संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- अध्याय १७ * ३३५
| वृथा कृशरसंयावं पायसापूपमेव च।<br>अनुपाकृतमांसं च देवान्नानि हवींषि च॥ २२॥<br><br>यवागूं मातुलिङ्गं च मत्स्यान्प्यनुपाकृतान्।<br>नीपं कपित्थं प्लक्षं च प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥ २३॥<br><br>पिण्याकं चोद्धृतस्नेहं देवधान्यं तथैव च।<br>रात्रौ च तिलसम्बद्धं प्रयत्नेन दधि त्यजेत्॥ २४॥<br><br>नाश्नीयात् पयसा तक्रं न बीजान्युपजीवयेत्।<br>क्रियादुष्टं भावदुष्टमसत्संगं च वर्जयेत्॥ २५॥<br><br>केशकीटावपन्नं च सहृल्लेखं च नित्यशः।<br>श्वाघ्रातं च पुनः सिद्धं चण्डालावेक्षितं तथा॥ २६॥<br><br>उदक्यया च पतितैर्गवा चाघ्रातमेव च।<br>अनर्चितं पर्युषितं पर्यायान्नं च नित्यशः॥ २७॥<br><br>काककुक्कुटसंस्पृष्टं कृमिभिश्चैव संयुतम्।<br>मनुष्यैरप्यवघ्रातं कुष्ठिना स्पृष्टमेव च॥ २८॥<br><br>न रजस्वलया दत्तं न पुंश्चल्या सरोषया।<br>मलवद्वाससा वापि परवासोऽथ वर्जयेत्॥ २९॥<br><br>विवत्सायाश्च गोः क्षीरमौष्ट्रं वानिर्दशं तथा।<br>आविकं सन्धिनीक्षीरमपेयं मनुरब्रवीत्॥ ३०॥<br><br>बलाकं हंसदात्यूहं कलविङ्कं शुकं तथा।<br>कुररं च चकोरं च जालपादं च कोकिलम्॥ ३१॥<br><br>वायसं खञ्जरीटं च श्येनं गृध्रं तथैव च।<br>उलूकं चक्रवाकं च भासं पारावतानपि।<br>कपोतं टिट्टिभं चैव ग्रामकुक्कुटमेव च॥ ३२॥ | देवताके उद्देश्यसे नहीं केवल अपने लिये पकाये गये कृशरान्न (तिल-चावलके बने पदार्थ), संयाव (लपसी), खीर एवं पुआका तथा देवान्न (देवताके लिये समर्पित अन्न), हवनके योग्य द्रव्य (पुरोडाश आदि), यवागू (जौकी काँजी), मातुलिंग (बिजौरा नींबू), देव-पित्र्यकर्ममें कदम्ब, कपित्थ (कैथ) और प्लक्ष (पर्कटी—पाकड़)-का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये। तेल निकाली हुई खली, देवताका धान्य और रात्रिमें तिल-सम्बन्धी पदार्थ तथा दहीका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। दूधके साथ मट्ठेका सेवन नहीं करना चाहिये। बीजोंके द्वारा जीविकाका निर्वाह नहीं करना चाहिये। कर्मसे दूषित और भावसे दूषित तथा दुर्जनोंसे सम्बन्धका परित्याग करना चाहिये॥ २२—२५॥<br><br>केश (बाल) और कीड़ोंसे युक्त, जिस अन्नको लेकर मनमें विचिकित्सा हो, कुत्तेद्वारा सूँघा हुआ, दुबारा पकाया गया, चाण्डाल, रजस्वला तथा पतितके द्वारा देखा गया और गाय-बैल आदि गोजातिद्वारा सूँघा हुआ, अनादरपूर्वक प्राप्त, बासी तथा पर्यायान्नका<sup>१</sup> नित्य परित्याग करना चाहिये। कौआ एवं मुर्गासे स्पृष्ट, कृमि-युक्त, मनुष्योंद्वारा सूँघे गये तथा कुष्ठ रोगीसे स्पर्श किये गये अन्नका परित्याग करना चाहिये। रजस्वलासे प्राप्त, क्रोधयुक्त व्यभिचारिणी स्त्रीद्वारा दिया गया और मलिन वस्त्र धारण करनेवाले व्यक्तिके द्वारा (दिये अन्नका) और दूसरेके वस्त्रका परित्याग करना चाहिये। मनुने बताया है कि बछड़े-रहित गौ, ऊँटनी और दस दिनोंके भीतर ब्यायी हुई (गौ इत्यादि)-का दूध तथा भेड़ी एवं गर्भिणी गौका दूध पीने योग्य नहीं है॥ २६—३०॥ |
१-(क) मूलमें 'पर्यायान्न' शब्द है। इसका अर्थ याज्ञ० स्मृ० आचा० १६८ वें श्लोककी मिताक्षरा व्याख्याके अनुसार वह अन्न है जो अन्यस्वामिक है और अन्यको दिया जाय। जैसे ब्राह्मणस्वामिक अन्नको शूद्र दे, शूद्रस्वामिक अन्नको ब्राह्मण दे। ऐसा अन्न ग्रहण करनेपर चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित्त है।
(ख) एक दूसरे मतके अनुसार एक पंक्तिमें बैठकर भोजन करनेवालोंमें किसी एकके उठकर आचमन कर लेनेके उपरान्त सभी भोजन करनेवालोंके अन्नको 'पर्यायान्न' कहा जाता है।
| ३३६ | * कूर्मपुराण * |
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सिंहव्याघ्रं च मार्जारं श्वानं शूकरमेव च।
शृगालं मर्कटं चैव गर्दभं च न भक्षयेत् ॥ ३३ ॥
न भक्षयेत् सर्वमृगान् पक्षिणोऽन्यान् वनेचरान्।
जलेचरान् स्थलचरान् प्राणिनश्चेति धारणा ॥ ३४ ॥
गोधा कूर्मः शशः श्वाविच्छल्यकश्चेति सत्तमाः ।
भक्ष्याः पञ्चनखा नित्यं मनूराह प्रजापतिः ॥ ३५ ॥
मत्स्यान् सशल्कान् भुञ्जीयान्मांसं रौरवमेव च।
निवेद्य देवताभ्यस्तु ब्राह्मणेभ्यस्तु नान्यथा ॥ ३६ ॥
मयूरं तित्तिरं चैव कपोतं च कपिञ्जलम् ।
वार्धीणसं वकं भक्ष्यं मीनहंसपराजिताः ॥ ३७ ॥
शफरं सिंहतुण्डं च तथा पाठीनरोहितौ ।
मत्स्याश्चैते समुद्दिष्टा भक्षणाय द्विजोत्तमाः ॥ ३८ ॥
प्रोक्षितं भक्षयेदेषां मांसं च द्विजकाम्यया ।
यथाविधि नियुक्तं च प्राणानामपि चात्यये ॥ ३९ ॥
भक्ष्येन्नैव मांसानि शेषभोजी न लिप्यते ।
औषधार्थमशक्तौ वा नियोगाद् यज्ञकारणात् ॥ ४० ॥
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे दैवे वा मांसमुत्सृजेत् ।
यावन्ति पशुरोमाणि तावतो नरकान् व्रजेत् ॥ ४१ ॥
अदेयं चाप्यपेयं च तथैवास्पृश्यमेव च।
द्विजातीनामनालोक्यं नित्यं मद्यमिति स्थितिः ॥ ४२ ॥
तस्मात् सर्वप्रकारेण मद्यं नित्यं विवर्जयेत् ।
पीत्वा पतति कर्मभ्यस्त्वसम्भाव्यो भवेद् द्विजः ॥ ४३ ॥
भक्षयित्वा ह्यभक्ष्याणि पीत्वाऽपेयान्यपि द्विजः ।
नाधिकारी भवेत् तावद् यावद् तन्न जहात्यधः ॥ ४४ ॥
तस्मात् परिहरेन्नित्यमभक्ष्याणि प्रयत्नतः।
अपेयानि च विप्रो वै तथा चेद् याति रौरवम् ॥ ४५ ॥ | द्विजोंके लिये मद्य न दान देने योग्य है, न पीने योग्य है, न स्पर्श करने योग्य है और न ही देखने योग्य है—ऐसी हमेशाके लिये मर्यादा बनी है। इसलिये सब प्रकारसे मद्यका नित्य ही परित्याग करना चाहिये। मद्य पीनेसे द्विज कर्मोंसे पतित और बातचीत करनेके अयोग्य हो जाता है। अभक्ष्यका भक्षण करने और अपेय पदार्थोंका पान करनेसे द्विज तबतक अपने कर्मका अधिकारी नहीं होता, जबतक उसका पाप दूर नहीं हो जाता। इसलिये प्रयत्नपूर्वक नित्य ही विप्र (द्विज)-को अभक्ष्य एवं अपेय पदार्थोंका परित्याग करना चाहिये। यदि द्विज ऐसा करता है अर्थात् इन्हें ग्रहण करता है तो उसे रौरव नरकमें जाना पड़ता है ॥ ४२–४५ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥
* अध्याय १८ * ३३७
अठारहवाँ अध्याय
गृहस्थके नित्यकर्मोंका वर्णन, प्रातःस्नानकी महिमा, छः प्रकारके स्नान, संध्योपासनकी महिमा तथा संध्योपासनविधि, सूर्योपस्थानका माहात्म्य, सूर्यहृदयस्तोत्र, अग्निहोत्रकी विधि, तर्पणकी विधि, नित्य किये जानेवाले पञ्चमहायज्ञोंकी महिमा तथा उनका विधान
| ऋषय ऊचुः<br>अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां महामुने।<br>तदाचक्ष्वाखिलं कर्म येन मुच्येत बन्धनात् ॥ १ ॥ | ऋषियोंने कहा— महामुने! आप द्विजोंके प्रतिदिन किये जानेवाले उन कर्मोंका सम्पूर्ण-रूपसे वर्णन करें, जिनका अनुष्ठान करनेसे बन्धनसे मुक्ति प्राप्त होती है॥ १॥ |
| व्यास उवाच<br>वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं गदतो मम।<br>अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां क्रमाद् विधिम्॥ २ ॥<br><br>ब्राह्मे मुहूर्ते तूत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।<br>कायक्लेशं तदुद्भूतं ध्यायीत मनसेश्वरम्॥ ३ ॥<br><br>उषःकालेऽथ सम्प्राप्ते कृत्वा चावश्यकं बुधः।<br>स्नायान्नदीषु शुद्धासु शौचं कृत्वा यथाविधि॥ ४ ॥<br><br>प्रातःस्नानेन पूयन्ते येऽपि पापकृतो जनाः।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रातःस्नानं समाचरेत्॥ ५ ॥ | व्यासजी बोले— मैं बतला रहा हूँ। आप लोग ध्यानपूर्वक मेरे द्वारा कहे जा रहे ब्राह्मणोंके प्रतिदिन किये जानेवाले कर्मोंको और उनके विधानको सुनें<sup>१</sup>। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर धर्म और अर्थ एवं (उनकी सम्पन्नताके लिये) अपेक्षित शारीरिक आयास (क्या कब कैसे करना है आदि)-का चिन्तन करे तथा मनसे ईश्वरका ध्यान करे। बुद्धिमान्को चाहिये कि ऊषाकाल होनेपर आवश्यक कर्मोंको करके विधिपूर्वक शौच आदिसे निवृत्त होकर शुद्ध जलवाली नदियोंमें स्नान करे। प्रातःस्नान करनेसे पाप करनेवाले व्यक्ति भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे प्रातःकाल स्नान करना चाहिये॥ २–५॥ |
| प्रातःस्नानं प्रशंसन्ति दृष्टादृष्टकरं शुभम्।<br>ऋषीणामृषिता नित्यं प्रातःस्नानान्न संशयः॥ ६ ॥<br><br>मुखे सुप्तस्य सततं लाला याः संस्रवन्ति हि।<br>ततो नैवाचरेत् कर्म अकृत्वा स्नानमादितः॥ ७ ॥<br><br>अलक्ष्मीः कालकर्णी च दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तितम्।<br>प्रातःस्नानेन पापानि पूयन्ते नात्र संशयः॥ ८ ॥<br><br>न च स्नानं विना पुंसां पावनं कर्म सुस्मृतम्।<br>होमे जप्ये विशेषेण तस्मात् स्नानं समाचरेत्॥ ९ ॥<br><br>अशक्तावशिरस्कं वा स्नानमस्य विधीयते।<br>आर्द्रेण वाससा वाथ मार्जनं कापिलं स्मृतम्॥ १०॥ | दृष्ट और अदृष्ट फल देनेवाले प्रातःकालीन शुभ स्नानकी सभी प्रशंसा करते हैं। नित्य प्रातःकाल स्नान करनेसे ही ऋषियोंका ऋषित्व है, इसमें संशय नहीं; क्योंकि सोये व्यक्तिके मुखसे निरन्तर लार बहती रहती है, अतः सर्वप्रथम स्नान किये बिना कोई कर्म नहीं करना चाहिये। प्रातः-स्नानसे अलक्ष्मी, कालकर्णी<sup>२</sup> (अलक्ष्मीविशेष) दुःस्वप्न, बुरे विचार और अन्य पाप दूर हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। बिना स्नानके मनुष्योंको पवित्र करनेवाला कोई कर्म नहीं बतलाया गया है। अतः होम तथा जपके समय विशेष-रूपसे स्नान करना चाहिये। असमर्थताकी स्थितिमें सिरको छोड़कर स्नान करनेका विधान किया गया है। अथवा भीगे वस्त्रसे शरीरका मार्जन करना चाहिये, इसे कपिलस्नान कहा गया है॥ ६–१०॥ |
