संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३२६ | * कूर्मपुराण * |
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| एकपङ्क्त्युपविष्टा ये न स्पृशन्ति परस्परम्।<br>भस्मना कृतमर्यादा न तेषां संकरो भवेत्॥ ३१॥<br><br>अग्निना भस्मना चैव सलिलेनावसेकतः।<br>द्वारेण स्तम्भमार्गेण षड्भिः पङ्क्तिर्विभिद्यते॥ ३२॥<br><br>न कुर्याच्छुष्कवैराणि विवादं न च पैशुनम्।<br>परक्षेत्रे गां धयन्तीं न चाचक्षीत कस्यचित्।<br>न संवदेत् सूतके च न कञ्चिन्मर्माणि स्पृशेत्॥ ३३॥<br>न सूर्यपरिवेषं वा नेन्द्रचापं शवाग्निकम्।<br>परस्मै कथयेद् विद्वान् शशिनं वा कदाचन॥ ३४॥<br><br>न कुर्याद् बहुभिः सार्धं विरोधं बन्धुभिस्तथा।<br>आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥ ३५॥<br>तिथिं पक्षस्य न ब्रूयात् न नक्षत्राणि निर्दिशेत्।<br>नोदक्यामभिभाषेत नाशुचिं वा द्विजोत्तमः॥ ३६॥<br><br>न देवगुरुविप्राणां दीयमानं तु वारयेत्।<br>न चात्मानं प्रशंसद् वा परनिन्दां च वर्जयेत्।<br>वेदनिन्दां देवनिन्दां प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥ ३७॥<br>यस्तु देवानृषीन् विप्रान् वेदान् वा निन्दति द्विजः।<br>न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा शास्त्रेष्विह मुनीश्वराः॥ ३८॥<br><br>निन्दयेद् वै गुरुं देवं वेदं वा सोपबृंहणम्।<br>कल्पकोटिशतं साग्रं रौरवे पच्यते नरः॥ ३९॥<br><br>तूष्णीमासीत निन्दायां न ब्रूयात् किंचिदुत्तरम्।<br>कर्णौ पिधाय गन्तव्यं न चैतानवलोकयेत्॥ ४०॥<br><br>वर्जयेद् वै रहस्यानि परेषां गूहयेद् बुधः।<br>विवादं स्वजनैः सार्धं न कुर्याद् वै कदाचन॥ ४१॥ | एक पंक्तिमें बैठे रहनेपर भी जो एक-दूसरेका स्पर्श नहीं करते हों और बीचमें भस्मके द्वारा रेखारूप मर्यादा खींचे हों, उनमें सांकर्य-दोष नहीं होता। अग्नि, भस्म, जलके छिड़काव, द्वार, स्तम्भ तथा मार्ग—इन छःके द्वारा पंक्तिका खंडन हो जाता है। अकारण शत्रुता, विवाद तथा चुगलखोरी नहीं करनी चाहिये। दूसरेके खेतमें चरती हुई गायको किसीको बतलाना नहीं चाहिये। सूतक (अशौच)-युक्त व्यक्तिसे बात न करे और किसीके भी मर्मका स्पर्श* न करे॥ ३१-३३॥<br><br>विद्वान् व्यक्ति दूसरोंको सूर्यमण्डल, इन्द्रधनुष, चिताग्नि तथा चन्द्रमा (चन्द्रमण्डल) न बतलाये, न दिखलाये। बहुत लोगोंके साथ और बन्धु-बान्धवोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिये। स्वयंके प्रति जैसा आचरण प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरोंके प्रति न करे॥ ३४-३५॥<br><br>पक्षकी तिथिको न कहे, न नक्षत्रोंका निर्देश करे। श्रेष्ठ द्विज रजस्वला स्त्रीसे बात न करे और न ही अपवित्र व्यक्तिसे बात करे। देवता, गुरु तथा ब्राह्मणोंको दी जा रही वस्तुका निषेध न करे। अपनी प्रशंसा न करे और दूसरेकी निन्दाका त्याग करे। वेदनिन्दा तथा देवनिन्दाका प्रयत्नपूर्वक (सर्वथा) परित्याग करे॥ ३६-३७॥<br><br>मुनीश्वरो! जो द्विज देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों अथवा वेदोंकी निन्दा करता है, उसके लिये इस लोकमें कोई प्रायश्चित्त शास्त्रोंमें दिखलायी नहीं देता। गुरु, देवता, वेद, उपबृंहण (इतिहास-पुराण)-की निन्दा करनेवाला व्यक्ति सैकड़ों, करोड़ों वर्षोंसे भी अधिक समयतक रौरव नरकमें कष्ट भोगता है। (देवता, शास्त्र आदिकी) निन्दा होनेपर (यदि उत्तर देनेका सामर्थ्य न हो तो) चुपचाप रहना चाहिये, उत्तरमें (दुराग्रहीसे) कुछ भी नहीं बोलना चाहिये। अथवा उस समय कान बंदकर अन्यत्र चला जाय और उन निन्दकोंकी ओर देखे भी नहीं॥ ३८—४०॥<br><br>विद्वान् व्यक्तिको दूसरोंके रहस्योंको जाननेका प्रयास नहीं करना चाहिये और (जाननेपर) उन्हें छिपाना चाहिये। अपने आत्मीय जनोंके साथ कभी भी विवाद नहीं करना चाहिये॥ ४१॥ |
* मर्मस्पर्शका तात्पर्य है—किसीके रहस्यको प्रकाशित कर उसे पीड़ा पहुँचाना।