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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
  • अध्याय १५ * ३१९

स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद् बहिर्माल्यं न धारयेत्।<br>अन्यत्र काञ्चनाद् विप्रो न रक्तां बिभृयात् स्रजम्॥ ५ ॥(स्नातकको) नित्य स्वाध्याय करना चाहिये। केशकलापसे बाहर माला नहीं धारण करनी चाहिये¹। सोनेकी मालाको छोड़कर ब्राह्मणको रक्तवर्णकी माला धारण नहीं करनी चाहिये॥ ५ ॥
शुक्लाम्बरधरो नित्यं सुगन्धः प्रियदर्शनः।<br>न जीर्णमलवद्वासा भवेद् वै विभवे सति॥ ६ ॥<br><br>न रक्तमुल्बणं चान्यधृतं वासो न कुण्डिकाम्।<br>नोपानहौ स्रजं चाथ पादुके च प्रयोजयेत्॥ ७ ॥<br><br>उपवीतमलंकारं दर्भान् कृष्णाजिनानि च।<br>नापसव्यं परिदध्याद् वासो न विकृतं वसेत्॥ ८ ॥उसे नित्य सफेद एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिये तथा सुगन्धित द्रव्य—इत्र आदि धारणकर सदा सुगन्धयुक्त एवं सुवेशसे प्रियदर्शन होना चाहिये। धन रहनेपर पुराना और मैला वस्त्र धारण नहीं करना चाहिये। उद्वेगजनक अधिक लाल और दूसरोंद्वारा प्रयोग किया हुआ वस्त्र, कमण्डलु, जूता, माला तथा खड़ाऊँ नहीं धारण करना चाहिये। इसी प्रकार उसे (स्नातकको) दूसरे द्वारा (प्रयुक्त) यज्ञोपवीत, अलङ्कार, कुश और कृष्णमृगचर्मको धारण नहीं करना चाहिये²। अपसव्य नहीं रहना चाहिये, उसे विकृत (कटे-फटे) वस्त्रोंको धारण नहीं करना चाहिये॥ ६–८॥
आहरेद् विधिवद् दारान् सदृशानात्मनः शुभान्।<br>रूपलक्षणसंयुक्तान् योनिदोषविवर्जितान्॥ ९ ॥<br><br>अमातृगोत्रप्रभवामसमानर्षिगोत्रजाम् ।<br>आहरेद् ब्राह्मणो भार्यां शीलशौचसमन्विताम्॥ १०॥अपने समान (कुलके अनुरूप) शुभ, अच्छे रूप और लक्षणोंसे सम्पन्न, योनि-सम्बन्धी दोषोंसे रहित पत्नीको विधिपूर्वक ग्रहण करना चाहिये। ब्राह्मण (द्विज)-को अपनी माताके गोत्रमें जो उत्पन्न न हो तथा जो अपने आर्ष गोत्रमें उत्पन्न न हो, ऐसी शील और सदाचारसे सम्पन्न भार्याको ग्रहण करना चाहिये॥ ९-१०॥
ऋतुकालाभिगामी स्याद् यावत् पुत्रोऽभिजायते।<br>वर्जयेत् प्रतिषिद्धानि प्रयत्नेन दिनानि तु॥ ११॥<br><br>षष्ठ्यष्टमीं पञ्चदशीं द्वादशीं च चतुर्दशीम्।<br>ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं तद्द्जन्मत्रयाहनि॥ १२॥पुत्रके उत्पन्न होनेतक ऋतुकालमें अपनी स्त्रीसे सहवास करना चाहिये, किंतु निषिद्ध दिनोंका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्दशी, पूर्णिमाको और इसी प्रकार जन्मदिनसे तीन दिनपर्यन्त सदा ब्रह्मचर्य धारण करना चाहिये॥ ११-१२॥
आदधीतावसथ्याग्निं जुहुयाज्जातवेदसम्।<br>व्रतानि स्नातको नित्यं पावनानि च पालयेत्॥ १३ ॥<br><br>वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः।<br>अकुर्वाणः पतत्याशु नरकानतिभीषणान्॥ १४॥आवसथ्य (संस्कार-विशेषसे संस्कृत स्मार्त अग्नि) नामक अग्निकी स्थापना कर उसमें प्रतिदिन हवन करना चाहिये और नित्य पवित्र व्रतोंका पालन करना चाहिये। वेदमें बताये गये अपने कर्मोंको नित्य आलस्यरहित होकर करना चाहिये। इन्हें न करनेपर (स्नातक) शीघ्र ही अत्यन्त भयंकर नरकोंमें गिरता है॥ १३-१४॥

१-मनुस्मृति (४।७२)-के अनुसार 'बहिर्माल्य'का अर्थ है—केशकलापसे बाहर माला। इसका आशय यह है कि सिरके ऊपर माला न पहने। सिरके नीचे कण्ठमें माला पहननी चाहिये।
२-दाहिने कंधेके ऊपर तथा बाँयें हाथके नीचे यज्ञोपवीत जब रहता है तब अपसव्य कहा जाता है। ऐसा श्राद्ध आदि विशेष अवसरपर ही विहित है।

३२० * कूर्मपुराण *

अभ्यसेत् प्रयतो वेदं महायज्ञान् न हापयेत् ।<br>कुर्याद् गृह्याणि कर्माणि संध्योपासनमेव च ॥ १५ ॥<br><br>सख्यं समाधिकैः कुर्यादुपैयादीश्वरं सदा ।<br>दैवतान्यपि गच्छेत कुर्याद् भार्याभिपोषणम् ॥ १६ ॥<br><br>न धर्मं ख्यापयेद् विद्वान् न पापं गूहयेदपि ।<br>कुर्वीतात्महितं नित्यं सर्वभूतानुकम्पकः ॥ १७ ॥<br><br>वयसः कर्मणोऽर्थस्य श्रुतस्याभिजनस्य च ।<br>वेषवाग्बुद्धिसारूप्यमाचरन् विचरेत् सदा ॥ १८ ॥<br><br>श्रुतिस्मृत्युदितः सम्यक् साधुभिर्यश्च सेवितः ।<br>तमाचारं निषेवेत नेहेतान्यत्र कर्हिचित् ॥ १९ ॥<br><br>येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः ।<br>तेन यायात् सतां मार्गं तेन गच्छन् न रिष्यति ॥ २० ॥<br><br>नित्यं स्वाध्यायशीलः स्यान्नित्यं यज्ञोपवीतवान् ।<br>सत्यवादी जितक्रोधो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २१ ॥<br><br>संध्यास्नानपरो नित्यं ब्रह्मयज्ञपरायणः ।<br>अनसूयो मृदुर्दान्तो गृहस्थः प्रेत्य वर्धते ॥ २२ ॥<br><br>वीतरागभयक्रोधो लोभमोहविवर्जितः ।<br>सावित्रीजाप्यनिरतः श्राद्धकृन्मुच्यते गृही ॥ २३ ॥<br><br>मातापित्रोर्हिते युक्तो गोब्राह्मणहिते रतः ।<br>दान्तो यज्वा देवभक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ २४ ॥<br><br>त्रिवर्गसेवी सततं देवतानां च पूजनम्।<br>कुर्यादहरहर्नित्यं नमस्येत् प्रयतः सुरान् ॥ २५ ॥प्रयत्नपूर्वक वेदोंका अभ्यास करे। (पञ्च) महायज्ञोंका परित्याग न करे। अपने गृह्यसूत्रोंमें प्रतिपादित कर्मोंको करे और संध्योपासन कर्म करे ॥ १५ ॥<br><br>अपने समान अथवा श्रेष्ठ व्यक्तिसे मित्रता करे। ईश्वरकी आराधना करे। देवताओंकी भी पूजा करे और अपनी भार्याका भलीभाँति पोषण करे। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि (अपने द्वारा अनुष्ठित) धर्मका वर्णन न करे और न अपने द्वारा किये गये पापको ही छिपाये। आत्मकल्याणका प्रयत्न करे और सदैव सभी प्राणियोंपर दया करे। अपनी अवस्था, कर्म, सम्पत्ति, ज्ञान और कुलके अनुसार सदा वेष धारण करे तथा संयत-वाणी और बुद्धिसे यथोचित आचरण करते हुए लौकिक व्यवहारका निर्वाह करे। वेदों तथा धर्मशास्त्रोंमें जो कहा गया हो और जो सत्पुरुषोंसे भलीभाँति अनुष्ठित हो, उसी सदाचारका पालन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त कभी भी दूसरे आचारका पालन नहीं करना चाहिये ॥ १६–१९ ॥<br><br>यदि शास्त्रोंसे अपने मार्गका निर्धारण करनेमें किसी कारण असमर्थ्य हो तो (शास्त्रोक्त) जिस मार्गसे माता-पिता गये हों और पितामह आदिने जिस मार्गका अवलम्बन किया हो, उसी मार्गका स्वयं भी अनुसरण करना चाहिये। यही सज्जनोंका मार्ग है। इस मार्गका अवलम्बन करनेवालेका पतन नहीं होता ॥ २० ॥<br><br>नित्य स्वाध्यायपरायण रहे, नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहे। सत्य बोलनेवाला एवं क्रोधपर विजय प्राप्त करनेवाला, ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। नित्य स्नान और संध्या करनेवाला, ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याय)-परायण रहनेवाला, असूयारहित, मृदु तथा जितेन्द्रिय गृहस्थ परलोकमें अभ्युदय प्राप्त करता है। राग, भय और क्रोधसे रहित, लोभ एवं मोहसे शून्य, गायत्रीके जपमें तत्पर रहनेवाला और श्राद्ध करनेवाला गृहस्थ मुक्त हो जाता है। माता, पिता, गौ और ब्राह्मणके हित करनेमें निरत रहनेवाला, जितेन्द्रिय, यजन करनेवाला तथा देवताओंका भक्त ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। निरन्तर (धर्म, अर्थ एवं कामरूप) त्रिवर्गका पालन और देवताओंका पूजन करना चाहिये तथा प्रयत्नपूर्वक नित्य देवताओंको नमस्कार करना चाहिये ॥ २१–२५ ॥
  • अध्याय १५ * ३२१

विभागशीलः सततं क्षमायुक्तो दयालुकः।<br>गृहस्थस्तु समाख्यातो न गृहेण गृही भवेत्॥ २६॥<br><br>क्षमा दया च विज्ञानं सत्यं चैव दमः शमः।<br>अध्यात्मनिरतं ज्ञानमेतद् ब्राह्मणलक्षणम्॥ २७॥<br><br>एतस्मान्न प्रमाद्येत विशेषेण द्विजोत्तमः।<br>यथाशक्ति चरन् कर्म निन्दितानि विवर्जयेत्॥ २८॥<br><br>विधूय मोहकलिलं लब्ध्वा योगमनुत्तमम्।<br>गृहस्थो मुच्यते बन्धात् नात्र कार्या विचारणा॥ २९॥<br><br>विगर्हातिक्रमाक्षेपहिंसाबन्धवधात्मकम् ।<br>अन्यमन्युसमुत्थानां दोषाणां मर्षणां क्षमा॥ ३०॥<br><br>स्वदुःखेष्विव कारुण्यं परदुःखेषु सौहृदात्।<br>दयेति मुनयः प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य साधनम्॥ ३१॥<br><br>चतुर्दशानां विद्यानां धारणं हि यथार्थतः।<br>विज्ञानमिति तद् विद्याद् येन धर्मो विवर्धते॥ ३२॥<br><br>अधीत्य विधिवद् विद्यामर्थं चैवोपलभ्य तु।<br>धर्मकार्यान्निवृत्तश्चेन्न तद् विज्ञानमिष्यते॥ ३३॥<br><br>सत्येन लोकाञ्जयति सत्यं तत्परमं पदम्।<br>यथाभूतप्रवादं तु सत्यमाहुर्मनीषिणः॥ ३४॥<br><br>दमः शरीरोपरमः शमः प्रज्ञाप्रसादजः।<br>अध्यात्ममक्षरं विद्याद् यत्र गत्वा न शोचति॥ ३५॥अपनी सम्पत्तिका (शास्त्रानुसार यथायोग्य) सदा विभाग करनेवाला¹, क्षमावान्, दयायुक्त व्यक्ति ही गृहस्थ कहलाता है। केवल गृहमें रहनेसे कोई गृहस्थ नहीं कहलाता। क्षमा, दया, विशिष्ट ज्ञान (लौकिक एवं शास्त्रीय ज्ञान), सत्य, दम, शम और अध्यात्मज्ञानमें निरत होना—यह ब्राह्मणका लक्षण है। यथाशक्ति (विहित) कर्मोंको करते हुए निन्दित कर्मोंका परित्याग करना चाहिये॥ २६-२८॥<br><br>विशेषरूपसे श्रेष्ठ द्विजको इस सम्बन्धमें प्रमाद नहीं करना चाहिये। मोहरूपी कलिमषको धोकर और श्रेष्ठ योगको प्राप्तकर गृहस्थ बन्धनसे मुक्त हो जाता है। इसमें संशय नहीं करना चाहिये। दूसरेके क्रोधसे उत्पन्न अपनी निन्दा, अनादर, दोषारोपण, हिंसा, बन्धन और ताड़नस्वरूप दोषोंको सहना ही क्षमा है॥ २९-३०॥<br><br>सौहार्दवश अपने दुःखके समान ही दूसरोंके दुःखमें उनके प्रति करुणाभावको मुनियोंने 'दया' इस नामसे कहा है। यह धर्मका साक्षात् साधन है। चौदह² विद्याओंको यथार्थरूपसे धारण करनेको ही विज्ञान समझना चाहिये। इससे धर्मकी वृद्धि होती है। विधिपूर्वक विद्याको ग्रहण कर लेने और उसके अर्थको भलीभाँति जान लेनेपर भी यदि (कोई व्यक्ति) धर्म-कार्योंसे निवृत्त (विरत) रहता है, उन्हें नहीं करता तो उसका वह (अध्ययन) विज्ञान नहीं कहलाता है॥ ३१-३३॥<br><br>सत्यके आचरणसे लोकोंपर विजय प्राप्त होती है, सत्य ही वह (सर्वोच्च) परमपद है। जो जैसा है उसका उसी रूपमें कथन ही मनीषियोंने सत्य कहा है। शरीरका उपरम (शरीरकी चेष्टाओंका नियन्त्रण अर्थात् इन्द्रियोंका निग्रह) दम है और शम (मनका नियन्त्रण) प्रज्ञा (प्रकृष्ट ज्ञान)-के विशद अवभाससे उत्पन्न होता है। अध्यात्म (आत्म-सम्बन्धी) ज्ञानको ही अविनाश्वर तत्त्व समझना चाहिये जहाँ पहुँचनेपर शोक नहीं होता॥ ३४-३५॥