१-इस अध्यायमें गृहस्थके प्रायः सभी अनुष्ठानोंका वर्णन है, पर क्रमसे नहीं है। क्रमका ज्ञान गृह्यसूत्र, आह्निकसूत्रावली, नित्यकर्मविधि आदि ग्रन्थोंसे करना चाहिये। इस अध्यायका उद्देश्य सभी कर्मोंका परिचय कराना है। कर्मोंका क्रम बताना उद्देश्य नहीं है।
२-कालकर्णी—अलक्ष्मी (शब्दकल्पद्रुम)।
३३८ * कूर्मपुराण *
| असामर्थ्ये समुत्पन्ने स्नानमेवं समाचरेत्।<br>ब्राह्मादीनि यथाशक्तो स्नानान्याहुर्मनीषिणः॥ ११॥<br><br>ब्राह्ममाग्नेयमुद्दिष्टं वायव्यं दिव्यमेव च।<br>वारुणं यौगिकं तद्वत् षोढा स्नानं प्रकीर्तितम्॥ १२॥<br><br>ब्राह्मं तु मार्जनं मन्त्रैः कुशैः सोदकबिन्दुभिः।<br>आग्नेयं भस्मना पादमस्तकाद्देहधूलनम्॥ १३॥<br><br>गवां हि रजसा प्रोक्तं वायव्यं स्नानमुत्तमम्।<br>यत्तु सातपवर्षेण स्नानं तद् दिव्यमुच्यते॥ १४॥<br><br>वारुणं चावगाहस्तु मानसं त्वात्मवेदनम्।<br>यौगिकं स्नानमाख्यातं योगो विष्णुविचिन्तनम्॥ १५॥<br><br>आत्मतीर्थमिति ख्यातं सेवितं ब्रह्मवादिभिः।<br>मनःशुचिकरां पुंसां नित्यं तत् स्नानमाचरेत्॥ १६॥<br><br>शक्तश्चेद् वारुणं विद्वान् प्राजापत्यं तथैव च।<br>प्रक्षाल्य दन्तकाष्ठं वै भक्षयित्वा विधानतः॥ १७॥<br><br>आचम्य प्रयतो नित्यं स्नानं प्रातः समाचरेत्।<br>मध्याङ्गुलिसमस्थौल्यं द्वादशाङ्गुलसम्मितम्॥ १८॥<br><br>सत्वचं दन्तकाष्ठं स्यात् तदग्रेण तु धावयेत्।<br>क्षीरवृक्षसमुद्भूतं मालतीसम्भवं शुभम्।<br>अपामार्गं च बिल्वं च करवीरं विशेषतः॥ १९॥<br><br>वर्जयित्वा निन्दितानि गृहीत्वैकं यथोदितम्।<br>परिहृत्य दिनं पापं भक्षयेद् वै विधानवित्॥ २०॥<br><br>नोत्पाटयेद् दन्तकाष्ठं नाङ्गुल्या धावयेत् क्वचित्।<br>प्रक्षाल्य भङ्क्त्वा तज्जह्याच्छुचौ देशे समाहितः॥ २१॥<br><br>स्नात्वा संतर्पयेद् देवानृषीन् पितॄगणांस्तथा।<br>आचम्य मन्त्रवन्नित्यं पुनराचम्य वाग्यतः॥ २२॥ | सामर्थ्य न रहनेपर यही (कपिल-) स्नान करना चाहिये। मनीषियोंने यथाशक्ति किये जानेवाले ब्राह्म आदि स्नानोंको बतलाया है। ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण तथा यौगिक—ये छः स्नान कहे गये हैं। कुशोंके द्वारा जलबिन्दुओंस मन्त्रोच्चारणपूर्वक मार्जन करना ब्राह्म-स्नान कहलाता है। मस्तकसे पैरोंतक समस्त देहमें भस्मका उपलेपन करना आग्नेय-स्नान है। गायोंकी धूलसे सम्पन्न उत्तम स्नानको वायव्य-स्नान कहा गया है। धूपमें वर्षाके जलसे जो स्नान किया जाता है, वह दिव्य-स्नान कहलाता है। (जलमें) डुबकी लगाकर किया गया स्नान वारुण-स्नान और मनसे आत्मतत्त्वका चिन्तन करना यौगिक-स्नान कहा गया है। विष्णुका चिन्तन ही योग है॥ ११–१५॥<br><br>ब्रह्मवादियोंसे सेवित इस (यौगिक) स्नानको आत्मतीर्थ कहा गया है। यह मनुष्योंके मनको पवित्र बनानेवाला है। इसलिये यह स्नान नित्य करना चाहिये। समर्थ होनेपर विद्वान्को वारुण तथा प्राजापत्य (ब्राह्म)-स्नान करना चाहिये। दन्तकाष्ठको धोकर विधिपूर्वक उसका भक्षण (चर्वण) करना चाहिये॥ १६–१७॥<br><br>(दतुअन करके) आचमनकर (मुख-प्रक्षालनकर) प्रयत्नपूर्वक नित्य प्रातःस्नान करना चाहिये। मध्यमा अंगुलिके समान मोटा और बारह अंगुलके बराबर लंबा छिलके-युक्त दन्तकाष्ठके अग्रभागसे मुखशुद्धि करनी चाहिये। विशेषरूपसे दूधवाले वृक्ष, मालती (चमेली), अपामार्ग, बिल्व तथा करवीर (कनेर)-की लकड़ीका दन्तकाष्ठ शुभ होता है। विधिके ज्ञाताको चाहिये कि दोषपूर्ण (निषिद्ध) दिनको छोड़कर तथा निन्दित काष्ठोंको छोड़कर बताये गये दन्तकाष्ठोंमेंसे किसी एकको ग्रहणकर दन्तधावन करना चाहिये। दन्तकाष्ठको उखाड़ना नहीं चाहिये (अर्थात् किसी छोटे पौधेको पूरा उखाड़कर उससे दन्तधावन नहीं करना चाहिये) और न कभी अँगुलीसे दतुअन करना चाहिये। (मुख) धोनेके उपरान्त उसे (दन्तकाष्ठको) तोड़कर सावधानीसे किसी पवित्र स्थानमें (यथास्थान) त्याग देना चाहिये॥ १८–२१॥<br><br>अनन्तर पवित्र देशमें स्नान करके आचमनपूर्वक देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको यथाधिकार मन्त्रपूर्वक यथाविधि तृप्त करना चाहिये॥ २२॥ |
| * अध्याय १८ * | ३३९ |
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| सम्मार्ज्य मन्त्रैरात्मानं कुशैः सोदकबिन्दुभिः।<br>आपो हि ष्ठा व्याहृतिभिः सावित्र्या वारुणैः शुभैः॥ २३॥<br><br>ओङ्कारव्याहृतियुतां गायत्रीं वेदमातरम्।<br>जप्त्वा जलाञ्जलिं दद्याद् भास्करं प्रति तन्मनाः॥ २४॥<br><br>प्राक्कूलेषु समासीनो दर्भेषु सुसमाहितः।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा ध्यायेत् संध्यामिति श्रुतिः॥ २५॥ | तदनन्तर पुनः आचमन करे और संयतवाणीवाला होकर 'आपो हि ष्ठा' इत्यादि मन्त्र, व्याहृतियों, गायत्रीमन्त्र तथा वरुण-सम्बन्धी शुभ मन्त्रोंका पाठ करते हुए जलबिन्दुओंसे युक्त कुशोंके द्वारा अपना मार्जन करे। ओंकार एवं व्याहृतियोंसे युक्त वेदमाता गायत्री (-मन्त्र)-का जप करके तन्मय होकर सूर्यको जलाञ्जलि देनी चाहिये। तदनन्तर पूर्वकी ओर बिछे हुए कुशासनपर सावधानीपूर्वक बैठकर तीन प्राणायाम करके संध्याका ध्यान करना चाहिये। ऐसा श्रुतिका विधान है॥ २३-२५॥ | | या संध्या सा जगत्सूतिर्मायातीता हि निष्कला।<br>ऐश्वरी तु पराशक्तिस्तत्त्वत्रयसमुद्भवा॥ २६॥<br><br>ध्यात्वार्कमण्डलगतां सावित्रीं वै जपन् बुधः।<br>प्राङ्मुखः सततं विप्रः संध्योपासनमाचरेत्॥ २७॥<br><br>संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु।<br>यदन्यत् कुरुते किञ्चिन्न तस्य फलमाप्नुयात्॥ २८॥<br><br>अनन्यचेतसः शान्ता ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>उपास्य विधिवत् संध्यां प्राप्ताः पूर्वं परां गतिम्॥ २९॥<br><br>योऽन्यत्र कुरुते यत्नं धर्मकार्ये द्विजोत्तमः।<br>विहाय संध्याप्रणतिं स याति नरकायुतम्॥ ३०॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन संध्योपासनमाचरेत्।<br>उपासितो भवेत् तेन देवो योगतनुः परः॥ ३१॥ | जो संध्या है वही जगत्को उत्पन्न करनेवाली है, मायातीत है, निष्कल है और तीन तत्त्वोंसे उत्पन्न होनेवाली ईश्वरकी पराशक्ति है। विद्वान् ब्राह्मण (द्विज)-को पूर्वाभिमुख होकर सूर्यमण्डलमें प्रतिष्ठित सावित्री (गायत्रीमन्त्र)-का ध्यानपूर्वक जप करते हुए संध्योपासना करनी चाहिये। संध्यासे हीन व्यक्ति (द्विज) नित्य अपवित्र और सभी कर्मोंको करनेके लिये अयोग्य होता है। वह जो भी कार्य करता है, उसका उसे कोई फल प्राप्त नहीं होता। पूर्वकालमें वेदके पारंगत शान्त ब्राह्मणोंने अनन्य-मनसे संध्योपासना करके परम गतिको प्राप्त किया था। जो द्विजोत्तम संध्यावन्दनको छोड़कर दूसरे धार्मिक कार्योंके लिये प्रयत्न करता है, वह सहस्रों नरकोंमें जाता है। इसलिये सभी प्रयत्नोंसे संध्योपासना करनी चाहिये। उस उपासनासे योगविग्रह परमदेवकी उपासना हो जाती है॥ २६-३१॥ | | सहस्रपरमां नित्यं शतमध्यां दशावराम्।<br>सावित्रीं वै जपेद् विद्वान् प्राङ्मुखः प्रयतः स्थितः॥ ३२॥<br><br>अथोपतिष्ठेदादित्यमुदयन्तं समाहितः।<br>मन्त्रैस्तु विविधैः सौरैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः॥ ३३॥<br><br>उपस्थाय महायोगं देवदेवं दिवाकरम्।<br>कुर्वीत प्रणतिं भूमौ मूर्ध्ना तेनैव मन्त्रतः॥ ३४॥ | विद्वान् व्यक्तिको नित्य पूर्वाभिमुख होकर सावित्री (-मन्त्र)-का सावधानीपूर्वक जप करना चाहिये। हजार बारका जप उत्कृष्ट, सौ बार किया गया जप मध्यम तथा दस बारका जप निम्नकोटिका होता है। इसके बाद खड़े होकर ध्यान लगाकर उदित होते हुए सूर्यकी ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें वर्णित सूर्य-सम्बन्धी विविध मन्त्रोंद्वारा उपासना करनी चाहिये। महायोगरूप देवाधिदेव दिवाकरका उपस्थान करके उसी मन्त्रद्वारा भूमिपर मस्तक झुकाकर प्रणाम करना चाहिये और निम्नलिखित मन्त्रोंसे प्रार्थना करनी चाहिये—॥ ३२-३४॥ |
| ३४० | * कूर्मपुराण * |
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| ॐ खखोल्काय शान्ताय कारणत्रयहेतवे।<br>निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे।<br>नमस्ते घृणिने तुभ्यं सूर्याय ब्रह्मरूपिणे॥ ३५॥ | मैं ओंकाररूप शान्त, कारणत्रयके^१ हेतुरूप खखोल्क^२ (सूर्य)-के प्रति अपनेको समर्पित करता हूँ। ज्ञानरूपी आप (सूर्य)-को नमस्कार है। ब्रह्मरूपी घृणि^३ सूर्य! आपको नमस्कार है। आप ही परम ब्रह्म, अप्, ज्योति, रस और अमृतस्वरूप हैं। आप ही भूः, भुवः, स्वः, ओंकार तथा समस्त सनातन रुद्र हैं। आप सत्स्वरूप और महान् पुरुष हैं। आप कपर्दीको मैं प्रणाम करता हूँ। आप ही अनेक रूपवाले सत्-असत्-रूप समस्त विश्वको उत्पन्न करते हैं। सूर्यरूप रुद्रको नमस्कार है। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप प्रचेताको नमस्कार है। मीढुष्टम^४! आपको नमस्कार है। रुद्रके लिये वार-बार नमस्कार है। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप हिरण्यबाहु तथा हिरण्यपतिको नमस्कार हैं। अम्बिकाके पति तथा उमाके पति आपको नमस्कार है। नीलग्रीवको नमस्कार है तथा आप पिनाकीको नमस्कार है। विलोहित, भर्ग तथा सहस्राक्ष! आपको नमस्कार है॥ ३५–४०॥ |
