भारतकोश
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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
३३०* कूर्मपुराण *
स्वप्नमध्ययनं स्नानमुद्वर्त्तं भोजनं गतिम्।<br>उभयोः संध्ययोर्नित्यं मध्याह्ने चैव वर्जयेत्॥ ७१॥<br><br>न स्पृशेत् पाणिनोच्छिष्टो विप्रो गोब्राह्मणानलान्।<br>न चासनं पदा वापि न देवप्रतिमां स्पृशेत्॥ ७२॥<br><br>नाशुद्धोऽग्निं परिचरेन्न देवान् कीर्तयेदृषीन्।<br>नावगाहेदगाधाम्बु धारयेन्नानिमित्ततः॥ ७३॥<br><br>न वामहस्तेनोद्धृत्य पिबेद् वक्त्रेण वा जलम्।<br>नोत्तरेदनुपस्पृश्य नाप्सु रेतः समुत्सृजेत्॥ ७४॥<br><br>अमेध्यलिप्तमन्यद् वा लोहितं वा विषाणि वा।<br>व्यतिक्रामेन्न स्रवन्तीं नाप्सु मैथुनमाचरेत्।<br>चैत्यं वृक्षं न वै छिन्द्यान्नाप्सु ष्ठीवनमाचरेत्॥ ७५॥दोनों संध्या-समयों तथा मध्याह्नकालमें शयन, अध्ययन, स्नान, उबटन लगाना, भोजन तथा गमनका नित्य त्याग करना चाहिये। ब्राह्मणको^१ चाहिये कि वह जूठे मुँह-हाथसे गौ, ब्राह्मण, अग्नि, आसन तथा देव-प्रतिमाका स्पर्श न करे। इसी प्रकार पैरसे भी इनका स्पर्श न करे। अपवित्रताकी स्थितिमें अग्निकी परिचर्या न करे, देवताओं तथा ऋषियों (-के नाम आदि)-का कीर्तन न करे। गहरे जलमें स्नान न करे और बिना कारण (मल-मूत्रादिका वेग) न रोके। बायें हाथसे उठाकर अथवा मुखसे (पशुके समान) जल नहीं पीना चाहिये। बिना आचमन किये उत्तर न दे और जलमें वीर्यका त्याग नहीं करना चाहिये। अपवित्र वस्तुसे लिप्त किसी वस्तु, रक्त (खून), विष तथा वेगवाली नदीका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। जलमें मैथुन नहीं करना चाहिये। अश्वत्थ वृक्षको^२ नहीं काटना चाहिये। जलमें थूकना नहीं चाहिये॥ ७१—७५॥
नास्थिभस्मकपालानि न केशांश्च कण्टकान्।<br>तुषाङ्गारकरीषं वा नाधितिष्ठेत् कदाचन॥ ७६॥<br><br>न चाग्निं लङ्घयेद् धीमान् नोपदध्यादधः क्वचित्।<br>न चैनं पादतः कुर्यान्मुखेन न धमेद् बुधः॥ ७७॥<br><br>न कूपमवरोहेत नावेक्षेताशुचिः क्वचित्।<br>अग्नौ न च क्षिपेदग्निं नाद्भिः प्रशमयेत् तथा॥ ७८॥<br><br>सुहृन्मरणमार्तिं वा न स्वयं श्रावयेत् परान्।<br>अपण्यं कूटपण्यं वा विक्रये न प्रयोजयेत्॥ ७९॥हड्डी, भस्म, कपाल, केश (बाल), कण्टक, भूसी, अंगार और शुष्क गोबरपर कभी भी बैठना नहीं चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अग्निका लंघन नहीं करना चाहिये। अग्निको कभी भी (शय्या, आसन आदिके) नीचे न रखे, न ही पैरकी ओर रखे और न मुखसे ही फूंके। कभी भी कुएँके अंदर न उतरे और न ही अपवित्र अवस्थामें उसे देखे। अग्निमें अग्निको नहीं फेंकना चाहिये और पानीसे इसे बुझाना नहीं चाहिये। मित्रके मरण तथा उसके दुःखको, (अपने दुःखको) स्वयं दूसरोंको न सुनाये। जो विक्रय-योग्य न हो तथा जो पदार्थ छलद्वारा प्राप्त हो उसे विक्रय नहीं करना चाहिये॥ ७६—७९॥
न वह्निं मुखनिःश्वासैर्ज्वलयेन्नाशुचिर्बुधः।<br>पुण्यस्थानोदकस्थाने सीमान्तं वा कृषेन्न तु॥ ८०॥विद्वान्‌को चाहिये कि वह अग्निको मुखके निःश्वाससे प्रज्वलित न करे। अपवित्रताकी स्थितिमें पवित्र तीर्थमें, जलवाले स्थानमें नहीं जाना चाहिये और (ग्राम आदिके) सीमा-समाप्तिकी भूमिको नहीं जोतना चाहिये॥ ८०॥
न भिन्द्यात् पूर्वसमयमभ्युपेतं कदाचन।<br>परस्परं पशून् व्यालान् पक्षिणो नावबोधयेत्॥ ८१॥पहले की गयी प्रतिज्ञा या नियमको कभी भी तोड़ना नहीं चाहिये। पशु, सर्प एवं पक्षियोंको परस्पर लड़ानेके लिये उत्तेजित नहीं करना चाहिये॥ ८१॥

१-सर्वप्रथम होनेसे ब्राह्मणका निर्देश है। यहाँ ब्राह्मणप्रमुख मानवमात्रको लेना चाहिये।
२-चैत्यवृक्ष (अश्वत्थवृक्ष)—चैत्यस्तदाख्यया प्रसिद्धो वृक्षः। अश्वत्थवृक्ष इति रत्नमाला। (शब्दकल्पद्रुम)