१-सम्पत्तिका पाँच भाग—(१) धर्मके लिये, (२) यशके लिये, (३) सम्पत्तिको बढ़ानेके लिये, (४) अपने भोगके लिये, (५) स्वजनके लिये—करनेसे इस लोक तथा परलोकमें सुख प्राप्त होता है।
२-चार वेद, छः वेदाङ्ग (—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दःशास्त्र, ज्योतिष), पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र—ये चौदह विद्याएँ हैं।

३२२ * कूर्मपुराण *


यया स देवो भगवान् विद्यया वेद्यते परः।<br>साक्षाद् देवो महादेवस्तज्ज्ञानमिति कीर्तितम्॥ ३६॥<br><br>तन्निष्ठस्तत्परो विद्वान्नित्यमक्रोधनः शुचिः।<br>महायज्ञपरो विप्रो लभते तदनुत्तमम्॥ ३७॥<br><br>धर्मस्यायतनं यत्नाच्छरीरं परिपालयेत्।<br>न हि देहं विना रुद्रः पुरुषैर्विद्यते परः॥ ३८॥<br><br>नित्यं धर्मार्थकामेषु युञ्जीत नियतो द्विजः।<br>न धर्मवर्जितं काममर्थं वा मनसा स्मरेत्॥ ३९॥<br><br>सीदन्नपि हि धर्मेण न त्वधर्मं समाचरेत्।<br>धर्मो हि भगवान् देवो गतिः सर्वेषु जन्तुषु॥ ४०॥<br><br>भूतानां प्रियकारी स्यात् न परद्रोहकर्मधीः।<br>न वेददेवतानिन्दां कुर्यात् तैश्च न संवसेत्॥ ४१॥जिस विद्याके द्वारा वे परात्पर देवाधिदेव साक्षात् भगवान् महादेव जाने जाते हैं, उसे ही ज्ञान कहा गया है। उनमें निष्ठा रखनेवाला, उनके परायण रहनेवाला, कभी भी क्रोध न करनेवाला, पवित्र, (पञ्च) महायज्ञोंको करनेवाला विद्वान् विप्र उस श्रेष्ठ तत्त्वको प्राप्त करता है। धर्मके आयतन इस शरीरका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। बिना देहके मनुष्य उस परात्पर रुद्रको नहीं जान सकता। नियत (संयत) द्विजको नित्य धर्म, अर्थ एवं कामकी साधनामें लगे रहना चाहिये। धर्मसे रहित काम अथवा अर्थका मनसे भी स्मरण नहीं करना चाहिये। धर्मके पालनमें कष्ट पाते हुए भी (उसका परित्यागकर) अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये। धर्मदेवता ही सभी प्राणियोंके भगवान् और गति हैं। (इसलिये) प्राणियोंका प्रिय करनेवाला बनना चाहिये। दूसरोंसे द्रोह करनेकी बुद्धिवाला नहीं होना चाहिये। वेदकी तथा देवताओंकी निन्दा नहीं करनी चाहिये और (जो इनकी निन्दा करता है) उसके साथ रहना (भी) नहीं चाहिये॥ ३६—४१॥
यस्त्विमं नियतं विप्रो धर्माध्यायं पठेच्छुचिः।<br>अध्यापयेत् श्रावयेद् वा ब्रह्मलोके महीयते॥ ४२॥जो विप्र पवित्रतापूर्वक नित्य इस धर्माध्यायका अध्ययन, अध्यापन अथवा उपदेश करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ४२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १५॥

  • अध्याय १६ * ३२३

सोलहवाँ अध्याय

सदाचारका वर्णन

व्यास उवाच

न हिंस्यात् सर्वभूतानि नानृतं वा वदेत् क्वचित्।
नाहितं नाप्रियं वाक्यं न स्तेनः स्याद् कदाचन ॥ १ ॥

तृणं वा यदि वा शाकं मृदं वा जलमेव वा।
परस्यापहरञ्जन्तुर्नरकं प्रतिपद्यते ॥ २ ॥

न राज्ञः प्रतिगृह्णीयान्न शूद्रपतितादपि।
न चान्यस्मादशक्तश्च निन्दितान् वर्जयेद् बुधः ॥ ३ ॥

नित्यं याचनको न स्यात् पुनस्तं नैव याचयेत्।
प्राणानपहरत्येवं याचकस्तस्य दुर्मतिः ॥ ४ ॥

न देवद्रव्यहारी स्याद् विशेषेण द्विजोत्तमः।
ब्रह्मस्वं वा नापहरेदापद्यपि कदाचन ॥ ५ ॥

न विषं विषमित्याहुर्ब्रह्मस्वं विषमुच्यते।
देवस्वं चापि यत्नेन सदा परिहरेत् ततः ॥ ६ ॥

पुष्पे शाकोदके काष्ठे तथा मूले फले तृणे।
अदत्तादानमस्तेयं मनुः प्राह प्रजापतिः ॥ ७ ॥

गृहीतव्यानि पुष्पाणि देवार्चनविधौ द्विजाः।
नैकस्मादेव नियतमननुज्ञाय केवलम् ॥ ८ ॥

तृणं काष्ठं फलं पुष्पं प्रकाशं वै हरेद् बुधः।
धर्मार्थं केवलं विप्रा ह्यन्यथा पतितो भवेत् ॥ ९ ॥

**व्यासजीने कहा—**किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये और कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिये। अहितकर और अप्रिय वचन नहीं बोलना चाहिये और कभी भी चोरी नहीं करनी चाहिये। दूसरेके तृण, शाक, मिट्टी अथवा जलका भी अपहरण करनेवाला प्राणी नरक प्राप्त करता है। राजा^१, शूद्र तथा पतित व्यक्तिसे दान नहीं लेना चाहिये। अशक्त होनेपर भी दूसरेसे याचना नहीं करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्तिको निन्दितों (पापमें रत)-का परित्याग करना चाहिये ॥ १–३ ॥

नित्य याचना करनेवाला नहीं होना चाहिये और एक ही व्यक्तिसे दुबारा नहीं माँगना चाहिये। याचना करनेवाला दुर्बुद्धि व्यक्ति (दाताके) प्राणोंका ही हरण^२ करता है। विशेषरूपसे श्रेष्ठ ब्राह्मणको देवसम्बन्धी द्रव्यका अपहरण नहीं करना चाहिये। आपत्ति पड़नेपर भी ब्राह्मणके धनका कभी भी अपहरण न करे ॥ ४–५ ॥

विषको विष नहीं कहा जाता बल्कि ब्राह्मणका धन ही विष-रूप है। इसी प्रकार देवसम्बन्धी स्वत्वका भी प्रयत्नपूर्वक सदा त्याग करना चाहिये। प्रजापति मनुने पुष्प, शाक, जल, लकड़ी, मूल, फल तथा तृण—इन सभी पदार्थोंको (इनके स्वामीद्वारा) बिना दिये ग्रहण कर लेनेको अस्तेय कहा है (अर्थात् पुष्प, शाक आदि यदि दूसरेके हैं तब भी अत्यावश्यक होनेपर धर्मार्थ या प्राणरक्षार्थ इनका प्रयोजनानुसार ग्रहण करनेपर चोरीका दोष नहीं लगता) ॥ ६–७ ॥

द्विजो! देवपूजाके लिये अन्य स्वामीका पुष्प ग्रहण किया जा सकता है। परंतु केवल एक ही स्थानसे बिना आज्ञाके प्रतिदिन पुष्प नहीं ग्रहण करना चाहिये। विप्रो! विद्वान् व्यक्ति केवल धर्मकार्यके लिये तृण, काष्ठ, फल, पुष्प प्रकट-रूपसे ग्रहण कर सकता है, अन्य प्रकारसे ग्रहण करनेपर वह पतित हो जाता है ॥ ८–९ ॥


१-राजासे दान लेनेपर तेजका ह्रास होता है—'राजात्रं हरते तेजः'।
२-पुनः-पुनः याचनासे दाताको कष्ट होना स्वाभाविक है। अतः यहाँ दाताके प्राण-हरणसे तात्पर्य कष्ट पहुँचानेसे है।

३२४

  • कूर्मपुराण *
तिलमुद्गयवादीनां मुष्टिर्ग्राह्या पथि स्थितैः ।<br>क्षुधार्तैर्नान्यथा विप्रा धर्मविद्भिरिति स्थितिः ॥ १० ॥ब्राह्मणो ! धर्म जाननेवालोंने यह मर्यादा स्थिर की है कि केवल भूखसे पीड़ित व्यक्ति रास्तेमें स्थित तिल, मूँग तथा यव आदि पदार्थोंको एक मुट्ठी मात्र ग्रहण कर सकता है। दूसरे जो भूखसे पीड़ित नहीं हैं, ऐसा नहीं कर सकते ॥ १० ॥
न धर्मस्यापदेशेन पापं कृत्वा व्रतं चरेत्।<br>व्रतेन पापं प्रच्छाद्य कुर्वन् स्त्रीशूद्रदम्भनम् ॥ ११ ॥पाप करके धर्मके बहाने किसी व्रतका अनुष्ठान नहीं करना चाहिये। व्रतके द्वारा पापको छिपाकर जो स्त्री और शूद्रोंका प्रवञ्चन करता है, वह विप्र इहलोक तथा परलोकमें ब्रह्मवादियोंद्वारा निन्दित होता है। छलके द्वारा किया गया व्रत राक्षसोंको प्राप्त होता है॥ ११-१२॥
प्रेत्येह चेदृशो विप्रो गर्ह्यते ब्रह्मवादिभिः ।<br>छद्मनाचरितं यच्च व्रतं रक्षांसि गच्छति ॥ १२ ॥
अलिङ्गी लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति ।<br>स लिङ्गिनां हरेदेनस्तिर्यग्योनौ च जायते ॥ १३ ॥यदि (यज्ञोपवीतादि) लिङ्गका अनधिकारी व्यक्ति इन लिङ्गों (चिह्नों-लक्षणों)-को धारणकर वेष बनाकर जीविकाका निर्वाह करता है तो वह इन लिङ्गोंके वास्तविक अधिकारी पुरुषोंके पापोंका भागी होता है और तिर्यक् (पक्षी आदि) योनिको प्राप्त करता है। लोकमें धर्मके विनाशक वैडालव्रती¹ (ढोंगी) पापी लोग शीघ्र ही पापयोनिमें जाते हैं। उनके दुष्कर्मका यही फल है। पाखंडी (वेदशास्त्राननुमत-व्रत लिङ्गधारी), निषिद्ध कर्म करनेवाले, वाममार्गी, पाञ्चरात्र और पाशुपत व्रतवालोंका वाणीमात्रसे भी सत्कार नहीं करना चाहिये²॥ १३-१५॥
बैडालव्रतिनः पापा लोके धर्मविनाशकाः ।<br>सद्यः पतन्ति पापेषु कर्मणस्तस्य तत् फलम् ॥ १४ ॥
पाषण्डिनो विकर्मस्थान् वामाचारांस्तथैव च ।<br>पाञ्चरात्रान् पाशुपतान् वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥ १५ ॥
वेदनिन्दारतान् मर्त्यान् देवनिन्दारतांस्तथा ।<br>द्विजनिन्दारतांश्चैव मनसापि न चिन्तयेत् ॥ १६ ॥वेदकी निन्दामें परायण, देवताओंकी निन्दामें निरत और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेमें संलग्न मनुष्योंका मनसे भी चिन्तन नहीं करना चाहिये। इनका यज्ञ कराना, इनके साथ विवाह आदि (योनि)-का सम्बन्ध, सहवास तथा बात करनेसे प्राणी पतित हो जाता है, अतः प्रयत्नपूर्वक इनका परित्याग करना चाहिये। देवताके द्रोहसे गुरुका द्रोह करोड़ों गुना अधिक दोषपूर्ण होता है। उस गुरुद्रोहसे भी शास्त्रीय ज्ञानकी निन्दा करना और नास्तिकतका भाव करोड़ गुना अधिक दोषपूर्ण है ॥ १६-१८ ॥
याजनं योनिसम्बन्धं सहवासं च भाषणम्।<br>कुर्वाणः पतते जन्तुस्तस्माद् यत्नेन वर्जयेत् ॥ १७ ॥
देवद्रोहाद् गुरुद्रोहः कोटिकोटिगुणाधिकः ।<br>ज्ञानापवादो नास्तिक्यं तस्मात् कोटिगुणाधिकम् ॥ १८ ॥

