भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १५ * ३१९

स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद् बहिर्माल्यं न धारयेत्।<br>अन्यत्र काञ्चनाद् विप्रो न रक्तां बिभृयात् स्रजम्॥ ५ ॥(स्नातकको) नित्य स्वाध्याय करना चाहिये। केशकलापसे बाहर माला नहीं धारण करनी चाहिये¹। सोनेकी मालाको छोड़कर ब्राह्मणको रक्तवर्णकी माला धारण नहीं करनी चाहिये॥ ५ ॥
शुक्लाम्बरधरो नित्यं सुगन्धः प्रियदर्शनः।<br>न जीर्णमलवद्वासा भवेद् वै विभवे सति॥ ६ ॥<br><br>न रक्तमुल्बणं चान्यधृतं वासो न कुण्डिकाम्।<br>नोपानहौ स्रजं चाथ पादुके च प्रयोजयेत्॥ ७ ॥<br><br>उपवीतमलंकारं दर्भान् कृष्णाजिनानि च।<br>नापसव्यं परिदध्याद् वासो न विकृतं वसेत्॥ ८ ॥उसे नित्य सफेद एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिये तथा सुगन्धित द्रव्य—इत्र आदि धारणकर सदा सुगन्धयुक्त एवं सुवेशसे प्रियदर्शन होना चाहिये। धन रहनेपर पुराना और मैला वस्त्र धारण नहीं करना चाहिये। उद्वेगजनक अधिक लाल और दूसरोंद्वारा प्रयोग किया हुआ वस्त्र, कमण्डलु, जूता, माला तथा खड़ाऊँ नहीं धारण करना चाहिये। इसी प्रकार उसे (स्नातकको) दूसरे द्वारा (प्रयुक्त) यज्ञोपवीत, अलङ्कार, कुश और कृष्णमृगचर्मको धारण नहीं करना चाहिये²। अपसव्य नहीं रहना चाहिये, उसे विकृत (कटे-फटे) वस्त्रोंको धारण नहीं करना चाहिये॥ ६–८॥
आहरेद् विधिवद् दारान् सदृशानात्मनः शुभान्।<br>रूपलक्षणसंयुक्तान् योनिदोषविवर्जितान्॥ ९ ॥<br><br>अमातृगोत्रप्रभवामसमानर्षिगोत्रजाम् ।<br>आहरेद् ब्राह्मणो भार्यां शीलशौचसमन्विताम्॥ १०॥अपने समान (कुलके अनुरूप) शुभ, अच्छे रूप और लक्षणोंसे सम्पन्न, योनि-सम्बन्धी दोषोंसे रहित पत्नीको विधिपूर्वक ग्रहण करना चाहिये। ब्राह्मण (द्विज)-को अपनी माताके गोत्रमें जो उत्पन्न न हो तथा जो अपने आर्ष गोत्रमें उत्पन्न न हो, ऐसी शील और सदाचारसे सम्पन्न भार्याको ग्रहण करना चाहिये॥ ९-१०॥
ऋतुकालाभिगामी स्याद् यावत् पुत्रोऽभिजायते।<br>वर्जयेत् प्रतिषिद्धानि प्रयत्नेन दिनानि तु॥ ११॥<br><br>षष्ठ्यष्टमीं पञ्चदशीं द्वादशीं च चतुर्दशीम्।<br>ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं तद्द्जन्मत्रयाहनि॥ १२॥पुत्रके उत्पन्न होनेतक ऋतुकालमें अपनी स्त्रीसे सहवास करना चाहिये, किंतु निषिद्ध दिनोंका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्दशी, पूर्णिमाको और इसी प्रकार जन्मदिनसे तीन दिनपर्यन्त सदा ब्रह्मचर्य धारण करना चाहिये॥ ११-१२॥
आदधीतावसथ्याग्निं जुहुयाज्जातवेदसम्।<br>व्रतानि स्नातको नित्यं पावनानि च पालयेत्॥ १३ ॥<br><br>वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः।<br>अकुर्वाणः पतत्याशु नरकानतिभीषणान्॥ १४॥आवसथ्य (संस्कार-विशेषसे संस्कृत स्मार्त अग्नि) नामक अग्निकी स्थापना कर उसमें प्रतिदिन हवन करना चाहिये और नित्य पवित्र व्रतोंका पालन करना चाहिये। वेदमें बताये गये अपने कर्मोंको नित्य आलस्यरहित होकर करना चाहिये। इन्हें न करनेपर (स्नातक) शीघ्र ही अत्यन्त भयंकर नरकोंमें गिरता है॥ १३-१४॥

१-मनुस्मृति (४।७२)-के अनुसार 'बहिर्माल्य'का अर्थ है—केशकलापसे बाहर माला। इसका आशय यह है कि सिरके ऊपर माला न पहने। सिरके नीचे कण्ठमें माला पहननी चाहिये।
२-दाहिने कंधेके ऊपर तथा बाँयें हाथके नीचे यज्ञोपवीत जब रहता है तब अपसव्य कहा जाता है। ऐसा श्राद्ध आदि विशेष अवसरपर ही विहित है।