  • अध्याय १६ * | ३३१ ---|---
परबाधं न कुर्वीत जलवातातपादिभिः ।<br>कारयित्वा स्वकर्माणि कारून् पश्चान्न वञ्चयेत् ।<br>सायंप्रातर्गृहद्वारान् भिक्षार्थं नावघट्टयेत् ॥ ८२ ॥जल, वायु तथा धूप आदिके द्वारा किसी दूसरेको बाधा नहीं पहुँचानी चाहिये। अपने कार्योंको करवाकर शिल्पियोंको बादमें ठगना नहीं चाहिये। भिक्षाके लिये सायंकाल और प्रातः (दूसरोंके) घरके दरवाजोंको खटखटाना नहीं चाहिये। दूसरोंके द्वारा प्रयुक्त माला<sup></sup>, गन्ध और भार्याके साथ भोजन, विग्रहपूर्वक विवाद एवं कुत्सित दरवाजेसे प्रवेश—इनका त्याग करना चाहिये॥ ८२-८३ ॥
बहिर्माल्यं बहिर्गन्धं भार्यया सह भोजनम् ।<br>विगृह्य वादं कुद्वारप्रवेशं च विवर्जयेत् ॥ ८३ ॥<br>न खादन् ब्राह्मणस्तिष्ठेन्न जल्पेद् वा हसन् बुधः ।<br>स्वमग्निं नैव हस्तेन स्पृशेन्नाप्सु चिरं वसेत् ॥ ८४ ॥बुद्धिमान् ब्राह्मणको<sup></sup> खाते हुए खड़ा नहीं होना चाहिये और न ही हँसते हुए बोलना चाहिये। अपने हाथोंद्वारा अपनी अग्निका स्पर्श नहीं करना चाहिये और देरतक जलमें नहीं रहना चाहिये। अग्निको न पंखेकी हवासे प्रज्वलित करना चाहिये, न सूप (-की हवा)-से और न हाथसे (हिलाकर)। मुखसे (फूँकनीद्वारा) अग्निको प्रज्वलित नहीं करना चाहिये, क्योंकि मुखसे ही अग्नि उत्पन्न हुआ है॥ ८४-८५ ॥
न पक्षकेणोपधमेन्न शूर्पेण न पाणिना ।<br>मुखे नैव धमेदग्निं मुखादग्निरजायत ॥ ८५ ॥<br>परस्त्रियं न भाषेत नायाज्यं याजयेद् द्विजः ।<br>नैकश्चरेत् सभां विप्रः समवायं च वर्जयेत् ॥ ८६ ॥दूसरेकी स्त्रीसे बात नहीं करनी चाहिये और द्विज (ब्राह्मण)-को चाहिये कि जो यज्ञ करने योग्य नहीं है उसका यज्ञ न कराये। विप्रको अकेले सभामें नहीं जाना चाहिये और समूहका त्याग करना चाहिये। बायेंसे देव-मन्दिरमें प्रवेश नहीं करना चाहिये। अर्थात् देवमन्दिरको अपने दाहिने करके प्रवेश करना चाहिये। वस्त्रद्वारा पंखा नहीं झलना चाहिये और देवमन्दिरमें सोना नहीं चाहिये। मार्गमें अकेले नहीं चलना चाहिये और न अधार्मिक व्यक्तियोंके साथ ही कहीं जाना चाहिये। इसी प्रकार व्याधिग्रस्त, शूद्र और पतितोंके साथ भी मार्गमें नहीं जाना चाहिये<sup></sup>। जूता और जल आदिके बिना मार्गमें नहीं चलना चाहिये। न रात्रिमें, न शत्रुके साथ और न बिना कमण्डलुके चलना चाहिये। अग्नि, गौ, ब्राह्मण आदिके बीचमेंसे होते हुए नहीं निकलना चाहिये॥ ८६-८९ ॥
न देवायतनं गच्छेत् कदाचिद् वाप्रदक्षिणम् ।<br>न वीजयेद् वा वस्त्रेण न देवायतने स्वपेत् ॥ ८७ ॥
नैकोऽध्वानं प्रपद्येत नाधार्मिकजनैः सह ।<br>न व्याधिदूषितैर्वापि न शूद्रैः पतितेन वा ॥ ८८ ॥
नोपानद्वर्जितो वाथ जलादिरहितस्तथा ।<br>न रात्रौ नारिणा सार्धं न विना च कमण्डलुम् ।<br>नाग्निगोब्राह्मणादीनामन्तरेण व्रजेत् क्वचित् ॥ ८९ ॥
न वत्सतन्त्रीं विततामतिक्रामेत् क्वचिद् द्विजः ।<br>न निन्देद् योगिनः सिद्धान् व्रतिनो वा यतींस्तथा ॥ ९० ॥द्विज (मानवमात्र)-को चाहिये कि वह कभी भी बछड़ेको दूध पिलाती हुई गाय तथा गायको बाँधनेवाली रस्सी अथवा उसकी पूँछका उल्लंघन न करे। योगियों, सिद्धों, व्रतपरायणों तथा संन्यासियोंकी निन्दा न करे॥ ९० ॥

१-शब्दकल्पद्रुममें यह श्लोक है। वहाँ 'बहिर्माल्‍य' का अर्थ 'कण्ठसे बाहर निकाली हुई माला' किया गया है। इससे अन्यके द्वारा धारित तथा अपने द्वारा भी धारित पुष्पमालाका पुनः धारण निषिद्ध है, यह स्पष्ट होता है।
२-सामान्य स्थितिमें यह निषेध सबके लिये है, ब्राह्मणका उल्लेख प्रमुखताकी दृष्टिसे है।
३-यहाँ घृणाका भाव नहीं है। व्यक्ति एवं समाजके दूरगामी सुपरिणाम (कल्याण)-की दृष्टिसे यह एक सुविचारित व्यवस्था है।