१-विडालव्रतसे जो अपनी जीविका चलाता है वह वैडालव्रती है। इसका आशय यह है कि जैसे विडाल (बिल्ली) मूषक आदिको पकड़कर खानेके लिये ध्याननिष्ठकी तरह विनीतकी भाँति बैठता है, वैसे ही जो दूसरोंको धोखा देकर अपने स्वार्थकी सिद्धिमात्रके लिये ध्यान, विनयभाव आदिका स्वाँग रचता है, वह वैडालव्रती है।
२-अतिथि-सत्कारकालमें इनके उपस्थित होनेपर अतिथिके समान इनका सत्कार नहीं करना चाहिये। जो लोग आदर योग्य नहीं हैं, उन्हें भी जीविका-निर्वाहके लिये यथाशक्ति देनेका विधान होनेसे जीवनोपयोगी वस्तु देनेका निषेध यहाँ नहीं है।

* अध्याय १६ * ३२५

गोभिश्च देवतैर्विप्रैः कृष्या राजोपसेवया।<br>कुलान्यकुलतां यान्ति यानि हीनानि धर्मतः ॥ १९ ॥<br><br>कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च।<br>कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ २० ॥गायसे, देवताओंसे, ब्राह्मणोंसे, कृषिसे तथा राजाकी सेवासे जीविका-निर्वाह करनेवाले व्यक्तियोंका कुल दोषपूर्ण हो जाता है; क्योंकि ये वृत्तियाँ धर्मकी दृष्टिसे हीन वृत्तियाँ हैं। कुविवाह, (नित्य अथवा धार्मिक) क्रियाओंका लोप, वेदोंके अध्ययन न करने और ब्राह्मणोंके अनादर करनेसे कुल दोषपूर्ण हो जाता है ॥१९-२०॥
अनृतात् पारदार्याच्च तथाभक्ष्यस्य भक्षणात्।<br>अश्रौतधर्माचरणात् क्षिप्रं नश्यति वै कुलम् ॥ २१ ॥<br><br>अश्रोत्रियेषु वै दानाद् वृषलेषु तथैव च।<br>विहिताचारहीनेषु क्षिप्रं नश्यति वै कुलम् ॥ २२ ॥झूठ बोलने, परदाराभिगमन, अभक्ष्य-भक्षण और वेदविरुद्ध धर्मोका आचरण करनेसे कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। अश्रोत्रिय, शूद्र तथा विहित आचारसे रहित (द्विज)-को दान देनेसे दाताका कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ २१-२२ ॥
नाधार्मिकैर्वृते ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम्।<br>न शूद्रराज्ये निवसेन्न पाषण्डजनैर्वृते ॥ २३ ॥<br><br>हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्ये पूर्वपश्चिमयोः शुभम्।<br>मुक्त्वा समुद्रयोर्देशं नान्यत्र निवसेद् द्विजः ॥ २४ ॥<br><br>कृष्णो वा यत्र चरति मृगो नित्यं स्वभावतः।<br>पुण्याश्च विश्रुता नद्यस्तत्र वा निवसेद् द्विजः ॥ २५ ॥अधार्मिकों तथा पाखंडीजनोंसे युक्त और अत्यधिक रोगसे आक्रान्त ग्राममें तथा शूद्रके राज्यमें निवास नहीं करना चाहिये। द्विजको चाहिये कि वह हिमालय एवं विन्ध्यपर्वतके मध्यके देश और पूर्व तथा पश्चिम दिशाके समुद्रके तटवर्ती शुभ प्रदेशको छोड़कर अन्यत्र निवास नहीं करे। अथवा जहाँ स्वाभाविकरूपसे नित्य कृष्ण (कृष्णसार मृग-जातिविशेषके मृग) मृग विचरण करते हों और जहाँ वेदशास्त्र-प्रसिद्ध पुण्यजलवाली नदियाँ प्रवाहित होती हों, द्विजको वहाँ निवास करना चाहिये ॥ २३-२५ ॥
अर्धक्रोशान्नदीकूलं वर्जयित्वा द्विजोत्तमः।<br>नान्यत्र निवसेत् पुण्यं नान्त्यजग्रामसंनिधौ ॥ २६ ॥<br><br>न संवसेच्च पतितैर्न चण्डालैर्न पुक्कसैः।<br>न मूर्खैर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥ २७ ॥<br><br>एकशय्यासनं पङ्क्तिर्भाण्डपक्वान्नमिथ्रणम्।<br>याजनाध्यापने योनिस्तथैव सहभोजनम् ॥ २८ ॥<br><br>सहाध्यायस्तु दशमः सहयाजनमेव च।<br>एकादश समुद्दिष्टा दोषाः साङ्कर्यसंज्ञिताः ॥ २९ ॥<br><br>समीपे वा व्यवस्थानात् पापं संक्रमते नृणाम्।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन साङ्कर्यं परिवर्जयेत् ॥ ३० ॥श्रेष्ठ द्विजको नदीके किनारेसे आधे कोसतककी भूमिका परित्यागकर अन्य किसी पवित्र स्थानपर नहीं रहना चाहिये और न अन्त्यजोंके ग्रामके समीपमें रहना चाहिये। पतित, चण्डाल, पुक्कस, मूर्ख, अभिमानी (धन आदिके मदसे गर्वित), अन्त्यज (म्लेच्छ, रजक आदि) और अन्त्यावसायीके साथ नहीं रहना चाहिये*। (इनके साथ) एक शय्यापर और एक आसनपर बैठना, एक पंक्तिमें बैठकर भोजन करना, बरतनों और पके हुए भोजनका मेल (मिश्रण, परस्पर आदान-प्रदान), यज्ञ करना, अध्यापन, विवाहादिका सम्बन्ध, साथमें भोजन करना और दसवाँ साथमें अध्ययन करना तथा साथमें यज्ञ कराना—ये ग्यारह 'सांकर्य' नामवाले दोष बतलाये गये हैं। इन सांकर्य-दोषयुक्त व्यक्तियोंके समीपमें भी रहनेसे मनुष्यमें पापका संक्रमण हो जाता है। अतः सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे सांकर्य (दोष)-का परित्याग करना चाहिये ॥ २६-३०॥

* यहाँ घृणाका भाव नहीं है। जन्मान्तरकृत कर्मोंके आधारपर यह केवल एक व्यवस्था है।

३. उत्तरविभाग (अध्याय १२-४६) — व्यासगीता, वर्णाश्रमधर्म, प्रायश्चित्त व मुक्तिनिरूपण

३२६* कूर्मपुराण *
एकपङ्क्त्युपविष्टा ये न स्पृशन्ति परस्परम्।<br>भस्मना कृतमर्यादा न तेषां संकरो भवेत्॥ ३१॥<br><br>अग्निना भस्मना चैव सलिलेनावसेकतः।<br>द्वारेण स्तम्भमार्गेण षड्भिः पङ्क्तिर्विभिद्यते॥ ३२॥<br><br>न कुर्याच्छुष्कवैराणि विवादं न च पैशुनम्।<br>परक्षेत्रे गां धयन्तीं न चाचक्षीत कस्यचित्।<br>न संवदेत् सूतके च न कञ्चिन्मर्माणि स्पृशेत्॥ ३३॥<br>न सूर्यपरिवेषं वा नेन्द्रचापं शवाग्निकम्।<br>परस्मै कथयेद् विद्वान् शशिनं वा कदाचन॥ ३४॥<br><br>न कुर्याद् बहुभिः सार्धं विरोधं बन्धुभिस्तथा।<br>आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥ ३५॥<br>तिथिं पक्षस्य न ब्रूयात् न नक्षत्राणि निर्दिशेत्।<br>नोदक्यामभिभाषेत नाशुचिं वा द्विजोत्तमः॥ ३६॥<br><br>न देवगुरुविप्राणां दीयमानं तु वारयेत्।<br>न चात्मानं प्रशंसद् वा परनिन्दां च वर्जयेत्।<br>वेदनिन्दां देवनिन्दां प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥ ३७॥<br>यस्तु देवानृषीन् विप्रान् वेदान् वा निन्दति द्विजः।<br>न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा शास्त्रेष्विह मुनीश्वराः॥ ३८॥<br><br>निन्दयेद् वै गुरुं देवं वेदं वा सोपबृंहणम्।<br>कल्पकोटिशतं साग्रं रौरवे पच्यते नरः॥ ३९॥<br><br>तूष्णीमासीत निन्दायां न ब्रूयात् किंचिदुत्तरम्।<br>कर्णौ पिधाय गन्तव्यं न चैतानवलोकयेत्॥ ४०॥<br><br>वर्जयेद् वै रहस्यानि परेषां गूहयेद् बुधः।<br>विवादं स्वजनैः सार्धं न कुर्याद् वै कदाचन॥ ४१॥एक पंक्तिमें बैठे रहनेपर भी जो एक-दूसरेका स्पर्श नहीं करते हों और बीचमें भस्मके द्वारा रेखारूप मर्यादा खींचे हों, उनमें सांकर्य-दोष नहीं होता। अग्नि, भस्म, जलके छिड़काव, द्वार, स्तम्भ तथा मार्ग—इन छःके द्वारा पंक्तिका खंडन हो जाता है। अकारण शत्रुता, विवाद तथा चुगलखोरी नहीं करनी चाहिये। दूसरेके खेतमें चरती हुई गायको किसीको बतलाना नहीं चाहिये। सूतक (अशौच)-युक्त व्यक्तिसे बात न करे और किसीके भी मर्मका स्पर्श* न करे॥ ३१-३३॥<br><br>विद्वान् व्यक्ति दूसरोंको सूर्यमण्डल, इन्द्रधनुष, चिताग्नि तथा चन्द्रमा (चन्द्रमण्डल) न बतलाये, न दिखलाये। बहुत लोगोंके साथ और बन्धु-बान्धवोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिये। स्वयंके प्रति जैसा आचरण प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरोंके प्रति न करे॥ ३४-३५॥<br><br>पक्षकी तिथिको न कहे, न नक्षत्रोंका निर्देश करे। श्रेष्ठ द्विज रजस्वला स्त्रीसे बात न करे और न ही अपवित्र व्यक्तिसे बात करे। देवता, गुरु तथा ब्राह्मणोंको दी जा रही वस्तुका निषेध न करे। अपनी प्रशंसा न करे और दूसरेकी निन्दाका त्याग करे। वेदनिन्दा तथा देवनिन्दाका प्रयत्नपूर्वक (सर्वथा) परित्याग करे॥ ३६-३७॥<br><br>मुनीश्वरो! जो द्विज देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों अथवा वेदोंकी निन्दा करता है, उसके लिये इस लोकमें कोई प्रायश्चित्त शास्त्रोंमें दिखलायी नहीं देता। गुरु, देवता, वेद, उपबृंहण (इतिहास-पुराण)-की निन्दा करनेवाला व्यक्ति सैकड़ों, करोड़ों वर्षोंसे भी अधिक समयतक रौरव नरकमें कष्ट भोगता है। (देवता, शास्त्र आदिकी) निन्दा होनेपर (यदि उत्तर देनेका सामर्थ्य न हो तो) चुपचाप रहना चाहिये, उत्तरमें (दुराग्रहीसे) कुछ भी नहीं बोलना चाहिये। अथवा उस समय कान बंदकर अन्यत्र चला जाय और उन निन्दकोंकी ओर देखे भी नहीं॥ ३८—४०॥<br><br>विद्वान् व्यक्तिको दूसरोंके रहस्योंको जाननेका प्रयास नहीं करना चाहिये और (जाननेपर) उन्हें छिपाना चाहिये। अपने आत्मीय जनोंके साथ कभी भी विवाद नहीं करना चाहिये॥ ४१॥