| त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोऽमृतम्।<br>भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वे रुद्राः सनातनाः।<br>पुरुषः सन्महोऽतस्त्वां प्रणमामि कपर्दिनम्॥ ३६॥ | |
| त्वमेव विश्वं बहुधा सदसत् सूयते च यत्।<br>नमो रुद्राय सूर्याय त्वामहं शरणं गतः॥ ३७॥ | |
| प्रचेतसे नमस्तुभ्यं नमो मीढुष्टमाय ते।<br>नमो नमस्ते रुद्राय त्वामहं शरणं गतः॥ ३८॥ | |
| हिरण्यबाहवे तुभ्यं हिरण्यपतये नमः।<br>अम्बिकापतये तुभ्यमुमायाः पतये नमः॥ ३९॥ | |
| नमोऽस्तु नीलग्रीवाय नमस्तुभ्यं पिनाकिने।<br>विलोहिताय भर्गाय सहस्राक्षाय ते नमः॥ ४०॥ | |
| नमो हंसाय ते नित्यमादित्याय नमोऽस्तु ते।<br>नमस्ते वज्रहस्ताय त्र्यम्बकाय नमोऽस्तु ते॥ ४१॥ | आप हंसको नित्य नमस्कार है। आदित्य ! आपको नमस्कार है। वज्रहस्त तथा त्र्यम्बक ! आपको नमस्कार है। मैं आप विरूपाक्ष महान् परमेश्वरकी शरणमें हूँ। सभी देहधारियोंके हिरण्मय गृहमें (हृदयमें) आप अपनेको गुह्यरूपसे प्रतिष्ठित किये हैं। परम ज्योतिरूप, परमगति, विश्वरूप, पशुपति, भीम तथा अर्ध-नारीश्वर-रूपवाले आप ब्रह्माको मैं नमस्कार करता हूँ। प्रकाशमान सूर्यरूप परमेष्ठी रुद्रको नमस्कार है। उग्र तथा सभीके भजनीय^५ आपकी मैं सदा ही शरण ग्रहण करता हूँ॥ ४१–४४॥ |
| प्रपद्ये त्वां विरूपाक्षं महान्तं परमेश्वरम्।<br>हिरण्मयं गृहे गुह्यमात्मानं सर्वदेहिनाम्॥ ४२॥ | |
| नमस्यामि परं ज्योतिर्ब्रह्माणं त्वां परां गतिम्।<br>विश्वं पशुपतिं भीमं नरनारीशरीरिणम्॥ ४३॥ | |
| नमः सूर्याय रुद्राय भास्वते परमेष्ठिने।<br>उग्राय सर्वभक्ताय त्वां प्रपद्ये सदैव हि॥ ४४॥ | |
| एतद् वै सूर्यहृदयं जप्त्वा स्तवमनुत्तमम्।<br>प्रातःकालेऽथ मध्याह्ने नमस्कुर्याद् दिवाकरम्॥ ४५॥ | इस सूर्यहृदय (नामक) उत्तम स्तोत्रका प्रातः-काल तथा मध्याह्नकालमें जपकर दिवाकरको नमस्कार करना चाहिये॥ ४५॥ |
१- यहाँ कारणत्रयसे मन, बुद्धि एवं अहंकार विवक्षित हैं। इन तीनोंको क्रियाशील बनानेमें सूर्य एक महत्त्वपूर्ण कारण हैं।
२- खखोल्क—ख (आकाश) ख (इन्द्रियों)-में क्रमशः सूर्य तथा आत्मारूपसे जो उल्काके समान बाहर-भीतर प्रकाशक-रूपमें विद्यमान हैं, वे खखोल्क हैं। काशीखण्ड ५० वें अध्यायमें खखोल्क नामके सूर्यका वर्णन है। ये काशीमें स्थित हैं।
३-घृणि—सूर्यका नाम है—जिघर्ति दीप्यते इति घृणिः=दीप्तिशाली।
४-मीढुष्टम—शिवका नाम है (श्रीमद्भागवत स्कन्ध ४ अ० ६)। सूर्यमें सभी देवताओंकी भावना एवं उपासनाका विधान होनेसे सूर्यको मीढुष्टम कहा गया है। रुद्र आदिके रूपमें सूर्यके उल्लेखका भी यही कारण है।
५-'सर्वः भक्तः यस्य सः' बहुव्रीहि समास हुआ है। इससे अभिप्राय यह निकलता है कि रुद्र सबके लिये भजनीय हैं।
- अध्याय १८ * ३४१
| इदं पुत्राय शिष्याय धार्मिकाय द्विजातये ।<br>प्रदेयं सूर्यहृदयं ब्रह्मणा तु प्रदर्शितम् ॥ ४६ ॥<br><br>सर्वपापप्रशमनं वेदसारसमुद्भवम् ।<br>ब्राह्मणानां हितं पुण्यमृषिसङ्घैर्निषेवितम् ॥ ४७ ॥ | ब्रह्माके द्वारा प्रदर्शित, सभी पापोंका शमन करनेवाले, वेदोंके सारसे प्रकट हुए, ब्राह्मणोंके हितकारी, पवित्र और ऋषिसमूहोंद्वारा सेवित इस सूर्यहृदय (स्तोत्र)-का द्विजाति-कुलोत्पन्न धार्मिक पुत्र एवं शिष्यके लिये उपदेश करना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥ |
| अथागम्य गृहं विप्रः समाचम्य यथाविधि ।<br>प्रज्वाल्य वह्निं विधिवज्जुहुयाज्जातवेदसम् ॥ ४८ ॥<br><br>ऋत्विक्पुत्रोऽथ पत्नी वा शिष्यो वापि सहोदरः ।<br>प्राप्यानुज्ञां विशेषेण जुहुयुर्वा यथाविधि ॥ ४९ ॥<br><br>पवित्रपाणिः पूतात्मा शुक्लाम्बरधरोत्तरः ।<br>अनन्यमानसो वह्निं जुहुयात् संयतेन्द्रियः ॥ ५० ॥ | तदनन्तर घर आकर ब्राह्मण (द्विज)-को विधिपूर्वक आचमन करके अग्नि प्रज्वलित कर यथाविधि अग्निमें हवन (अग्निहोत्र) करना चाहिये। (अग्न्याधान करनेवाला यजमान द्विजाति यदि किसी अपरिहार्य कारणवश स्वयं अग्निहोत्र नहीं कर सकता है तो उसके प्रतिनिधि-रूपमें) ऋत्विक्का पुत्र (यज्ञोपवीत-संस्कार-सम्पन्न पुत्र), पत्नी, शिष्य (यज्ञोपवीती) अथवा (यज्ञोपवीती) सहोदर भाई भी विशेषरूपसे आज्ञा प्राप्तकर विधिपूर्वक हवन (अग्निहोत्र) कर सकता है। हाथमें पवित्री धारणकर, पवित्रात्मा होकर, शुक्लवर्णका वस्त्र एवं उत्तरीय वस्त्र धारणकर एकाग्रमनसे इन्द्रियोंको संयमित करते हुए अग्निमें हवन करे ॥ ४८-५० ॥ |
| विना दर्भेण यत्कर्म विना सूत्रेण वा पुनः ।<br>राक्षसं तद्भवेत् सर्वं नामुत्रेह फलप्रदम् ॥ ५१ ॥<br><br>दैवतानि नमस्कुर्याद् देयसारान्निवेदयेत् ।<br>दद्यात् पुष्पादिकं तेषां वृद्धांश्चैवाभिवादयेत् ॥ ५२ ॥<br><br>गुरुं चैवाप्युपासीत हितं चास्य समाचरेत् ।<br>वेदाभ्यासं ततः कुर्यात् प्रयत्नाच्छक्तितो द्विजः ॥ ५३ ॥<br><br>जपेदध्यापयेच्छिष्यान् धारयेच्च विचारयेत् ।<br>अवेक्षेत च शास्त्राणि धर्मादीनि द्विजोत्तमः ।<br>वैदिकांश्चैव निगमान् वेदाङ्गानि विशेषतः ॥ ५४ ॥ | बिना कुशके और बिना यज्ञोपवीतके जो भी कर्म किया जाता है, वह सब राक्षसी कर्म होता है, वह न इस लोकमें फल देता है और न परलोकमें ॥ ५१ ॥<br><br>देवताओंको नमस्कार करना चाहिये। उन्हें प्रदान की जानेवाली (शास्त्रविहित) वस्तुओंमें उत्तमोत्तम वस्तुओंको ही निवेदित करना चाहिये। उन्हें (देवताओंको) पुष्प आदि (पदार्थ) समर्पित करना चाहिये और वृद्धजनोंका अभिवादन करना चाहिये। गुरुकी भी उपासना करनी चाहिये, उनका हित करना चाहिये। तदनन्तर द्विजको यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक वेदोंका अभ्यास करना चाहिये। द्विजोत्तमको जप करना चाहिये। शिष्योंको पढ़ाना चाहिये। (पढ़े विषयोंको) धारण करना चाहिये और (उसपर) विचार करना चाहिये। शास्त्रोंका अवलोकन तथा धर्मका—विशेषरूपसे वैदिक तथा वेदसम्मत शास्त्रों और वेदाङ्गोंका चिन्तन करना चाहिये ॥ ५२-५४ ॥ |
| उपेयादीश्वरं चाथ योगक्षेमप्रसिद्धये ।<br>साधयेद् विविधानर्थान् कुटुम्बार्थे ततो द्विजः ॥ ५५ ॥ | अनन्तर योग (अप्राप्तकी प्राप्ति), क्षेम (प्राप्तकी रक्षा)-के लिये ईश्वर (धार्मिक राजा अथवा श्रीमान्)-के समीप जाना चाहिये और द्विजको कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये विविध प्रकारकी सम्पत्तियोंका (न्यायपूर्वक) साधन (चिन्तन, अर्जन) करना चाहिये ॥ ५५ ॥ |
| ३४२ | * कूर्मपुराण * |
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| ततो मध्याह्नसमये स्नानार्थं मृदमाहरेत्।<br>पुष्पाक्षतान् कुशतिलान् गोमयं शुद्धमेव च॥ ५६ ॥<br><br>नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरस्सु च।<br>स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च॥ ५७॥<br><br>परकीयनिपानेषु न स्नायाद् वै कदाचन।<br>पञ्चपिण्डान् समुद्धृत्य स्नायाद् वाऽसम्भवे पुनः॥ ५८ ॥<br><br>मृदैक्या शिरः क्षाल्यं द्वाभ्यां नाभेस्तथोपरि।<br>अधश्च तिसृभिः कायं पादौ षड्भिस्तथैव च॥ ५९॥<br><br>मृत्तिका च समुद्दिष्टा त्वार्द्रामलकमात्रिका।<br>गोमयस्य प्रमाणं तत् तेनाङ्गं लेपयेत् ततः॥ ६०॥ | तदनन्तर मध्याह्न-समयमें स्नानके लिये मिट्टी, पुष्प, अक्षत, कुश, तिल तथा शुद्ध गोबर लाना चाहिये। नदियों (पुराण आदिमें प्रसिद्ध देव, ऋषिनिर्मित), अगाध जलवाले कुण्डों, (जलाशयों), सरोवरों, झरनों तथा बावलियोंमें नित्य स्नान करना चाहिये। दूसरोंके तालाब आदिमें कभी भी स्नान नहीं करना चाहिये। (अन्यत्र स्नान) असम्भव होनेपर (तालाब आदिमेंसे) मिट्टीके पाँच पिण्डोंको निकालकर स्नान करना चाहिये। मिट्टीसे एक बार सिर धोकर दो बार नाभिके ऊपर (-के अङ्गोंको) धोना चाहिये। नीचेका शरीर तीन बार तथा छः बार पाँवोंको धोना चाहिये। आँवलेके बराबर गीली मिट्टी लेनेका विधान है। गोबरका भी इतना ही प्रमाण है। उससे अङ्गोंका लेपन करे॥ ५६–६०॥ | | लेपयित्वा तु तीरस्थस्तल्लिङ्गैरैव मन्त्रतः।<br>प्रक्षाल्याचम्य विधिवत् ततः स्नायात् समाहितः॥ ६१॥ | (नदी आदिके) किनारे बैठकर तल्लिङ्गक* मन्त्रोंके द्वारा (अङ्गोंमें मृत्तिका आदिका यथाविधि) लेपकर विधिपूर्वक प्रक्षालन एवं आचमन करके सावधानी-पूर्वक स्नान करना चाहिये॥ ६१॥ | | अभिमन्त्र्य जलं मन्त्रैस्तल्लिङ्गैर्वारुणैः शुभैः।<br>भावपूतस्तदव्यक्तं ध्यायन् वै विष्णुमव्ययम्॥ ६२॥<br><br>आपो नारायणोद्भूतास्ता एवास्यायनं पुनः।<br>तस्मान्नारायणं देवं स्नानकाले स्मरेद् बुधः॥ ६३॥<br><br>प्रोच्य सोंकारमादित्यं त्रिर्निमज्जेज्जलाशये।<br>आचान्तः पुनराचामेन्मन्त्रेणानेन मन्त्रवित्॥ ६४॥<br><br>अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः।<br>त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥ ६५॥ | तल्लिङ्गक शुभ वरुण-सम्बन्धी मन्त्रोंके द्वारा जलका अभिमन्त्रणकर पवित्र भावसे उन अव्यक्त अविनाशी विष्णुका ध्यान करे। ‘जल’की उत्पत्ति नारायणसे ही हुई है, पुनः वही जल उन (नारायण)-का अयन (निवास) हुआ, अतः स्नानके समय विद्वान्को चाहिये कि वह नारायणदेवका स्मरण करे। ओंकारके साथ आदित्यका उच्चारण करके जलके भीतर तीन बार डुबकी लगानी चाहिये। आचमन किये रहनेपर भी मन्त्रवेत्ताको पुनः इस मन्त्रसे आचमन करना चाहिये—अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥ अर्थात् (हे भगवन्!) सभी ओर मुखवाले आप सभी प्राणियोंके भीतर (हृदयरूपी) गुहामें विचरण करते हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार, जल, ज्योति, रस तथा अमृतरूप हैं॥ ६२–६५॥ | | द्रुपदां वा त्रिरभ्यसेद् व्याहृतिप्रणवान्विताम्।<br>सावित्रीं वा जपेद् विद्वान् तथा चैवाघमर्षणम्॥ ६६ ॥ | अथवा विद्वान् व्यक्तिको तीन बार द्रुपदा (दो चरणवाली) या व्याहृति अथवा प्रणवसे युक्त गायत्री और अघमर्षण-मन्त्रका जप करना चाहिये॥ ६६॥ |
