संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 89, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 89
| * अध्याय ११ * | ७९ |
|---|---|
| शक्रासनगता शाक्री साध्वी नारी शवासना।<br>इष्टा विशिष्टा शिष्टेष्टा शिष्टाशिष्टप्रपूजिता ॥ २०४ ॥<br>शतरूपा शतावर्ती विनता सुरभिः सुरा।<br>सुरेन्द्रमाता सुद्युम्ना सुषुम्ना सूर्यसंस्थिता ॥ २०५ ॥<br>समीक्ष्या सत्प्रतिष्ठा च निवृत्तिर्ज्ञानपारगा।<br>धर्मशास्त्रार्थकुशला धर्मज्ञा धर्मवाहना ॥ २०६ ॥ | शक्रासनगता, शाक्री, साध्वी, नारी, शवासना, इष्टा, विशिष्टा, शिष्टेष्टा, शिष्टाशिष्टप्रपूजिता, शतरूपा, शतावर्ता, विनता, सुरभि, सुरा, सुरेन्द्रमाता, सुद्युम्ना, सुषुम्ना, सूर्यसंस्थिता, समीक्ष्या, सत्प्रतिष्ठा, निवृत्ति, ज्ञानपारगा, धर्मशास्त्रार्थकुशला, धर्मज्ञा, धर्मवाहना ॥ २०४-२०६ ॥ |
| धर्माधर्मविनिर्मात्री धार्मिकाणां शिवप्रदा।<br>धर्मशक्तिर्धर्ममयी विधर्मा विश्वधर्मिणी ॥ २०७ ॥<br>धर्मान्तरा धर्ममेघा धर्मपूर्वा धनावहा।<br>धर्मोपदेष्ट्री धर्मात्मा धर्मगम्या धराधरा ॥ २०८ ॥<br>कापाली शाकला मूर्तिः कला कलितविग्रहा।<br>सर्वशक्तिविनिर्मुक्ता सर्वशक्त्याश्रयाश्रया ॥ २०९ ॥<br>सर्वा सर्वेश्वरी सूक्ष्मा सुसूक्ष्मा ज्ञानरूपिणी।<br>प्रधानपुरुषेशेशा महादेवैकसाक्षिणी।<br>सदाशिवा वियन्मूर्तिर्विश्वमूर्तिरमूर्तिका ॥ २१० ॥ | धर्माधर्मविनिर्मात्री, धार्मिकाणां शिवप्रदा (धार्मिकोंका कल्याण करनेवाली), धर्मशक्ति, धर्ममयी, विधर्मा, विश्वधर्मिणी, धर्मान्तरा, धर्ममेघा, धर्मपूर्वा, धनावहा, धर्मोपदेष्ट्री, धर्मात्मा, धर्मगम्या, धराधरा, कापाली, शाकला, मूर्ति, कला, कलितविग्रहा, सर्वशक्तिविनिर्मुक्ता, सर्वशक्त्याश्रयाश्रया, सर्वा, सर्वेश्वरी, सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, ज्ञानरूपिणी, प्रधानपुरुषेशेशा, महादेवैकसाक्षिणी, सदाशिवा, वियन्मूर्ति, विश्वमूर्ति तथा अमूर्तिका—(के नामसे प्रसिद्ध) हैं॥ २०७-२१० ॥ |
| एवं नाम्नां सहस्रेण स्तुत्वासौ हिमवान् गिरिः।<br>भूयः प्रणम्य भीतात्मा प्रोवाचेदं कृताञ्जलिः ॥ २११ ॥ | इस प्रकार हजार नामोंसे (देवीकी) स्तुति करके वे भयभीत हिमवान् पर्वत पुनः प्रणाम कर हाथ जोड़ते हुए इस प्रकार बोले— ॥ २११ ॥ |
| यदेतदैश्वरं रूपं घोरं ते परमेश्वरि।<br>भीतोऽस्मि साम्प्रतं दृष्ट्वा रूपमन्यत् प्रदर्शय ॥ २१२ ॥ | हे परमेश्वरि ! यह जो आपका घोर ऐश्वर (विराट्)-रूप है, उसे देखकर मैं इस समय भयभीत हो गया हूँ, आप अपना दूसरा (सौम्य) रूप मुझे दिखायें। उस (हिमवान्) पर्वतके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उन देवी पार्वती ने अपने उस विराट् रूपको समेटकर दूसरा (सौम्य) रूप उन्हें दिखलाया ॥ २१२-२१३ ॥ |
| एवमुक्ताथ सा देवी तेन शैलेन पार्वती।<br>संहृत्य दर्शयामास स्वरूपमपरं पुनः ॥ २१३ ॥<br>नीलोत्पलदलप्रख्यं नीलोत्पलसुगन्धिकम्।<br>द्विनेत्रं द्विभुजं सौम्यं नीलालकविभूषितम् ॥ २१४ ॥ | (देवीका वह रूप) नीले कमलदलके समान (नीलवर्णवाला), नीलकमलके समान सुगन्धियुक्त, दो नेत्र एवं दो भुजावाला, सौम्य, नीले अलकोंसे विभूषित, |
| रक्तपादाम्बुजतलं सुरक्तकरपल्लवम्।<br>श्रीमद् विशालसंवृत्तललाटतिलकोज्ज्वलम् ॥ २१५ ॥ | रक्तकमलके समान चरणतलवाला, सुन्दर लाल पल्लवके समान हाथवाला, श्रीयुक्त (वह रूप) विशाल एवं प्रशस्त ललाटपर लगे तिलकसे प्रफुल्लित (था)। (उसके) सभी अङ्ग अत्यन्त कोमल, सुन्दर तथा भूषणोंसे आभूषित थे। (उन देवीने) स्वर्णनिर्मित विशाल मालाको अपने |
| भूषितं चारुसर्वाङ्गं भूषणैरतिकोमलम्।<br>दधानमुरसा मालां विशालां हेमनिर्मिताम् ॥ २१६ ॥ | वक्षःस्थलपर धारण कर रखा था। सुन्दर बिम्बफलके समान (रक्त) ओठ मन्द मधुर मुसकानयुक्त था। (चरणोंमें धारण किये) नूपुरोंसे ध्वनि निकल रही थी। |
| ईषत्स्मितं सुबिम्बोष्ठं नूपुरारावसंयुतम्।<br>प्रसन्नवदनं दिव्यमनन्तमहिमास्पदम् ॥ २१७ ॥ | (देवीका वह रूप) प्रसन्न मुखवाला तथा दिव्य एवं अनन्त महिमामें प्रतिष्ठित था ॥ २१४-२१७ ॥ |