संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १७ * ३३३
| कुलालचित्रकर्मान्नं वार्धुषेः पतितस्य च।<br>पौनर्भवच्छत्रिकयोरभिशस्तस्य चैव हि॥ ६ ॥<br><br>सुवर्णकारशैलूषव्याधबद्धातुरस्य च।<br>चिकित्सकस्य चैवान्नं पुंश्चल्या दण्डिकस्य च॥ ७ ॥<br><br>स्तेननास्तिकयोरन्नं देवतानिन्दकस्य च।<br>सोमविक्रयिणश्चान्नं श्वपाकस्य विशेषतः॥ ८ ॥<br><br>भार्याजितस्य चैवान्नं यस्य चोपपतिर्गृहे।<br>उत्सृष्टस्य कदर्यस्य तथैवोच्छिष्टभोजिनः॥ ९ ॥ | कुम्भकार, चित्रकार, वार्धुषी¹ (कर्ज देकर सूदसे जीविका चलानेवाले), पतित, विधवाके पुनर्विवाहके अनन्तर अथवा पति-परित्यक्तासे उत्पन्न पुरुष², छत्रिक³ (नापित), अभिशस्त (चोरी, मैथुन आदि आरोपसे ग्रस्त), स्वर्णकार, नट, व्याध, बन्धनप्राप्त, आतुर (रोगी), चिकित्सक, व्यभिचारिणी स्त्री तथा दण्डधर (दण्ड देनेवाले, नियामक—जल्लाद आदि)—का अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये। चोर, नास्तिक, देवनिन्दक, सोमलता-विक्रयी तथा विशेषरूपसे चाण्डालका और स्त्रीके वशीभूत तथा जिसके घरमें उस स्त्रीका उपपति हो, (समाजद्वारा) परित्यक्त, कृपण और जूठा भोजन करनेवालेका अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये॥ ६—९ ॥ |
| अपाङ्क्त्यान्नं च सङ्घान्नं शस्त्राजीवस्य चैव हि।<br>क्लीबसन्न्यासिनोश्चान्नं मत्तोन्मत्तस्य चैव हि।<br>भीतस्य रुदितस्यान्नमवकृष्टं परिक्षुतम्॥ १०॥<br><br>ब्रह्मद्विषः पापरुचेः श्राद्धान्नं सूतकस्य च।<br>वृथापाकस्य चैवान्नं शावान्नं श्वशुरस्य च॥ ११ ॥<br><br>अप्रजानां तु नारीणां भृतकस्य तथैव च।<br>कारुकान्नं विशेषेण शस्त्रविक्रयिणस्तथा॥ १२ ॥ | पंक्तिसे बहिष्कृत, समूहके आश्रित, शस्त्रसे आजीविका चलानेवाला, क्लीब (नपुंसक), संन्यासी, मत्त, उन्मत्त, भयभीत, रोते हुए व्यक्तिके तथा अभिशप्त एवं छींकसे अशुद्ध अन्नको ग्रहण नहीं करना चाहिये। ब्राह्मणसे द्वेष करनेवालों, पापबुद्धि, श्राद्ध तथा अशौचसम्बन्धी अन्न, निष्प्रयोजन बने हुए भोजन (ईश्वर-समर्पणबुद्धिसे न बना हुआ), शव-सम्बन्धी तथा ससुरका⁴ अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये। बिना संतानवाली स्त्री, भृत्य, शिल्पी (कारीगर⁵) तथा शस्त्रविक्रयीका अन्न विशेष-रूपसे त्याग करना चाहिये॥ १०—१२ ॥ |
| शौण्डान्नं घाटिकान्नं च भिषजामन्नमेव च।<br>विद्धप्रजननस्यान्नं परिवित्त्यन्नमेव च॥ १३॥<br><br>पुनर्भुवो विशेषेण तथैव दिधिषूपतेः।<br>अवज्ञातं चावधूतं सरोषं विस्मयान्वितम्।<br>गुरोरपि न भोक्तव्यमन्नं संस्कारवर्जितम्॥ १४॥ | शौण्ड (मद्य बनानेवाले जातिविशेषके लोग), स्तुति करनेवाले 'भाट'-जातिके लोगों, भिषक् (जिससे रोग भयभीत हो), विद्धलिंगी और ज्येष्ठ भाईके अविवाहित रहनेपर विवाह कर लेनेवाले छोटे भाईका अन्न भी ग्रहण नहीं करना चाहिये। दो बार विवाह करनेवाली स्त्री⁶ तथा ऐसी स्त्रीके पतिका अन्न विशेषरूपसे त्याज्य है। अनादरपूर्वक दिया गया, तिरस्कारपूर्वक दिया गया, रोष एवं अभिमानपूर्वक दिया हुआ अन्न, इसी प्रकार गुरुके संस्कारहीन अन्नको ग्रहण नहीं करना चाहिये॥ १३—१४॥ |
१-अमरकोष (२।९।५)-के अनुसार।
२-मनुस्मृति (९।१७५)-के अनुसार।
३-शब्दकल्पद्रुमके अनुसार।
४-आलसी या प्रमादी होकर श्वशुरगृहमें स्थायीरूपसे रहनेके साथ वहाँका अन्न ग्रहण करना निषिद्ध है।
५-बढ़ई, जुलाहा, नाई, धोबी और चर्मकार—इन पाँचको 'कारु' या 'शिल्पी' कहा जाता है।
६-मूलमें 'पुनर्भू' शब्द है। इसका पर्याय 'दिधिषू' है। ये दोनों शब्द स्त्रीलिङ्ग हैं। इनका अर्थ दो बार विवाह करनेवाली स्त्री है (शब्दकल्पद्रुम, अमरकोश)।