* स्मार्तकर्मोंमें वे मन्त्र गृह्यसूत्रानुसार विनियुक्त होते हैं, जिनमें स्मार्तकर्म-बोधक शब्द श्रुत हों। यह आवश्यक नहीं होता कि उन मन्त्रोंमें स्मार्तकर्मका प्रतिपादन हो। इसीलिये स्मार्तकर्मके मन्त्र स्मार्तकर्मविषयक नहीं, किंतु स्मार्तकर्मलिङ्गक होते हैं। 'अक्षन्मी०' मन्त्रमें 'अक्षत' शब्द कथञ्चित् श्रुत होनेसे उसका अक्षत चढ़ानेमें विनियोग होता है, वह 'अक्षत' चढ़ाने-रूप कर्मका प्रतिपादक नहीं है, अतएव 'अक्षत'-विषयक नहीं है। मात्र अक्षतलिङ्गक है।
* अध्याय १८ * ३४३
| ततः सम्मार्जनं कुर्यादापो हि ष्ठा मयोभुवः।<br>इदमापः प्र वहत व्याहृतिभिस्तथैव च॥ ६७॥ | तदनन्तर 'आपो हि ष्ठा मयो- भुवः०'<sup>१</sup>, 'इदमापः प्र वहत०'<sup>२</sup> इन मन्त्रों और व्याहृतियोंद्वारा मार्जन करना चाहिये। तदनन्तर 'आपो हि ष्ठा०' इत्यादि मन्त्रोंसे उस जल (स्नानीय नदी आदिके जल)-का अभिमन्त्रण करके जलके भीतर डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण-मन्त्रका जप करना चाहिये। अथवा त्रिपदा गायत्री-मन्त्र 'तद्विष्णोः परमं पदम्०'<sup>३</sup>, इस मन्त्र या प्रणवका जप करे अथवा भगवान् विष्णुका स्मरण करे॥ ६७-६९॥ |
| ततोऽभिमन्त्र्य तत् तीर्थमापो हि ष्ठादिमन्त्रकैः।<br>अन्तर्जलगतो मग्नो जपेत् त्रिर्घमर्षणम्॥ ६८॥ | |
| त्रिपदां वाथ सावित्रीं तद्विष्णोः परमं पदम्।<br>आवर्तयेद् वा प्रणवं देवं वा संस्मरेद्धरिम्॥ ६९॥ | |
| द्रुपदादिव यो मन्त्रो यजुर्वेदे प्रतिष्ठितः।<br>अन्तर्जले त्रिरावर्त्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७०॥ | यजुर्वेदमें 'द्रुपदादिव०'<sup>४</sup> इस प्रकारसे जो मन्त्र प्रतिष्ठित है, उसका जलके भीतर तीन बार जप करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। मार्जन करनेके बाद हाथमें जल लेकर मन्त्र (द्रुपदादिव०) जपपूर्वक उस जलको सिरपर रखनेसे (अघमर्षण करनेसे) सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति हो जाती है। जिस प्रकार अश्वमेध-यज्ञ समस्त यज्ञोंके राजाके समान है और समस्त पापोंको दूर करनेवाला है, उसी प्रकार अघमर्षणसूक्त<sup>५</sup> भी (सभी सूक्तोंका सम्राट् और) सभी पापोंको दूर करनेवाला है॥ ७०-७२॥ |
| अपः पाणौ समादाय जप्त्वा वै मार्जने कृते।<br>विन्यस्य मूर्ध्नि तत् तोयं मुच्यते सर्वपातकैः॥ ७१॥ | |
| यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनः।<br>तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम्॥ ७२॥ | |
| अथोपतिष्ठेदादित्यं मूर्ध्नि पुष्पान्विताञ्जलिम्।<br>प्रक्षिप्यालोकयेद् देवमुद्वयं तमसस्परि॥ ७३॥ | इसके बाद सूर्योपस्थान करना चाहिये। (इसकी प्रक्रिया यह है—) पुष्पयुक्त अञ्जलि मस्तकसे लगाकर उस फूलको ऊपर (सूर्य)-की ओर उछालकर उन सूर्यका दर्शन करते हुए 'उद्वयं तमसस्परि'<sup>६</sup>, 'चित्रं०'<sup>७</sup>, 'उदु त्यं०'<sup>८</sup>, 'तच्चक्षुः०'<sup>९</sup>, 'हंसः शुचिषद'<sup>१०</sup> एवं विशेष-रूपसे सावित्री-मन्त्र और सूर्य-सम्बन्धी अन्य भी पापको नष्ट करनेवाले वैदिक मन्त्रोंके जपके द्वारा सूर्यको प्रसन्न किया जाय, यही सूर्योपस्थान है। इसके अनन्तर गायत्रीमन्त्रका जप करना चाहिये। इस (गायत्रीजपको) ही जपयज्ञ कहा गया है॥ ७३-७५॥ |
| उदु त्यं चित्रमित्येते तच्चक्षुरिति मन्त्रतः।<br>हंसः शुचिषदेतेन सावित्र्या च विशेषतः॥ ७४॥ | |
| अन्यैश्च वैदिकैर्मन्त्रैः सौरैः पापप्रणाशनैः।<br>सावित्रीं वै जपेत् पश्चाज्जपयज्ञः स वै स्मृतः॥ ७५॥ |
१-आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥ (यजु० ११। ५०)
२-इदमापः प्र वहतावद्यं च मलं च यत्। यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम्। आपो मा तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु। (यजु० ६। १७)
३-तद्विष्णोः परमं पदᳵसदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (यजु० ६। ५)
४-द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥ (यजु० २०। २०)
५-ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः।..... मथो स्वः॥ (ऋग्वेद १०। १९०। १-३)
६-उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्यमन्म ज्योतिरुत्तमम्॥ (यजु० २०। २१)
७-उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यᳵस्वाहा॥ (यजु० ७। ४१)
८-चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षᳵसूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥ (यजु० ७। ४२)
९-तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम।
शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ (यजु० ३६। २४)
१०-हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्॥ (यजु० १०। २४)
३४४ * कूर्मपुराण *
| विविधानि पवित्राणि गुह्यविद्यास्तथैव च।<br>शतरुद्रीयमथर्वाशिरः सौरांश्च शक्तितः ॥ ७६ ॥<br><br>प्राक्कूलेषु समासीनः कुशेषु प्राङ्मुखः शुचिः।<br>तिष्ठंश्चेदीक्षमाणोऽर्कं जप्यं कुर्यात् समाहितः ॥ ७७ ॥<br><br>स्फाटिकेन्द्राक्षरुरुद्राक्षैः पुत्रजीवसमुद्भवैः।<br>कर्तव्या त्वक्षमाला स्यादुत्तरादुत्तमा स्मृता ॥ ७८ ॥<br>जपकाले न भाषेत नान्यानि प्रेक्षयेद् बुधः।<br>'न कम्पयेच्छिरोग्रीवां दन्तान् नैव प्रकाशयेत् ॥ ७९ ॥<br><br>गुह्यका राक्षसा सिद्धा हरन्ति प्रसभं यतः।<br>एकान्ते सुशुभे देशे तस्माज्जप्यं समाचरेत् ॥ ८० ॥<br>चण्डालाशौचपतितान् दृष्ट्वाचम्य पुनर्जपेत्।<br>तैरेव भाषणं कृत्वा स्नात्वा चैव जपेत् पुनः ॥ ८१ ॥<br><br>आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने।<br>सौराम् मन्त्रान् शक्तितो वै पावमानीस्तु कामतः ॥ ८२ ॥<br><br>यदि स्यात् क्लिन्नवासा वै वारिमध्यगतो जपेत्।<br>अन्यथा तु शुचौ भूम्यां दर्भेषु सुसमाहितः ॥ ८३ ॥<br>प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्या ततः क्षितौ।<br>आचम्य च यथाशास्त्रं शक्त्या स्वाध्यायमाचरेत् ॥ ८४ ॥<br><br>ततः संतर्पयेद् देवानृषीन् पितृगणांस्तथा।<br>आदावोंकारमुच्चार्य नमोऽन्ते तर्पयामि वः ॥ ८५ ॥<br><br>देवान् ब्रह्मर्षींश्चैव तर्पयेदक्षतोदकैः।<br>तिलोदकैः पितॄन् भक्त्या स्वसूत्रोक्तविधानतः ॥ ८६ ॥ | पूर्वाग्र कुशोंपर पूर्वाभिमुख पवित्र होकर बैठना चाहिये और सूर्यका दर्शन करते हुए समाहित-चित्त होकर विविध पवित्र मन्त्रों, गुह्यविद्याओं, शतरुद्रिय, अथर्वशिरस् एवं सूर्यदेवताके मन्त्रोंका जप करना चाहिये। स्फटिक, इन्द्राक्ष (इन्द्र वृक्ष-विशेषके फलकी माला), रुद्राक्ष तथा पुत्रजीवककी (वृक्ष-विशेषके फलकी माला*) अक्षमाला बनानी चाहिये। इनमें पूर्वसे बादवाली माला क्रमशः उत्तम कही गयी है॥ ७६-७८॥<br><br>बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि वह जप करते समय बोले नहीं, दूसरे लोगोंकी ओर न देखे। सिर और गरदनको न हिलाये और न ही दाँतोंको दिखलाये, क्योंकि (ऐसा करनेसे) गुह्यक, राक्षस तथा सिद्ध उस जपके फलका बलात् हरण कर लेते हैं, अतः किसी एकान्त अत्यन्त शुभ स्थानमें जप करना चाहिये ॥ ७९-८० ॥<br><br>चाण्डाल, आशौच-युक्त व्यक्ति तथा पतितको देखनेपर आचमन करके पुनः जप करना चाहिये। इनके साथ बात करनेपर स्नान करनेके बाद ही पुनः जप करना चाहिये। अपवित्र पदार्थके दिख जानेपर आचमन करके प्रयत्नपूर्वक यथाशक्ति नित्य सूर्यसम्बन्धी मन्त्रों और पावमानी मन्त्रोंका इच्छानुसार (मनस्तुष्टिपर्यन्त) जप करना चाहिये। यदि भींगे वस्त्र पहने हों तो जलके मध्य स्थित होकर जप करना चाहिये। अन्यथा पवित्र भूमिमें कुशासनके ऊपर बैठकर एकाग्रतापूर्वक जप करना चाहिये ॥ ८१-८३ ॥<br><br>(जप पूरा करनेके बाद) प्रदक्षिणा करके पृथ्वीपर नमस्कार करके और आचमन करके शास्त्रानुसार यथाशक्ति स्वाध्याय करना चाहिये, तदनन्तर देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। प्रारम्भमें ओंकारका उच्चारण कर और अन्तमें 'नमः' लगाकर 'आपका तर्पण करता हूँ' (वः तर्पयामि)-ऐसा कहना चाहिये ॥ ८४-८५ ॥<br><br>देवताओं तथा ब्रह्मर्षियोंका तर्पण अक्षत और जलसे करना चाहिये और अपने गृह्यसूत्रोक्त विधिके अनुसार पितरोंका तर्पण तिल और जलसे भक्तिपूर्वक करना चाहिये ॥ ८६ ॥ |
* माला-विशेषोंका विस्तृत वर्णन पद्मोत्तरखण्ड अध्याय १०८ में द्रष्टव्य है।
- अध्याय १८ * | ३४५ ---|---
अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु।
देवर्षींस्तर्पयेद् धीमानुदकाञ्जलिभिः पितॄन्॥ ८७॥
यज्ञोपवीती देवानां निवीती ऋषितर्पणे।
प्राचीनावीती पित्र्ये तु स्वेन तीर्थेन भावतः॥ ८८॥
निष्पीड्य स्नानवस्त्रं तु समाचम्य च वाग्यतः।
स्वैर्मन्त्रैरर्चयेद् देवान् पुष्पैः पत्रैरथाम्बुभिः॥ ८९॥
ब्रह्माणं शंकरं सूर्यं तथैव मधुसूदनम्।
अन्यांश्चाभिमतान् देवान् भक्त्या चाक्रोधनोऽत्वरः॥ ९०॥
