संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १६ * ३२५
| गोभिश्च देवतैर्विप्रैः कृष्या राजोपसेवया।<br>कुलान्यकुलतां यान्ति यानि हीनानि धर्मतः ॥ १९ ॥<br><br>कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च।<br>कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ २० ॥ | गायसे, देवताओंसे, ब्राह्मणोंसे, कृषिसे तथा राजाकी सेवासे जीविका-निर्वाह करनेवाले व्यक्तियोंका कुल दोषपूर्ण हो जाता है; क्योंकि ये वृत्तियाँ धर्मकी दृष्टिसे हीन वृत्तियाँ हैं। कुविवाह, (नित्य अथवा धार्मिक) क्रियाओंका लोप, वेदोंके अध्ययन न करने और ब्राह्मणोंके अनादर करनेसे कुल दोषपूर्ण हो जाता है ॥१९-२०॥ |
| अनृतात् पारदार्याच्च तथाभक्ष्यस्य भक्षणात्।<br>अश्रौतधर्माचरणात् क्षिप्रं नश्यति वै कुलम् ॥ २१ ॥<br><br>अश्रोत्रियेषु वै दानाद् वृषलेषु तथैव च।<br>विहिताचारहीनेषु क्षिप्रं नश्यति वै कुलम् ॥ २२ ॥ | झूठ बोलने, परदाराभिगमन, अभक्ष्य-भक्षण और वेदविरुद्ध धर्मोका आचरण करनेसे कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। अश्रोत्रिय, शूद्र तथा विहित आचारसे रहित (द्विज)-को दान देनेसे दाताका कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ २१-२२ ॥ |
| नाधार्मिकैर्वृते ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम्।<br>न शूद्रराज्ये निवसेन्न पाषण्डजनैर्वृते ॥ २३ ॥<br><br>हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्ये पूर्वपश्चिमयोः शुभम्।<br>मुक्त्वा समुद्रयोर्देशं नान्यत्र निवसेद् द्विजः ॥ २४ ॥<br><br>कृष्णो वा यत्र चरति मृगो नित्यं स्वभावतः।<br>पुण्याश्च विश्रुता नद्यस्तत्र वा निवसेद् द्विजः ॥ २५ ॥ | अधार्मिकों तथा पाखंडीजनोंसे युक्त और अत्यधिक रोगसे आक्रान्त ग्राममें तथा शूद्रके राज्यमें निवास नहीं करना चाहिये। द्विजको चाहिये कि वह हिमालय एवं विन्ध्यपर्वतके मध्यके देश और पूर्व तथा पश्चिम दिशाके समुद्रके तटवर्ती शुभ प्रदेशको छोड़कर अन्यत्र निवास नहीं करे। अथवा जहाँ स्वाभाविकरूपसे नित्य कृष्ण (कृष्णसार मृग-जातिविशेषके मृग) मृग विचरण करते हों और जहाँ वेदशास्त्र-प्रसिद्ध पुण्यजलवाली नदियाँ प्रवाहित होती हों, द्विजको वहाँ निवास करना चाहिये ॥ २३-२५ ॥ |
| अर्धक्रोशान्नदीकूलं वर्जयित्वा द्विजोत्तमः।<br>नान्यत्र निवसेत् पुण्यं नान्त्यजग्रामसंनिधौ ॥ २६ ॥<br><br>न संवसेच्च पतितैर्न चण्डालैर्न पुक्कसैः।<br>न मूर्खैर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥ २७ ॥<br><br>एकशय्यासनं पङ्क्तिर्भाण्डपक्वान्नमिथ्रणम्।<br>याजनाध्यापने योनिस्तथैव सहभोजनम् ॥ २८ ॥<br><br>सहाध्यायस्तु दशमः सहयाजनमेव च।<br>एकादश समुद्दिष्टा दोषाः साङ्कर्यसंज्ञिताः ॥ २९ ॥<br><br>समीपे वा व्यवस्थानात् पापं संक्रमते नृणाम्।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन साङ्कर्यं परिवर्जयेत् ॥ ३० ॥ | श्रेष्ठ द्विजको नदीके किनारेसे आधे कोसतककी भूमिका परित्यागकर अन्य किसी पवित्र स्थानपर नहीं रहना चाहिये और न अन्त्यजोंके ग्रामके समीपमें रहना चाहिये। पतित, चण्डाल, पुक्कस, मूर्ख, अभिमानी (धन आदिके मदसे गर्वित), अन्त्यज (म्लेच्छ, रजक आदि) और अन्त्यावसायीके साथ नहीं रहना चाहिये*। (इनके साथ) एक शय्यापर और एक आसनपर बैठना, एक पंक्तिमें बैठकर भोजन करना, बरतनों और पके हुए भोजनका मेल (मिश्रण, परस्पर आदान-प्रदान), यज्ञ करना, अध्यापन, विवाहादिका सम्बन्ध, साथमें भोजन करना और दसवाँ साथमें अध्ययन करना तथा साथमें यज्ञ कराना—ये ग्यारह 'सांकर्य' नामवाले दोष बतलाये गये हैं। इन सांकर्य-दोषयुक्त व्यक्तियोंके समीपमें भी रहनेसे मनुष्यमें पापका संक्रमण हो जाता है। अतः सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे सांकर्य (दोष)-का परित्याग करना चाहिये ॥ २६-३०॥ |
* यहाँ घृणाका भाव नहीं है। जन्मान्तरकृत कर्मोंके आधारपर यह केवल एक व्यवस्था है।