संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३३२ * कूर्मपुराण *
| देवतायतनं प्राज्ञो देवानां चैव सत्रिणाम्।<br>नाक्रामेत् कामतश्छायां ब्राह्मणानां च गोरपि ॥ ९१ ॥<br><br>स्वां तु नाक्रमयेच्छायां पतिताद्यैर्न रोगिभिः।<br>नाङ्गारभस्मकेशादिष्वधितिष्ठेत् कदाचन ॥ ९२ ॥<br><br>वर्जयेन्मार्जनीरेणुं स्नानवस्त्रघटोदकम्।<br>न भक्षयेदभक्ष्याणि नापेयं च पिबेद् द्विजः ॥ ९३ ॥ | बुद्धिमान् व्यक्तिको देवमन्दिर, देवताओं, यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणों तथा गायकी परछाईंको इच्छापूर्वक लाँघना नहीं चाहिये। पतित आदिसे तथा रोगियोंसे अपनी परछाईंका उल्लंघन नहीं होने देना चाहिये। अंगार, भस्म तथा केश आदिपर कभी भी बैठना नहीं चाहिये। झाड़ूकी धूल, स्नानके वस्त्र तथा (स्नानसे बचे) घड़ेके जलके छींटेसे बचना चाहिये (उसे अपने ऊपर नहीं पड़ने देना चाहिये)। द्विज (मानवमात्र)-को चाहिये कि वह अभक्षणीय पदार्थको खाये नहीं और न ही अपेय पदार्थको पीये ॥ ९१-९३ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ॥
सत्रहवाँ अध्याय
भक्ष्य एवं अभक्ष्य-पदार्थोंका वर्णन
| व्यास उवाच | व्यासजीने कहा— |
|---|---|
| नाद्याच्छूद्रस्य विप्रोऽन्नं मोहाद् वा यदि वान्यतः।<br>स शूद्रयोनिं व्रजति यस्तु भुङ्क्ते ह्यनापदि ॥ १ ॥<br><br>षण्मासान् यो द्विजो भुङ्क्ते शूद्रस्यान्नं विगर्हितम्।<br>जीवन्नेव भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते ॥ २ ॥<br><br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्रस्य च मुनीश्वराः।<br>यस्यान्नेनोदरस्थेन मृतस्तद्योनिमाप्नुयात् ॥ ३ ॥<br><br>राजानं नर्तकान्नं च तक्ष्णोऽन्नं चर्मकारिणः।<br>गणान्नं गणिकान्नं च षण्ढान्नं चैव वर्जयेत् ॥ ४ ॥<br><br>चक्रोपजीविरजकतस्करध्वजिनां तथा।<br>गान्धर्वलोहकारान्नं सूतकान्नं च वर्जयेत् ॥ ५ ॥ | ब्राह्मणको मोहसे अथवा अन्य किसी दूसरे कारणसे शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये। जो अनापत्तिकालमें शूद्रका अन्न भक्षण करता है, वह शूद्रयोनिको प्राप्त होता है। जो द्विज छः महीनेतक लगातार शूद्रका गर्हित अन्न खाता है, वह जीते हुए शूद्र हो जाता है और मृत्युके बाद श्वान-योनिमें जन्म लेता है ॥ १-२ ॥<br><br>हे मुनीश्वरो ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इनमेंसे जिसका अन्न मृत्युके समय जिसके उदरमें रहता है, उसे उसीकी योनि प्राप्त होती है (अर्थात् ब्राह्मणका अन्न उदरमें मृत्युके समय है तो ब्राह्मण-योनि प्राप्त होगी आदि-आदि) ॥ ३ ॥<br><br>राजा, नर्तक, बढ़ई, चर्मकार, गण¹ (सौ ब्राह्मणोंका संघ), गणिका और नपुंसकके अन्नका परित्याग करना चाहिये। चक्रके आधारपर अपनी जीविका चलानेवाला (तैलक—तेली)², धोबी, चोर, ध्वजी³ (मद्यविक्रय-जीवी), गायक, लौहकार और सूतकके अन्नका त्याग करना चाहिये ॥ ४-५ ॥ |
१-मनुस्मृति (४।२०९)-की कुल्लूकभट्टकी व्याख्याके अनुसार 'गण' का अर्थ 'शतब्राह्मणसंघ' है। शत संख्याको अनेक संख्यापरक मानकर ब्राह्मण-समूहका अन्न परित्याज्य समझना चाहिये।
२-मनुस्मृति (४।८४)-के अनुसार चक्रोपजीवीका अर्थ तैलिक है।
३-मनुस्मृति (४।८४)-के अनुसार ध्वजीका अर्थ मदिराविक्रयके द्वारा जिस जातिके लोग जीविका चलाते हैं, उस जातिके लोग हैं। इन्हें संस्कृतमें 'शौण्डिक' कहते हैं।