प्रदद्याद् वाथ पुष्पाणि सूक्तेन पौरुषेण तु।
आपो वा देवताः सर्वास्तेन सम्यक् समर्चितः॥ ९१॥
ध्यात्वा प्रणवपूर्वं वै दैवतानि समाहितः।
नमस्कारेण पुष्पाणि विन्यसेद् वै पृथक् पृथक्॥ ९२॥
न विष्ण्वाराधनात् पुण्यं विद्यते कर्म वैदिकम्।
तस्मादनादिमध्यान्तं नित्यमाराधयेद्धरिम्॥ ९३॥
तद्विष्णोरिति मन्त्रेण सूक्तेन पुरुषेण तु।
नैताभ्यां सदृशो मन्त्रो वेदेषूक्तश्चतुर्ष्वपि॥ ९४॥
| बुद्धिमान् (आस्तिक अधिकारी व्यक्ति)-को सव्य (बाँयें) हाथसे अन्वारब्ध (सम्बद्ध) दाहिने हाथसे अर्थात् दोनों हाथोंकी अञ्जलिद्वारा जलसे देवताओं, ऋषियों एवं पितरोंका तर्पण करना चाहिये। यज्ञोपवीती¹ अर्थात् सव्य होकर देवताओंका, निवीती² होकर अर्थात् मालाकी तरह कण्ठमें यज्ञोपवीत धारणकर ऋषियोंका और प्राचीनावीती³ अर्थात् अपसव्य होकर भक्तिभावसे (देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंके) अपने-अपने तीर्थोंसे⁴ तर्पण करना चाहिये॥ ८७-८८॥
| स्नानके वस्त्रको⁵ निचोड़कर संयतवाणीसे युक्त होकर आचमन करके तत्तद् मन्त्रोंसे पत्र, पुष्प तथा जलके द्वारा देवताओंका पूजन करना चाहिये। क्रोध और शीघ्रताका सर्वथा परित्यागकर भक्तिपूर्वक ब्रह्मा, शंकर, सूर्य, विष्णु तथा अन्य जो भी अभीष्ट देवता हों, उनकी पूजा करनी चाहिये॥ ८९-९०॥
| पुरुषसूक्तके द्वारा पुष्प अर्पित करना चाहिये। अथवा जल सभी देवताओंका स्वरूप है, अतः उसके द्वारा पूजन करनेसे सभी देवताओंकी भलीभाँति पूजा हो जाती है। एकाग्रमनसे प्रणवका उच्चारण कर देवताओंका ध्यान करना चाहिये। नमस्कारकर पृथक्-पृथक् देवोंपर पुष्प चढ़ाना चाहिये। विष्णुकी आराधनासे अधिक पुण्यप्रद और कोई वैदिक कर्म नहीं है। इसलिये आदि, मध्य और अन्तसे रहित विष्णुकी नित्य आराधना करनी चाहिये॥ ९१-९३॥
| 'तद्विष्णोः०'⁶ इस मन्त्रसे तथा पुरुषसूक्तसे श्रीविष्णुकी आराधना करनी चाहिये। चारों वेदोंमें भी इन दोनों ('तद्विष्णोः०' एवं 'पुरुष सूक्त') मन्त्रोंके सदृश अन्य कोई मन्त्र नहीं कहा गया है॥ ९४॥
१-बाँयें कंधेके ऊपर रखते हुए दाहिने हाथ (दाहिनी भुजा)-के नीचे रखे हुए ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)-को उपवीत या यज्ञोपवीत कहते हैं और इस प्रकार ब्रह्मसूत्र धारण करनेवालेको उपवीती या यज्ञोपवीती कहते हैं।
२-मालाकी तरह कण्ठसे सीधे वक्षःस्थलकी ओर लम्बित ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)-को निवीत कहते हैं और इस ब्रह्मसूत्र धारण करनेवालेको निवीती कहते हैं।
३-दाहिने कंधेके ऊपर रखते हुए बायें हाथ (बायीं भुजा)-के नीचे रखे हुए ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)-को प्राचीनावीत कहते हैं और इस प्रकार ब्रह्मसूत्र धारण करनेवालेको प्राचीनावीती कहते हैं।
४-देवताओंका तर्पण देवतीर्थ (अँगुलियोंके अग्रभाग)-से, ऋषियों-मनुष्योंका तर्पण काय-तीर्थ (कनिष्ठिका अँगुलीके मूल)-से और पितरोंका तर्पण पितृतीर्थ (अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अँगुलीके मूलों)-से करना चाहिये।
५-तर्पणके पूर्व स्नानके वस्त्रोंको सुखानेके लिये निचोड़ना नहीं चाहिये अन्यथा पितर निराश होकर चले जाते हैं। इसीलिये यहाँ तर्पणके अनन्तर स्नानके वस्त्रोंको निचोड़नेकी बात कही गयी है।
६-तद्विष्णोः परमं पदँ सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम् (यजु० ६। ५)।
३४६ * कूर्मपुराण *
| निवेदयेत स्वात्मानं विष्णावमलतेजसि ।<br>तदात्मा तन्मनाः शान्तस्तद्विष्णोरिति मन्त्रतः ॥ ९५ ॥<br><br>अथवा देवमीशानं भगवन्तं सनातनम्।<br>आराधयेन्महादेवं भावपूतो महेश्वरम् ॥ ९६ ॥ | 'तद्विष्णोः०' इस मन्त्रके द्वारा तदात्मा और तन्मय होकर शान्तिपूर्वक अपनेको विशुद्ध तेजः-स्वरूप विष्णुमें निवेदित करना चाहिये। अथवा पवित्र भावनासे सनातन भगवान् ईशान महेश्वरदेव महादेवकी आराधना करनी चाहिये ॥ ९५-९६ ॥ |
|---|---|
| मन्त्रेण रुद्रगायत्र्या प्रणवेनाथ वा पुनः।<br>ईशानेनाथ वा रुद्रैस्त्र्यम्बकेन समाहितः ॥ ९७ ॥<br><br>पुष्पैः पत्रैस्तथाद्भिर्वा चन्दनाद्यैर्महेश्वरम्।<br>उक्त्वा नमः शिवायेति मन्त्रेणानेन योजयेत् ॥ ९८ ॥<br><br>नमस्कुर्यान्महादेवं ऋतं सत्यमितीश्वरम्।<br>निवेदयीत स्वात्मानं यो ब्रह्माणमितीश्वरम् ॥ ९९ ॥<br><br>प्रदक्षिणं द्विजः कुर्यात् पञ्च ब्रह्माणि वै जपन्।<br>ध्यायीत देवमीशानं व्योममध्यगतं शिवम् ॥ १०० ॥ | रुद्रगायत्री, प्रणव, ईशान-मन्त्र, रुद्र तथा त्र्यम्बक-मन्त्रसे एकाग्र-मन होकर पुष्प, पत्र, जल तथा चन्दन आदिके द्वारा महेश्वरकी आराधना करनी चाहिये और मन्त्रका उच्चारणकर मन्त्रके साथ 'नमः शिवाय' को जोड़ना चाहिये। तदनन्तर ऋत एवं सत्यस्वरूप ईश्वर महादेवको नमस्कार करना चाहिये और 'यो ब्रह्माणं० ¹' इस मन्त्रके द्वारा अपनेको ईश्वरके लिये समर्पित करे। द्विजको पाँच ब्रह्म (शिवके पाँच नामों²)-का जप करते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिये और आकाशके मध्य स्थित ईशानदेव शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ ९७-१०० ॥ |
| अथावलोकयेदर्कं हंसः शुचिषदित्यृचा।<br>कुर्यात् पञ्च महायज्ञान् गृहं गत्वा समाहितः ॥ १०१ ॥<br><br>देवयज्ञं पितृयज्ञं भूतयज्ञं तथैव च।<br>मानुष्यं ब्रह्मयज्ञं च पञ्च यज्ञान् प्रचक्षते ॥ १०२ ॥ | इसके अनन्तर 'हंसः शुचिषद०' इस ऋचासे सूर्यका दर्शन करे और घर जाकर ध्यानपूर्वक पञ्चयज्ञोंको करे। देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ तथा ब्रह्मयज्ञ—ये पाँच (महा-) यज्ञ कहे गये हैं ॥ १०१-१०२ ॥ |
| यदि स्यात् तर्पणादर्वाक् ब्रह्मयज्ञः कृतो न हि।<br>कृत्वा मनुष्ययज्ञं वै ततः स्वाध्यायमाचरेत् ॥ १०३ ॥<br><br>अग्नेः पश्चििमतो देशे भूतयज्ञान्त एव वा।<br>कुशपुञ्जे समासीनः कुशपाणिः समाहितः ॥ १०४ ॥<br><br>शालाग्नौ लौकिके वाग्नौ जले भूम्यामथापि वा।<br>वैश्वदेवं ततः कुर्याद् देवयज्ञः स वै स्मृतः ॥ १०५ ॥<br><br>यदि स्याल्लौकिके पक्वं ततोऽन्नं तत्र हूयते।<br>शालाग्नौ तन्न देवान्नं विधिरेश सनातनः ॥ १०६ ॥<br><br>देवेभ्यस्तु हुतादन्नाच्छेषाद् भूतबलिं हरेत्।<br>भूतयज्ञः स वै ज्ञेयो भूतिदः सर्वदेहिनाम् ॥ १०७ ॥<br><br>श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च पतितादिभ्य एव च।<br>दद्याद् भूमौ बलिं त्वन्नं पक्षिभ्योऽथ द्विजोत्तमः ॥ १०८ ॥ | यदि तर्पणसे पहले ब्रह्मयज्ञ न किया हो तो मनुष्ययज्ञ करनेके बाद स्वाध्याय (ब्रह्मयज्ञ) करना चाहिये अथवा भूतयज्ञके अन्तमें एकाग्रचित्त होकर हाथमें कुश लेकर अग्निके पश्चिमकी दिशामें कुशपुंजपर बैठकर यज्ञशालाकी अग्नि, लौकिकाग्नि अथवा जलमें या भूमिपर वैश्वदेव करना चाहिये। यह देवयज्ञ कहलाता है। यदि लौकिकाग्निमें अन्न पकाया गया हो तो उसीमें हवन किया जाता है और यदि शालाकी अग्निमें अन्न तैयार किया गया हो तो शालाग्निमें ही वैश्वदेव होम करना चाहिये। यही सनातन विधि है। वैश्वदेव होमके पश्चात् बचे हुए अन्नद्वारा भूतबलिकर्म करना चाहिये। इसे भूतयज्ञ जानना चाहिये। यह सर्वप्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करता है। द्विजोत्तमको (घरके बाहर) भूमिपर कुत्ता, चाण्डाल, पतित आदि तथा पक्षियोंको अन्नकी बलि देनी चाहिये ॥ १०३-१०८ ॥ |
१-यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ (श्वेताश्वतर० ६। १८)
२-ईशानः ¹ सर्वविद्यानाम् ईश्वरः ² सर्वभूतानाम्। ब्रह्माधिपतिः ³ ब्रह्मणोऽधिपतिः ⁴ ब्रह्मा ⁵ शिवो मे अस्तु सदा शिवोम् ॥
- अध्याय १८ * ३४७
सायं चान्नस्य सिद्धस्य पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत्। भूतयज्ञस्त्वयं नित्यं सायं प्रातर्विधीयते॥ १०९॥
एकं तु भोजयेद् विप्रं पितॄनुद्दिश्य सत्तमम्। नित्यश्राद्धं तदुद्दिष्टं पितृयज्ञो गतिप्रदः॥ ११०॥
उद्धृत्य वा यथाशक्ति किञ्चिदन्नं समाहितः। वेदतत्त्वार्थविदुषे द्विजायैवोपपादयेत्॥ १११॥
पूजयेदतिथिं नित्यं नमस्येदर्चयेद् द्विजम्। मनोवाक्कर्मभिः शान्तमागतं स्वगृहं ततः॥ ११२॥
हन्तकारमथाग्रं वा भिक्षां वा शक्तितो द्विजः। दद्यादतिथये नित्यं बुध्येत परमेश्वरम्॥ ११३॥
भिक्षामार्हुग्रासमात्रमग्रं तस्याश्चतुर्गुणम्। पुष्कलं हन्तकारं तु तच्चतुर्गुणमुच्यते॥ ११४॥
गोदोहमात्रं कालं वै प्रतीक्ष्यो ह्यतिथिः स्वयम्। अभ्यागतान् यथाशक्ति पूजयेदतिथिं यथा॥ ११५॥
भिक्षां वै भिक्षवे दद्याद् विधिवद् ब्रह्मचारिणे। दद्यादन्नं यथाशक्ति त्वर्थिभ्यो लोभवर्जितः॥ ११६॥
सर्वेषामप्यलाभे तु अन्नं गोभ्यो निवेदयेत्। भुञ्जीत बन्धुभिः सार्धं वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन्॥ ११७॥
अकृत्वा तु द्विजः पञ्च महायज्ञान् द्विजोत्तमाः। भुञ्जीत चेत् स मूढात्मा तिर्यग्योनिं स गच्छति॥ ११८॥
वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा। नाशयत्याशु पापानि देवानामार्चनं तथा॥ ११९॥
यो मोहादथवालस्यादकृत्वा देवतार्चनम्। भुङ्क्ते स याति नरकान् शूकStatus/शूकरेष्वभिजायते॥ १२०॥
पत्नी सायंकाल पके हुए अन्नकी बलि बिना मन्त्रके प्रदान करे, यही भूतयज्ञ है, जो नित्य सायंकाल और प्रातःकाल किया जाता है। पितरोंके उद्देश्यसे एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रतिदिन भोजन कराना चाहिये, इसे नित्य-श्राद्ध कहा गया है। यह पितृयज्ञ (उत्तम) गति प्रदान करनेवाला है॥ १०९-११०॥
