भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93
  • अध्याय ११ * ८३

एषा तवाम्बिका देवि किलाभूत् पितृकन्यका।<br>मेनाशेषजगन्मातुरहो पुण्यस्य गौरवम्॥ २५३॥<br><br>पाहि माममरेशानि मेनया सह सर्वदा।<br>नमामि तव पादाब्जं व्रजामि शरणं शिवाम्॥ २५४॥<br>अहो मे सुमहद् भाग्यं महादेवीसमागमात्।<br>आज्ञापय महादेवि किं करिष्यामि शंकरि॥ २५५॥<br><br>एतावदुक्त्वा वचनं तदा हिमगिरीश्वरः।<br>सम्प्रेक्षमाणो गिरिजां प्राञ्जलिः पार्श्वतोऽभवत्॥ २५६॥<br><br>अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतोऽरणिः।<br>सस्मितं प्राह पितरं स्मृत्वा पशुपतिं पतिम्॥ २५७॥<br>देव्युवाच<br>शृणुष्व चैतत् परमं गुह्यमीश्वरगोचरम्।<br>उपदेशं गिरिश्रेष्ठ सेवितं ब्रह्मवादिभिः॥ २५८॥<br><br>यन्मे साक्षात् परं रूपमैश्वरं दृष्टमद्भुतम्।<br>सर्वशक्तिसमायुक्तमनन्तं प्रेरकं परम्॥ २५९॥<br><br>शान्तः समाहितमना दम्भाहंकारवर्जितः।<br>तन्निष्ठस्तत्परो भूत्वा तदेव शरणं व्रज॥ २६०॥<br><br>भक्त्या त्वनन्यया तात मद्भावं परमाश्रितः।<br>सर्वयज्ञतपोदानैस्तदेवार्चय सर्वदा॥ २६१॥<br><br>तदेव मनसा पश्य तद् ध्यायस्व जपस्व च।<br>ममोपदेशात् संसारं नाशयामि तवानघ॥ २६२॥<br>अहं वै मत्परान् भक्तानैश्वरं योगमास्थितान्।<br>संसारसागरादस्मादुद्धराम्यचिरेण तु॥ २६३॥<br><br>ध्यानेन कर्मयोगेन भक्त्या ज्ञानेन चैव हि।<br>प्राप्याहं ते गिरिश्रेष्ठ नान्यथा कर्मकोटिभिः॥ २६४॥<br><br>श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यक् कर्म वर्णाश्रमात्मकम्।<br>अध्यात्मज्ञानसहितं मुक्तये सततं कुरु॥ २६५॥<br><br>धर्मात् संजायते भक्तिर्भक्त्या सम्प्राप्यते परम्।<br>श्रुतिस्मृतिभ्यामुदितो धर्मो यज्ञादिको मतः॥ २६६॥देवि! ये पितरोंकी कन्या मेना सम्पूर्ण संसारकी मातास्वरूप आपकी माता हैं, अहो! पुण्यके गौरवका क्या कहना? अमरेशानि! आप मेनाके साथ मेरी सर्वदा रक्षा करें। मैं आपके चरणकमलोंमें नमस्कार करता हूँ और आप कल्याणकारिणीकी शरणमें हूँ॥ २५३-२५४॥<br><br>अहो! महादेवीके (मेरे घर) आ जानेसे मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य हुआ। महादेवि! शंकरि! आप मुझे आज्ञा दें कि मैं क्या करूँ? ऐसा वचन कहकर वह गिरिराज हिमालय गिरिजाको देखते हुए एवं हाथ जोड़ते हुए उनके पास खड़े हो गये। जगत्की अरणि (मूल कारण)-रूप उस देवीने उनका (हिमवान्‌का) वचन सुनकर अपने पति पशुपति (शंकर)-का स्मरणकर मधुर-मधुर मुसकराते हुए पिता (हिमवान्)-से कहा- ॥ २५५-२५७॥<br><br>देवी बोलीं- गिरिश्रेष्ठ! ब्रह्मवादियोंद्वारा सेवित केवल ईश्वरको ज्ञात इस परम गुह्य उपदेशको सुनो। मेरे जिस सर्वशक्तिसम्पन्न, अनन्त, परम प्रेरक, अद्भुत एवं ऐश्वर्यसम्पन्न रूपको तुमने देखा है, शान्त एवं एकाग्रमन होकर, दम्भ और अहंकारका सर्वथा परित्यागकर, अत्यन्त निष्ठा रखकर, तत्परायण हो उसी (रूप)-की शरण ग्रहण करो। तात! अनन्य भक्तिपूर्वक मेरे श्रेष्ठ भावका आश्रय ग्रहणकर, सभी यज्ञ, तप, दान (आदि साधनों)-के द्वारा सदा उसी (रूप)-की अर्चना करो। मेरे उपदेशको मानकर मनसे उसी (रूप)-को देखो, उसीका ध्यान करो और उसीका जप करो। अनघ! मैं तुम्हारे संसार (भवबन्धन)-को विनष्ट कर दूँगी॥ २५८-२६२॥<br><br>ऐश्वर-योगमें स्थित अपने भक्तोंका मैं इस संसार-सागरसे शीघ्र ही उद्धार कर देती हूँ। गिरिश्रेष्ठ! मैं ध्यान, कर्मयोग, भक्ति तथा ज्ञानके द्वारा ही तुम्हारे लिये प्राप्य हूँ, दूसरे करोड़ों कर्मोंके द्वारा मुझे प्राप्त नहीं किया जा सकता। श्रुति तथा स्मृति-शास्त्रोंमें जो सम्यक् वर्णाश्रमकर्म (धर्म) बतलाया गया है, मुक्ति-प्राप्तिके लिये अध्यात्मज्ञानयुक्त उस (कर्म)-का निरन्तर आचरण करो। धर्मसे भक्ति उत्पन्न होती है और भक्तिसे परम (तत्त्व) प्राप्त होता है। श्रुति एवं स्मृतिद्वारा प्रतिपादित यज्ञादि कर्मको धर्म कहा गया है॥ २६३-२६६॥
संक्षिप्त कूर्मपुराण · पृष्ठ 93, कुल 506 में से · BharatKosha