भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १६ * | ३३१ ---|---
परबाधं न कुर्वीत जलवातातपादिभिः ।<br>कारयित्वा स्वकर्माणि कारून् पश्चान्न वञ्चयेत् ।<br>सायंप्रातर्गृहद्वारान् भिक्षार्थं नावघट्टयेत् ॥ ८२ ॥जल, वायु तथा धूप आदिके द्वारा किसी दूसरेको बाधा नहीं पहुँचानी चाहिये। अपने कार्योंको करवाकर शिल्पियोंको बादमें ठगना नहीं चाहिये। भिक्षाके लिये सायंकाल और प्रातः (दूसरोंके) घरके दरवाजोंको खटखटाना नहीं चाहिये। दूसरोंके द्वारा प्रयुक्त माला<sup></sup>, गन्ध और भार्याके साथ भोजन, विग्रहपूर्वक विवाद एवं कुत्सित दरवाजेसे प्रवेश—इनका त्याग करना चाहिये॥ ८२-८३ ॥
बहिर्माल्यं बहिर्गन्धं भार्यया सह भोजनम् ।<br>विगृह्य वादं कुद्वारप्रवेशं च विवर्जयेत् ॥ ८३ ॥<br>न खादन् ब्राह्मणस्तिष्ठेन्न जल्पेद् वा हसन् बुधः ।<br>स्वमग्निं नैव हस्तेन स्पृशेन्नाप्सु चिरं वसेत् ॥ ८४ ॥बुद्धिमान् ब्राह्मणको<sup></sup> खाते हुए खड़ा नहीं होना चाहिये और न ही हँसते हुए बोलना चाहिये। अपने हाथोंद्वारा अपनी अग्निका स्पर्श नहीं करना चाहिये और देरतक जलमें नहीं रहना चाहिये। अग्निको न पंखेकी हवासे प्रज्वलित करना चाहिये, न सूप (-की हवा)-से और न हाथसे (हिलाकर)। मुखसे (फूँकनीद्वारा) अग्निको प्रज्वलित नहीं करना चाहिये, क्योंकि मुखसे ही अग्नि उत्पन्न हुआ है॥ ८४-८५ ॥
न पक्षकेणोपधमेन्न शूर्पेण न पाणिना ।<br>मुखे नैव धमेदग्निं मुखादग्निरजायत ॥ ८५ ॥<br>परस्त्रियं न भाषेत नायाज्यं याजयेद् द्विजः ।<br>नैकश्चरेत् सभां विप्रः समवायं च वर्जयेत् ॥ ८६ ॥दूसरेकी स्त्रीसे बात नहीं करनी चाहिये और द्विज (ब्राह्मण)-को चाहिये कि जो यज्ञ करने योग्य नहीं है उसका यज्ञ न कराये। विप्रको अकेले सभामें नहीं जाना चाहिये और समूहका त्याग करना चाहिये। बायेंसे देव-मन्दिरमें प्रवेश नहीं करना चाहिये। अर्थात् देवमन्दिरको अपने दाहिने करके प्रवेश करना चाहिये। वस्त्रद्वारा पंखा नहीं झलना चाहिये और देवमन्दिरमें सोना नहीं चाहिये। मार्गमें अकेले नहीं चलना चाहिये और न अधार्मिक व्यक्तियोंके साथ ही कहीं जाना चाहिये। इसी प्रकार व्याधिग्रस्त, शूद्र और पतितोंके साथ भी मार्गमें नहीं जाना चाहिये<sup></sup>। जूता और जल आदिके बिना मार्गमें नहीं चलना चाहिये। न रात्रिमें, न शत्रुके साथ और न बिना कमण्डलुके चलना चाहिये। अग्नि, गौ, ब्राह्मण आदिके बीचमेंसे होते हुए नहीं निकलना चाहिये॥ ८६-८९ ॥
न देवायतनं गच्छेत् कदाचिद् वाप्रदक्षिणम् ।<br>न वीजयेद् वा वस्त्रेण न देवायतने स्वपेत् ॥ ८७ ॥
नैकोऽध्वानं प्रपद्येत नाधार्मिकजनैः सह ।<br>न व्याधिदूषितैर्वापि न शूद्रैः पतितेन वा ॥ ८८ ॥
नोपानद्वर्जितो वाथ जलादिरहितस्तथा ।<br>न रात्रौ नारिणा सार्धं न विना च कमण्डलुम् ।<br>नाग्निगोब्राह्मणादीनामन्तरेण व्रजेत् क्वचित् ॥ ८९ ॥
न वत्सतन्त्रीं विततामतिक्रामेत् क्वचिद् द्विजः ।<br>न निन्देद् योगिनः सिद्धान् व्रतिनो वा यतींस्तथा ॥ ९० ॥द्विज (मानवमात्र)-को चाहिये कि वह कभी भी बछड़ेको दूध पिलाती हुई गाय तथा गायको बाँधनेवाली रस्सी अथवा उसकी पूँछका उल्लंघन न करे। योगियों, सिद्धों, व्रतपरायणों तथा संन्यासियोंकी निन्दा न करे॥ ९० ॥

१-शब्दकल्पद्रुममें यह श्लोक है। वहाँ 'बहिर्माल्‍य' का अर्थ 'कण्ठसे बाहर निकाली हुई माला' किया गया है। इससे अन्यके द्वारा धारित तथा अपने द्वारा भी धारित पुष्पमालाका पुनः धारण निषिद्ध है, यह स्पष्ट होता है।
२-सामान्य स्थितिमें यह निषेध सबके लिये है, ब्राह्मणका उल्लेख प्रमुखताकी दृष्टिसे है।
३-यहाँ घृणाका भाव नहीं है। व्यक्ति एवं समाजके दूरगामी सुपरिणाम (कल्याण)-की दृष्टिसे यह एक सुविचारित व्यवस्था है।