* मर्मस्पर्शका तात्पर्य है—किसीके रहस्यको प्रकाशित कर उसे पीड़ा पहुँचाना।

  • अध्याय १६ * | ३२७ ---|---
न पापं पापिनां ब्रूयादपापं वा द्विजोत्तमाः।<br>स तेन तुल्यदोषः स्यान्मिथ्या द्विर्दोषवान् भवेत् ॥ ४२ ॥हे द्विजोत्तमो! पापियोंके पापकी चर्चा न करे, न अपाप (पापरहित)-पर पापी होनेका आरोप लगाये, क्योंकि ऐसा करनेसे वह उसी (पापी)-के समान दोषयुक्त होकर तथा मिथ्याभिभाषणरूप दोषसे युक्त* होकर दो दोषोंका भागी हो जाता है।
यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि रोदनात्।<br>तानि पुत्रान् पशून् घ्नन्ति तेषां मिथ्याभिशंसिनाम् ॥ ४३ ॥मिथ्या दोषारोपणयुक्त व्यक्तियोंके रोनेसे जो अश्रुविन्दु गिरते हैं, वे मिथ्या दोषारोपण करनेवाले व्यक्तिके पुत्रों तथा पशुओंका नाश कर देते हैं।
ब्रह्महत्यासुरापाने स्तेयगुर्वङ्गनागमे।<br>दृष्टं विशोधनं वृद्धैर्नास्ति मिथ्याभिशंसने ॥ ४४ ॥ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन—इन महापापोंकी शुद्धि वृद्धजनोंद्वारा देखी गयी है (अर्थात् बतायी गयी है), किंतु मिथ्या दोषारोपण करनेवालेकी कोई शुद्धि नहीं है अर्थात् इनकी शुद्धिका कोई उपाय नहीं है॥ ४२—४४॥
नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं शशिनं चानिमित्ततः।<br>नास्तं यान्तं न वारिस्थं नोपसृष्टं न मध्यगम्।<br>तिरोहितं वाससा वा नादर्शान्तरगामिनम् ॥ ४५ ॥बिना किसी प्रयोजनके उगते हुए सूर्य और चन्द्रमाको नहीं देखना चाहिये। (ऐसे ही अकारण) अस्त होते हुए, जलमें प्रतिबिम्बित, आकाशके मध्य स्थित, ग्रहणयुक्त, वस्त्राच्छादित अथवा दर्पण आदिमें प्रतिबिम्बित सूर्य-चन्द्रमाको नहीं देखना चाहिये॥ ४५॥
न नग्नां स्त्रियमीक्षेत पुरुषं वा कदाचन।<br>न च मूत्रं पुरीषं वा न च संसृष्टमैथुनम्।<br>नाशुचिः सूर्यसोमादीन् ग्रहानालोकयेद् बुधः ॥ ४६ ॥नग्न स्त्री अथवा पुरुषको कभी भी न देखे। मल-मूत्र विसर्जित कर रहे तथा मैथुनासक्त व्यक्तिको न देखे। बुद्धिमान् व्यक्तिको अपवित्रताकी स्थितिमें सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रहोंको नहीं देखना चाहिये।
पतितव्यङ्गचण्डालानुच्छिष्टान् नावलोकयेत्।<br>नाभिभाषेत च परमुच्छिष्टो वावगुण्ठितः ॥ ४७ ॥पतित, विकलाङ्ग, चाण्डाल एवं उच्छिष्ट (मुखवाले) व्यक्तियोंको नहीं देखना चाहिये। उच्छिष्ट दशामें अथवा मुख ढककर दूसरेसे बात नहीं करनी चाहिये।
न पश्येत् प्रेतसंस्पर्शं न क्रुद्धस्य गुरोर्मुखम्।<br>न तैलोदकयोश्छायां न पत्नीं भोजने सति।<br>नामुक्तबन्धनाङ्गां वा नोन्मत्तं मत्तमेव वा ॥ ४८ ॥शवका स्पर्श किये हुए व्यक्तिको (जबतक स्नानादिसे शुद्ध नहीं हो जाता है तबतक), क्रुद्ध गुरुके मुखको, तेल या जलमें पड़नेवाली छायाको, भोजन करते समय पत्नीको, खुले हुए अङ्गोंवाली स्त्रीको, पागल एवं मतवाले व्यक्तिको नहीं देखना चाहिये।
नाश्नीयात् भार्यया सार्धं नैनामीक्षेत चाश्नतीम्।<br>क्षुवन्तीं जृम्भमाणां वा नासनस्थां यथासुखम् ॥ ४९ ॥पत्नीके साथ भोजन नहीं करना चाहिये और उसे भोजन करते हुए, छींकते हुए, जम्हाई लेते हुए तथा आसनपर आरामसे बैठे रहनेकी अवस्थामें नहीं देखना चाहिये।
नोदके चात्मनो रूपं न कूलं श्वभ्रमेव वा।<br>न लङ्घयेच्च मूत्रं वा नाधितिष्ठेत् कदाचन ॥ ५० ॥जलमें अपना रूप तथा (नदी आदिके) किनारे और गर्त (गहरा गड्डा)-को नहीं देखना चाहिये। मूत्रको लाँघना नहीं चाहिये और न कभी उसपर बैठना चाहिये॥ ४६—५०॥

* इसका आशय यह है कि किसीके पापकी चर्चासे स्वयंमें पाप संक्रमित होते हैं तथा वस्तुतः निष्पापमें पापकी कल्पना मिथ्याकल्पना है और इस कल्पनाके आधारपर पापका कथन मिथ्याभाषण है।

३२८ * कूर्मपुराण *


न शूद्राय मतिं दद्यात् कृशरं पायसं दधि।
नोच्छिष्टं वा मधु घृतं न च कृष्णाजिनं हविः ॥ ५१ ॥

न चैवास्मै व्रतं दद्यान्न च धर्मं वदेद् बुधः।
न च क्रोधवशं गच्छेद् द्वेषं रागं च वर्जयेत् ॥ ५२ ॥

लोभं दम्भं तथा यत्नादसूयां ज्ञानकुत्सनम्।
ईर्ष्यां मदं तथा शोकं मोहं च परिवर्जयेत् ॥ ५३ ॥

न कुर्यात् कस्यचित् पीडां सुतं शिष्यं च ताडयेत्।
न हीनानुपसेवेत न च तीक्ष्णमतीन् क्वचित् ॥ ५४ ॥

नात्मानं चावमन्येत दैन्यं यत्नेन वर्जयेत्।
न विशिष्टानसत्कुर्यात् नात्मानं वा शपेद् बुधः ॥ ५५ ॥

न नखैर्विलिखेद् भूमिं गां च संवेशयेन्न हि।
न नदीषु नदीं ब्रूयात् पर्वतेषु च पर्वतान् ॥ ५६ ॥

आवासे भोजने वापि न त्यजेत् सहयायिनम्।
नावगाहेदपो नग्नो वह्निं नातिव्रजेत् पदा ॥ ५७ ॥

शिरोऽभ्यङ्गावशिष्टेन तैलेनाङ्गं न लेपयेत्।
न सर्पशस्त्रैः क्रीडेत स्वानि खानि न संस्पृशेत्।
रोमाणि च रहस्यानि नाशिष्टेन सह व्रजेत् ॥ ५८ ॥

शूद्रको दृष्टार्थोपदेश (लौकिक विषयका उपदेश^१) नहीं देना चाहिये। साथ ही कृशर अर्थात् तिल, चावल आदिसे मिश्रित पदार्थ, खीर, दही^२, जूठी^३ वस्तु, मधु, घृत, कृष्णमृगचर्म^४ तथा हवनकी सामग्री नहीं देनी चाहिये। विद्वान् व्यक्ति इसे (शूद्रको) व्रत एवं धर्म-सम्बन्धी उपदेश न दे। क्रोधके वशीभूत नहीं होना चाहिये और राग-द्वेषको छोड़ देना चाहिये। लोभ, दम्भ, असूया (गुणमें दोषदर्शन), ज्ञानकी निन्दा, ईर्ष्या, मद, शोक तथा मोहको प्रयत्नपूर्वक छोड़ देना चाहिये। किसीको भी पीड़ा न पहुँचाये। पुत्र और शिष्यको योग्य बनानेके पवित्रभावसे ताड़न^५ करे। कभी हीन व्यक्तियों और तीक्ष्ण (उद्धत) बुद्धिवाले व्यक्तियोंका आश्रय ग्रहण न करे। विद्वान्‌को अपना अपमान नहीं करना चाहिये अर्थात् हीनभाव नहीं अपनाना चाहिये। प्रयत्नपूर्वक दीनताका परित्याग करना चाहिये। विशिष्ट जनोंका निरादर नहीं करना चाहिये और अपनेको (क्रोधावेशसे) शाप नहीं देना चाहिये॥ ५१—५५॥

नखोंसे भूमिपर नहीं लिखना (कुरेदना) चाहिये। गौको पकड़ना नहीं चाहिये। किसी नदीके समीप दूसरी नदियों तथा किसी पर्वतपर दूसरे पर्वतोंकी चर्चा (प्रशंसा) नहीं करनी चाहिये। भोजन अथवा निवासके समय सहयात्रीको छोड़ना नहीं चाहिये (अर्थात् साथमें रहनेवालेको छोड़कर न एकाकी भोजन करना चाहिये न एकाकीके लिये निवासकी व्यवस्था करनी चाहिये)। जलमें नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिये और पैरसे आगका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। सिरपर लगानेसे बचे हुए तेलका शरीरपर लेपन नहीं करना चाहिये। सर्प एवं शस्त्रसे खेल नहीं करना चाहिये। अपनी इन्द्रियों एवं गुप्तस्थानोंके रोमोंका स्पर्श (जब चाहे तब) नहीं करना चाहिये। अशिष्ट व्यक्तिके साथ कहीं नहीं जाना चाहिये॥ ५६—५८॥


१-यहाँ उपदेशका निषेध है। सलाह (सम्मति, राय) देनेका निषेध नहीं है। उपदेश द्विजको सामने करके ही करना चाहिये। शास्त्रीय व्यवस्थाके अनुसार साक्षात् उपदेश लेनेका अधिकारी शूद्र नहीं है। यह मात्र व्यवस्था है, द्वेषभाव नहीं है। 'न शूद्राय मतिं दद्यात्' मनुस्मृति (४।८०)-की कुल्लूकभट्टकी व्याख्याके अनुसार।
२-आहुति देनेसे अवशिष्ट तिल आदि हविष्य शूद्रको नहीं देना चाहिये।
३-जो शूद्र अपना सेवक नहीं है उसे उच्छिष्ट देनेका निषेध है।
४-कृष्णमृगचर्मका ब्राह्मण ही अधिकारी है।
५-यहाँ तात्पर्य यह है कि पुत्र एवं शिष्यको योग्य बनानेका उत्तरदायित्व होता है, अतः आवश्यक होनेपर करुणाका भाव रखते हुए ताड़न किया जा सकता है।

* अध्याय १६ *३२९

न पाणिपादवाङ्नेत्रचापल्यं समुपाश्रयेत्।
न शिश्नोदरचापल्ये न च श्रवणयोः क्वचित्॥ ५९॥

न चाङ्गनखवादं वै कुर्यान्नाञ्जलिना पिबेत्।
नाभिहन्याज्जलं पद्भ्यां पाणिना वा कदाचन॥ ६०॥

न शातयेदिष्टकाभिः फलानि न फलेन च।
न म्लेच्छभाषां शिक्षेत नाकर्षेच्च पदासनम्॥ ६१॥

न भेदनमवस्फोटं छेदनं वा विलेखनम्।
कुर्याद् विमर्दनं धीमान् नाकस्मादेव निष्फलम्॥ ६२॥

नोत्सङ्गे भक्षयेद् भक्ष्यं वृथा चेष्टां च नाचरेत्।
न नृत्येद्थवा गायेन्न वादित्राणि वादयेत्॥ ६३॥

न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः।
न लौकिकैः स्तवैर्देवांतोषयेद् बाह्यजैरपि॥ ६४॥

नाक्षैः क्रीडेन्न धावेत् नाप्सु विण्मूत्रमाचरेत्।
नोच्छिष्टः संविशेन्नित्यं न नग्नः स्नानमाचरेत्॥ ६५॥

न गच्छेन्न पठेद् वापि न चैव स्वशिरः स्पृशेत्।
न दन्तैर्नखरोमाणि छिन्द्यात् सुप्तं न बोधयेत्॥ ६६॥

न बालातपमासेवेत् प्रेतधूमं विवर्जयेत्।
नैकः सुप्याच्छून्यगृहे स्वयं नोपानहौ हरेत्॥ ६७॥