३३२ * कूर्मपुराण *

देवतायतनं प्राज्ञो देवानां चैव सत्रिणाम्।<br>नाक्रामेत् कामतश्छायां ब्राह्मणानां च गोरपि ॥ ९१ ॥<br><br>स्वां तु नाक्रमयेच्छायां पतिताद्यैर्न रोगिभिः।<br>नाङ्गारभस्मकेशादिष्वधितिष्ठेत् कदाचन ॥ ९२ ॥<br><br>वर्जयेन्मार्जनीरेणुं स्नानवस्त्रघटोदकम्।<br>न भक्षयेदभक्ष्याणि नापेयं च पिबेद् द्विजः ॥ ९३ ॥बुद्धिमान् व्यक्तिको देवमन्दिर, देवताओं, यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणों तथा गायकी परछाईंको इच्छापूर्वक लाँघना नहीं चाहिये। पतित आदिसे तथा रोगियोंसे अपनी परछाईंका उल्लंघन नहीं होने देना चाहिये। अंगार, भस्म तथा केश आदिपर कभी भी बैठना नहीं चाहिये। झाड़ूकी धूल, स्नानके वस्त्र तथा (स्नानसे बचे) घड़ेके जलके छींटेसे बचना चाहिये (उसे अपने ऊपर नहीं पड़ने देना चाहिये)। द्विज (मानवमात्र)-को चाहिये कि वह अभक्षणीय पदार्थको खाये नहीं और न ही अपेय पदार्थको पीये ॥ ९१-९३ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ॥


सत्रहवाँ अध्याय

भक्ष्य एवं अभक्ष्य-पदार्थोंका वर्णन

व्यास उवाचव्यासजीने कहा—
नाद्याच्छूद्रस्य विप्रोऽन्नं मोहाद् वा यदि वान्यतः।<br>स शूद्रयोनिं व्रजति यस्तु भुङ्क्ते ह्यनापदि ॥ १ ॥<br><br>षण्मासान् यो द्विजो भुङ्क्ते शूद्रस्यान्नं विगर्हितम्।<br>जीवन्नेव भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते ॥ २ ॥<br><br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्रस्य च मुनीश्वराः।<br>यस्यान्नेनोदरस्थेन मृतस्तद्योनिमाप्नुयात् ॥ ३ ॥<br><br>राजानं नर्तकान्नं च तक्ष्णोऽन्नं चर्मकारिणः।<br>गणान्नं गणिकान्नं च षण्ढान्नं चैव वर्जयेत् ॥ ४ ॥<br><br>चक्रोपजीविरजकतस्करध्वजिनां तथा।<br>गान्धर्वलोहकारान्नं सूतकान्नं च वर्जयेत् ॥ ५ ॥ब्राह्मणको मोहसे अथवा अन्य किसी दूसरे कारणसे शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये। जो अनापत्तिकालमें शूद्रका अन्न भक्षण करता है, वह शूद्रयोनिको प्राप्त होता है। जो द्विज छः महीनेतक लगातार शूद्रका गर्हित अन्न खाता है, वह जीते हुए शूद्र हो जाता है और मृत्युके बाद श्वान-योनिमें जन्म लेता है ॥ १-२ ॥<br><br>हे मुनीश्वरो ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इनमेंसे जिसका अन्न मृत्युके समय जिसके उदरमें रहता है, उसे उसीकी योनि प्राप्त होती है (अर्थात् ब्राह्मणका अन्न उदरमें मृत्युके समय है तो ब्राह्मण-योनि प्राप्त होगी आदि-आदि) ॥ ३ ॥<br><br>राजा, नर्तक, बढ़ई, चर्मकार, गण¹ (सौ ब्राह्मणोंका संघ), गणिका और नपुंसकके अन्नका परित्याग करना चाहिये। चक्रके आधारपर अपनी जीविका चलानेवाला (तैलक—तेली)², धोबी, चोर, ध्वजी³ (मद्यविक्रय-जीवी), गायक, लौहकार और सूतकके अन्नका त्याग करना चाहिये ॥ ४-५ ॥

१-मनुस्मृति (४।२०९)-की कुल्लूकभट्टकी व्याख्याके अनुसार 'गण' का अर्थ 'शतब्राह्मणसंघ' है। शत संख्याको अनेक संख्यापरक मानकर ब्राह्मण-समूहका अन्न परित्याज्य समझना चाहिये।
२-मनुस्मृति (४।८४)-के अनुसार चक्रोपजीवीका अर्थ तैलिक है।
३-मनुस्मृति (४।८४)-के अनुसार ध्वजीका अर्थ मदिराविक्रयके द्वारा जिस जातिके लोग जीविका चलाते हैं, उस जातिके लोग हैं। इन्हें संस्कृतमें 'शौण्डिक' कहते हैं।

