भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२८ * कूर्मपुराण *


न शूद्राय मतिं दद्यात् कृशरं पायसं दधि।
नोच्छिष्टं वा मधु घृतं न च कृष्णाजिनं हविः ॥ ५१ ॥

न चैवास्मै व्रतं दद्यान्न च धर्मं वदेद् बुधः।
न च क्रोधवशं गच्छेद् द्वेषं रागं च वर्जयेत् ॥ ५२ ॥

लोभं दम्भं तथा यत्नादसूयां ज्ञानकुत्सनम्।
ईर्ष्यां मदं तथा शोकं मोहं च परिवर्जयेत् ॥ ५३ ॥

न कुर्यात् कस्यचित् पीडां सुतं शिष्यं च ताडयेत्।
न हीनानुपसेवेत न च तीक्ष्णमतीन् क्वचित् ॥ ५४ ॥

नात्मानं चावमन्येत दैन्यं यत्नेन वर्जयेत्।
न विशिष्टानसत्कुर्यात् नात्मानं वा शपेद् बुधः ॥ ५५ ॥

न नखैर्विलिखेद् भूमिं गां च संवेशयेन्न हि।
न नदीषु नदीं ब्रूयात् पर्वतेषु च पर्वतान् ॥ ५६ ॥

आवासे भोजने वापि न त्यजेत् सहयायिनम्।
नावगाहेदपो नग्नो वह्निं नातिव्रजेत् पदा ॥ ५७ ॥

शिरोऽभ्यङ्गावशिष्टेन तैलेनाङ्गं न लेपयेत्।
न सर्पशस्त्रैः क्रीडेत स्वानि खानि न संस्पृशेत्।
रोमाणि च रहस्यानि नाशिष्टेन सह व्रजेत् ॥ ५८ ॥

शूद्रको दृष्टार्थोपदेश (लौकिक विषयका उपदेश^१) नहीं देना चाहिये। साथ ही कृशर अर्थात् तिल, चावल आदिसे मिश्रित पदार्थ, खीर, दही^२, जूठी^३ वस्तु, मधु, घृत, कृष्णमृगचर्म^४ तथा हवनकी सामग्री नहीं देनी चाहिये। विद्वान् व्यक्ति इसे (शूद्रको) व्रत एवं धर्म-सम्बन्धी उपदेश न दे। क्रोधके वशीभूत नहीं होना चाहिये और राग-द्वेषको छोड़ देना चाहिये। लोभ, दम्भ, असूया (गुणमें दोषदर्शन), ज्ञानकी निन्दा, ईर्ष्या, मद, शोक तथा मोहको प्रयत्नपूर्वक छोड़ देना चाहिये। किसीको भी पीड़ा न पहुँचाये। पुत्र और शिष्यको योग्य बनानेके पवित्रभावसे ताड़न^५ करे। कभी हीन व्यक्तियों और तीक्ष्ण (उद्धत) बुद्धिवाले व्यक्तियोंका आश्रय ग्रहण न करे। विद्वान्‌को अपना अपमान नहीं करना चाहिये अर्थात् हीनभाव नहीं अपनाना चाहिये। प्रयत्नपूर्वक दीनताका परित्याग करना चाहिये। विशिष्ट जनोंका निरादर नहीं करना चाहिये और अपनेको (क्रोधावेशसे) शाप नहीं देना चाहिये॥ ५१—५५॥

नखोंसे भूमिपर नहीं लिखना (कुरेदना) चाहिये। गौको पकड़ना नहीं चाहिये। किसी नदीके समीप दूसरी नदियों तथा किसी पर्वतपर दूसरे पर्वतोंकी चर्चा (प्रशंसा) नहीं करनी चाहिये। भोजन अथवा निवासके समय सहयात्रीको छोड़ना नहीं चाहिये (अर्थात् साथमें रहनेवालेको छोड़कर न एकाकी भोजन करना चाहिये न एकाकीके लिये निवासकी व्यवस्था करनी चाहिये)। जलमें नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिये और पैरसे आगका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। सिरपर लगानेसे बचे हुए तेलका शरीरपर लेपन नहीं करना चाहिये। सर्प एवं शस्त्रसे खेल नहीं करना चाहिये। अपनी इन्द्रियों एवं गुप्तस्थानोंके रोमोंका स्पर्श (जब चाहे तब) नहीं करना चाहिये। अशिष्ट व्यक्तिके साथ कहीं नहीं जाना चाहिये॥ ५६—५८॥


१-यहाँ उपदेशका निषेध है। सलाह (सम्मति, राय) देनेका निषेध नहीं है। उपदेश द्विजको सामने करके ही करना चाहिये। शास्त्रीय व्यवस्थाके अनुसार साक्षात् उपदेश लेनेका अधिकारी शूद्र नहीं है। यह मात्र व्यवस्था है, द्वेषभाव नहीं है। 'न शूद्राय मतिं दद्यात्' मनुस्मृति (४।८०)-की कुल्लूकभट्टकी व्याख्याके अनुसार।
२-आहुति देनेसे अवशिष्ट तिल आदि हविष्य शूद्रको नहीं देना चाहिये।
३-जो शूद्र अपना सेवक नहीं है उसे उच्छिष्ट देनेका निषेध है।
४-कृष्णमृगचर्मका ब्राह्मण ही अधिकारी है।
५-यहाँ तात्पर्य यह है कि पुत्र एवं शिष्यको योग्य बनानेका उत्तरदायित्व होता है, अतः आवश्यक होनेपर करुणाका भाव रखते हुए ताड़न किया जा सकता है।