसलिये सब प्रकारसे मेरे भक्त और मेरे परायण रहते हुए (तुम) मेनाके साथ सर्वत्र मेरी ही अर्चना करो। यदि तुम मेरे ऐश्वर्यसम्पन्न अव्यय-स्वरूपका ध्यान करनेमें असमर्थ हो तो मेरे आदिकालस्वरूप कलात्मक रूपकी शरण ग्रहण करो। तात! मेरा जो-जो भी रूप आपके मनको अभीष्ट हो, उसीमें निष्ठा रखो और उसीके परायण होकर उसकी ही आराधनामें संलग्न रहो॥ २९१-२९३॥
अशक्तो यदि मे ध्यातुमैश्वरं रूपमव्ययम्।<br>ततो मे सकलं रूपं कालाद्यं शरणं व्रज॥ २९२॥
यद् यत् स्वरूपं मे तात मनसो गोचरं भवेत्।<br>तन्निष्ठस्तत्परो भूत्वा तदर्चनपरो भव॥ २९३॥
यत्तु मे निष्कलं रूपं चिन्मात्रं केवलं शिवम्।<br>सर्वोपाधिविनिर्मुक्तमनन्तममृतं परम्॥ २९४॥मेरा जो कलारहित, चिन्मात्र, अद्वितीय, कल्याणकारी, सभी उपाधियोंसे सर्वथा मुक्त, अनन्त, अमर एवं परमरूप है, वह परमपद एकमात्र ज्ञानके द्वारा बड़े ही कष्टसे प्राप्त किया जाता है। ज्ञानका साक्षात्कार करनेवाले लोग मुझमें ही प्रवेश करते हैं॥ २९४-२९५॥
ज्ञानेनैकेन तल्लभ्यं क्लेशेन परमं पदम्।<br>ज्ञानमेव प्रपश्यन्तो मामेव प्रविशन्ति ते॥ २९५॥
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