  • अध्याय १७ * ३३३

कुलालचित्रकर्मान्नं वार्धुषेः पतितस्य च।<br>पौनर्भवच्छत्रिकयोरभिशस्तस्य चैव हि॥ ६ ॥<br><br>सुवर्णकारशैलूषव्याधबद्धातुरस्य च।<br>चिकित्सकस्य चैवान्नं पुंश्चल्या दण्डिकस्य च॥ ७ ॥<br><br>स्तेननास्तिकयोरन्नं देवतानिन्दकस्य च।<br>सोमविक्रयिणश्चान्नं श्वपाकस्य विशेषतः॥ ८ ॥<br><br>भार्याजितस्य चैवान्नं यस्य चोपपतिर्गृहे।<br>उत्सृष्टस्य कदर्यस्य तथैवोच्छिष्टभोजिनः॥ ९ ॥कुम्भकार, चित्रकार, वार्धुषी¹ (कर्ज देकर सूदसे जीविका चलानेवाले), पतित, विधवाके पुनर्विवाहके अनन्तर अथवा पति-परित्यक्तासे उत्पन्न पुरुष², छत्रिक³ (नापित), अभिशस्त (चोरी, मैथुन आदि आरोपसे ग्रस्त), स्वर्णकार, नट, व्याध, बन्धनप्राप्त, आतुर (रोगी), चिकित्सक, व्यभिचारिणी स्त्री तथा दण्डधर (दण्ड देनेवाले, नियामक—जल्लाद आदि)—का अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये। चोर, नास्तिक, देवनिन्दक, सोमलता-विक्रयी तथा विशेषरूपसे चाण्डालका और स्त्रीके वशीभूत तथा जिसके घरमें उस स्त्रीका उपपति हो, (समाजद्वारा) परित्यक्त, कृपण और जूठा भोजन करनेवालेका अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये॥ ६—९ ॥
अपाङ्क्त्यान्नं च सङ्घान्नं शस्त्राजीवस्य चैव हि।<br>क्लीबसन्न्यासिनोश्चान्नं मत्तोन्मत्तस्य चैव हि।<br>भीतस्य रुदितस्यान्नमवकृष्टं परिक्षुतम्॥ १०॥<br><br>ब्रह्मद्विषः पापरुचेः श्राद्धान्नं सूतकस्य च।<br>वृथापाकस्य चैवान्नं शावान्नं श्वशुरस्य च॥ ११ ॥<br><br>अप्रजानां तु नारीणां भृतकस्य तथैव च।<br>कारुकान्नं विशेषेण शस्त्रविक्रयिणस्तथा॥ १२ ॥पंक्तिसे बहिष्कृत, समूहके आश्रित, शस्त्रसे आजीविका चलानेवाला, क्लीब (नपुंसक), संन्यासी, मत्त, उन्मत्त, भयभीत, रोते हुए व्यक्तिके तथा अभिशप्त एवं छींकसे अशुद्ध अन्नको ग्रहण नहीं करना चाहिये। ब्राह्मणसे द्वेष करनेवालों, पापबुद्धि, श्राद्ध तथा अशौचसम्बन्धी अन्न, निष्प्रयोजन बने हुए भोजन (ईश्वर-समर्पणबुद्धिसे न बना हुआ), शव-सम्बन्धी तथा ससुरका⁴ अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये। बिना संतानवाली स्त्री, भृत्य, शिल्पी (कारीगर⁵) तथा शस्त्रविक्रयीका अन्न विशेष-रूपसे त्याग करना चाहिये॥ १०—१२ ॥
शौण्डान्नं घाटिकान्नं च भिषजामन्नमेव च।<br>विद्धप्रजननस्यान्नं परिवित्त्यन्नमेव च॥ १३॥<br><br>पुनर्भुवो विशेषेण तथैव दिधिषूपतेः।<br>अवज्ञातं चावधूतं सरोषं विस्मयान्वितम्।<br>गुरोरपि न भोक्तव्यमन्नं संस्कारवर्जितम्॥ १४॥शौण्ड (मद्य बनानेवाले जातिविशेषके लोग), स्तुति करनेवाले 'भाट'-जातिके लोगों, भिषक् (जिससे रोग भयभीत हो), विद्धलिंगी और ज्येष्ठ भाईके अविवाहित रहनेपर विवाह कर लेनेवाले छोटे भाईका अन्न भी ग्रहण नहीं करना चाहिये। दो बार विवाह करनेवाली स्त्री⁶ तथा ऐसी स्त्रीके पतिका अन्न विशेषरूपसे त्याज्य है। अनादरपूर्वक दिया गया, तिरस्कारपूर्वक दिया गया, रोष एवं अभिमानपूर्वक दिया हुआ अन्न, इसी प्रकार गुरुके संस्कारहीन अन्नको ग्रहण नहीं करना चाहिये॥ १३—१४॥

१-अमरकोष (२।९।५)-के अनुसार।
२-मनुस्मृति (९।१७५)-के अनुसार।
३-शब्दकल्पद्रुमके अनुसार।
४-आलसी या प्रमादी होकर श्वशुरगृहमें स्थायीरूपसे रहनेके साथ वहाँका अन्न ग्रहण करना निषिद्ध है।
५-बढ़ई, जुलाहा, नाई, धोबी और चर्मकार—इन पाँचको 'कारु' या 'शिल्पी' कहा जाता है।
६-मूलमें 'पुनर्भू' शब्द है। इसका पर्याय 'दिधिषू' है। ये दोनों शब्द स्त्रीलिङ्ग हैं। इनका अर्थ दो बार विवाह करनेवाली स्त्री है (शब्दकल्पद्रुम, अमरकोश)।