अथवा यथाशक्ति कुछ अन्न निकालकर वेदके तत्त्वार्थको जाननेवाले ब्राह्मणको समाहित होकर देना चाहिये। तदनन्तर अपने घर आये हुए शान्त द्विज अतिथिका मन, वाणी तथा कर्मके द्वारा नित्य नमस्कार, पूजन एवं अर्चन करना चाहिये। द्विज अतिथिको यथाशक्ति नित्य 'हन्तकार', 'अग्र' अथवा भिक्षा प्रदान करे और उसे परमेश्वरका रूप समझे॥ १११-११३॥
ग्रासमात्र (अन्न)-को भिक्षा और उसके चौगुने अर्थात् चार ग्रासके बराबर अन्नको अग्र कहा जाता है। अग्रके चौगुने अर्थात् सोलह ग्रासके बराबर पर्याप्त अन्नको हन्तकार कहा जाता है। गोदोहनकाल-पर्यन्त अतिथिकी स्वयं प्रतीक्षा करनी चाहिये। जिस प्रकार अतिथिकी^१ पूजा की जाती है, उसी प्रकार अभ्यागतोंकी^२ भी यथाशक्ति पूजा (सेवा) करनी चाहिये॥ ११४-११५॥
ब्रह्मचारी भिक्षुकको विधिवत् भिक्षा प्रदान करे। लोभरहित होकर याचकोंको यथाशक्ति अन्न प्रदान करे, इन सभीके न मिलनेपर गौओंको अन्न निवेदित करे। तदनन्तर भोजनकी निन्दा न करते हुए बन्धुओंके साथ मौन होकर भोजन करे॥ ११६-११७॥
द्विजोत्तमो! यदि द्विज पञ्च महायज्ञोंको बिना किये ही भोजन करता है तो वह मूढात्मा तिर्यग्योनि प्राप्त करता है। प्रतिदिन यथाशक्ति किया गया वेदोंका अभ्यास, महायज्ञ कर्म, क्षमाका भाव और देवताओंका पूजन—ये शीघ्र ही पापोंका नाश करते हैं। जो मोहपूर्वक अथवा आलस्यसे देवताओंकी पूजा किये बिना भोजन करता है, वह नरकोंको प्राप्त करता है और बादमें शूकरकी योनिमें जन्म लेता है॥ ११८-१२०॥
१-अज्ञातपूर्वगृहागत व्यक्ति (अकस्मात् घरपर आ जानेवाला) अतिथि है। (श्रीधरस्वामी)
२-ज्ञातपूर्वगृहागत व्यक्ति (जिसका पहलेसे घरपर आना ज्ञात है ऐसा व्यक्ति) अभ्यागत है।
३४८ * कूर्मपुराण *
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कृत्वा कर्माणि वै द्विजाः।<br>भुञ्जीत स्वजनैः सार्धं स याति परमां गतिम्॥ १२१॥ | द्विजो! इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा (नित्य) (अपने अधिकारानुसार शास्त्रविहित) कर्मोंको (श्रद्धापूर्वक) करनेके बाद स्वजनोंके साथ भोजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला परमगति प्राप्त करता है॥ १२१॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १८॥
उन्नीसवाँ अध्याय
भोजन-विधि, ग्रहणकालमें भोजनका निषेध, शयन-विधि, गृहस्थके नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका महत्त्व
| व्यास उवाच | व्यासजीने कहा—पवित्र आसनपर बैठकर पाँवोंको भूमिपर रखकर पूर्वकी ओर अथवा सूर्याभिमुख होकर अन्न (भोजन) ग्रहण करना चाहिये। पूर्वाभिमुख होकर भोजन करनेसे लम्बी आयु, दक्षिणाभिमुख होकर भोजन करनेसे यश, पश्चिमाभिमुख होकर भोजन करनेसे सम्पत्ति और उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करनेसे सत्यकी प्राप्ति होती है॥ १-२॥ |
|---|---|
| प्राङ्मुखोऽन्नानि भुञ्जीत सूर्याभिमुख एव वा।<br>आसीनस्त्वासने शुद्धे भूम्यां पादौ निधाय तु॥ १॥<br><br>आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः।<br>श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते उदङ्मुखः॥ २॥ | |
| पञ्चार्द्रो भोजनं कुर्याद् भूमौ पात्रं निधाय तु।<br>उपवासेन तत्तुल्यं मनुराह प्रजापतिः॥ ३॥<br><br>उपलिप्ते शुचौ देशे पादौ प्रक्षाल्य वै करौ।<br>आचम्यार्द्राननोऽक्रोधः पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्॥ ४॥<br><br>महाव्याहृतिभिस्त्वन्नं परिधायोदकेन तु।<br>अमृतोपस्तरणमसीत्यापोशानक्रियां चरेत्॥ ५॥ | पाँचों अङ्गों (दोनों हाथ, दोनों पैर तथा मुख)-का प्रक्षालनकर (भोजन) पात्रको भूमिपर रखकर भोजन करना चाहिये। प्रजापति मनुने इस प्रकारके भोजनको उपवासके समान बताया है। दोनों हाथ, पैर एवं मुखको धोनेके बाद आचमनकर (गोबर इत्यादिसे) लीपे गये पवित्र स्थानमें (बैठकर) क्रोधरहित होकर भोजन करना चाहिये। महाव्याहृतियोंका उच्चारण करते हुए जलसे अन्नको परिवेष्टितकर 'अमृतोपस्तरणमसि' ऐसा कहकर आपोशान¹ (आचमन) क्रिया (सम्पन्न) करे॥ ३-५॥ |
| स्वाहाप्रणवसंयुक्तां प्राणायाद्याहुतिं ततः।<br>अपनाय ततो हुत्वा व्यानाय तदनन्तरम्॥ ६॥<br><br>उदानाय ततः कुर्यात् समानायेति पञ्चमीम्।<br>विज्ञाय तत्त्वमेतेषां जुहुयादात्मनि द्विजः॥ ७॥ | तदनन्तर स्वाहा एवं प्रणवके साथ 'प्राणाय' का उच्चारण कर (ॐ प्राणाय स्वाहा) कहकर पहली आहुति देनी चाहिये। तदुपरान्त 'ॐ अपानाय स्वाहा' और फिर 'ॐ व्यानाय स्वाहा', पुनः 'ॐ उदानाय स्वाहा' और अन्तमें 'ॐ समानाय स्वाहा' कहकर पाँचवीं आहुति देनी चाहिये। इनका रहस्य समझते हुए द्विजको आत्मामें आहुति देनी चाहिये²॥ ६-७॥ |
१-भोजनके आरम्भ एवं अन्तमें आपोशान (आचमन) करके अन्नको अनग्र एवं अमृत किया जाता है।
२-आत्मामें आहुति देनेकी भावनासे भोजनके प्रारम्भमें छोटे-छोटे पाँच ग्रास मुखमें 'प्राणाय स्वाहा' आदि पाँच मन्त्रोंसे देना चाहिये।
| * अध्याय १९ * | ३४९ |
|---|
| शेषमन्नं यथाकामं भुञ्जीतव्यं जनैर्युतम्।<br>ध्यात्वा तन्मनसा देवमात्मानं वै प्रजापतिम्॥ ८॥<br><br>अमृतापिधानमसीत्युपरिष्टादपः पिबेत्।<br>आचान्तः पुनराचामेदायं गौरिति मन्त्रतः॥ ९॥<br><br>द्रुपदां वा त्रिरावर्त्य सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>प्राणानां ग्रन्थिरसीत्यालभेद हृदयं ततः॥ १०॥<br>आचम्याङ्गुष्ठमात्रेति पादाङ्गुष्ठेऽथ दक्षिणे।<br>निःस्रावयेद् हस्तजलमूर्ध्वहस्तः समाहितः॥ ११॥<br><br>हुतानुमन्त्रणं कुर्यात् श्रद्धायामिति मन्त्रतः।<br>अथाक्षरेण स्वात्मानं योजयेद् ब्रह्मणोति हि॥ १२॥<br><br>सर्वेषामेव यागानामात्मयागः परः स्मृतः।<br>योऽनेन विधिना कुर्यात् स याति ब्रह्मणः क्षयम्॥ १३॥<br>यज्ञोपवीती भुञ्जीत स्रग्गन्धालङ्कृतः शुचिः।<br>सायंप्रातर्नान्तरा वै संध्यायां तु विशेषतः॥ १४॥<br><br>नाद्यात् सूर्यग्रहात् पूर्वमह्नि सायं शशिग्रहात्।<br>ग्रहकाले च नाश्नीयात् स्नात्वाश्नीयात् तु मुक्तयोः॥ १५॥<br><br>मुक्ते शशिनि भुञ्जीत यदि न स्यान्महानिशा।<br>अमुक्तयोरस्तंगतयोर्दृष्ट्वा दृष्ट्वा परेऽहनि॥ १६॥<br>नाश्नीयात् प्रेक्षमाणानामप्रदायैव दुर्मतिः।<br>न यज्ञशिष्टादन्यद् वा न क्रुद्धो नान्यमानसः॥ १७॥<br><br>आत्मार्थं भोजनं यस्य रत्यर्थं यस्य मैथुनम्।<br>वृत्त्यर्थं यस्य चाधीतं निष्फलं तस्य जीवितम्॥ १८॥ | फिर देव प्रजापति तथा आत्माका मनसे ध्यान करते हुए अवशिष्ट अन्न (भोजन)-का बन्धुओंके साथ इच्छानुसार भोजन करना चाहिये। (भोजन कर लेनेके बाद) 'अमृतापिधानमसि' यह मन्त्र पढ़कर जल पीना (आचमन करना) चाहिये। आचमनके उपरान्त पुनः 'आयं गौः*०' इस मन्त्रको पढ़ते हुए आचमन करना चाहिये। तदनन्तर सभी प्रकारके पापोंका नाश करनेवाली 'द्रुपदा०' का तीन बार पाठकर 'प्राणानां ग्रन्थिरसि' इस मन्त्रसे हृदयका स्पर्श करे॥ ८-१०॥<br><br>ऊपर हाथ किये हुए समाहितमन होकर आचमन करके 'अङ्गुष्ठमात्रेति' मन्त्रद्वारा दाहिने पैरके अँगुठेपर हाथका जल गिराना चाहिये। 'श्रद्धायाम्०' इस मन्त्रसे हुतानुमन्त्रण करे। तदनन्तर 'ब्रह्मण०' इस मन्त्रसे अपनी आत्माका अक्षर-तत्त्वसे योग करना चाहिये। सभी यागोंमें आत्मयाग श्रेष्ठ कहा गया है। जो इस विधिसे (आत्मयाग) करता है, वह ब्रह्मधाममें जाता है॥ ११-१३॥<br><br>यज्ञोपवीती होकर अर्थात् सव्य होकर तथा माला (एवं चन्दनकी) सुगन्धिसे अलंकृत होकर पवित्रतापूर्वक भोजन करना चाहिये। सायंकाल, प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और विशेषरूपसे संध्याकाल (प्रदोषकाल)-के समय भोजन नहीं करना चाहिये। सूर्यग्रहणसे पहले दिनमें, चन्द्रग्रहणसे पूर्व सायंकालमें तथा ग्रहणकालमें भोजन नहीं करना चाहिये। ग्रहणकी मुक्ति हो जानेपर स्नान करनेके अनन्तर भोजन करना चाहिये। चन्द्रमाके ग्रहणसे मुक्त हो जानेपर यदि अर्धरात्रि न हो तो भोजन करना चाहिये। बिना ग्रहणसे मुक्त हुए चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके अस्त हो जानेपर दूसरे दिन उनका दर्शन करके भोजन करना चाहिये॥ १४-१६॥<br><br>देखनेवालों (भूखे व्यक्तियों)-को बिना दिये हुए तथा दुर्मना होकर भोजन नहीं करना चाहिये। यज्ञसे अवशिष्ट अन्नसे भिन्न अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। अन्यमनस्क होकर तथा क्रुद्ध होकर भोजन नहीं करना चाहिये। जो केवल अपने लिये ही भोजन बनाता है, जो केवल कामसुखके लिये ही मैथुन करता है और जो केवल आजीविका प्राप्त हो जाय-इस उद्देश्यसे अध्ययन करता है, उसका जीवन निष्फल ही है॥ १७-१८॥ |
- आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदनू मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः। (यजु० ३। ६)
३५० * कूर्मपुराण *
| यदभुङ्क्ते वेष्टितशिरा यच्च भुङ्क्ते उदङ्मुखः।<br>सोपानत्कश्च यद् भुङ्क्ते सर्वं विद्यात् तदासुरम्॥ १९॥ | जो सिर ढककर भोजन करता है, उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करता है और जूता पहनकर भोजन करता है, उसके इस प्रकार किये गये भोजनको आसुरी भोजन समझना चाहिये। ठीक अर्धरात्रि, ठीक मध्याह्न, अजीर्ण होनेपर, गीले वस्त्र धारणकर, दूसरेके लिये निर्दिष्ट आसनपर, सोते हुए, खड़े होकर, टूटे-फूटे पात्रमें, भूमिपर तथा हाथपर भोजन नहीं करना चाहिये। जूठे होकर न तो घृत ग्रहण करे और न सिरका ही स्पर्श करे॥ १९-२१॥ |
