भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 337
  • अध्याय १६ * | ३२७ ---|---
न पापं पापिनां ब्रूयादपापं वा द्विजोत्तमाः।<br>स तेन तुल्यदोषः स्यान्मिथ्या द्विर्दोषवान् भवेत् ॥ ४२ ॥हे द्विजोत्तमो! पापियोंके पापकी चर्चा न करे, न अपाप (पापरहित)-पर पापी होनेका आरोप लगाये, क्योंकि ऐसा करनेसे वह उसी (पापी)-के समान दोषयुक्त होकर तथा मिथ्याभिभाषणरूप दोषसे युक्त* होकर दो दोषोंका भागी हो जाता है।
यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि रोदनात्।<br>तानि पुत्रान् पशून् घ्नन्ति तेषां मिथ्याभिशंसिनाम् ॥ ४३ ॥मिथ्या दोषारोपणयुक्त व्यक्तियोंके रोनेसे जो अश्रुविन्दु गिरते हैं, वे मिथ्या दोषारोपण करनेवाले व्यक्तिके पुत्रों तथा पशुओंका नाश कर देते हैं।
ब्रह्महत्यासुरापाने स्तेयगुर्वङ्गनागमे।<br>दृष्टं विशोधनं वृद्धैर्नास्ति मिथ्याभिशंसने ॥ ४४ ॥ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन—इन महापापोंकी शुद्धि वृद्धजनोंद्वारा देखी गयी है (अर्थात् बतायी गयी है), किंतु मिथ्या दोषारोपण करनेवालेकी कोई शुद्धि नहीं है अर्थात् इनकी शुद्धिका कोई उपाय नहीं है॥ ४२—४४॥
नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं शशिनं चानिमित्ततः।<br>नास्तं यान्तं न वारिस्थं नोपसृष्टं न मध्यगम्।<br>तिरोहितं वाससा वा नादर्शान्तरगामिनम् ॥ ४५ ॥बिना किसी प्रयोजनके उगते हुए सूर्य और चन्द्रमाको नहीं देखना चाहिये। (ऐसे ही अकारण) अस्त होते हुए, जलमें प्रतिबिम्बित, आकाशके मध्य स्थित, ग्रहणयुक्त, वस्त्राच्छादित अथवा दर्पण आदिमें प्रतिबिम्बित सूर्य-चन्द्रमाको नहीं देखना चाहिये॥ ४५॥
न नग्नां स्त्रियमीक्षेत पुरुषं वा कदाचन।<br>न च मूत्रं पुरीषं वा न च संसृष्टमैथुनम्।<br>नाशुचिः सूर्यसोमादीन् ग्रहानालोकयेद् बुधः ॥ ४६ ॥नग्न स्त्री अथवा पुरुषको कभी भी न देखे। मल-मूत्र विसर्जित कर रहे तथा मैथुनासक्त व्यक्तिको न देखे। बुद्धिमान् व्यक्तिको अपवित्रताकी स्थितिमें सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रहोंको नहीं देखना चाहिये।
पतितव्यङ्गचण्डालानुच्छिष्टान् नावलोकयेत्।<br>नाभिभाषेत च परमुच्छिष्टो वावगुण्ठितः ॥ ४७ ॥पतित, विकलाङ्ग, चाण्डाल एवं उच्छिष्ट (मुखवाले) व्यक्तियोंको नहीं देखना चाहिये। उच्छिष्ट दशामें अथवा मुख ढककर दूसरेसे बात नहीं करनी चाहिये।
न पश्येत् प्रेतसंस्पर्शं न क्रुद्धस्य गुरोर्मुखम्।<br>न तैलोदकयोश्छायां न पत्नीं भोजने सति।<br>नामुक्तबन्धनाङ्गां वा नोन्मत्तं मत्तमेव वा ॥ ४८ ॥शवका स्पर्श किये हुए व्यक्तिको (जबतक स्नानादिसे शुद्ध नहीं हो जाता है तबतक), क्रुद्ध गुरुके मुखको, तेल या जलमें पड़नेवाली छायाको, भोजन करते समय पत्नीको, खुले हुए अङ्गोंवाली स्त्रीको, पागल एवं मतवाले व्यक्तिको नहीं देखना चाहिये।
नाश्नीयात् भार्यया सार्धं नैनामीक्षेत चाश्नतीम्।<br>क्षुवन्तीं जृम्भमाणां वा नासनस्थां यथासुखम् ॥ ४९ ॥पत्नीके साथ भोजन नहीं करना चाहिये और उसे भोजन करते हुए, छींकते हुए, जम्हाई लेते हुए तथा आसनपर आरामसे बैठे रहनेकी अवस्थामें नहीं देखना चाहिये।
नोदके चात्मनो रूपं न कूलं श्वभ्रमेव वा।<br>न लङ्घयेच्च मूत्रं वा नाधितिष्ठेत् कदाचन ॥ ५० ॥जलमें अपना रूप तथा (नदी आदिके) किनारे और गर्त (गहरा गड्डा)-को नहीं देखना चाहिये। मूत्रको लाँघना नहीं चाहिये और न कभी उसपर बैठना चाहिये॥ ४६—५०॥

* इसका आशय यह है कि किसीके पापकी चर्चासे स्वयंमें पाप संक्रमित होते हैं तथा वस्तुतः निष्पापमें पापकी कल्पना मिथ्याकल्पना है और इस कल्पनाके आधारपर पापका कथन मिथ्याभाषण है।