३३४* कूर्मपुराण *
दुष्कृतं हि मनुष्यस्य सर्वमन्ने व्यवस्थितम्।<br>यो यस्यान्नं समश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम्॥ १५॥<br><br>आर्द्धिकः कुलमित्रञ्च स्वगोपालश्च नापितः।<br>एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत्॥ १६॥<br><br>कुशीलवः कुम्भकारः क्षेत्रकर्मक एव च।<br>एते शूद्रेषु भोज्यान्ना दत्त्वा स्वल्पं पणं बुधैः॥ १७॥<br><br>पायसं स्नेहपक्वं यद् गोरसं चैव सक्तवः।<br>पिण्याकं चैव तैलं च शूद्राद् ग्राह्यं द्विजातिभिः॥ १८॥<br><br>वृन्ताकं नालिकाशाकं कुसुम्भाश्मन्तकं तथा।<br>पलाण्डुं लशुनं शुक्तं निर्यासं चैव वर्जयेत्॥ १९॥<br><br>छत्राकं विड्वराहं च शेलुं पेयूषमेव च।<br>विलयं सुमुखं चैव कवकानि च वर्जयेत्॥ २०॥<br><br>गृञ्जनं किंशुकं चैव ककुभाण्डं तथैव च।<br>उदुम्बरमलाबुं च जग्ध्वा पतति वै द्विजः॥ २१॥मनुष्यका किया हुआ सारा पाप अन्नमें स्थित रहता है। इसलिये जो जिसका अन्न ग्रहण करता है, वह उसके पापका ही भक्षण करता है॥ १५॥<br>आर्द्धिक (जो शूद्र द्विजातिके घर हल जोतकर उसके पारिश्रमिक-रूपमें अन्न प्राप्त करता है), कुलमित्र (पिता-पितामहकी परम्परासे जो द्विजातिके घर रहता आया है तथा अभिन्न सहयोगी है), जो अपने गौओंका पालन करनेवाला है, नापित तथा जिस शूद्रने मन, वाणी और कर्मसे सर्वथा स्वयंको 'मैं आपका ही हूँ'-इस रूपमें समर्पित कर दिया है—ऐसे शूद्रका अन्न ग्रहण किया जा सकता है। बुद्धिमान् व्यक्तिको शूद्रोंमें नाटक आदिसे जीविका चलानेवालों (चारण, कत्थक), कुम्हार और खेतमें काम करनेवालोंका अन्न थोड़ा मूल्य देकर ग्रहण करना चाहिये। द्विजातियोंद्वारा दूधका^१ विकार—मक्खन-खोआ आदि, घृतमें पके पदार्थ, गोरस (दूध), सत्तू, पिण्याक (खली, शिलाजीत, केसर, हींग इत्यादि) तथा तेल—ये पदार्थ शूद्रोंसे ग्रहण किये जा सकते हैं॥ १६-१८॥<br>बैगन, नालिकासाग^२, कुसुम्भ (पुष्पविशेष), अश्मन्तक^३, प्याज, लहसुन, शुक्त^४ और वृक्षके गोंदका परित्याग करना चाहिये। छत्राक, विड्वराह (ग्राम्य-सूकर), शेलु^५ (वनमेथी), पेयूष^६, विलय, सुमुख^७, कवक, (कुकुरमुत्ता), किंशुक (पलाश), ककुभाण्ड, उदुम्बर (गूलर) तथा अलाबु (वर्तुलाकार—गोल लौकी)—का भक्षण करनेसे द्विज पतित हो जाता है॥ १९-२१॥

१-मूलमें 'पायस' शब्द है। इसका अर्थ खीर नहीं करना चाहिये। शब्दकल्पद्रुममें उद्धृत तिथितत्त्वके वराहपुराणीय वचनके अनुसार यहाँ पायसका अर्थ दुग्धविकार ही है।
२-'नालिकाशाक' मूलमें पठित है। सुश्रुत (१।४६)-में इसकी चर्चा है। ग्राम्य भाषामें इसे 'भँसीड़' कहते हैं। यह तालाबमें होता है। इसमें पत्ते नहीं होते हैं। मात्र डंठल होता है। डंठलके भीतर छिद्र होते हैं। आप्तपरम्परामें इसका भक्षण निषिद्ध माना जाता है।
३-अश्मन्तक—तृणविशेष 'अम्लकुचाई' लोकभाषा। पर्याय 'अम्लोटक' (रत्नमाला) इसके गुण राजनिर्घण्टमें वर्णित हैं। (शब्दकल्पद्रुम)
४-'शुक्त' उसे कहते हैं जो स्वभावतः मधुर हो तथा कालवश (समयानुसार) खट्टी हो जाय। जैसे काँजी (प्रायश्चित्तविवेक)। मनुस्मृति (२। १७७)-के अनुसार भी जो स्वभावतः मधुर हो, पर समयवश जल आदिमें रखनेसे अम्ल (खट्टी) हो जाय वह शुक्त है। किंतु शुक्तके रूपमें दही और दहीसे बननेवाले मट्ठा आदि पदार्थ भक्ष्य हैं।
५-शेलु—श्लेष्मातक (लोकभाषा—लिसोढ़ा) अमरकोश।
६-पेयूष—नवप्रसूता गौका अग्निसंयोगसे कठिन किया गया दूध (फेनुप, इतर लोकभाषामें) यह भैंस-बकरीका भी निषिद्ध है।
७-सुमुख—शाकविशेष। इसका पर्याय—वनवर्बरिका, वर्बर है। (राजनिर्घण्ट) (शब्दकल्पद्रुम)।

