भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८४ * कूर्मपुराण *

नान्यतो जायते धर्मो वेदाद् धर्मो हि निर्बभौ।<br>तस्मान्मुमुक्षुर्धर्मार्थी मद्रूपं वेदमाश्रयेत्॥ २६७॥<br><br>ममैवैषा परा शक्तिर्वेदसंज्ञा पुरातनी।<br>ऋग्यजुःसामरूपेण सर्गादौ सम्प्रवर्तते॥ २६८॥धर्म किसी अन्यसे उत्पन्न नहीं होता, वेदसे ही धर्म निर्गत है। इसलिये धर्मार्थी एवं मुमुक्षुको चाहिये कि मेरे स्वरूपभूत वेदका आश्रय ग्रहण करे। मेरी ही यह ‘वेद’ नामवाली पुरातन परा शक्ति ऋक्, यजुष् तथा सामवेदके रूपमें सृष्टिके आदिमें प्रवर्तित होती है॥ २६७-२६८॥
तेषामेव च गुप्त्यर्थं वेदानां भगवानजः।<br>ब्राह्मणादीन् ससर्जाथ स्वे स्वे कर्मण्ययोजयत्॥ २६९॥<br><br>ये न कुर्वन्ति तद् धर्मं तदर्थं ब्रह्मनिर्मितम्।<br>तेषामधस्तान्रकांस्तामिस्रादीनकल्पयत्॥ २७०॥<br><br>न च वेदाद् ऋते किञ्चिच्छास्त्रधर्मभिधायकम्।<br>योऽन्यत्र रमते सोऽसौ न सम्भाष्यो द्विजातिभिः॥ २७१॥<br><br>यानि शास्त्राणि दृश्यन्ते लोकेऽस्मिन् विविधानि तु।<br>श्रुतिस्मृतिविरुद्धानि निष्ठा तेषां हि तामसी॥ २७२॥<br><br>कापालं पञ्चरात्रं च यामलं वाममार्हतम्।<br>एवंविधानि चान्यानि मोहनार्थानि तानि तु॥ २७३॥<br><br>ये कुशास्त्राभियोगेन मोहयन्तीह मानवान्।<br>मया सृष्टानि शास्त्राणि मोहायैषां भवान्तरे॥ २७४॥उन्हीं वेदोंकी रक्षाके लिये भगवान् ब्रह्माने ब्राह्मणादिको उत्पन्न कर अपने-अपने कर्मोंमें लगाया। ब्रह्माद्वारा बनाये गये उस (वेदविहित वर्णाश्रम) धर्मका जो पालन नहीं करते हैं, उनके लिये (ब्रह्माने) नीचेके लोकोंमें स्थित तामिस्र आदि नरकोंको बनाया है। धर्मका विधान करनेवाले अथवा धर्मको बतलानेवाले वेदको छोड़कर और अन्य कोई शास्त्र नहीं हैं। जो (वेदाभ्यासके अतिरिक्त) अन्यत्र मन लगाते हैं, द्विजातियोंके द्वारा वे सम्भाषण करने योग्य नहीं हैं। इस संसारमें श्रुति एवं स्मृतिके विरुद्ध जो विविध शास्त्र देखे जाते हैं, निश्चय ही उनमें निष्ठा (विश्वास) रखना तमोगुणी (निष्ठा) है। जो कुत्सित शास्त्रोंके प्रभावको बतलाकर मनुष्योंको मोहित करते हैं, इस संसारमें उन लोगोंको मोहित करनेके लिये मैंने (ऐसे) शास्त्रोंको बनाया है॥ २६९-२७४॥
वेदार्थवित्तमैः कार्यं यत् स्मृतं कर्म वैदिकम्।<br>तत् प्रयत्नेन कुर्वन्ति मत्प्रियास्ते हि ये नराः॥ २७५॥<br><br>वर्णानामनुकम्पार्थं मन्नियोगाद् विराट् स्वयम्।<br>स्वायम्भुवो मनुर्धर्मान् मुनीनां पूर्वमुक्तवान्॥ २७६॥<br><br>श्रुत्वा चान्येऽपि मुनयस्तन्मुखाद् धर्ममुत्तमम्।<br>चक्रुर्धर्मप्रतिष्ठार्थं धर्मशास्त्राणि चैव हि॥ २७७॥<br><br>तेषु चान्तर्हितेष्वेवं युगान्तेषु महर्षयः।<br>ब्रह्मणो वचनात् तानि करिष्यन्ति युगे युगे॥ २७८॥वेदके अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ विद्वानोंके द्वारा जिस कर्मको वेदसम्मत कहा गया है वही (कर्म) करणीय है और जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक उस कर्मको करते हैं, वे मुझे प्रिय हैं। प्राचीन कालमें विराट् (पुरुष) स्वायम्भुव मनुने सभी वर्णोंपर अनुग्रह करनेके लिये मेरी ही आज्ञासे (भृगु आदि) मुनियोंसे धर्म (मनुस्मृति) कहा था। उनके मुखसे श्रेष्ठ धर्मका श्रवणकर अन्य मुनियोंने भी धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये अन्य धर्मशास्त्रों (स्मृतियों)-की रचना की। प्रलयकालमें उनके (धर्मशास्त्रोंके) अन्तर्हित हो जानेपर प्रत्येक युगमें वे महर्षिगण ब्रह्माके कहनेपर पुनः उन शास्त्रोंकी रचना करते हैं॥ २७५-२७८॥
अष्टादश पुराणानि व्यासेन कथितानि तु।<br>नियोगाद् ब्रह्मणो राजंस्तेषु धर्मः प्रतिष्ठितः॥ २७९॥<br><br>अन्यान्युपपुराणानि तच्छिष्यैः कथितानि तु।<br>युगे युगेऽत्र सर्वेषां कर्ता वै धर्मशास्त्रवित्॥ २८०॥<br><br>शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्द एव च।<br>ज्योतिःशास्त्रं न्यायविद्या मीमांसा चोपबृंहणम्॥ २८१॥राजन्! ब्रह्माके आदेशसे व्यासजीने अठारह (महा-) पुराणोंको कहा है। उन (पुराणों)-में धर्म प्रतिष्ठित है। अन्य उपपुराण उन व्यासजीके शिष्योंद्वारा कहे गये हैं। यहाँ प्रत्येक युगमें इन सभी शास्त्रोंका कर्ता ही धर्मशास्त्रका ज्ञाता होता है। सत्तम! चार वेदोंसहित शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिषशास्त्र, न्यायविद्या, मीमांसा तथा उपबृंहण (इतिहास और पुराण)—॥ २७९-२८१॥