| नार्धरात्रे न मध्याह्ने नाजीर्णे नार्द्रवस्त्रधृक्।<br>न च भिन्नासनगतो न शयानः स्थितोऽपि वा॥ २०॥ | |
| न भिन्नभाजने चैव न भूम्यां न च पाणिषु।<br>नोच्छिष्टो घृतमादद्यान्न मूर्धानं स्पृशेदपि॥ २१॥ | |
| न ब्रह्म कीर्तयन् वापि न निःशेषं न भार्यया।<br>नान्धकारे न चाकाशे न च देवालयादिषु॥ २२॥ | (भोजन करते हुए) वेदका उच्चारण नहीं करना चाहिये और बिना कुछ* भोजन छोड़े ही अर्थात् पूर्ण भोजन न करे तथा भार्याके साथ भी भोजन न करे। न अन्धकारमें, न आकाशके नीचे (शून्य स्थानमें), न देवमन्दिरोंमें ही भोजन करे। एक वस्त्र पहनकर, सवारी या शय्यापर बैठकर भोजन नहीं करना चाहिये। बिना खड़ाऊँ उतारे और हँसते हुए तथा रोते हुए भी भोजन नहीं करना चाहिये॥ २२-२३॥ |
| नैकवस्त्रस्तु भुञ्जीत न यानशयनस्थितः।<br>न पादुकानिर्गतोऽथ न हसन् विलपन्नपि॥ २३॥ | |
| भुक्त्वैवं सुखमास्थाय तदन्नं परिणामयेत्।<br>इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थानुपबृंहयेत्॥ २४॥ | इस प्रकार भोजन करके सुखपूर्वक बैठकर उस अन्नको पचाना चाहिये और इतिहास तथा पुराणोंके द्वारा वेदके रहस्योंको विस्तारपूर्वक समझना चाहिये। तदनन्तर द्विजको पूर्वमें बतलायी गयी विधिके अनुसार संध्योपासना करनी चाहिये। पश्चिमकी ओर मुख करते हुए आसनपर बैठकर गायत्री देवीका जप करना चाहिये। जो व्यक्ति पूर्वकी अर्थात् प्रातःकालकी और पश्चिमकी अर्थात् सायंकालकी संध्या नहीं करता है, वह सभी धर्मोंसे रहित होता हुआ लोकमें शूद्रके समान होता है॥ २४-२६॥ |
| ततः संध्यामुपासीत पूर्वोक्तविधिना द्विजः।<br>आसीनस्तु जपेद् देवीं गायत्रीं पश्चिमां प्रति॥ २५॥ | |
| न तिष्ठति तु यः पूर्वा नास्ते संध्यां तु पश्चिमाम्।<br>स शूद्रेण समो लोके सर्वधर्मविवर्जितः॥ २६॥ | |
| हुत्वाग्निं विधिवन्मन्त्रैर्भुक्त्वा यज्ञावशिष्टकम्।<br>सभृत्यबान्धवजनः स्वपेच्छुष्कपदो निशि॥ २७॥ | मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके यज्ञसे बचे अन्नको बन्धु-बान्धव तथा भृत्यजनोंके साथ ग्रहणकर रात्रिमें सूखे पैर होकर (अर्थात् गीला पैर न रहे) शयन करना चाहिये। न तो उत्तरकी ओर सिर करके और न पश्चिमकी ओर सिर करके सोना चाहिये। खुले आकाशके नीचे (अथवा शून्य स्थानमें), नग्न होकर, अपवित्र अवस्थामें और बैठनेके आसनपर कभी नहीं सोना चाहिये॥ २७-२८॥ |
| नोत्तराभिमुखः स्वप्यात् पश्चिमाभिमुखो न च।<br>न चाकाशे न नग्नो वा नाशुचिर्नासने क्वचित्॥ २८॥ |
* गृहस्थको भोज्य पदार्थ यथायोग्य अवशिष्ट रखकर भोजन करना चाहिये। इसका आशय यह है कि भोजन कर लेनेके अनन्तर यदि कोई ऐसा व्यक्ति आ जाय, जिसे स्वयं भोजन कर लेनेके बाद भी उसकी अपेक्षाके अनुसार भोजन कराया जा सके, जिससे भोज्य पदार्थके अभावमें वह भूखा न रह जाय।
- अध्याय २० * । ३५१
| न शीर्णायां तु खट्वायाँ शून्यागारे न चैव हि।<br>नानुवंशं न पालाशे शयनं वा कदाचन ॥ २९॥<br>इत्येतदखिलेनोक्तमहन्यहनि वै मया।<br>ब्राह्मणानां कृत्यजातमपवर्गफलप्रदम् ॥ ३०॥<br><br>नास्तिक्यादथवालस्यात् ब्राह्मणो न करोति यः।<br>स याति नरकान् घोरान् काकयोनौ च जायते ॥ ३१॥<br><br>नान्यो विमुक्तये पन्था मुक्त्वाश्रमविधिं स्वकम्।<br>तस्मात् कर्माणि कुर्वीत तुष्टये परमेष्ठिनः ॥ ३२॥ | टूटी-फूटी चारपाईपर, सूनसान घरमें तथा बाँस या पलाससे बनी खाटपर कभी नहीं सोना चाहिये। इस प्रकार मैंने ब्राह्मणों (द्विजों)-के मोक्षदायक प्रतिदिन किये जानेवाले सम्पूर्ण कृत्यों (दैनिक कर्मों)-का पूर्णरूपसे वर्णन किया। जो ब्राह्मण (द्विज) नास्तिकता अथवा आलस्यके कारण इन कर्मोंको नहीं करता, वह घोर नरकोंमें जाता है और काकयोनिमें जन्म लेता है। अपने आश्रमकी विधिको छोड़कर अन्य कोई दूसरा मुक्तिका मार्ग नहीं है। इसलिये परमेष्ठी (परब्रह्म)-की प्रसन्नताके लिये (विहित) कर्मोंको करना चाहिये॥ २९-३२॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय
श्राद्ध-प्रकरण—श्राद्धके प्रशस्त दिन, विभिन्न तिथियों, नक्षत्रों और वारोंमें किये जानेवाले श्राद्धोंका विभिन्न फल, श्राद्धके आठ भेद, श्राद्धके लिये प्रशस्त स्थान, श्राद्धमें विहित तथा निषिद्ध पदार्थ
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| अथ श्राद्धममावास्यां प्राप्य कार्यं द्विजोत्तमैः।<br>पिण्डान्वाहार्यकं भक्त्या भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १॥<br><br>पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं क्षीणे राजनि शस्यते।<br>अपराह्ने द्विजातीनां प्रशस्तेनामिषेण च॥ २॥<br><br>प्रतिपत्प्रभृति ह्यन्यास्तिथयः कृष्णपक्षके।<br>चतुर्दशीं वर्जयित्वा प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तराः॥ ३॥<br><br>अमावास्याष्टकास्तिस्रः पौषमासादिषु त्रिषु।<br>तिस्रश्चान्वष्टकाः पुण्या माघी पञ्चदशी तथा॥ ४॥<br><br>त्रयोदशी मघायुक्ता वर्षासु तु विशेषतः।<br>शस्यपाकश्चाद्धकाला नित्याः प्रोक्ता दिने दिने॥ ५॥ | द्विजोत्तमोंको अमावास्या आनेपर भक्तिपूर्वक भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाला पिण्डान्वाहार्यक* नामक श्राद्ध करना चाहिये। चन्द्रमाके क्षीण होनेपर अर्थात् अमावास्या तिथिके अपराह्न-कालमें द्विजातियोंके लिये पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करना प्रशस्त होता है॥ १-२॥<br><br>कृष्णपक्षमें चतुर्दशीको छोड़कर प्रतिपदादि अन्य तिथियाँ उत्तरोत्तर प्रशस्त हैं। पौष, माघ तथा फाल्गुन मासकी तीनों अष्टकाएँ (तीनों कृष्णाष्टमी) और अमावास्या, तीनों अन्वष्टकाएँ (नवमी) और माघ मासकी पूर्णिमा तिथि (श्राद्धके लिये) पुण्य तिथियाँ हैं। वर्षा-ऋतुमें मघा नक्षत्रयुक्त त्रयोदशी तिथि और फसलके पकनेका समय विशेषरूपसे श्राद्ध करनेका काल होता है। ये सभी श्राद्ध नित्य और प्रतिदिन किये जानेवाले नित्यश्राद्ध हैं॥ ३-५॥ |
* मनुस्मृति (३। १२२)-के अनुसार पिण्डान्वाहार्यक एक स्वतन्त्र श्राद्ध है। इसे अग्निहोत्री लोग ही कर सकते हैं। यह पिण्ड पितृयज्ञके बाद किया जाता है, इसलिये इसका नाम पिण्डान्वाहार्यक है। यह प्रतिमास किया जाता है। यह नित्यश्राद्ध है।
| ३५२ | * कूर्मपुराण * |
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| नैमित्तिकं तु कर्तव्यं ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः।<br>बान्धवानां च मरणे नारकी स्यादतोऽन्यथा॥ ६ ॥ | चन्द्र और सूर्यके ग्रहणकाल तथा बान्धवोंके मरनेपर नैमित्तिक श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा न करनेपर नारकीय गति प्राप्त होती है। ग्रहण आदिके समय किये गये काम्य श्राद्ध प्रशस्त माने गये हैं। उत्तरायण एवं दक्षिणायनके समय, विषुव तथा व्यतीपात योगमें किया हुआ श्राद्ध भी अनन्त फल देनेवाला होता है। संक्रान्ति तथा जन्मके समय किया गया श्राद्ध अक्षय होता है। सभी नक्षत्रोंमें विशेषरूपसे काम्य श्राद्ध करना चाहिये॥ ६-८॥ |
| काम्यानि चैव श्राद्धानि शस्यन्ते ग्रहणादिषु।<br>अयने विषुवे चैव व्यतीपातेऽप्यनन्तकम्॥ ७ ॥ | |
| संक्रान्त्यामक्षयं श्राद्धं तथा जन्मदिनेष्वपि।<br>नक्षत्रेषु च सर्वेषु कार्यं काम्यं विशेषतः॥ ८ ॥ | |
| स्वर्गं च लभते कृत्वा कृत्तिकासु द्विजोत्तमः।<br>अपत्यमथ रोहिण्यां सौम्ये तु ब्रह्मवर्चसम्॥ ९ ॥ | श्रेष्ठ द्विज कृत्तिका नक्षत्रमें श्राद्ध कर स्वर्ग प्राप्त करता है। रोहिणीमें श्राद्ध करनेसे संतान और मृगशिरा नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे ब्रह्मतेजकी प्राप्ति होती है। आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे रौद्र कर्मोंकी सिद्धि तथा शौर्यकी प्राप्ति होती है। पुनर्वसु नक्षत्रमें भूमि और पुष्य नक्षत्रमें लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। आश्लेषा नक्षत्रमें (श्राद्ध करनेसे) सभी कामनाओं और मघा नक्षत्रमें सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार उत्तराफाल्गुनीमें धनकी प्राप्ति होती है और पूर्वाफाल्गुनीमें पापका नाश होता है। हस्त नक्षत्रमें किये गये श्राद्धसे अपनी जातिमें श्रेष्ठता और चित्रा नक्षत्रमें बहुतसे पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। स्वातीमें व्यापारकी सिद्धि और विशाखामें सुवर्णकी प्राप्ति होती है। अनुराधामें श्राद्ध करनेसे बहुतसे मित्रोंकी तथा ज्येष्ठामें राज्यकी प्राप्ति होती है। मूल नक्षत्रमें कृषि तथा पूर्वाषाढ़ामें समुद्रतककी सफल यात्रा होती है। उत्तराषाढ़ामें सभी कामनाओंकी सिद्धि और श्रवण नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे श्रेष्ठता प्राप्त होती है। धनिष्ठामें सभी कामनाओं और शतभिषामें परम बलकी प्राप्ति होती है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे कुप्य अर्थात् सोना-चाँदीसे भिन्न धातुएँ और उत्तराभाद्रपदमें शुभ गृह प्राप्त होता है। रेवती नक्षत्रमें किये गये श्राद्धसे बहुत-सी गौएँ और अश्विनीमें श्राद्ध करनेसे घोड़ोंकी प्राप्ति होती है। भरणी नक्षत्रमें यदि श्राद्ध किया जाय तो आयुकी प्राप्ति होती है॥ ९-१५॥ |
| रौद्राणां कर्मणां सिद्धिमाद्र्रायां शौर्यमेव च।<br>पुनर्वसौ तथा भूमिं श्रियं पुष्ये तथैव च॥ १० ॥ | |