  • अध्याय १७ * ३३५

वृथा कृशरसंयावं पायसापूपमेव च।<br>अनुपाकृतमांसं च देवान्नानि हवींषि च॥ २२॥<br><br>यवागूं मातुलिङ्गं च मत्स्यान्प्यनुपाकृतान्।<br>नीपं कपित्थं प्लक्षं च प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥ २३॥<br><br>पिण्याकं चोद्धृतस्नेहं देवधान्यं तथैव च।<br>रात्रौ च तिलसम्बद्धं प्रयत्नेन दधि त्यजेत्॥ २४॥<br><br>नाश्नीयात् पयसा तक्रं न बीजान्युपजीवयेत्।<br>क्रियादुष्टं भावदुष्टमसत्संगं च वर्जयेत्॥ २५॥<br><br>केशकीटावपन्नं च सहृल्लेखं च नित्यशः।<br>श्वाघ्रातं च पुनः सिद्धं चण्डालावेक्षितं तथा॥ २६॥<br><br>उदक्यया च पतितैर्गवा चाघ्रातमेव च।<br>अनर्चितं पर्युषितं पर्यायान्नं च नित्यशः॥ २७॥<br><br>काककुक्कुटसंस्पृष्टं कृमिभिश्चैव संयुतम्।<br>मनुष्यैरप्यवघ्रातं कुष्ठिना स्पृष्टमेव च॥ २८॥<br><br>न रजस्वलया दत्तं न पुंश्चल्या सरोषया।<br>मलवद्वाससा वापि परवासोऽथ वर्जयेत्॥ २९॥<br><br>विवत्सायाश्च गोः क्षीरमौष्ट्रं वानिर्दशं तथा।<br>आविकं सन्धिनीक्षीरमपेयं मनुरब्रवीत्॥ ३०॥<br><br>बलाकं हंसदात्यूहं कलविङ्कं शुकं तथा।<br>कुररं च चकोरं च जालपादं च कोकिलम्॥ ३१॥<br><br>वायसं खञ्जरीटं च श्येनं गृध्रं तथैव च।<br>उलूकं चक्रवाकं च भासं पारावतानपि।<br>कपोतं टिट्टिभं चैव ग्रामकुक्कुटमेव च॥ ३२॥देवताके उद्देश्यसे नहीं केवल अपने लिये पकाये गये कृशरान्न (तिल-चावलके बने पदार्थ), संयाव (लपसी), खीर एवं पुआका तथा देवान्न (देवताके लिये समर्पित अन्न), हवनके योग्य द्रव्य (पुरोडाश आदि), यवागू (जौकी काँजी), मातुलिंग (बिजौरा नींबू), देव-पित्र्यकर्ममें कदम्ब, कपित्थ (कैथ) और प्लक्ष (पर्कटी—पाकड़)-का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये। तेल निकाली हुई खली, देवताका धान्य और रात्रिमें तिल-सम्बन्धी पदार्थ तथा दहीका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। दूधके साथ मट्ठेका सेवन नहीं करना चाहिये। बीजोंके द्वारा जीविकाका निर्वाह नहीं करना चाहिये। कर्मसे दूषित और भावसे दूषित तथा दुर्जनोंसे सम्बन्धका परित्याग करना चाहिये॥ २२—२५॥<br><br>केश (बाल) और कीड़ोंसे युक्त, जिस अन्नको लेकर मनमें विचिकित्सा हो, कुत्तेद्वारा सूँघा हुआ, दुबारा पकाया गया, चाण्डाल, रजस्वला तथा पतितके द्वारा देखा गया और गाय-बैल आदि गोजातिद्वारा सूँघा हुआ, अनादरपूर्वक प्राप्त, बासी तथा पर्यायान्नका<sup></sup> नित्य परित्याग करना चाहिये। कौआ एवं मुर्गासे स्पृष्ट, कृमि-युक्त, मनुष्योंद्वारा सूँघे गये तथा कुष्ठ रोगीसे स्पर्श किये गये अन्नका परित्याग करना चाहिये। रजस्वलासे प्राप्त, क्रोधयुक्त व्यभिचारिणी स्त्रीद्वारा दिया गया और मलिन वस्त्र धारण करनेवाले व्यक्तिके द्वारा (दिये अन्नका) और दूसरेके वस्त्रका परित्याग करना चाहिये। मनुने बताया है कि बछड़े-रहित गौ, ऊँटनी और दस दिनोंके भीतर ब्यायी हुई (गौ इत्यादि)-का दूध तथा भेड़ी एवं गर्भिणी गौका दूध पीने योग्य नहीं है॥ २६—३०॥

१-(क) मूलमें 'पर्यायान्न' शब्द है। इसका अर्थ याज्ञ० स्मृ० आचा० १६८ वें श्लोककी मिताक्षरा व्याख्याके अनुसार वह अन्न है जो अन्यस्वामिक है और अन्यको दिया जाय। जैसे ब्राह्मणस्वामिक अन्नको शूद्र दे, शूद्रस्वामिक अन्नको ब्राह्मण दे। ऐसा अन्न ग्रहण करनेपर चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित्त है।
(ख) एक दूसरे मतके अनुसार एक पंक्तिमें बैठकर भोजन करनेवालोंमें किसी एकके उठकर आचमन कर लेनेके उपरान्त सभी भोजन करनेवालोंके अन्नको 'पर्यायान्न' कहा जाता है।

३३६* कूर्मपुराण *

सिंहव्याघ्रं च मार्जारं श्वानं शूकरमेव च।
शृगालं मर्कटं चैव गर्दभं च न भक्षयेत् ॥ ३३ ॥
न भक्षयेत् सर्वमृगान् पक्षिणोऽन्यान् वनेचरान्।
जलेचरान् स्थलचरान् प्राणिनश्चेति धारणा ॥ ३४ ॥
गोधा कूर्मः शशः श्वाविच्छल्यकश्चेति सत्तमाः ।
भक्ष्याः पञ्चनखा नित्यं मनूराह प्रजापतिः ॥ ३५ ॥
मत्स्यान् सशल्कान् भुञ्जीयान्मांसं रौरवमेव च।
निवेद्य देवताभ्यस्तु ब्राह्मणेभ्यस्तु नान्यथा ॥ ३६ ॥
मयूरं तित्तिरं चैव कपोतं च कपिञ्जलम् ।
वार्धीणसं वकं भक्ष्यं मीनहंसपराजिताः ॥ ३७ ॥
शफरं सिंहतुण्डं च तथा पाठीनरोहितौ ।
मत्स्याश्चैते समुद्दिष्टा भक्षणाय द्विजोत्तमाः ॥ ३८ ॥
प्रोक्षितं भक्षयेदेषां मांसं च द्विजकाम्यया ।
यथाविधि नियुक्तं च प्राणानामपि चात्यये ॥ ३९ ॥
भक्ष्येन्नैव मांसानि शेषभोजी न लिप्यते ।
औषधार्थमशक्तौ वा नियोगाद् यज्ञकारणात् ॥ ४० ॥
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे दैवे वा मांसमुत्सृजेत् ।
यावन्ति पशुरोमाणि तावतो नरकान् व्रजेत् ॥ ४१ ॥
अदेयं चाप्यपेयं च तथैवास्पृश्यमेव च।
द्विजातीनामनालोक्यं नित्यं मद्यमिति स्थितिः ॥ ४२ ॥
तस्मात् सर्वप्रकारेण मद्यं नित्यं विवर्जयेत् ।
पीत्वा पतति कर्मभ्यस्त्वसम्भाव्यो भवेद् द्विजः ॥ ४३ ॥
भक्षयित्वा ह्यभक्ष्याणि पीत्वाऽपेयान्यपि द्विजः ।
नाधिकारी भवेत् तावद् यावद् तन्न जहात्यधः ॥ ४४ ॥
तस्मात् परिहरेन्नित्यमभक्ष्याणि प्रयत्नतः।
अपेयानि च विप्रो वै तथा चेद् याति रौरवम् ॥ ४५ ॥ | द्विजोंके लिये मद्य न दान देने योग्य है, न पीने योग्य है, न स्पर्श करने योग्य है और न ही देखने योग्य है—ऐसी हमेशाके लिये मर्यादा बनी है। इसलिये सब प्रकारसे मद्यका नित्य ही परित्याग करना चाहिये। मद्य पीनेसे द्विज कर्मोंसे पतित और बातचीत करनेके अयोग्य हो जाता है। अभक्ष्यका भक्षण करने और अपेय पदार्थोंका पान करनेसे द्विज तबतक अपने कर्मका अधिकारी नहीं होता, जबतक उसका पाप दूर नहीं हो जाता। इसलिये प्रयत्नपूर्वक नित्य ही विप्र (द्विज)-को अभक्ष्य एवं अपेय पदार्थोंका परित्याग करना चाहिये। यदि द्विज ऐसा करता है अर्थात् इन्हें ग्रहण करता है तो उसे रौरव नरकमें जाना पड़ता है ॥ ४२–४५ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥

