भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 340
३३०* कूर्मपुराण *
स्वप्नमध्ययनं स्नानमुद्वर्त्तं भोजनं गतिम्।<br>उभयोः संध्ययोर्नित्यं मध्याह्ने चैव वर्जयेत्॥ ७१॥<br><br>न स्पृशेत् पाणिनोच्छिष्टो विप्रो गोब्राह्मणानलान्।<br>न चासनं पदा वापि न देवप्रतिमां स्पृशेत्॥ ७२॥<br><br>नाशुद्धोऽग्निं परिचरेन्न देवान् कीर्तयेदृषीन्।<br>नावगाहेदगाधाम्बु धारयेन्नानिमित्ततः॥ ७३॥<br><br>न वामहस्तेनोद्धृत्य पिबेद् वक्त्रेण वा जलम्।<br>नोत्तरेदनुपस्पृश्य नाप्सु रेतः समुत्सृजेत्॥ ७४॥<br><br>अमेध्यलिप्तमन्यद् वा लोहितं वा विषाणि वा।<br>व्यतिक्रामेन्न स्रवन्तीं नाप्सु मैथुनमाचरेत्।<br>चैत्यं वृक्षं न वै छिन्द्यान्नाप्सु ष्ठीवनमाचरेत्॥ ७५॥दोनों संध्या-समयों तथा मध्याह्नकालमें शयन, अध्ययन, स्नान, उबटन लगाना, भोजन तथा गमनका नित्य त्याग करना चाहिये। ब्राह्मणको^१ चाहिये कि वह जूठे मुँह-हाथसे गौ, ब्राह्मण, अग्नि, आसन तथा देव-प्रतिमाका स्पर्श न करे। इसी प्रकार पैरसे भी इनका स्पर्श न करे। अपवित्रताकी स्थितिमें अग्निकी परिचर्या न करे, देवताओं तथा ऋषियों (-के नाम आदि)-का कीर्तन न करे। गहरे जलमें स्नान न करे और बिना कारण (मल-मूत्रादिका वेग) न रोके। बायें हाथसे उठाकर अथवा मुखसे (पशुके समान) जल नहीं पीना चाहिये। बिना आचमन किये उत्तर न दे और जलमें वीर्यका त्याग नहीं करना चाहिये। अपवित्र वस्तुसे लिप्त किसी वस्तु, रक्त (खून), विष तथा वेगवाली नदीका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। जलमें मैथुन नहीं करना चाहिये। अश्वत्थ वृक्षको^२ नहीं काटना चाहिये। जलमें थूकना नहीं चाहिये॥ ७१—७५॥
नास्थिभस्मकपालानि न केशांश्च कण्टकान्।<br>तुषाङ्गारकरीषं वा नाधितिष्ठेत् कदाचन॥ ७६॥<br><br>न चाग्निं लङ्घयेद् धीमान् नोपदध्यादधः क्वचित्।<br>न चैनं पादतः कुर्यान्मुखेन न धमेद् बुधः॥ ७७॥<br><br>न कूपमवरोहेत नावेक्षेताशुचिः क्वचित्।<br>अग्नौ न च क्षिपेदग्निं नाद्भिः प्रशमयेत् तथा॥ ७८॥<br><br>सुहृन्मरणमार्तिं वा न स्वयं श्रावयेत् परान्।<br>अपण्यं कूटपण्यं वा विक्रये न प्रयोजयेत्॥ ७९॥हड्डी, भस्म, कपाल, केश (बाल), कण्टक, भूसी, अंगार और शुष्क गोबरपर कभी भी बैठना नहीं चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अग्निका लंघन नहीं करना चाहिये। अग्निको कभी भी (शय्या, आसन आदिके) नीचे न रखे, न ही पैरकी ओर रखे और न मुखसे ही फूंके। कभी भी कुएँके अंदर न उतरे और न ही अपवित्र अवस्थामें उसे देखे। अग्निमें अग्निको नहीं फेंकना चाहिये और पानीसे इसे बुझाना नहीं चाहिये। मित्रके मरण तथा उसके दुःखको, (अपने दुःखको) स्वयं दूसरोंको न सुनाये। जो विक्रय-योग्य न हो तथा जो पदार्थ छलद्वारा प्राप्त हो उसे विक्रय नहीं करना चाहिये॥ ७६—७९॥
न वह्निं मुखनिःश्वासैर्ज्वलयेन्नाशुचिर्बुधः।<br>पुण्यस्थानोदकस्थाने सीमान्तं वा कृषेन्न तु॥ ८०॥विद्वान्‌को चाहिये कि वह अग्निको मुखके निःश्वाससे प्रज्वलित न करे। अपवित्रताकी स्थितिमें पवित्र तीर्थमें, जलवाले स्थानमें नहीं जाना चाहिये और (ग्राम आदिके) सीमा-समाप्तिकी भूमिको नहीं जोतना चाहिये॥ ८०॥
न भिन्द्यात् पूर्वसमयमभ्युपेतं कदाचन।<br>परस्परं पशून् व्यालान् पक्षिणो नावबोधयेत्॥ ८१॥पहले की गयी प्रतिज्ञा या नियमको कभी भी तोड़ना नहीं चाहिये। पशु, सर्प एवं पक्षियोंको परस्पर लड़ानेके लिये उत्तेजित नहीं करना चाहिये॥ ८१॥

१-सर्वप्रथम होनेसे ब्राह्मणका निर्देश है। यहाँ ब्राह्मणप्रमुख मानवमात्रको लेना चाहिये।
२-चैत्यवृक्ष (अश्वत्थवृक्ष)—चैत्यस्तदाख्यया प्रसिद्धो वृक्षः। अश्वत्थवृक्ष इति रत्नमाला। (शब्दकल्पद्रुम)