भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३४* कूर्मपुराण *
दुष्कृतं हि मनुष्यस्य सर्वमन्ने व्यवस्थितम्।<br>यो यस्यान्नं समश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम्॥ १५॥<br><br>आर्द्धिकः कुलमित्रञ्च स्वगोपालश्च नापितः।<br>एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत्॥ १६॥<br><br>कुशीलवः कुम्भकारः क्षेत्रकर्मक एव च।<br>एते शूद्रेषु भोज्यान्ना दत्त्वा स्वल्पं पणं बुधैः॥ १७॥<br><br>पायसं स्नेहपक्वं यद् गोरसं चैव सक्तवः।<br>पिण्याकं चैव तैलं च शूद्राद् ग्राह्यं द्विजातिभिः॥ १८॥<br><br>वृन्ताकं नालिकाशाकं कुसुम्भाश्मन्तकं तथा।<br>पलाण्डुं लशुनं शुक्तं निर्यासं चैव वर्जयेत्॥ १९॥<br><br>छत्राकं विड्वराहं च शेलुं पेयूषमेव च।<br>विलयं सुमुखं चैव कवकानि च वर्जयेत्॥ २०॥<br><br>गृञ्जनं किंशुकं चैव ककुभाण्डं तथैव च।<br>उदुम्बरमलाबुं च जग्ध्वा पतति वै द्विजः॥ २१॥मनुष्यका किया हुआ सारा पाप अन्नमें स्थित रहता है। इसलिये जो जिसका अन्न ग्रहण करता है, वह उसके पापका ही भक्षण करता है॥ १५॥<br>आर्द्धिक (जो शूद्र द्विजातिके घर हल जोतकर उसके पारिश्रमिक-रूपमें अन्न प्राप्त करता है), कुलमित्र (पिता-पितामहकी परम्परासे जो द्विजातिके घर रहता आया है तथा अभिन्न सहयोगी है), जो अपने गौओंका पालन करनेवाला है, नापित तथा जिस शूद्रने मन, वाणी और कर्मसे सर्वथा स्वयंको 'मैं आपका ही हूँ'-इस रूपमें समर्पित कर दिया है—ऐसे शूद्रका अन्न ग्रहण किया जा सकता है। बुद्धिमान् व्यक्तिको शूद्रोंमें नाटक आदिसे जीविका चलानेवालों (चारण, कत्थक), कुम्हार और खेतमें काम करनेवालोंका अन्न थोड़ा मूल्य देकर ग्रहण करना चाहिये। द्विजातियोंद्वारा दूधका^१ विकार—मक्खन-खोआ आदि, घृतमें पके पदार्थ, गोरस (दूध), सत्तू, पिण्याक (खली, शिलाजीत, केसर, हींग इत्यादि) तथा तेल—ये पदार्थ शूद्रोंसे ग्रहण किये जा सकते हैं॥ १६-१८॥<br>बैगन, नालिकासाग^२, कुसुम्भ (पुष्पविशेष), अश्मन्तक^३, प्याज, लहसुन, शुक्त^४ और वृक्षके गोंदका परित्याग करना चाहिये। छत्राक, विड्वराह (ग्राम्य-सूकर), शेलु^५ (वनमेथी), पेयूष^६, विलय, सुमुख^७, कवक, (कुकुरमुत्ता), किंशुक (पलाश), ककुभाण्ड, उदुम्बर (गूलर) तथा अलाबु (वर्तुलाकार—गोल लौकी)—का भक्षण करनेसे द्विज पतित हो जाता है॥ १९-२१॥

१-मूलमें 'पायस' शब्द है। इसका अर्थ खीर नहीं करना चाहिये। शब्दकल्पद्रुममें उद्धृत तिथितत्त्वके वराहपुराणीय वचनके अनुसार यहाँ पायसका अर्थ दुग्धविकार ही है।
२-'नालिकाशाक' मूलमें पठित है। सुश्रुत (१।४६)-में इसकी चर्चा है। ग्राम्य भाषामें इसे 'भँसीड़' कहते हैं। यह तालाबमें होता है। इसमें पत्ते नहीं होते हैं। मात्र डंठल होता है। डंठलके भीतर छिद्र होते हैं। आप्तपरम्परामें इसका भक्षण निषिद्ध माना जाता है।
३-अश्मन्तक—तृणविशेष 'अम्लकुचाई' लोकभाषा। पर्याय 'अम्लोटक' (रत्नमाला) इसके गुण राजनिर्घण्टमें वर्णित हैं। (शब्दकल्पद्रुम)
४-'शुक्त' उसे कहते हैं जो स्वभावतः मधुर हो तथा कालवश (समयानुसार) खट्टी हो जाय। जैसे काँजी (प्रायश्चित्तविवेक)। मनुस्मृति (२। १७७)-के अनुसार भी जो स्वभावतः मधुर हो, पर समयवश जल आदिमें रखनेसे अम्ल (खट्टी) हो जाय वह शुक्त है। किंतु शुक्तके रूपमें दही और दहीसे बननेवाले मट्ठा आदि पदार्थ भक्ष्य हैं।
५-शेलु—श्लेष्मातक (लोकभाषा—लिसोढ़ा) अमरकोश।
६-पेयूष—नवप्रसूता गौका अग्निसंयोगसे कठिन किया गया दूध (फेनुप, इतर लोकभाषामें) यह भैंस-बकरीका भी निषिद्ध है।
७-सुमुख—शाकविशेष। इसका पर्याय—वनवर्बरिका, वर्बर है। (राजनिर्घण्ट) (शब्दकल्पद्रुम)।