* अध्याय १८ * ३३७


अठारहवाँ अध्याय

गृहस्थके नित्यकर्मोंका वर्णन, प्रातःस्नानकी महिमा, छः प्रकारके स्नान, संध्योपासनकी महिमा तथा संध्योपासनविधि, सूर्योपस्थानका माहात्म्य, सूर्यहृदयस्तोत्र, अग्निहोत्रकी विधि, तर्पणकी विधि, नित्य किये जानेवाले पञ्चमहायज्ञोंकी महिमा तथा उनका विधान

ऋषय ऊचुः<br>अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां महामुने।<br>तदाचक्ष्वाखिलं कर्म येन मुच्येत बन्धनात् ॥ १ ॥ऋषियोंने कहा— महामुने! आप द्विजोंके प्रतिदिन किये जानेवाले उन कर्मोंका सम्पूर्ण-रूपसे वर्णन करें, जिनका अनुष्ठान करनेसे बन्धनसे मुक्ति प्राप्त होती है॥ १॥
व्यास उवाच<br>वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं गदतो मम।<br>अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां क्रमाद् विधिम्॥ २ ॥<br><br>ब्राह्मे मुहूर्ते तूत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।<br>कायक्लेशं तदुद्भूतं ध्यायीत मनसेश्वरम्॥ ३ ॥<br><br>उषःकालेऽथ सम्प्राप्ते कृत्वा चावश्यकं बुधः।<br>स्नायान्नदीषु शुद्धासु शौचं कृत्वा यथाविधि॥ ४ ॥<br><br>प्रातःस्नानेन पूयन्ते येऽपि पापकृतो जनाः।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रातःस्नानं समाचरेत्॥ ५ ॥व्यासजी बोले— मैं बतला रहा हूँ। आप लोग ध्यानपूर्वक मेरे द्वारा कहे जा रहे ब्राह्मणोंके प्रतिदिन किये जानेवाले कर्मोंको और उनके विधानको सुनें<sup></sup>। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर धर्म और अर्थ एवं (उनकी सम्पन्नताके लिये) अपेक्षित शारीरिक आयास (क्या कब कैसे करना है आदि)-का चिन्तन करे तथा मनसे ईश्वरका ध्यान करे। बुद्धिमान्‌को चाहिये कि ऊषाकाल होनेपर आवश्यक कर्मोंको करके विधिपूर्वक शौच आदिसे निवृत्त होकर शुद्ध जलवाली नदियोंमें स्नान करे। प्रातःस्नान करनेसे पाप करनेवाले व्यक्ति भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे प्रातःकाल स्नान करना चाहिये॥ २–५॥
प्रातःस्नानं प्रशंसन्ति दृष्टादृष्टकरं शुभम्।<br>ऋषीणामृषिता नित्यं प्रातःस्नानान्न संशयः॥ ६ ॥<br><br>मुखे सुप्तस्य सततं लाला याः संस्रवन्ति हि।<br>ततो नैवाचरेत् कर्म अकृत्वा स्नानमादितः॥ ७ ॥<br><br>अलक्ष्मीः कालकर्णी च दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तितम्।<br>प्रातःस्नानेन पापानि पूयन्ते नात्र संशयः॥ ८ ॥<br><br>न च स्नानं विना पुंसां पावनं कर्म सुस्मृतम्।<br>होमे जप्ये विशेषेण तस्मात् स्नानं समाचरेत्॥ ९ ॥<br><br>अशक्तावशिरस्कं वा स्नानमस्य विधीयते।<br>आर्द्रेण वाससा वाथ मार्जनं कापिलं स्मृतम्॥ १०॥दृष्ट और अदृष्ट फल देनेवाले प्रातःकालीन शुभ स्नानकी सभी प्रशंसा करते हैं। नित्य प्रातःकाल स्नान करनेसे ही ऋषियोंका ऋषित्व है, इसमें संशय नहीं; क्योंकि सोये व्यक्तिके मुखसे निरन्तर लार बहती रहती है, अतः सर्वप्रथम स्नान किये बिना कोई कर्म नहीं करना चाहिये। प्रातः-स्नानसे अलक्ष्मी, कालकर्णी<sup></sup> (अलक्ष्मीविशेष) दुःस्वप्न, बुरे विचार और अन्य पाप दूर हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। बिना स्नानके मनुष्योंको पवित्र करनेवाला कोई कर्म नहीं बतलाया गया है। अतः होम तथा जपके समय विशेष-रूपसे स्नान करना चाहिये। असमर्थताकी स्थितिमें सिरको छोड़कर स्नान करनेका विधान किया गया है। अथवा भीगे वस्त्रसे शरीरका मार्जन करना चाहिये, इसे कपिलस्नान कहा गया है॥ ६–१०॥

