संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३१८ * कूर्मपुराण *
| गत्वा वनं वा विधिवज्जुहुयाज्जातवेदसम्।<br>अधीयीत सदा नित्यं ब्रह्मनिष्ठः समाहितः॥ ८६॥<br><br>सावित्रीं शतरुद्रीयं वेदान्तांश्च विशेषतः।<br>अभ्यसेत् सततं युक्तो भस्मस्नानपरायणः॥ ८७॥<br><br>एतद् विधानं परमं पुराणं<br>वेदागमे सम्यगिहेरितां वः।<br>पुरा महर्षिप्रवराभिपृष्टः<br>स्वायम्भुवो यन्मनुराह देवः ॥ ८८॥<br><br>एवमीश्वरसमर्पितान्तरो<br>योऽनुतिष्ठति विधिं विधानवित्।<br>मोहजालमपहाय सोऽमृतो<br>याति तत् पदमनामयं शिवम् ॥ ८९॥ | अथवा (गुरु, गुरुपत्नी या उनके किसी सपिण्डके न रहनेपर) वनमें जाकर विधिपूर्वक अग्निमें हवन करना चाहिये और समाहित होकर ब्रह्ममें अत्यन्त निष्ठा रखते हुए नित्य वेदाभ्यास करना चाहिये। नित्य भस्म-स्नान करते हुए गायत्री, शतरुद्रिय और वेदान्त-शास्त्रोंका विशेष रूपसे निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये॥ ८६-८७॥<br><br>वेदज्ञानकी प्राप्तिका यह सनातन विधान आप लोगोंको बतलाया गया, प्राचीन कालमें श्रेष्ठ महर्षियोंके पूछनेपर भगवान् स्वायम्भुव मनुने स्वयं ही इसे कहा था। इस प्रकार अपने अन्तःकरणको ईश्वरमें समर्पित करके विधानको जाननेवाले जो पुरुष इस (ब्रह्मचर्य) विधिक अनुष्ठान (यथावत् पालन) करता है, वह क्रमशः समस्त मोह-जालका परित्यागकर, अमर होते हुए अनामय शिवपदको प्राप्त करता है तथा अमर हो जाता है अर्थात् ब्रह्मस्वरूप होकर कृतकृत्य हो जाता है॥ ८८-८९॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १४॥
पंद्रहवाँ अध्याय
गृहस्थधर्म तथा गृहस्थके सदाचारका वर्णन, धर्माचरण एवं सत्यधर्मकी महिमा
| व्यास उवाच<br><br>वेदं वेदौ तथा वेदान् वेदान् वा चतुरो द्विजाः।<br>अधीत्य चाधिगम्यार्थं ततः स्नायाद् द्विजोत्तमः ॥ १॥<br><br>गुरवे तु वरं दत्त्वा स्नायीत तदनुज्ञया।<br>चीर्णव्रतोऽथ युक्तात्मा सशक्तः स्नातुमर्हति ॥ २॥<br><br>वैणवीं धारयेद् यष्टिमन्तर्वासस्तथोत्तरम्।<br>यज्ञोपवीतद्वितयं सोदकं च कमण्डलुम् ॥ ३॥<br><br>छत्रं चोष्णीषममलं पादुके चाप्युपानहौ।<br>रौक्मे च कुण्डले वेदं कृत्तकेशनखः शुचिः ॥ ४॥ | **व्यासजीने कहा—**द्विजो ! द्विजोत्तमको चाहिये कि वह एक वेद, दो वेद (तीन) वेद अथवा वेदोंका अध्ययन कर और वेदके अर्थका ज्ञान प्राप्तकर स्नान (संस्कार-विशेष— समावर्तन) करे। गुरुको दक्षिणा निवेदित कर उनकी आज्ञासे स्नान (समावर्तन) करे। व्रत (ब्रह्मचर्यव्रत) पूर्णकर उसके फलस्वरूप शक्ति-सम्पन्न युक्तात्मा द्विज स्नान (समावर्तन)-का अधिकारी होता है॥ १-२॥<br><br>(स्नातकको) बाँसकी छड़ी, कौपीन, धोती तथा उत्तरीय वस्त्र (चद्दर), दो यज्ञोपवीत, जलपूर्ण कमण्डलु, छाता, सुन्दर स्वच्छ पगड़ी, खड़ाऊँ, जूता, दो स्वर्णकुण्डल और वेद (कुशमुष्टि) धारण करना चाहिये तथा केश और नखोंको कटवाकर स्वच्छ रहना चाहिये॥ ३-४॥ |