नाकारणाद् वा निष्ठीवेन्न बाहुभ्यां नदीं तरेत्।
न पादक्षालनं कुर्यात् पादेनैव कदाचन॥ ६८॥

नाग्नौ प्रतापयेत् पादौ न कांस्ये धावयेद् बुधः।
नाभिप्रसारयेद् देवं ब्राह्मणान् गामथापि वा।
वाय्वग्निगुरुविप्रान् वा सूर्यं वा शशिनं प्रति॥ ६९॥

अशुद्धः शयनं यानं स्वाध्यायं स्नानवाहनम्।
बहिर्निष्क्रमणं चैव न कुर्वीत कथञ्चन॥ ७०॥

कभी भी हाथ, पैर, वाणी और नेत्र-सम्बन्धी चंचलताका आश्रय न ले। इसी प्रकार लिंग तथा उदर और कान-सम्बन्धी चंचलता नहीं करनी चाहिये। अंग एवं नखकी आवाज न करे। अंजलिसे (जल) न पिये। कभी भी हाथ अथवा पैरसे जलको न पीटे॥ ५९-६०॥

ईंटों और फलके द्वारा फलोंको नहीं तोड़ना चाहिये। म्लेच्छ भाषाकी शिक्षा न ले, पैरसे आसनको न खींचे। (नखोंद्वारा) काटने, छेदने, फोड़ने तथा लिखने-सम्बन्धी क्रियाएँ नहीं करनी चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अकस्मात् बिना प्रयोजनके शरीर या (अङ्गोंका) मर्दन (मरोड़नेकी क्रिया) नहीं करना चाहिये। (कोई पदार्थ) गोदमें रखकर नहीं खाना चाहिये। व्यर्थकी कोई चेष्टा नहीं करनी चाहिये। नृत्य, गायन तथा वादन (जब चाहे तब) नहीं करना चाहिये। दोनों हाथोंसे अपना सिर नहीं खुजलाना चाहिये। लौकिक तथा बाह्य (विदेशी) भाषाकी स्तुतियोंसे देवताओंको संतुष्ट (करनेका प्रयास) नहीं करना चाहिये*। पाशोंसे (जूआ) न खेले, न दौड़े, जलमें मल-मूत्रका विसर्जन न करे। जूठे मुख नहीं रहना चाहिये और कभी भी नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिये॥ ६१-६५॥

(नग्न अवस्थामें) न कहीं जाय, न पढ़े और न अपने सिरका स्पर्श करे। दाँतोंके द्वारा नख या रोमोंको नहीं काटना चाहिये। सोये हुए व्यक्तिको जगाना नहीं चाहिये। उगते हुए सूर्यके धूपका सेवन नहीं करना चाहिये। चिताके धुएँसे दूर रहना चाहिये। शून्य गृहमें अकेले नहीं सोना चाहिये। स्वयं अपने जूतोंको नहीं ढोना चाहिये। अकारण नहीं थूकना चाहिये। तैरकर नदीको पार नहीं करना चाहिये। कभी भी पैरद्वारा पैरको नहीं धोना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अग्निसे पैर नहीं सेंकना चाहिये। काँसेके पात्रमें पैर नहीं धोना चाहिये। देवताकी ओर, ब्राह्मणोंकी ओर एवं गौ, वायु, अग्नि, गुरु, विप्र, सूर्य तथा चन्द्रमाकी ओर पैर नहीं फैलाना चाहिये। कभी भी अपवित्र अवस्थामें सोना, दूरकी यात्रा, स्वाध्याय, स्नान, सवारीपर बैठना और घरसे बाहर नहीं निकलना चाहिये॥ ६६-७०॥


* इसका तात्पर्य यह है कि जो लोग संस्कृतके अध्ययनके अधिकारी हैं, उन्हें अवश्य संस्कृतका अध्ययन करना चाहिये और वेदादिशास्त्रोंमें निर्दिष्ट स्तुतियोंसे ही देवताओंकी स्तुति करनी चाहिये। अनधिकारके कारण या सर्वथा सामर्थ्यके अभावमें श्रद्धातिशयमें जिस किसी भाषाके द्वारा स्तुति करनी ही चाहिये। यहाँ यथाधिकार संस्कृत शास्त्रोंके अवश्य अध्ययनमें तात्पर्य है। लौकिक भाषा आदिसे स्तुतिके निषेधमें तात्पर्य नहीं है।

३३०* कूर्मपुराण *
स्वप्नमध्ययनं स्नानमुद्वर्त्तं भोजनं गतिम्।<br>उभयोः संध्ययोर्नित्यं मध्याह्ने चैव वर्जयेत्॥ ७१॥<br><br>न स्पृशेत् पाणिनोच्छिष्टो विप्रो गोब्राह्मणानलान्।<br>न चासनं पदा वापि न देवप्रतिमां स्पृशेत्॥ ७२॥<br><br>नाशुद्धोऽग्निं परिचरेन्न देवान् कीर्तयेदृषीन्।<br>नावगाहेदगाधाम्बु धारयेन्नानिमित्ततः॥ ७३॥<br><br>न वामहस्तेनोद्धृत्य पिबेद् वक्त्रेण वा जलम्।<br>नोत्तरेदनुपस्पृश्य नाप्सु रेतः समुत्सृजेत्॥ ७४॥<br><br>अमेध्यलिप्तमन्यद् वा लोहितं वा विषाणि वा।<br>व्यतिक्रामेन्न स्रवन्तीं नाप्सु मैथुनमाचरेत्।<br>चैत्यं वृक्षं न वै छिन्द्यान्नाप्सु ष्ठीवनमाचरेत्॥ ७५॥दोनों संध्या-समयों तथा मध्याह्नकालमें शयन, अध्ययन, स्नान, उबटन लगाना, भोजन तथा गमनका नित्य त्याग करना चाहिये। ब्राह्मणको^१ चाहिये कि वह जूठे मुँह-हाथसे गौ, ब्राह्मण, अग्नि, आसन तथा देव-प्रतिमाका स्पर्श न करे। इसी प्रकार पैरसे भी इनका स्पर्श न करे। अपवित्रताकी स्थितिमें अग्निकी परिचर्या न करे, देवताओं तथा ऋषियों (-के नाम आदि)-का कीर्तन न करे। गहरे जलमें स्नान न करे और बिना कारण (मल-मूत्रादिका वेग) न रोके। बायें हाथसे उठाकर अथवा मुखसे (पशुके समान) जल नहीं पीना चाहिये। बिना आचमन किये उत्तर न दे और जलमें वीर्यका त्याग नहीं करना चाहिये। अपवित्र वस्तुसे लिप्त किसी वस्तु, रक्त (खून), विष तथा वेगवाली नदीका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। जलमें मैथुन नहीं करना चाहिये। अश्वत्थ वृक्षको^२ नहीं काटना चाहिये। जलमें थूकना नहीं चाहिये॥ ७१—७५॥
नास्थिभस्मकपालानि न केशांश्च कण्टकान्।<br>तुषाङ्गारकरीषं वा नाधितिष्ठेत् कदाचन॥ ७६॥<br><br>न चाग्निं लङ्घयेद् धीमान् नोपदध्यादधः क्वचित्।<br>न चैनं पादतः कुर्यान्मुखेन न धमेद् बुधः॥ ७७॥<br><br>न कूपमवरोहेत नावेक्षेताशुचिः क्वचित्।<br>अग्नौ न च क्षिपेदग्निं नाद्भिः प्रशमयेत् तथा॥ ७८॥<br><br>सुहृन्मरणमार्तिं वा न स्वयं श्रावयेत् परान्।<br>अपण्यं कूटपण्यं वा विक्रये न प्रयोजयेत्॥ ७९॥हड्डी, भस्म, कपाल, केश (बाल), कण्टक, भूसी, अंगार और शुष्क गोबरपर कभी भी बैठना नहीं चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अग्निका लंघन नहीं करना चाहिये। अग्निको कभी भी (शय्या, आसन आदिके) नीचे न रखे, न ही पैरकी ओर रखे और न मुखसे ही फूंके। कभी भी कुएँके अंदर न उतरे और न ही अपवित्र अवस्थामें उसे देखे। अग्निमें अग्निको नहीं फेंकना चाहिये और पानीसे इसे बुझाना नहीं चाहिये। मित्रके मरण तथा उसके दुःखको, (अपने दुःखको) स्वयं दूसरोंको न सुनाये। जो विक्रय-योग्य न हो तथा जो पदार्थ छलद्वारा प्राप्त हो उसे विक्रय नहीं करना चाहिये॥ ७६—७९॥
न वह्निं मुखनिःश्वासैर्ज्वलयेन्नाशुचिर्बुधः।<br>पुण्यस्थानोदकस्थाने सीमान्तं वा कृषेन्न तु॥ ८०॥विद्वान्‌को चाहिये कि वह अग्निको मुखके निःश्वाससे प्रज्वलित न करे। अपवित्रताकी स्थितिमें पवित्र तीर्थमें, जलवाले स्थानमें नहीं जाना चाहिये और (ग्राम आदिके) सीमा-समाप्तिकी भूमिको नहीं जोतना चाहिये॥ ८०॥
न भिन्द्यात् पूर्वसमयमभ्युपेतं कदाचन।<br>परस्परं पशून् व्यालान् पक्षिणो नावबोधयेत्॥ ८१॥पहले की गयी प्रतिज्ञा या नियमको कभी भी तोड़ना नहीं चाहिये। पशु, सर्प एवं पक्षियोंको परस्पर लड़ानेके लिये उत्तेजित नहीं करना चाहिये॥ ८१॥

१-सर्वप्रथम होनेसे ब्राह्मणका निर्देश है। यहाँ ब्राह्मणप्रमुख मानवमात्रको लेना चाहिये।
२-चैत्यवृक्ष (अश्वत्थवृक्ष)—चैत्यस्तदाख्यया प्रसिद्धो वृक्षः। अश्वत्थवृक्ष इति रत्नमाला। (शब्दकल्पद्रुम)

  • अध्याय १६ * | ३३१ ---|---
परबाधं न कुर्वीत जलवातातपादिभिः ।<br>कारयित्वा स्वकर्माणि कारून् पश्चान्न वञ्चयेत् ।<br>सायंप्रातर्गृहद्वारान् भिक्षार्थं नावघट्टयेत् ॥ ८२ ॥जल, वायु तथा धूप आदिके द्वारा किसी दूसरेको बाधा नहीं पहुँचानी चाहिये। अपने कार्योंको करवाकर शिल्पियोंको बादमें ठगना नहीं चाहिये। भिक्षाके लिये सायंकाल और प्रातः (दूसरोंके) घरके दरवाजोंको खटखटाना नहीं चाहिये। दूसरोंके द्वारा प्रयुक्त माला<sup></sup>, गन्ध और भार्याके साथ भोजन, विग्रहपूर्वक विवाद एवं कुत्सित दरवाजेसे प्रवेश—इनका त्याग करना चाहिये॥ ८२-८३ ॥
बहिर्माल्यं बहिर्गन्धं भार्यया सह भोजनम् ।<br>विगृह्य वादं कुद्वारप्रवेशं च विवर्जयेत् ॥ ८३ ॥<br>न खादन् ब्राह्मणस्तिष्ठेन्न जल्पेद् वा हसन् बुधः ।<br>स्वमग्निं नैव हस्तेन स्पृशेन्नाप्सु चिरं वसेत् ॥ ८४ ॥बुद्धिमान् ब्राह्मणको<sup></sup> खाते हुए खड़ा नहीं होना चाहिये और न ही हँसते हुए बोलना चाहिये। अपने हाथोंद्वारा अपनी अग्निका स्पर्श नहीं करना चाहिये और देरतक जलमें नहीं रहना चाहिये। अग्निको न पंखेकी हवासे प्रज्वलित करना चाहिये, न सूप (-की हवा)-से और न हाथसे (हिलाकर)। मुखसे (फूँकनीद्वारा) अग्निको प्रज्वलित नहीं करना चाहिये, क्योंकि मुखसे ही अग्नि उत्पन्न हुआ है॥ ८४-८५ ॥
न पक्षकेणोपधमेन्न शूर्पेण न पाणिना ।<br>मुखे नैव धमेदग्निं मुखादग्निरजायत ॥ ८५ ॥<br>परस्त्रियं न भाषेत नायाज्यं याजयेद् द्विजः ।<br>नैकश्चरेत् सभां विप्रः समवायं च वर्जयेत् ॥ ८६ ॥दूसरेकी स्त्रीसे बात नहीं करनी चाहिये और द्विज (ब्राह्मण)-को चाहिये कि जो यज्ञ करने योग्य नहीं है उसका यज्ञ न कराये। विप्रको अकेले सभामें नहीं जाना चाहिये और समूहका त्याग करना चाहिये। बायेंसे देव-मन्दिरमें प्रवेश नहीं करना चाहिये। अर्थात् देवमन्दिरको अपने दाहिने करके प्रवेश करना चाहिये। वस्त्रद्वारा पंखा नहीं झलना चाहिये और देवमन्दिरमें सोना नहीं चाहिये। मार्गमें अकेले नहीं चलना चाहिये और न अधार्मिक व्यक्तियोंके साथ ही कहीं जाना चाहिये। इसी प्रकार व्याधिग्रस्त, शूद्र और पतितोंके साथ भी मार्गमें नहीं जाना चाहिये<sup></sup>। जूता और जल आदिके बिना मार्गमें नहीं चलना चाहिये। न रात्रिमें, न शत्रुके साथ और न बिना कमण्डलुके चलना चाहिये। अग्नि, गौ, ब्राह्मण आदिके बीचमेंसे होते हुए नहीं निकलना चाहिये॥ ८६-८९ ॥
न देवायतनं गच्छेत् कदाचिद् वाप्रदक्षिणम् ।<br>न वीजयेद् वा वस्त्रेण न देवायतने स्वपेत् ॥ ८७ ॥
नैकोऽध्वानं प्रपद्येत नाधार्मिकजनैः सह ।<br>न व्याधिदूषितैर्वापि न शूद्रैः पतितेन वा ॥ ८८ ॥
नोपानद्वर्जितो वाथ जलादिरहितस्तथा ।<br>न रात्रौ नारिणा सार्धं न विना च कमण्डलुम् ।<br>नाग्निगोब्राह्मणादीनामन्तरेण व्रजेत् क्वचित् ॥ ८९ ॥
न वत्सतन्त्रीं विततामतिक्रामेत् क्वचिद् द्विजः ।<br>न निन्देद् योगिनः सिद्धान् व्रतिनो वा यतींस्तथा ॥ ९० ॥द्विज (मानवमात्र)-को चाहिये कि वह कभी भी बछड़ेको दूध पिलाती हुई गाय तथा गायको बाँधनेवाली रस्सी अथवा उसकी पूँछका उल्लंघन न करे। योगियों, सिद्धों, व्रतपरायणों तथा संन्यासियोंकी निन्दा न करे॥ ९० ॥

