संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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* अध्याय ११ * ८१
| पुंसां त्वमेकः पुरुषः सर्वभूतहृदि स्थितः।<br>सर्वोपनिषदां देवि गुह्योपनिषदुच्यसे॥ २३२॥<br><br>ईशानश्चासि कल्पानां युगानां कृतमेव च।<br>आदित्यः सर्वमार्गाणां वाचां देवी सरस्वती॥ २३३॥<br><br>त्वं लक्ष्मीश्चारुरूपाणां विष्णुर्मायाविनामसि।<br>अरुन्धती सतीनां त्वं सुपर्णः पततामसि॥ २३४॥<br><br>सूक्तानां पौरुषं सूक्तं ज्येष्ठसाम च सामसु।<br>सावित्री चासि जप्यानां यजुषां शतरुद्रियम्॥ २३५॥ | पुरुषोंमें जो (उत्तम) पुरुष है और जो सभी प्राणियोंके हृदयमें रहनेवाला है, वह एकमात्र आप ही हैं। देवि! आप सभी उपनिषदोंमें गुह्योपनिषत् कही जाती हैं। कल्पोंमें आप ईशानकल्प हैं और युगोंमें सत्ययुग हैं। सभी भ्रमण करनेवालों (ग्रह-नक्षत्रों आदि)-में आदित्य (सूर्य) तथा वाणियोंमें सरस्वती देवी हैं। सुन्दर रूपवालोंमें आप लक्ष्मी और मायावियोंमें विष्णु हैं। आप पतिव्रताओंमें अरुन्धती तथा पक्षियोंमें गरुड हैं। आप सूक्तोंमें पुरुषसूक्त, सामगानोंमें ज्येष्ठ साम हैं। जपने योग्य मन्त्रोंमें सावित्री मन्त्र और यजुर्वेदके मन्त्रोंमें शतरुद्रिय आप ही हैं॥ २३२—२३५॥ |
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| पर्वतानां महामेरुरनन्तो भोगिनामसि।<br>सर्वेषां त्वं परं ब्रह्म तन्मयं सर्वमेव हि॥ २३६॥<br>रूपं तवाशेषकलाविहीन-<br>मगोचरं निर्मलमेकरूपम्।<br>अनादिमध्यान्तमनन्तमाद्यं<br>नमामि सत्यं तमसः परस्तात्॥ २३७॥<br>यदेव पश्यन्ति जगत्प्रसूतिं<br>वेदान्तविज्ञानविनिश्चिताsubार्थः ।<br>आनन्दमात्रं प्रणवाभिधानं<br>तदेव रूपं शरणं प्रपद्ये॥ २३८॥<br>अशेषभूतान्तरसंनिविष्टं<br>प्रधानपुंयोगवियोगहेतुम् ।<br>तेजोमयं जन्मविनाशहीनं<br>प्राणाभिधानं प्रणतोऽस्मि रूपम्॥ २३९॥ | आप पर्वतोंमें महामेरु और सर्पोंमें अनन्त (नाग) हैं। सभीमें आप परब्रह्म हैं, सब कुछ आपमें ही व्याप्त है। मैं आपके तमोगुणसे परे रहनेवाले उस सत्यरूपको नमस्कार करता हूँ जो समस्त कलाओंसे रहित, अगोचर, निर्मल, अद्वितीय, आदि, मध्य तथा अन्तरहित, अनन्त और आदिरूप हैं। वेदान्तरूपी विज्ञानके अर्थका निश्चय करनेवाले, जगत्के उत्पादक प्रणव नामवाले जिस अद्वितीय आनन्दका साक्षात्कार करते हैं, मैं उसी रूपकी शरण ग्रहण करता हूँ। (मैं) समस्त प्राणियोंके भीतर रहनेवाले, प्रधान और पुरुषके संयोग तथा वियोगके कारण, उत्पत्ति एवं विनाशसे रहित तथा तेजोमय उस प्राण नामवाले रूपको प्रणाम करता हूँ॥ २३६—२३९॥ |
| आद्यन्तहीनं जगदात्मभूतं<br>विभिन्नसंस्थं प्रकृतेः परस्तात्।<br>कूटस्थमव्यक्तवपुस्तवैव<br>नमामि रूपं पुरुषाभिधानम्॥ २४०॥<br>सर्वाश्रयं सर्वजगद्विधानं<br>सर्वत्रगं जन्मविनाशहीनम् ।<br>सूक्ष्मं विचित्रं त्रिगुणं प्रधानं<br>नतोऽस्मि ते रूपमलुप्तभेदम्॥ २४१॥<br>आद्यं महत् ते पुरुषात्मरूपं<br>प्रकृत्यवस्थं त्रिगुणात्मबीजम्।<br>ऐश्वर्यविज्ञानविरागधर्मैः<br>समन्वितं देवि नतोऽस्मि रूपम्॥ २४२॥ | (मैं) आदि तथा अन्तसे रहित, संसारके आत्मारूप, अनेक रूपोंमें स्थित, प्रकृतिसे परे रहनेवाले, कूटस्थ एवं अव्यक्त शरीर धारण करनेवाले पुरुष नामक आपके रूपको नमस्कार करता हूँ। मैं सभीके आश्रयरूप, सम्पूर्ण संसारका विधान करनेवाले, सर्वत्र व्याप्त, जन्म और मरणसे रहित, सूक्ष्म, विचित्र, त्रिगुणात्मक, प्रधानस्वरूप तथा अलुप्त भेदवाले आपके रूपको प्रणाम करता हूँ। देवि! आपका जो आद्य, महान्, पुरुषात्मक रूप है, जो प्रकृतिमें अवस्थित है, त्रिगुणात्मक मूल बीजरूप है तथा ऐश्वर्य, विज्ञान और विराग-धर्मोंसे समन्वित है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ॥ २४०—२४२॥ |