भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 506 में से

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  • अध्याय १७ * ३३५

वृथा कृशरसंयावं पायसापूपमेव च।<br>अनुपाकृतमांसं च देवान्नानि हवींषि च॥ २२॥<br><br>यवागूं मातुलिङ्गं च मत्स्यान्प्यनुपाकृतान्।<br>नीपं कपित्थं प्लक्षं च प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥ २३॥<br><br>पिण्याकं चोद्धृतस्नेहं देवधान्यं तथैव च।<br>रात्रौ च तिलसम्बद्धं प्रयत्नेन दधि त्यजेत्॥ २४॥<br><br>नाश्नीयात् पयसा तक्रं न बीजान्युपजीवयेत्।<br>क्रियादुष्टं भावदुष्टमसत्संगं च वर्जयेत्॥ २५॥<br><br>केशकीटावपन्नं च सहृल्लेखं च नित्यशः।<br>श्वाघ्रातं च पुनः सिद्धं चण्डालावेक्षितं तथा॥ २६॥<br><br>उदक्यया च पतितैर्गवा चाघ्रातमेव च।<br>अनर्चितं पर्युषितं पर्यायान्नं च नित्यशः॥ २७॥<br><br>काककुक्कुटसंस्पृष्टं कृमिभिश्चैव संयुतम्।<br>मनुष्यैरप्यवघ्रातं कुष्ठिना स्पृष्टमेव च॥ २८॥<br><br>न रजस्वलया दत्तं न पुंश्चल्या सरोषया।<br>मलवद्वाससा वापि परवासोऽथ वर्जयेत्॥ २९॥<br><br>विवत्सायाश्च गोः क्षीरमौष्ट्रं वानिर्दशं तथा।<br>आविकं सन्धिनीक्षीरमपेयं मनुरब्रवीत्॥ ३०॥<br><br>बलाकं हंसदात्यूहं कलविङ्कं शुकं तथा।<br>कुररं च चकोरं च जालपादं च कोकिलम्॥ ३१॥<br><br>वायसं खञ्जरीटं च श्येनं गृध्रं तथैव च।<br>उलूकं चक्रवाकं च भासं पारावतानपि।<br>कपोतं टिट्टिभं चैव ग्रामकुक्कुटमेव च॥ ३२॥देवताके उद्देश्यसे नहीं केवल अपने लिये पकाये गये कृशरान्न (तिल-चावलके बने पदार्थ), संयाव (लपसी), खीर एवं पुआका तथा देवान्न (देवताके लिये समर्पित अन्न), हवनके योग्य द्रव्य (पुरोडाश आदि), यवागू (जौकी काँजी), मातुलिंग (बिजौरा नींबू), देव-पित्र्यकर्ममें कदम्ब, कपित्थ (कैथ) और प्लक्ष (पर्कटी—पाकड़)-का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये। तेल निकाली हुई खली, देवताका धान्य और रात्रिमें तिल-सम्बन्धी पदार्थ तथा दहीका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। दूधके साथ मट्ठेका सेवन नहीं करना चाहिये। बीजोंके द्वारा जीविकाका निर्वाह नहीं करना चाहिये। कर्मसे दूषित और भावसे दूषित तथा दुर्जनोंसे सम्बन्धका परित्याग करना चाहिये॥ २२—२५॥<br><br>केश (बाल) और कीड़ोंसे युक्त, जिस अन्नको लेकर मनमें विचिकित्सा हो, कुत्तेद्वारा सूँघा हुआ, दुबारा पकाया गया, चाण्डाल, रजस्वला तथा पतितके द्वारा देखा गया और गाय-बैल आदि गोजातिद्वारा सूँघा हुआ, अनादरपूर्वक प्राप्त, बासी तथा पर्यायान्नका<sup></sup> नित्य परित्याग करना चाहिये। कौआ एवं मुर्गासे स्पृष्ट, कृमि-युक्त, मनुष्योंद्वारा सूँघे गये तथा कुष्ठ रोगीसे स्पर्श किये गये अन्नका परित्याग करना चाहिये। रजस्वलासे प्राप्त, क्रोधयुक्त व्यभिचारिणी स्त्रीद्वारा दिया गया और मलिन वस्त्र धारण करनेवाले व्यक्तिके द्वारा (दिये अन्नका) और दूसरेके वस्त्रका परित्याग करना चाहिये। मनुने बताया है कि बछड़े-रहित गौ, ऊँटनी और दस दिनोंके भीतर ब्यायी हुई (गौ इत्यादि)-का दूध तथा भेड़ी एवं गर्भिणी गौका दूध पीने योग्य नहीं है॥ २६—३०॥

१-(क) मूलमें 'पर्यायान्न' शब्द है। इसका अर्थ याज्ञ० स्मृ० आचा० १६८ वें श्लोककी मिताक्षरा व्याख्याके अनुसार वह अन्न है जो अन्यस्वामिक है और अन्यको दिया जाय। जैसे ब्राह्मणस्वामिक अन्नको शूद्र दे, शूद्रस्वामिक अन्नको ब्राह्मण दे। ऐसा अन्न ग्रहण करनेपर चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित्त है।
(ख) एक दूसरे मतके अनुसार एक पंक्तिमें बैठकर भोजन करनेवालोंमें किसी एकके उठकर आचमन कर लेनेके उपरान्त सभी भोजन करनेवालोंके अन्नको 'पर्यायान्न' कहा जाता है।

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