संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० * कूर्मपुराण *
| तदीदृशं समालोक्य स्वरूपं शैलसत्तमः।<br>भीतिं संत्यज्य हृष्टात्मा बभाषे परमेश्वरीम् ॥ २१८॥<br><br>हिमवानुवाच<br><br>अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः।<br>यन्मे साक्षात्त्वमव्यक्ता प्रसन्ना दृष्टिगोचरा ॥ २१९ ॥<br><br>त्वया सृष्टं जगत् सर्वं प्रधानाद्यं त्वयि स्थितम्।<br>त्वय्येव लीयते देवि त्वमेव च परा गतिः ॥ २२० ॥<br><br>वदन्ति केचित् त्वामेव प्रकृतिं प्रकृतेः पराम्।<br>अपरे परमार्थज्ञाः शिवेति शिवसंश्रये ॥ २२१ ॥<br><br>त्वयि प्रधानं पुरुषो महान् ब्रह्मा तथेश्वरः।<br>अविद्या नियतिर्माया कलाद्याः शतशोऽभवन् ॥ २२२ ॥<br><br>त्वं हि सा परमा शक्तिरनन्ता परमेष्ठिनी।<br>सर्वभेदविनिर्मुक्ता सर्वभेदाश्रया निजा ॥ २२३ ॥<br><br>त्वामधिष्ठाय योगेशि महादेवो महेश्वरः।<br>प्रधानाद्यं जगत् कृत्स्नं करोति विकरोति च ॥ २२४॥<br><br>त्वयैव संगतो देवः स्वमानन्दं समश्नुते।<br>त्वमेव परमानन्दस्त्वमेवानन्ददायिनी ॥ २२५ ॥<br><br>त्वमक्षरं परं व्योम महज्ज्योतिर्निरञ्जनम्।<br>शिवं सर्वगतं सूक्ष्मं परं ब्रह्म सनातनम् ॥ २२६ ॥<br><br>त्वं शक्रः सर्वदेवानां ब्रह्मा ब्रह्मविदामसि।<br>वायुर्बलवतां देवि योगिनां त्वं कुमारकः ॥ २२७ ॥<br><br>ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं व्यासो वेदविदामसि।<br>सांख्यानां कपिलो देवो रुद्राणामसि शंकरः ॥ २२८ ॥<br><br>आदित्यानामुपेन्द्रस्त्वं वसूनां चैव पावकः।<br>वेदानां सामवेदस्त्वं गायत्री छन्दसामसि ॥ २२९ ॥<br><br>अध्यात्मविद्या विद्यानां गतीनां परमा गतिः।<br>माया त्वं सर्वशक्तीनां कालः कलयतामसि ॥ २३० ॥<br><br>ओङ्कारः सर्वगुह्यानां वर्णानां च द्विजोत्तमः।<br>आश्रमाणां च गार्हस्थ्यमीश्वराणां महेश्वरः ॥ २३१ ॥ | पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् देवीके इस प्रकारके (सौम्य) स्वरूपको देखकर भयका परित्यागकर प्रसन्न-मन होकर परमेश्वरीसे कहने लगे— ॥ २१८॥<br><br>हिमवान् बोले—मेरा जन्म लेना आज सफल हो गया, आज मेरा तप सफल हो गया, जो मुझे अव्यक्तस्वरूपा आप प्रसन्न होकर दृष्टिगोचर हुई हैं। देवि ! आपके द्वारा सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि हुई है, आपमें प्रधानादि प्रतिष्ठित हैं और आपमें ही (वह सब) लीन भी हो जाता है। आप ही परम गति भी हैं। शिवके आश्रयमें रहनेवाली देवि ! कुछ लोग आपको ही प्रकृति तथा प्रकृतिसे परे कहते हैं और दूसरे परमार्थको जाननेवाले आपको शिवा कहते हैं। आपमें प्रधान, पुरुष, महान्, ब्रह्मा तथा ईश्वर (प्रतिष्ठित हैं)। (आपसे) अविद्या, नियति, माया और सैकड़ों कला आदिकी उत्पत्ति हुई है ॥ २१९–२२२ ॥<br><br>आप ही वह परमा शक्ति, अनन्ता और परमेष्ठिनी हैं। आप सभी भेदोंसे विनिर्मुक्त और सभी भेदोंके आश्रय एवं स्वयं प्रतिष्ठित हैं। हे योगेश्वरी ! आपमें ही अधिष्ठित होकर महादेव महेश्वर प्रधान आदि सम्पूर्ण जगत्की रचना करते हैं और फिर (उसका) संहार करते हैं। आपके ही संयोगसे महादेव स्वात्मानन्दका उपभोग करते हैं। आप ही परमानन्द (रूपा) और आप ही आनन्द प्रदान करनेवाली हैं। आप अक्षर, परमव्योम, महान् ज्योति, निरञ्जन, कल्याणरूप, सर्वगत, सूक्ष्म एवं सनातन परम ब्रह्म हैं। देवि ! आप सभी देवताओंमें इन्द्र (रूप) और ब्रह्मज्ञानियोंमें ब्रह्मा (रूप) हैं। (आप) बलवानोंमें वायु (रूप) तथा योगियोंमें कुमारक (सनत्कुमार) हैं ॥ २२३–२२७ ॥<br><br>आप ऋषियोंमें वसिष्ठ, वेदविदोंमें व्यास हैं। सांख्यशास्त्रके जाननेवालोंमें कपिलदेव तथा रुद्रोंमें शंकर हैं। आप आदित्योंमें उपेन्द्र (विष्णु) तथा वसुओंमें पावक हैं। वेदोंमें आप सामवेद तथा छन्दोंमें गायत्री छन्द हैं। विद्याओंमें अध्यात्मविद्या तथा गतियोंमें परम गति हैं। आप सभी शक्तियोंमें माया और संहार करनेवालोंमें काल (रूप) हैं। आप सभी गुह्योंमें ओंकार और वर्णोंमें द्विजोत्तम हैं। आश्रमोंमें गृहस्थाश्रम तथा ईश्वरोंमें महेश्वर हैं ॥ २२८–२३१ ॥ |