संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १६ * | ३२९ |
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न पाणिपादवाङ्नेत्रचापल्यं समुपाश्रयेत्।
न शिश्नोदरचापल्ये न च श्रवणयोः क्वचित्॥ ५९॥
न चाङ्गनखवादं वै कुर्यान्नाञ्जलिना पिबेत्।
नाभिहन्याज्जलं पद्भ्यां पाणिना वा कदाचन॥ ६०॥
न शातयेदिष्टकाभिः फलानि न फलेन च।
न म्लेच्छभाषां शिक्षेत नाकर्षेच्च पदासनम्॥ ६१॥
न भेदनमवस्फोटं छेदनं वा विलेखनम्।
कुर्याद् विमर्दनं धीमान् नाकस्मादेव निष्फलम्॥ ६२॥
नोत्सङ्गे भक्षयेद् भक्ष्यं वृथा चेष्टां च नाचरेत्।
न नृत्येद्थवा गायेन्न वादित्राणि वादयेत्॥ ६३॥
न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः।
न लौकिकैः स्तवैर्देवांतोषयेद् बाह्यजैरपि॥ ६४॥
नाक्षैः क्रीडेन्न धावेत् नाप्सु विण्मूत्रमाचरेत्।
नोच्छिष्टः संविशेन्नित्यं न नग्नः स्नानमाचरेत्॥ ६५॥
न गच्छेन्न पठेद् वापि न चैव स्वशिरः स्पृशेत्।
न दन्तैर्नखरोमाणि छिन्द्यात् सुप्तं न बोधयेत्॥ ६६॥
न बालातपमासेवेत् प्रेतधूमं विवर्जयेत्।
नैकः सुप्याच्छून्यगृहे स्वयं नोपानहौ हरेत्॥ ६७॥
नाकारणाद् वा निष्ठीवेन्न बाहुभ्यां नदीं तरेत्।
न पादक्षालनं कुर्यात् पादेनैव कदाचन॥ ६८॥
नाग्नौ प्रतापयेत् पादौ न कांस्ये धावयेद् बुधः।
नाभिप्रसारयेद् देवं ब्राह्मणान् गामथापि वा।
वाय्वग्निगुरुविप्रान् वा सूर्यं वा शशिनं प्रति॥ ६९॥
अशुद्धः शयनं यानं स्वाध्यायं स्नानवाहनम्।
बहिर्निष्क्रमणं चैव न कुर्वीत कथञ्चन॥ ७०॥
कभी भी हाथ, पैर, वाणी और नेत्र-सम्बन्धी चंचलताका आश्रय न ले। इसी प्रकार लिंग तथा उदर और कान-सम्बन्धी चंचलता नहीं करनी चाहिये। अंग एवं नखकी आवाज न करे। अंजलिसे (जल) न पिये। कभी भी हाथ अथवा पैरसे जलको न पीटे॥ ५९-६०॥
ईंटों और फलके द्वारा फलोंको नहीं तोड़ना चाहिये। म्लेच्छ भाषाकी शिक्षा न ले, पैरसे आसनको न खींचे। (नखोंद्वारा) काटने, छेदने, फोड़ने तथा लिखने-सम्बन्धी क्रियाएँ नहीं करनी चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अकस्मात् बिना प्रयोजनके शरीर या (अङ्गोंका) मर्दन (मरोड़नेकी क्रिया) नहीं करना चाहिये। (कोई पदार्थ) गोदमें रखकर नहीं खाना चाहिये। व्यर्थकी कोई चेष्टा नहीं करनी चाहिये। नृत्य, गायन तथा वादन (जब चाहे तब) नहीं करना चाहिये। दोनों हाथोंसे अपना सिर नहीं खुजलाना चाहिये। लौकिक तथा बाह्य (विदेशी) भाषाकी स्तुतियोंसे देवताओंको संतुष्ट (करनेका प्रयास) नहीं करना चाहिये*। पाशोंसे (जूआ) न खेले, न दौड़े, जलमें मल-मूत्रका विसर्जन न करे। जूठे मुख नहीं रहना चाहिये और कभी भी नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिये॥ ६१-६५॥
(नग्न अवस्थामें) न कहीं जाय, न पढ़े और न अपने सिरका स्पर्श करे। दाँतोंके द्वारा नख या रोमोंको नहीं काटना चाहिये। सोये हुए व्यक्तिको जगाना नहीं चाहिये। उगते हुए सूर्यके धूपका सेवन नहीं करना चाहिये। चिताके धुएँसे दूर रहना चाहिये। शून्य गृहमें अकेले नहीं सोना चाहिये। स्वयं अपने जूतोंको नहीं ढोना चाहिये। अकारण नहीं थूकना चाहिये। तैरकर नदीको पार नहीं करना चाहिये। कभी भी पैरद्वारा पैरको नहीं धोना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अग्निसे पैर नहीं सेंकना चाहिये। काँसेके पात्रमें पैर नहीं धोना चाहिये। देवताकी ओर, ब्राह्मणोंकी ओर एवं गौ, वायु, अग्नि, गुरु, विप्र, सूर्य तथा चन्द्रमाकी ओर पैर नहीं फैलाना चाहिये। कभी भी अपवित्र अवस्थामें सोना, दूरकी यात्रा, स्वाध्याय, स्नान, सवारीपर बैठना और घरसे बाहर नहीं निकलना चाहिये॥ ६६-७०॥
* इसका तात्पर्य यह है कि जो लोग संस्कृतके अध्ययनके अधिकारी हैं, उन्हें अवश्य संस्कृतका अध्ययन करना चाहिये और वेदादिशास्त्रोंमें निर्दिष्ट स्तुतियोंसे ही देवताओंकी स्तुति करनी चाहिये। अनधिकारके कारण या सर्वथा सामर्थ्यके अभावमें श्रद्धातिशयमें जिस किसी भाषाके द्वारा स्तुति करनी ही चाहिये। यहाँ यथाधिकार संस्कृत शास्त्रोंके अवश्य अध्ययनमें तात्पर्य है। लौकिक भाषा आदिसे स्तुतिके निषेधमें तात्पर्य नहीं है।