भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • कूर्मपुराण *
तिलमुद्गयवादीनां मुष्टिर्ग्राह्या पथि स्थितैः ।<br>क्षुधार्तैर्नान्यथा विप्रा धर्मविद्भिरिति स्थितिः ॥ १० ॥ब्राह्मणो ! धर्म जाननेवालोंने यह मर्यादा स्थिर की है कि केवल भूखसे पीड़ित व्यक्ति रास्तेमें स्थित तिल, मूँग तथा यव आदि पदार्थोंको एक मुट्ठी मात्र ग्रहण कर सकता है। दूसरे जो भूखसे पीड़ित नहीं हैं, ऐसा नहीं कर सकते ॥ १० ॥
न धर्मस्यापदेशेन पापं कृत्वा व्रतं चरेत्।<br>व्रतेन पापं प्रच्छाद्य कुर्वन् स्त्रीशूद्रदम्भनम् ॥ ११ ॥पाप करके धर्मके बहाने किसी व्रतका अनुष्ठान नहीं करना चाहिये। व्रतके द्वारा पापको छिपाकर जो स्त्री और शूद्रोंका प्रवञ्चन करता है, वह विप्र इहलोक तथा परलोकमें ब्रह्मवादियोंद्वारा निन्दित होता है। छलके द्वारा किया गया व्रत राक्षसोंको प्राप्त होता है॥ ११-१२॥
प्रेत्येह चेदृशो विप्रो गर्ह्यते ब्रह्मवादिभिः ।<br>छद्मनाचरितं यच्च व्रतं रक्षांसि गच्छति ॥ १२ ॥
अलिङ्गी लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति ।<br>स लिङ्गिनां हरेदेनस्तिर्यग्योनौ च जायते ॥ १३ ॥यदि (यज्ञोपवीतादि) लिङ्गका अनधिकारी व्यक्ति इन लिङ्गों (चिह्नों-लक्षणों)-को धारणकर वेष बनाकर जीविकाका निर्वाह करता है तो वह इन लिङ्गोंके वास्तविक अधिकारी पुरुषोंके पापोंका भागी होता है और तिर्यक् (पक्षी आदि) योनिको प्राप्त करता है। लोकमें धर्मके विनाशक वैडालव्रती¹ (ढोंगी) पापी लोग शीघ्र ही पापयोनिमें जाते हैं। उनके दुष्कर्मका यही फल है। पाखंडी (वेदशास्त्राननुमत-व्रत लिङ्गधारी), निषिद्ध कर्म करनेवाले, वाममार्गी, पाञ्चरात्र और पाशुपत व्रतवालोंका वाणीमात्रसे भी सत्कार नहीं करना चाहिये²॥ १३-१५॥
बैडालव्रतिनः पापा लोके धर्मविनाशकाः ।<br>सद्यः पतन्ति पापेषु कर्मणस्तस्य तत् फलम् ॥ १४ ॥
पाषण्डिनो विकर्मस्थान् वामाचारांस्तथैव च ।<br>पाञ्चरात्रान् पाशुपतान् वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥ १५ ॥
वेदनिन्दारतान् मर्त्यान् देवनिन्दारतांस्तथा ।<br>द्विजनिन्दारतांश्चैव मनसापि न चिन्तयेत् ॥ १६ ॥वेदकी निन्दामें परायण, देवताओंकी निन्दामें निरत और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेमें संलग्न मनुष्योंका मनसे भी चिन्तन नहीं करना चाहिये। इनका यज्ञ कराना, इनके साथ विवाह आदि (योनि)-का सम्बन्ध, सहवास तथा बात करनेसे प्राणी पतित हो जाता है, अतः प्रयत्नपूर्वक इनका परित्याग करना चाहिये। देवताके द्रोहसे गुरुका द्रोह करोड़ों गुना अधिक दोषपूर्ण होता है। उस गुरुद्रोहसे भी शास्त्रीय ज्ञानकी निन्दा करना और नास्तिकतका भाव करोड़ गुना अधिक दोषपूर्ण है ॥ १६-१८ ॥
याजनं योनिसम्बन्धं सहवासं च भाषणम्।<br>कुर्वाणः पतते जन्तुस्तस्माद् यत्नेन वर्जयेत् ॥ १७ ॥
देवद्रोहाद् गुरुद्रोहः कोटिकोटिगुणाधिकः ।<br>ज्ञानापवादो नास्तिक्यं तस्मात् कोटिगुणाधिकम् ॥ १८ ॥

१-विडालव्रतसे जो अपनी जीविका चलाता है वह वैडालव्रती है। इसका आशय यह है कि जैसे विडाल (बिल्ली) मूषक आदिको पकड़कर खानेके लिये ध्याननिष्ठकी तरह विनीतकी भाँति बैठता है, वैसे ही जो दूसरोंको धोखा देकर अपने स्वार्थकी सिद्धिमात्रके लिये ध्यान, विनयभाव आदिका स्वाँग रचता है, वह वैडालव्रती है।
२-अतिथि-सत्कारकालमें इनके उपस्थित होनेपर अतिथिके समान इनका सत्कार नहीं करना चाहिये। जो लोग आदर योग्य नहीं हैं, उन्हें भी जीविका-निर्वाहके लिये यथाशक्ति देनेका विधान होनेसे जीवनोपयोगी वस्तु देनेका निषेध यहाँ नहीं है।

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