१-शब्दकल्पद्रुममें यह श्लोक है। वहाँ 'बहिर्माल्‍य' का अर्थ 'कण्ठसे बाहर निकाली हुई माला' किया गया है। इससे अन्यके द्वारा धारित तथा अपने द्वारा भी धारित पुष्पमालाका पुनः धारण निषिद्ध है, यह स्पष्ट होता है।
२-सामान्य स्थितिमें यह निषेध सबके लिये है, ब्राह्मणका उल्लेख प्रमुखताकी दृष्टिसे है।
३-यहाँ घृणाका भाव नहीं है। व्यक्ति एवं समाजके दूरगामी सुपरिणाम (कल्याण)-की दृष्टिसे यह एक सुविचारित व्यवस्था है।

३३२ * कूर्मपुराण *

देवतायतनं प्राज्ञो देवानां चैव सत्रिणाम्।<br>नाक्रामेत् कामतश्छायां ब्राह्मणानां च गोरपि ॥ ९१ ॥<br><br>स्वां तु नाक्रमयेच्छायां पतिताद्यैर्न रोगिभिः।<br>नाङ्गारभस्मकेशादिष्वधितिष्ठेत् कदाचन ॥ ९२ ॥<br><br>वर्जयेन्मार्जनीरेणुं स्नानवस्त्रघटोदकम्।<br>न भक्षयेदभक्ष्याणि नापेयं च पिबेद् द्विजः ॥ ९३ ॥बुद्धिमान् व्यक्तिको देवमन्दिर, देवताओं, यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणों तथा गायकी परछाईंको इच्छापूर्वक लाँघना नहीं चाहिये। पतित आदिसे तथा रोगियोंसे अपनी परछाईंका उल्लंघन नहीं होने देना चाहिये। अंगार, भस्म तथा केश आदिपर कभी भी बैठना नहीं चाहिये। झाड़ूकी धूल, स्नानके वस्त्र तथा (स्नानसे बचे) घड़ेके जलके छींटेसे बचना चाहिये (उसे अपने ऊपर नहीं पड़ने देना चाहिये)। द्विज (मानवमात्र)-को चाहिये कि वह अभक्षणीय पदार्थको खाये नहीं और न ही अपेय पदार्थको पीये ॥ ९१-९३ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ॥


सत्रहवाँ अध्याय

भक्ष्य एवं अभक्ष्य-पदार्थोंका वर्णन

व्यास उवाचव्यासजीने कहा—
नाद्याच्छूद्रस्य विप्रोऽन्नं मोहाद् वा यदि वान्यतः।<br>स शूद्रयोनिं व्रजति यस्तु भुङ्क्ते ह्यनापदि ॥ १ ॥<br><br>षण्मासान् यो द्विजो भुङ्क्ते शूद्रस्यान्नं विगर्हितम्।<br>जीवन्नेव भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते ॥ २ ॥<br><br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्रस्य च मुनीश्वराः।<br>यस्यान्नेनोदरस्थेन मृतस्तद्योनिमाप्नुयात् ॥ ३ ॥<br><br>राजानं नर्तकान्नं च तक्ष्णोऽन्नं चर्मकारिणः।<br>गणान्नं गणिकान्नं च षण्ढान्नं चैव वर्जयेत् ॥ ४ ॥<br><br>चक्रोपजीविरजकतस्करध्वजिनां तथा।<br>गान्धर्वलोहकारान्नं सूतकान्नं च वर्जयेत् ॥ ५ ॥ब्राह्मणको मोहसे अथवा अन्य किसी दूसरे कारणसे शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये। जो अनापत्तिकालमें शूद्रका अन्न भक्षण करता है, वह शूद्रयोनिको प्राप्त होता है। जो द्विज छः महीनेतक लगातार शूद्रका गर्हित अन्न खाता है, वह जीते हुए शूद्र हो जाता है और मृत्युके बाद श्वान-योनिमें जन्म लेता है ॥ १-२ ॥<br><br>हे मुनीश्वरो ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इनमेंसे जिसका अन्न मृत्युके समय जिसके उदरमें रहता है, उसे उसीकी योनि प्राप्त होती है (अर्थात् ब्राह्मणका अन्न उदरमें मृत्युके समय है तो ब्राह्मण-योनि प्राप्त होगी आदि-आदि) ॥ ३ ॥<br><br>राजा, नर्तक, बढ़ई, चर्मकार, गण¹ (सौ ब्राह्मणोंका संघ), गणिका और नपुंसकके अन्नका परित्याग करना चाहिये। चक्रके आधारपर अपनी जीविका चलानेवाला (तैलक—तेली)², धोबी, चोर, ध्वजी³ (मद्यविक्रय-जीवी), गायक, लौहकार और सूतकके अन्नका त्याग करना चाहिये ॥ ४-५ ॥

१-मनुस्मृति (४।२०९)-की कुल्लूकभट्टकी व्याख्याके अनुसार 'गण' का अर्थ 'शतब्राह्मणसंघ' है। शत संख्याको अनेक संख्यापरक मानकर ब्राह्मण-समूहका अन्न परित्याज्य समझना चाहिये।
२-मनुस्मृति (४।८४)-के अनुसार चक्रोपजीवीका अर्थ तैलिक है।
३-मनुस्मृति (४।८४)-के अनुसार ध्वजीका अर्थ मदिराविक्रयके द्वारा जिस जातिके लोग जीविका चलाते हैं, उस जातिके लोग हैं। इन्हें संस्कृतमें 'शौण्डिक' कहते हैं।

  • अध्याय १७ * ३३३

कुलालचित्रकर्मान्नं वार्धुषेः पतितस्य च।<br>पौनर्भवच्छत्रिकयोरभिशस्तस्य चैव हि॥ ६ ॥<br><br>सुवर्णकारशैलूषव्याधबद्धातुरस्य च।<br>चिकित्सकस्य चैवान्नं पुंश्चल्या दण्डिकस्य च॥ ७ ॥<br><br>स्तेननास्तिकयोरन्नं देवतानिन्दकस्य च।<br>सोमविक्रयिणश्चान्नं श्वपाकस्य विशेषतः॥ ८ ॥<br><br>भार्याजितस्य चैवान्नं यस्य चोपपतिर्गृहे।<br>उत्सृष्टस्य कदर्यस्य तथैवोच्छिष्टभोजिनः॥ ९ ॥कुम्भकार, चित्रकार, वार्धुषी¹ (कर्ज देकर सूदसे जीविका चलानेवाले), पतित, विधवाके पुनर्विवाहके अनन्तर अथवा पति-परित्यक्तासे उत्पन्न पुरुष², छत्रिक³ (नापित), अभिशस्त (चोरी, मैथुन आदि आरोपसे ग्रस्त), स्वर्णकार, नट, व्याध, बन्धनप्राप्त, आतुर (रोगी), चिकित्सक, व्यभिचारिणी स्त्री तथा दण्डधर (दण्ड देनेवाले, नियामक—जल्लाद आदि)—का अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये। चोर, नास्तिक, देवनिन्दक, सोमलता-विक्रयी तथा विशेषरूपसे चाण्डालका और स्त्रीके वशीभूत तथा जिसके घरमें उस स्त्रीका उपपति हो, (समाजद्वारा) परित्यक्त, कृपण और जूठा भोजन करनेवालेका अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये॥ ६—९ ॥
अपाङ्क्त्यान्नं च सङ्घान्नं शस्त्राजीवस्य चैव हि।<br>क्लीबसन्न्यासिनोश्चान्नं मत्तोन्मत्तस्य चैव हि।<br>भीतस्य रुदितस्यान्नमवकृष्टं परिक्षुतम्॥ १०॥<br><br>ब्रह्मद्विषः पापरुचेः श्राद्धान्नं सूतकस्य च।<br>वृथापाकस्य चैवान्नं शावान्नं श्वशुरस्य च॥ ११ ॥<br><br>अप्रजानां तु नारीणां भृतकस्य तथैव च।<br>कारुकान्नं विशेषेण शस्त्रविक्रयिणस्तथा॥ १२ ॥पंक्तिसे बहिष्कृत, समूहके आश्रित, शस्त्रसे आजीविका चलानेवाला, क्लीब (नपुंसक), संन्यासी, मत्त, उन्मत्त, भयभीत, रोते हुए व्यक्तिके तथा अभिशप्त एवं छींकसे अशुद्ध अन्नको ग्रहण नहीं करना चाहिये। ब्राह्मणसे द्वेष करनेवालों, पापबुद्धि, श्राद्ध तथा अशौचसम्बन्धी अन्न, निष्प्रयोजन बने हुए भोजन (ईश्वर-समर्पणबुद्धिसे न बना हुआ), शव-सम्बन्धी तथा ससुरका⁴ अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये। बिना संतानवाली स्त्री, भृत्य, शिल्पी (कारीगर⁵) तथा शस्त्रविक्रयीका अन्न विशेष-रूपसे त्याग करना चाहिये॥ १०—१२ ॥
शौण्डान्नं घाटिकान्नं च भिषजामन्नमेव च।<br>विद्धप्रजननस्यान्नं परिवित्त्यन्नमेव च॥ १३॥<br><br>पुनर्भुवो विशेषेण तथैव दिधिषूपतेः।<br>अवज्ञातं चावधूतं सरोषं विस्मयान्वितम्।<br>गुरोरपि न भोक्तव्यमन्नं संस्कारवर्जितम्॥ १४॥शौण्ड (मद्य बनानेवाले जातिविशेषके लोग), स्तुति करनेवाले 'भाट'-जातिके लोगों, भिषक् (जिससे रोग भयभीत हो), विद्धलिंगी और ज्येष्ठ भाईके अविवाहित रहनेपर विवाह कर लेनेवाले छोटे भाईका अन्न भी ग्रहण नहीं करना चाहिये। दो बार विवाह करनेवाली स्त्री⁶ तथा ऐसी स्त्रीके पतिका अन्न विशेषरूपसे त्याज्य है। अनादरपूर्वक दिया गया, तिरस्कारपूर्वक दिया गया, रोष एवं अभिमानपूर्वक दिया हुआ अन्न, इसी प्रकार गुरुके संस्कारहीन अन्नको ग्रहण नहीं करना चाहिये॥ १३—१४॥

१-अमरकोष (२।९।५)-के अनुसार।
२-मनुस्मृति (९।१७५)-के अनुसार।
३-शब्दकल्पद्रुमके अनुसार।
४-आलसी या प्रमादी होकर श्वशुरगृहमें स्थायीरूपसे रहनेके साथ वहाँका अन्न ग्रहण करना निषिद्ध है।
५-बढ़ई, जुलाहा, नाई, धोबी और चर्मकार—इन पाँचको 'कारु' या 'शिल्पी' कहा जाता है।
६-मूलमें 'पुनर्भू' शब्द है। इसका पर्याय 'दिधिषू' है। ये दोनों शब्द स्त्रीलिङ्ग हैं। इनका अर्थ दो बार विवाह करनेवाली स्त्री है (शब्दकल्पद्रुम, अमरकोश)।