| सर्वान् कामांस्तथा सार्पे पित्र्ये सौभाग्यमेव च।<br>अर्यम्णे तु धनं विन्द्यात् फाल्गुन्यां पापनाशनम्॥ ११ ॥ | |
| ज्ञातिश्रैष्ठ्यं तथा हस्ते चित्रायां च बहून् सुतान्।<br>वाणिज्यसिद्धिं स्वातौ तु विशाखासु सुवर्णकम्॥ १२ ॥ | |
| मैत्रे बहूनि मित्राणि राज्यं शाक्रे तथैव च।<br>मूले कृषिं लभेद यानसिद्धिमाप्ये समुद्रतः॥ १३ ॥ | |
| सर्वान् कामान् वैश्वदेवे श्रेष्ठ्यं तु श्रवणे पुनः।<br>श्रविष्ठायां तथा कामान् वारुणे च परं बलम्॥ १४ ॥ | |
| अजैकपादे कुप्यं स्यादहिर्बुध्न्ये गृहं शुभम्।<br>रेवत्यां बहवो गावो ह्याश्विन्यां तुरगांस्तथा।<br>याम्येऽथ जीवनं तत् स्याद्यदि श्राद्धं प्रयच्छति॥ १५ ॥ | |
| आदित्यवारे त्वारोग्यं चन्द्रे सौभाग्यमेव च।<br>भौमे सर्वत्र विजयं सर्वान् कामान् बुधस्य तु॥ १६ ॥ | रविवारको (श्राद्ध करनेसे) आरोग्य, सोमवारको सौभाग्य, मंगलवारको सर्वत्र विजय और बुधवारको श्राद्धसे सभी कामनाओंकी सिद्धि होती है। बृहस्पतिवारके दिन श्राद्धसे अभीष्ट विद्या, शुक्रवारके दिन श्राद्धसे धन और शनैश्चरको (श्राद्ध करनेसे) आयु प्राप्त होती है। |
| विद्यामभीष्टां जीवे तु धनं वै भार्गवे पुनः।<br>शनैश्चरे लभेदायूः प्रतिपत्सु सुतान् शुभान्॥ १७ ॥ |
| * अध्याय २० * | ३५३ |
|---|---|
| कन्यकां वै द्वितीयायां तृतीयायां तु वन्दिनः।<br>पशून् क्षुद्रांश्चतुर्थ्यां तु पञ्चम्यां शोभनान् सुतान्॥ १८ ॥<br><br>षष्ठ्यां द्यूतं कृषिं चापि सप्तम्यां लभते नरः।<br>अष्टम्यामपि वाणिज्यं लभते श्राद्धदः सदा॥ १९ ॥<br><br>स्यान्नवम्यामेकखुरं दशम्यां द्विखुरं बहु।<br>एकादश्यां तथा रूप्यं ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्॥ २० ॥<br><br>द्वादश्यां जातरूपं च रजतं कुप्यमेव च।<br>ज्ञातिश्रैष्ठ्यं त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां तु कुप्रजाः।<br>पञ्चदश्यां सर्वकामानाप्नोति श्राद्धदः सदा॥ २१ ॥<br>तस्माच्छ्राद्धं न कर्तव्यं चतुर्दश्यां द्विजातिभिः।<br>शस्त्रेण तु हतानां वै तत्र श्राद्धं प्रकल्पयेत्॥ २२ ॥<br><br>द्रव्यब्राह्मणसम्पत्तौ न कालनियमः कृतः।<br>तस्माद् भोगापवर्गार्थं श्राद्धं कुर्युर्द्विजातयः॥ २३ ॥<br>कर्मारम्भेषु सर्वेषु कुर्यादाभ्युदयं पुनः।<br>पुत्रजन्मादिषु श्राद्धं पार्वणं पर्वणि स्मृतम्॥ २४ ॥<br><br>अहन्यहनि नित्यं स्यात् काम्यं नैमित्तिकं पुनः।<br>एकोद्दिष्टादि विज्ञेयं वृद्धिश्राद्धं तु पार्वणम्॥ २५ ॥<br><br>एतत् पञ्चविधं श्राद्धं मनुना परिकीर्तितम्।<br>यात्रायां षष्ठमाख्यातं तत्प्रयत्नेन पालयेत्॥ २६ ॥<br><br>शुद्धये सप्तमं श्राद्धं ब्रह्मणा परिभाषितम्।<br>दैविकं चाष्टमं श्राद्धं यत्कृत्वा मुच्यते भयात्॥ २७ ॥<br><br>संध्यारात्र्योर्न कर्तव्यं राहोरन्यत्र दर्शनात्।<br>देशानां च विशेषेण भवेत् पुण्यमनन्तकम्॥ २८ ॥ | प्रतिपदा तिथिको (श्राद्ध करनेसे) शुभ पुत्र प्राप्त होते हैं। द्वितीयामें श्राद्धसे कन्या, तृतीयामें वन्दीजनों, चतुर्थीमें क्षुद्र पशु और पञ्चमीको श्राद्ध करनेसे सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। षष्ठीमें श्राद्ध करनेसे द्यूत (-में विजय) और सप्तमीमें श्राद्धसे कृषिकी प्राप्ति होती है। अष्टमीको श्राद्ध करनेवाला सदा वाणिज्य (-में लाभ) प्राप्त करता है। नवमीमें श्राद्धसे एक खुरवाले और दशमीमें श्राद्ध करनेसे दो खुरवाले बहुतसे पशु मिलते हैं। एकादशीको (श्राद्ध करनेसे) रौप्य (रजत) पदार्थ तथा ब्रह्मवर्चस्वी पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। द्वादशीको (श्राद्ध करनेसे) जातरूप (स्वर्ण), चाँदी तथा कुप्य, त्रयोदशीको जातिमें श्रेष्ठता और चतुर्दशीको श्राद्ध करनेसे कुप्रजाकी प्राप्ति होती है। पञ्चदशी (पूर्णिमा एवं अमावास्या)-को श्राद्ध करनेवाला सदा सभी कामनाओंको प्राप्त करता है॥ १६-२१॥<br><br>इसलिये द्विजातियोंको चतुर्दशीके दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिये। शस्त्र (आदि)-द्वारा जो मरे हुए हों, उनका श्राद्ध (इस चतुर्दशी तिथिको) करना चाहिये। द्रव्य एवं ब्राह्मणके उपलब्ध रहनेपर कालसम्बन्धी कोई नियम नहीं बताया गया है (अर्थात् कभी भी श्राद्ध किया जा सकता है)। इसलिये भोग और मोक्षकी प्राप्तिके लिये द्विजातियोंको श्राद्ध (अवश्य) करना चाहिये॥ २२-२३॥<br><br>सभी (शुभ) कर्मोंके प्रारम्भमें तथा पुत्रजन्म आदि समयोंमें आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। पर्वके दिन पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। मनुने प्रतिदिन किये जानेवाले नित्यश्राद्ध, काम्य-श्राद्ध (कामनाविशेषकी सिद्धिके लिये किया जानेवाला श्राद्ध), एकोद्दिष्टादि नैमित्तिक श्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध और पार्वण श्राद्ध—इन पाँच प्रकारके श्राद्धोंका वर्णन किया है। यात्राके समय (किया जानेवाला) छठा श्राद्ध कहा गया है, उसे प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। ब्रह्माने शुद्धिके लिये सातवें श्राद्धका वर्णन किया है। आठवाँ दैविक नामक श्राद्ध है, जिसे करनेसे भयसे मुक्ति हो जाती है। संध्या और रात्रिमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। किंतु राहु और केतुद्वारा सूर्य-चन्द्रके ग्रस्त किये जानेपर रात्रिमें भी श्राद्ध किया जा सकता है। देशविशेषके कारण श्राद्ध अनन्त पुण्य फल देनेवाला होता है॥ २४-२८॥ |
३५४ * कूर्मपुराण *
| गङ्गायामक्षयं श्राद्धं प्रयागेऽमरकण्टके।<br>गायन्ति पितरो गाथां कीर्तयन्ति मनीषिणः ॥ २९ ॥<br><br>एष्टव्या बहवः पुत्राः शीलवन्तो गुणान्विताः।<br>तेषां तु समवेतानां यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ॥ ३० ॥<br><br>गयां प्राप्यानुषङ्गेण यदि श्राद्धं समाचरेत् ।<br>तारिताः पितरस्तेन स याति परमां गतिम् ॥ ३१ ॥ | गङ्गा, प्रयाग तथा अमरकण्टकमें किया गया श्राद्ध अक्षय फल प्रदान करता है। पितर इस गाथाका गान करते हैं और मनीषी ऐसा कीर्तन करते रहते हैं कि 'शीलवान् तथा गुणवान् बहुतसे पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे कोई एक भी किसी प्रसंगवश गया चला जाय और गया पहुँचकर यदि श्राद्ध कर दे तो उसके द्वारा पितर तार दिये जाते हैं (अर्थात् पितरोंको उत्तमोत्तम गति प्राप्त होती है) और वह (श्राद्धकर्ता) परमगतिको प्राप्त करता है'॥ २९-३१॥ |
|---|---|
| वराहपर्वते चैव गङ्गायां वै विशेषतः ।<br>वाराणस्यां विशेषेण यत्र देवः स्वयं हरः ॥ ३२ ॥<br>गङ्गाद्वारे प्रभासे च बिल्वके नीलपर्वते ।<br>कुरुक्षेत्रे च कुब्जाम्रे भृगुतुङ्गे महालये ॥ ३३ ॥<br>केदारे फल्गुतीर्थे च नैमिषारण्य एव च।<br>सरस्वत्यां विशेषेण पुष्करेषु विशेषतः ॥ ३४ ॥<br>नर्मदायां कुशावर्ते श्रीशैले भद्रकर्णके ।<br>वेत्रवत्यां विपाशायां गोदावर्यां विशेषतः ॥ ३५ ॥<br>एवमादिषु चान्येषु तीर्थेषु पुलिनेषु च।<br>नदीनां चैव तीरेषु तुष्यन्ति पितरः सदा ॥ ३६ ॥ | वराह¹ पर्वत, विशेषरूपसे गङ्गा तथा जहाँ स्वयं भगवान् हर निवास करते हैं विशेषतया उस वाराणसी, गङ्गाद्वार (हरिद्वार), प्रभास, बिल्वकतीर्थ, नीलपर्वत, कुरुक्षेत्र, कुब्जाम्रतीर्थ, भृगुतुङ्ग, महालय, केदारपर्वत, फल्गुतीर्थ, नैमिषारण्य, विशेषरूपसे सरस्वती नदी तथा पुष्कर, नर्मदा, कुशावर्त, श्रीशैल, भद्रकर्णक, वेत्रवती, विपाशा तथा विशेषरूपसे गोदावरी नदी आदि स्थानों तथा अन्य तीर्थों, पुलिनों² और नदियोंके तटोंपर किये गये श्राद्धसे पितर सदा संतुष्ट होते हैं॥ ३२-३६॥ |
| व्रीहिभिश्च यवैर्माषैरद्भिर्मूलफलेन वा।<br>श्यामाकैश्च यवैः शाकैर्नीवारैश्च प्रियङ्गुभिः ।<br>गोधूमैश्च तिलैर्मुद्गैर्मासं प्रीणयते पितॄन् ॥ ३७ ॥<br>आम्रान् पानेरतानिक्षून् मृद्वीकांश्च सदाडिमान्।<br>विदार्यांश्च भरण्डांश्च श्राद्धकाले प्रदापयेत् ॥ ३८ ॥<br>लाजान् मधुयुतान् दद्यात् सक्तून् शर्करया सह।<br>दद्याच्छ्राद्धे प्रयत्नेन शृङ्गाटककशेरुकान् ॥ ३९ ॥<br>द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु।<br>औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनेह पञ्च तु ॥ ४० ॥<br>षण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेनाथ सप्त वै।<br>अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवैव तु ॥ ४१ ॥<br>दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः ।<br>शशकूर्मयोर्मांसेन मासानेकादशैव तु ॥ ४२ ॥<br>संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन तु।<br>वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥ ४३ ॥ | व्रीहि, जौ, उड़द, जल, मूल, फल, श्यामाक (सावाँ), यव, शाक, नीवार, प्रियङ्गु, गोधूम, तिल तथा मुद्गद्वारा किये गये श्राद्धसे पितर एक महीनेतक प्रसन्न रहते हैं। आम, पानेरत (पानेण, करमईंद अर्थात् करौंदा या करमर्द), ईख, द्राक्षा (अंगूर), दाडिम, विदारी (भूमिकुष्माण्ड) तथा भरण्ड— इन्हें श्राद्धके समय प्रदान करना चाहिये। मधुयुक्त लाजा, शर्कराके साथ सत्तू, सिंघाड़ा तथा कसेरू—इन्हें श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक देना चाहिये॥ ३७—४३॥ |
१-वराहपर्वतकी चर्चा वह्निपुराणमें तथा महाभारत (२।२१।२)-में है।
२-पुलिन—(नदीके किनारेका वह भाग जहाँसे जल हटा हो (—तोयोत्थितं तत् पुलिनम्)। (अमरकोश)