भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८२* कूर्मपुराण *
द्विसप्तलोकात्मकमम्बुसंस्थं<br>विचित्रभेदं पुरुषैकनाथम्।<br>अनन्तभूतैरधिवासितं ते<br>नतोऽस्मि रूपं जगदण्डसंज्ञम्॥ २४३॥<br>अशेषवेदात्मकमेकमाद्यं<br>स्वतेजसा पूरितलोकभेदम्।<br>त्रिकालहेतुं परमेष्ठिसंज्ञं<br>नमामि रूपं रविमण्डलस्थम्॥ २४४॥<br>सहस्रमूर्धानमनन्तशक्तिं<br>सहस्रबाहुं पुरुषं पुराणम्।<br>शयानमन्तःसलिले तथैव<br>नारायणाख्यं प्रणतोऽस्मि रूपम्॥ २४५॥<br>दंष्ट्राकरालं त्रिदशाभिवन्द्यं<br>युगान्तकालानलकल्परूपम् ।<br>अशेषभूताण्डविनाशहेतुं<br>नमामि रूपं तव कालसंज्ञम्॥ २४६॥चौदह लोकात्मक, जलमें अवस्थित, विचित्र भेदवाले, परम पुरुषको ही अपना स्वामी स्वीकार करनेवाले, अनन्त प्राणियोंके निवासस्थान, उस जगदण्ड (ब्रह्माण्ड)-संज्ञक आपके रूपको मैं नमस्कार करता हूँ। (मैं) समग्र वेदरूप, अद्वितीय, आदि, अपने तेजसे सम्पूर्ण संसारको व्याप्त करनेवाले, तीनों कालोंके कारण तथा सूर्यमण्डलमें प्रतिष्ठित परमेष्ठी नामवाले रूपको नमस्कार करता हूँ। जो हजारों सिरवाले हैं, अनन्त शक्ति-सम्पन्न हैं, हजारों हाथवाले हैं तथा जलके मध्यमें शयन करनेवाले हैं, मैं उन 'नारायण' नामसे प्रसिद्ध पुराणपुरुषके रूपको प्रणाम करता हूँ। (देवि!) आपका जो रूप भयंकर दाढ़वाला, देवताओंद्वारा सब प्रकारसे वन्दनीय, प्रलयकालीन अग्निके समान रूपवाला और सम्पूर्ण प्राणियोंके विनाशके लिये कारण-रूप है, मैं उस काल नामवाले रूपको नमस्कार करता हूँ॥ २४३-२४६॥
फणासहस्रेण विराजमानं<br>भोगीन्द्रमुख्यैरभिपूज्यमानम् ।<br>जनार्दनारूढतनुं प्रसुप्तं<br>नतोऽस्मि रूपं तव शेषसंज्ञम्॥ २४७॥<br><br>अव्याहतैश्वर्यमयुग्मनेत्रं<br>ब्रह्मामृतानन्दरसज्ञमेकम् ।<br>युगान्तशेषं दिवि नृत्यमानं<br>नतोऽस्मि रूपं तव रुद्रसंज्ञम्॥ २४८॥<br><br>प्रहीणशोकं विमलं पवित्रं<br>सुरासुरैरर्चितपादपद्मम् ।<br>सुकोमलं देवि विशालशुभ्रं<br>नमामि ते रूपमिदं नमामि॥ २४९॥(देवि!) मैं आपके शेष नामवाले उस रूपको प्रणाम करता हूँ, जो हजारों फणोंसे सुशोभित है, प्रधान-प्रधान नागराजोंसे पूजित है, जनार्दन नामसे शरीर धारण किये हुए है तथा प्रगाढ़ निद्रामें है। जिसका ऐश्वर्य अव्याहत (अबाधित) है, जिसके नेत्र विषम हैं, (जो तीन नेत्रोंसे युक्त है), जो ब्रह्मके अमृतरूपी आनन्द-रसको जाननेवाला है, अद्वितीय है, प्रलयकालमें स्थित रहनेवाला है और जो द्युलोकमें नृत्य करता रहता है (देवि!) मैं आपके उस रुद्र नामवाले रूपको प्रणाम करता हूँ। देवि! (मैं) शोकसे सर्वथा शून्य, निर्मल, पवित्र, देवताओं तथा असुरोंसे पूजित चरणकमलवाले आपके अत्यन्त कोमल, विशाल एवं उज्ज्वल इस रूपको नमस्कार करता हूँ, बार-बार नमस्कार करता हूँ।
ॐ नमस्ते महादेवि नमस्ते परमेश्वरि।<br>नमो भगवतीशानि शिवायै ते नमो नमः॥ २५०॥महादेवि! आपको नमस्कार है, परमेश्वरि! आपको नमस्कार है। भगवती ईशानीको नमस्कार है, कल्याणरूपिणी आपको बार-बार नमस्कार है॥ २४७-२५०॥
त्वन्मयोऽहं त्वदाधारस्त्वमेव च गतिर्मम।<br>त्वामेव शरणं यास्ये प्रसीद परमेश्वरि॥ २५१॥<br><br>मया नास्ति समो लोके देवो वा दानवोऽपि वा।<br>जगन्मातैव मत्पुत्री सम्भूता तपसा यतः॥ २५२॥मैं आपसे व्याप्त हूँ, आप मेरे आधार हैं और आप ही मेरी गति हैं। परमेश्वरि! मैं आपकी ही शरण ग्रहण करता हूँ, आप (मुझपर) प्रसन्न हों। मेरे समान संसारमें देवता या दानव कोई भी नहीं है, क्योंकि (मेरे) तपके कारण आप जगन्माता ही मेरी पुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुई हैं॥ २५१-२५२॥