३३४* कूर्मपुराण *
दुष्कृतं हि मनुष्यस्य सर्वमन्ने व्यवस्थितम्।<br>यो यस्यान्नं समश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम्॥ १५॥<br><br>आर्द्धिकः कुलमित्रञ्च स्वगोपालश्च नापितः।<br>एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत्॥ १६॥<br><br>कुशीलवः कुम्भकारः क्षेत्रकर्मक एव च।<br>एते शूद्रेषु भोज्यान्ना दत्त्वा स्वल्पं पणं बुधैः॥ १७॥<br><br>पायसं स्नेहपक्वं यद् गोरसं चैव सक्तवः।<br>पिण्याकं चैव तैलं च शूद्राद् ग्राह्यं द्विजातिभिः॥ १८॥<br><br>वृन्ताकं नालिकाशाकं कुसुम्भाश्मन्तकं तथा।<br>पलाण्डुं लशुनं शुक्तं निर्यासं चैव वर्जयेत्॥ १९॥<br><br>छत्राकं विड्वराहं च शेलुं पेयूषमेव च।<br>विलयं सुमुखं चैव कवकानि च वर्जयेत्॥ २०॥<br><br>गृञ्जनं किंशुकं चैव ककुभाण्डं तथैव च।<br>उदुम्बरमलाबुं च जग्ध्वा पतति वै द्विजः॥ २१॥मनुष्यका किया हुआ सारा पाप अन्नमें स्थित रहता है। इसलिये जो जिसका अन्न ग्रहण करता है, वह उसके पापका ही भक्षण करता है॥ १५॥<br>आर्द्धिक (जो शूद्र द्विजातिके घर हल जोतकर उसके पारिश्रमिक-रूपमें अन्न प्राप्त करता है), कुलमित्र (पिता-पितामहकी परम्परासे जो द्विजातिके घर रहता आया है तथा अभिन्न सहयोगी है), जो अपने गौओंका पालन करनेवाला है, नापित तथा जिस शूद्रने मन, वाणी और कर्मसे सर्वथा स्वयंको 'मैं आपका ही हूँ'-इस रूपमें समर्पित कर दिया है—ऐसे शूद्रका अन्न ग्रहण किया जा सकता है। बुद्धिमान् व्यक्तिको शूद्रोंमें नाटक आदिसे जीविका चलानेवालों (चारण, कत्थक), कुम्हार और खेतमें काम करनेवालोंका अन्न थोड़ा मूल्य देकर ग्रहण करना चाहिये। द्विजातियोंद्वारा दूधका^१ विकार—मक्खन-खोआ आदि, घृतमें पके पदार्थ, गोरस (दूध), सत्तू, पिण्याक (खली, शिलाजीत, केसर, हींग इत्यादि) तथा तेल—ये पदार्थ शूद्रोंसे ग्रहण किये जा सकते हैं॥ १६-१८॥<br>बैगन, नालिकासाग^२, कुसुम्भ (पुष्पविशेष), अश्मन्तक^३, प्याज, लहसुन, शुक्त^४ और वृक्षके गोंदका परित्याग करना चाहिये। छत्राक, विड्वराह (ग्राम्य-सूकर), शेलु^५ (वनमेथी), पेयूष^६, विलय, सुमुख^७, कवक, (कुकुरमुत्ता), किंशुक (पलाश), ककुभाण्ड, उदुम्बर (गूलर) तथा अलाबु (वर्तुलाकार—गोल लौकी)—का भक्षण करनेसे द्विज पतित हो जाता है॥ १९-२१॥

१-मूलमें 'पायस' शब्द है। इसका अर्थ खीर नहीं करना चाहिये। शब्दकल्पद्रुममें उद्धृत तिथितत्त्वके वराहपुराणीय वचनके अनुसार यहाँ पायसका अर्थ दुग्धविकार ही है।
२-'नालिकाशाक' मूलमें पठित है। सुश्रुत (१।४६)-में इसकी चर्चा है। ग्राम्य भाषामें इसे 'भँसीड़' कहते हैं। यह तालाबमें होता है। इसमें पत्ते नहीं होते हैं। मात्र डंठल होता है। डंठलके भीतर छिद्र होते हैं। आप्तपरम्परामें इसका भक्षण निषिद्ध माना जाता है।
३-अश्मन्तक—तृणविशेष 'अम्लकुचाई' लोकभाषा। पर्याय 'अम्लोटक' (रत्नमाला) इसके गुण राजनिर्घण्टमें वर्णित हैं। (शब्दकल्पद्रुम)
४-'शुक्त' उसे कहते हैं जो स्वभावतः मधुर हो तथा कालवश (समयानुसार) खट्टी हो जाय। जैसे काँजी (प्रायश्चित्तविवेक)। मनुस्मृति (२। १७७)-के अनुसार भी जो स्वभावतः मधुर हो, पर समयवश जल आदिमें रखनेसे अम्ल (खट्टी) हो जाय वह शुक्त है। किंतु शुक्तके रूपमें दही और दहीसे बननेवाले मट्ठा आदि पदार्थ भक्ष्य हैं।
५-शेलु—श्लेष्मातक (लोकभाषा—लिसोढ़ा) अमरकोश।
६-पेयूष—नवप्रसूता गौका अग्निसंयोगसे कठिन किया गया दूध (फेनुप, इतर लोकभाषामें) यह भैंस-बकरीका भी निषिद्ध है।
७-सुमुख—शाकविशेष। इसका पर्याय—वनवर्बरिका, वर्बर है। (राजनिर्घण्ट) (शब्दकल्पद्रुम)।

  • अध्याय १७ * ३३५

वृथा कृशरसंयावं पायसापूपमेव च।<br>अनुपाकृतमांसं च देवान्नानि हवींषि च॥ २२॥<br><br>यवागूं मातुलिङ्गं च मत्स्यान्प्यनुपाकृतान्।<br>नीपं कपित्थं प्लक्षं च प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥ २३॥<br><br>पिण्याकं चोद्धृतस्नेहं देवधान्यं तथैव च।<br>रात्रौ च तिलसम्बद्धं प्रयत्नेन दधि त्यजेत्॥ २४॥<br><br>नाश्नीयात् पयसा तक्रं न बीजान्युपजीवयेत्।<br>क्रियादुष्टं भावदुष्टमसत्संगं च वर्जयेत्॥ २५॥<br><br>केशकीटावपन्नं च सहृल्लेखं च नित्यशः।<br>श्वाघ्रातं च पुनः सिद्धं चण्डालावेक्षितं तथा॥ २६॥<br><br>उदक्यया च पतितैर्गवा चाघ्रातमेव च।<br>अनर्चितं पर्युषितं पर्यायान्नं च नित्यशः॥ २७॥<br><br>काककुक्कुटसंस्पृष्टं कृमिभिश्चैव संयुतम्।<br>मनुष्यैरप्यवघ्रातं कुष्ठिना स्पृष्टमेव च॥ २८॥<br><br>न रजस्वलया दत्तं न पुंश्चल्या सरोषया।<br>मलवद्वाससा वापि परवासोऽथ वर्जयेत्॥ २९॥<br><br>विवत्सायाश्च गोः क्षीरमौष्ट्रं वानिर्दशं तथा।<br>आविकं सन्धिनीक्षीरमपेयं मनुरब्रवीत्॥ ३०॥<br><br>बलाकं हंसदात्यूहं कलविङ्कं शुकं तथा।<br>कुररं च चकोरं च जालपादं च कोकिलम्॥ ३१॥<br><br>वायसं खञ्जरीटं च श्येनं गृध्रं तथैव च।<br>उलूकं चक्रवाकं च भासं पारावतानपि।<br>कपोतं टिट्टिभं चैव ग्रामकुक्कुटमेव च॥ ३२॥देवताके उद्देश्यसे नहीं केवल अपने लिये पकाये गये कृशरान्न (तिल-चावलके बने पदार्थ), संयाव (लपसी), खीर एवं पुआका तथा देवान्न (देवताके लिये समर्पित अन्न), हवनके योग्य द्रव्य (पुरोडाश आदि), यवागू (जौकी काँजी), मातुलिंग (बिजौरा नींबू), देव-पित्र्यकर्ममें कदम्ब, कपित्थ (कैथ) और प्लक्ष (पर्कटी—पाकड़)-का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये। तेल निकाली हुई खली, देवताका धान्य और रात्रिमें तिल-सम्बन्धी पदार्थ तथा दहीका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। दूधके साथ मट्ठेका सेवन नहीं करना चाहिये। बीजोंके द्वारा जीविकाका निर्वाह नहीं करना चाहिये। कर्मसे दूषित और भावसे दूषित तथा दुर्जनोंसे सम्बन्धका परित्याग करना चाहिये॥ २२—२५॥<br><br>केश (बाल) और कीड़ोंसे युक्त, जिस अन्नको लेकर मनमें विचिकित्सा हो, कुत्तेद्वारा सूँघा हुआ, दुबारा पकाया गया, चाण्डाल, रजस्वला तथा पतितके द्वारा देखा गया और गाय-बैल आदि गोजातिद्वारा सूँघा हुआ, अनादरपूर्वक प्राप्त, बासी तथा पर्यायान्नका<sup></sup> नित्य परित्याग करना चाहिये। कौआ एवं मुर्गासे स्पृष्ट, कृमि-युक्त, मनुष्योंद्वारा सूँघे गये तथा कुष्ठ रोगीसे स्पर्श किये गये अन्नका परित्याग करना चाहिये। रजस्वलासे प्राप्त, क्रोधयुक्त व्यभिचारिणी स्त्रीद्वारा दिया गया और मलिन वस्त्र धारण करनेवाले व्यक्तिके द्वारा (दिये अन्नका) और दूसरेके वस्त्रका परित्याग करना चाहिये। मनुने बताया है कि बछड़े-रहित गौ, ऊँटनी और दस दिनोंके भीतर ब्यायी हुई (गौ इत्यादि)-का दूध तथा भेड़ी एवं गर्भिणी गौका दूध पीने योग्य नहीं है॥ २६—३०॥

१-(क) मूलमें 'पर्यायान्न' शब्द है। इसका अर्थ याज्ञ० स्मृ० आचा० १६८ वें श्लोककी मिताक्षरा व्याख्याके अनुसार वह अन्न है जो अन्यस्वामिक है और अन्यको दिया जाय। जैसे ब्राह्मणस्वामिक अन्नको शूद्र दे, शूद्रस्वामिक अन्नको ब्राह्मण दे। ऐसा अन्न ग्रहण करनेपर चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित्त है।
(ख) एक दूसरे मतके अनुसार एक पंक्तिमें बैठकर भोजन करनेवालोंमें किसी एकके उठकर आचमन कर लेनेके उपरान्त सभी भोजन करनेवालोंके अन्नको 'पर्यायान्न' कहा जाता है।

३३६* कूर्मपुराण *

सिंहव्याघ्रं च मार्जारं श्वानं शूकरमेव च।
शृगालं मर्कटं चैव गर्दभं च न भक्षयेत् ॥ ३३ ॥
न भक्षयेत् सर्वमृगान् पक्षिणोऽन्यान् वनेचरान्।
जलेचरान् स्थलचरान् प्राणिनश्चेति धारणा ॥ ३४ ॥
गोधा कूर्मः शशः श्वाविच्छल्यकश्चेति सत्तमाः ।
भक्ष्याः पञ्चनखा नित्यं मनूराह प्रजापतिः ॥ ३५ ॥
मत्स्यान् सशल्कान् भुञ्जीयान्मांसं रौरवमेव च।
निवेद्य देवताभ्यस्तु ब्राह्मणेभ्यस्तु नान्यथा ॥ ३६ ॥
मयूरं तित्तिरं चैव कपोतं च कपिञ्जलम् ।
वार्धीणसं वकं भक्ष्यं मीनहंसपराजिताः ॥ ३७ ॥
शफरं सिंहतुण्डं च तथा पाठीनरोहितौ ।
मत्स्याश्चैते समुद्दिष्टा भक्षणाय द्विजोत्तमाः ॥ ३८ ॥
प्रोक्षितं भक्षयेदेषां मांसं च द्विजकाम्यया ।
यथाविधि नियुक्तं च प्राणानामपि चात्यये ॥ ३९ ॥
भक्ष्येन्नैव मांसानि शेषभोजी न लिप्यते ।
औषधार्थमशक्तौ वा नियोगाद् यज्ञकारणात् ॥ ४० ॥
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे दैवे वा मांसमुत्सृजेत् ।
यावन्ति पशुरोमाणि तावतो नरकान् व्रजेत् ॥ ४१ ॥
अदेयं चाप्यपेयं च तथैवास्पृश्यमेव च।
द्विजातीनामनालोक्यं नित्यं मद्यमिति स्थितिः ॥ ४२ ॥
तस्मात् सर्वप्रकारेण मद्यं नित्यं विवर्जयेत् ।
पीत्वा पतति कर्मभ्यस्त्वसम्भाव्यो भवेद् द्विजः ॥ ४३ ॥
भक्षयित्वा ह्यभक्ष्याणि पीत्वाऽपेयान्यपि द्विजः ।
नाधिकारी भवेत् तावद् यावद् तन्न जहात्यधः ॥ ४४ ॥
तस्मात् परिहरेन्नित्यमभक्ष्याणि प्रयत्नतः।
अपेयानि च विप्रो वै तथा चेद् याति रौरवम् ॥ ४५ ॥ | द्विजोंके लिये मद्य न दान देने योग्य है, न पीने योग्य है, न स्पर्श करने योग्य है और न ही देखने योग्य है—ऐसी हमेशाके लिये मर्यादा बनी है। इसलिये सब प्रकारसे मद्यका नित्य ही परित्याग करना चाहिये। मद्य पीनेसे द्विज कर्मोंसे पतित और बातचीत करनेके अयोग्य हो जाता है। अभक्ष्यका भक्षण करने और अपेय पदार्थोंका पान करनेसे द्विज तबतक अपने कर्मका अधिकारी नहीं होता, जबतक उसका पाप दूर नहीं हो जाता। इसलिये प्रयत्नपूर्वक नित्य ही विप्र (द्विज)-को अभक्ष्य एवं अपेय पदार्थोंका परित्याग करना चाहिये। यदि द्विज ऐसा करता है अर्थात् इन्हें ग्रहण करता है तो उसे रौरव नरकमें जाना पड़ता है ॥ ४२–४५ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥

* अध्याय १८ * ३३७


अठारहवाँ अध्याय

गृहस्थके नित्यकर्मोंका वर्णन, प्रातःस्नानकी महिमा, छः प्रकारके स्नान, संध्योपासनकी महिमा तथा संध्योपासनविधि, सूर्योपस्थानका माहात्म्य, सूर्यहृदयस्तोत्र, अग्निहोत्रकी विधि, तर्पणकी विधि, नित्य किये जानेवाले पञ्चमहायज्ञोंकी महिमा तथा उनका विधान

ऋषय ऊचुः<br>अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां महामुने।<br>तदाचक्ष्वाखिलं कर्म येन मुच्येत बन्धनात् ॥ १ ॥ऋषियोंने कहा— महामुने! आप द्विजोंके प्रतिदिन किये जानेवाले उन कर्मोंका सम्पूर्ण-रूपसे वर्णन करें, जिनका अनुष्ठान करनेसे बन्धनसे मुक्ति प्राप्त होती है॥ १॥
व्यास उवाच<br>वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं गदतो मम।<br>अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां क्रमाद् विधिम्॥ २ ॥<br><br>ब्राह्मे मुहूर्ते तूत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।<br>कायक्लेशं तदुद्भूतं ध्यायीत मनसेश्वरम्॥ ३ ॥<br><br>उषःकालेऽथ सम्प्राप्ते कृत्वा चावश्यकं बुधः।<br>स्नायान्नदीषु शुद्धासु शौचं कृत्वा यथाविधि॥ ४ ॥<br><br>प्रातःस्नानेन पूयन्ते येऽपि पापकृतो जनाः।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रातःस्नानं समाचरेत्॥ ५ ॥व्यासजी बोले— मैं बतला रहा हूँ। आप लोग ध्यानपूर्वक मेरे द्वारा कहे जा रहे ब्राह्मणोंके प्रतिदिन किये जानेवाले कर्मोंको और उनके विधानको सुनें<sup></sup>। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर धर्म और अर्थ एवं (उनकी सम्पन्नताके लिये) अपेक्षित शारीरिक आयास (क्या कब कैसे करना है आदि)-का चिन्तन करे तथा मनसे ईश्वरका ध्यान करे। बुद्धिमान्‌को चाहिये कि ऊषाकाल होनेपर आवश्यक कर्मोंको करके विधिपूर्वक शौच आदिसे निवृत्त होकर शुद्ध जलवाली नदियोंमें स्नान करे। प्रातःस्नान करनेसे पाप करनेवाले व्यक्ति भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे प्रातःकाल स्नान करना चाहिये॥ २–५॥
प्रातःस्नानं प्रशंसन्ति दृष्टादृष्टकरं शुभम्।<br>ऋषीणामृषिता नित्यं प्रातःस्नानान्न संशयः॥ ६ ॥<br><br>मुखे सुप्तस्य सततं लाला याः संस्रवन्ति हि।<br>ततो नैवाचरेत् कर्म अकृत्वा स्नानमादितः॥ ७ ॥<br><br>अलक्ष्मीः कालकर्णी च दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तितम्।<br>प्रातःस्नानेन पापानि पूयन्ते नात्र संशयः॥ ८ ॥<br><br>न च स्नानं विना पुंसां पावनं कर्म सुस्मृतम्।<br>होमे जप्ये विशेषेण तस्मात् स्नानं समाचरेत्॥ ९ ॥<br><br>अशक्तावशिरस्कं वा स्नानमस्य विधीयते।<br>आर्द्रेण वाससा वाथ मार्जनं कापिलं स्मृतम्॥ १०॥दृष्ट और अदृष्ट फल देनेवाले प्रातःकालीन शुभ स्नानकी सभी प्रशंसा करते हैं। नित्य प्रातःकाल स्नान करनेसे ही ऋषियोंका ऋषित्व है, इसमें संशय नहीं; क्योंकि सोये व्यक्तिके मुखसे निरन्तर लार बहती रहती है, अतः सर्वप्रथम स्नान किये बिना कोई कर्म नहीं करना चाहिये। प्रातः-स्नानसे अलक्ष्मी, कालकर्णी<sup></sup> (अलक्ष्मीविशेष) दुःस्वप्न, बुरे विचार और अन्य पाप दूर हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। बिना स्नानके मनुष्योंको पवित्र करनेवाला कोई कर्म नहीं बतलाया गया है। अतः होम तथा जपके समय विशेष-रूपसे स्नान करना चाहिये। असमर्थताकी स्थितिमें सिरको छोड़कर स्नान करनेका विधान किया गया है। अथवा भीगे वस्त्रसे शरीरका मार्जन करना चाहिये, इसे कपिलस्नान कहा गया है॥ ६–१०॥

१-इस अध्यायमें गृहस्थके प्रायः सभी अनुष्ठानोंका वर्णन है, पर क्रमसे नहीं है। क्रमका ज्ञान गृह्यसूत्र, आह्निकसूत्रावली, नित्यकर्मविधि आदि ग्रन्थोंसे करना चाहिये। इस अध्यायका उद्देश्य सभी कर्मोंका परिचय कराना है। कर्मोंका क्रम बताना उद्देश्य नहीं है।
२-कालकर्णी—अलक्ष्मी (शब्दकल्पद्रुम)।

३३८ * कूर्मपुराण *


असामर्थ्ये समुत्पन्ने स्नानमेवं समाचरेत्।<br>ब्राह्मादीनि यथाशक्तो स्नानान्याहुर्मनीषिणः॥ ११॥<br><br>ब्राह्ममाग्नेयमुद्दिष्टं वायव्यं दिव्यमेव च।<br>वारुणं यौगिकं तद्वत् षोढा स्नानं प्रकीर्तितम्॥ १२॥<br><br>ब्राह्मं तु मार्जनं मन्त्रैः कुशैः सोदकबिन्दुभिः।<br>आग्नेयं भस्मना पादमस्तकाद्देहधूलनम्॥ १३॥<br><br>गवां हि रजसा प्रोक्तं वायव्यं स्नानमुत्तमम्।<br>यत्तु सातपवर्षेण स्नानं तद् दिव्यमुच्यते॥ १४॥<br><br>वारुणं चावगाहस्तु मानसं त्वात्मवेदनम्।<br>यौगिकं स्नानमाख्यातं योगो विष्णुविचिन्तनम्॥ १५॥<br><br>आत्मतीर्थमिति ख्यातं सेवितं ब्रह्मवादिभिः।<br>मनःशुचिकरां पुंसां नित्यं तत् स्नानमाचरेत्॥ १६॥<br><br>शक्तश्चेद् वारुणं विद्वान् प्राजापत्यं तथैव च।<br>प्रक्षाल्य दन्तकाष्ठं वै भक्षयित्वा विधानतः॥ १७॥<br><br>आचम्य प्रयतो नित्यं स्नानं प्रातः समाचरेत्।<br>मध्याङ्गुलिसमस्थौल्यं द्वादशाङ्गुलसम्मितम्॥ १८॥<br><br>सत्वचं दन्तकाष्ठं स्यात् तदग्रेण तु धावयेत्।<br>क्षीरवृक्षसमुद्भूतं मालतीसम्भवं शुभम्।<br>अपामार्गं च बिल्वं च करवीरं विशेषतः॥ १९॥<br><br>वर्जयित्वा निन्दितानि गृहीत्वैकं यथोदितम्।<br>परिहृत्य दिनं पापं भक्षयेद् वै विधानवित्॥ २०॥<br><br>नोत्पाटयेद् दन्तकाष्ठं नाङ्गुल्या धावयेत् क्वचित्।<br>प्रक्षाल्य भङ्क्त्वा तज्जह्याच्छुचौ देशे समाहितः॥ २१॥<br><br>स्नात्वा संतर्पयेद् देवानृषीन् पितॄगणांस्तथा।<br>आचम्य मन्त्रवन्नित्यं पुनराचम्य वाग्यतः॥ २२॥सामर्थ्य न रहनेपर यही (कपिल-) स्नान करना चाहिये। मनीषियोंने यथाशक्ति किये जानेवाले ब्राह्म आदि स्नानोंको बतलाया है। ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण तथा यौगिक—ये छः स्नान कहे गये हैं। कुशोंके द्वारा जलबिन्दुओंस मन्त्रोच्चारणपूर्वक मार्जन करना ब्राह्म-स्नान कहलाता है। मस्तकसे पैरोंतक समस्त देहमें भस्मका उपलेपन करना आग्नेय-स्नान है। गायोंकी धूलसे सम्पन्न उत्तम स्नानको वायव्य-स्नान कहा गया है। धूपमें वर्षाके जलसे जो स्नान किया जाता है, वह दिव्य-स्नान कहलाता है। (जलमें) डुबकी लगाकर किया गया स्नान वारुण-स्नान और मनसे आत्मतत्त्वका चिन्तन करना यौगिक-स्नान कहा गया है। विष्णुका चिन्तन ही योग है॥ ११–१५॥<br><br>ब्रह्मवादियोंसे सेवित इस (यौगिक) स्नानको आत्मतीर्थ कहा गया है। यह मनुष्योंके मनको पवित्र बनानेवाला है। इसलिये यह स्नान नित्य करना चाहिये। समर्थ होनेपर विद्वान्‌को वारुण तथा प्राजापत्य (ब्राह्म)-स्नान करना चाहिये। दन्तकाष्ठको धोकर विधिपूर्वक उसका भक्षण (चर्वण) करना चाहिये॥ १६–१७॥<br><br>(दतुअन करके) आचमनकर (मुख-प्रक्षालनकर) प्रयत्नपूर्वक नित्य प्रातःस्नान करना चाहिये। मध्यमा अंगुलिके समान मोटा और बारह अंगुलके बराबर लंबा छिलके-युक्त दन्तकाष्ठके अग्रभागसे मुखशुद्धि करनी चाहिये। विशेषरूपसे दूधवाले वृक्ष, मालती (चमेली), अपामार्ग, बिल्व तथा करवीर (कनेर)-की लकड़ीका दन्तकाष्ठ शुभ होता है। विधिके ज्ञाताको चाहिये कि दोषपूर्ण (निषिद्ध) दिनको छोड़कर तथा निन्दित काष्ठोंको छोड़कर बताये गये दन्तकाष्ठोंमेंसे किसी एकको ग्रहणकर दन्तधावन करना चाहिये। दन्तकाष्ठको उखाड़ना नहीं चाहिये (अर्थात् किसी छोटे पौधेको पूरा उखाड़कर उससे दन्तधावन नहीं करना चाहिये) और न कभी अँगुलीसे दतुअन करना चाहिये। (मुख) धोनेके उपरान्त उसे (दन्तकाष्ठको) तोड़कर सावधानीसे किसी पवित्र स्थानमें (यथास्थान) त्याग देना चाहिये॥ १८–२१॥<br><br>अनन्तर पवित्र देशमें स्नान करके आचमनपूर्वक देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको यथाधिकार मन्त्रपूर्वक यथाविधि तृप्त करना चाहिये॥ २२॥