१-इस अध्यायमें गृहस्थके प्रायः सभी अनुष्ठानोंका वर्णन है, पर क्रमसे नहीं है। क्रमका ज्ञान गृह्यसूत्र, आह्निकसूत्रावली, नित्यकर्मविधि आदि ग्रन्थोंसे करना चाहिये। इस अध्यायका उद्देश्य सभी कर्मोंका परिचय कराना है। कर्मोंका क्रम बताना उद्देश्य नहीं है।
२-कालकर्णी—अलक्ष्मी (शब्दकल्पद्रुम)।

३३८ * कूर्मपुराण *


असामर्थ्ये समुत्पन्ने स्नानमेवं समाचरेत्।<br>ब्राह्मादीनि यथाशक्तो स्नानान्याहुर्मनीषिणः॥ ११॥<br><br>ब्राह्ममाग्नेयमुद्दिष्टं वायव्यं दिव्यमेव च।<br>वारुणं यौगिकं तद्वत् षोढा स्नानं प्रकीर्तितम्॥ १२॥<br><br>ब्राह्मं तु मार्जनं मन्त्रैः कुशैः सोदकबिन्दुभिः।<br>आग्नेयं भस्मना पादमस्तकाद्देहधूलनम्॥ १३॥<br><br>गवां हि रजसा प्रोक्तं वायव्यं स्नानमुत्तमम्।<br>यत्तु सातपवर्षेण स्नानं तद् दिव्यमुच्यते॥ १४॥<br><br>वारुणं चावगाहस्तु मानसं त्वात्मवेदनम्।<br>यौगिकं स्नानमाख्यातं योगो विष्णुविचिन्तनम्॥ १५॥<br><br>आत्मतीर्थमिति ख्यातं सेवितं ब्रह्मवादिभिः।<br>मनःशुचिकरां पुंसां नित्यं तत् स्नानमाचरेत्॥ १६॥<br><br>शक्तश्चेद् वारुणं विद्वान् प्राजापत्यं तथैव च।<br>प्रक्षाल्य दन्तकाष्ठं वै भक्षयित्वा विधानतः॥ १७॥<br><br>आचम्य प्रयतो नित्यं स्नानं प्रातः समाचरेत्।<br>मध्याङ्गुलिसमस्थौल्यं द्वादशाङ्गुलसम्मितम्॥ १८॥<br><br>सत्वचं दन्तकाष्ठं स्यात् तदग्रेण तु धावयेत्।<br>क्षीरवृक्षसमुद्भूतं मालतीसम्भवं शुभम्।<br>अपामार्गं च बिल्वं च करवीरं विशेषतः॥ १९॥<br><br>वर्जयित्वा निन्दितानि गृहीत्वैकं यथोदितम्।<br>परिहृत्य दिनं पापं भक्षयेद् वै विधानवित्॥ २०॥<br><br>नोत्पाटयेद् दन्तकाष्ठं नाङ्गुल्या धावयेत् क्वचित्।<br>प्रक्षाल्य भङ्क्त्वा तज्जह्याच्छुचौ देशे समाहितः॥ २१॥<br><br>स्नात्वा संतर्पयेद् देवानृषीन् पितॄगणांस्तथा।<br>आचम्य मन्त्रवन्नित्यं पुनराचम्य वाग्यतः॥ २२॥सामर्थ्य न रहनेपर यही (कपिल-) स्नान करना चाहिये। मनीषियोंने यथाशक्ति किये जानेवाले ब्राह्म आदि स्नानोंको बतलाया है। ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण तथा यौगिक—ये छः स्नान कहे गये हैं। कुशोंके द्वारा जलबिन्दुओंस मन्त्रोच्चारणपूर्वक मार्जन करना ब्राह्म-स्नान कहलाता है। मस्तकसे पैरोंतक समस्त देहमें भस्मका उपलेपन करना आग्नेय-स्नान है। गायोंकी धूलसे सम्पन्न उत्तम स्नानको वायव्य-स्नान कहा गया है। धूपमें वर्षाके जलसे जो स्नान किया जाता है, वह दिव्य-स्नान कहलाता है। (जलमें) डुबकी लगाकर किया गया स्नान वारुण-स्नान और मनसे आत्मतत्त्वका चिन्तन करना यौगिक-स्नान कहा गया है। विष्णुका चिन्तन ही योग है॥ ११–१५॥<br><br>ब्रह्मवादियोंसे सेवित इस (यौगिक) स्नानको आत्मतीर्थ कहा गया है। यह मनुष्योंके मनको पवित्र बनानेवाला है। इसलिये यह स्नान नित्य करना चाहिये। समर्थ होनेपर विद्वान्‌को वारुण तथा प्राजापत्य (ब्राह्म)-स्नान करना चाहिये। दन्तकाष्ठको धोकर विधिपूर्वक उसका भक्षण (चर्वण) करना चाहिये॥ १६–१७॥<br><br>(दतुअन करके) आचमनकर (मुख-प्रक्षालनकर) प्रयत्नपूर्वक नित्य प्रातःस्नान करना चाहिये। मध्यमा अंगुलिके समान मोटा और बारह अंगुलके बराबर लंबा छिलके-युक्त दन्तकाष्ठके अग्रभागसे मुखशुद्धि करनी चाहिये। विशेषरूपसे दूधवाले वृक्ष, मालती (चमेली), अपामार्ग, बिल्व तथा करवीर (कनेर)-की लकड़ीका दन्तकाष्ठ शुभ होता है। विधिके ज्ञाताको चाहिये कि दोषपूर्ण (निषिद्ध) दिनको छोड़कर तथा निन्दित काष्ठोंको छोड़कर बताये गये दन्तकाष्ठोंमेंसे किसी एकको ग्रहणकर दन्तधावन करना चाहिये। दन्तकाष्ठको उखाड़ना नहीं चाहिये (अर्थात् किसी छोटे पौधेको पूरा उखाड़कर उससे दन्तधावन नहीं करना चाहिये) और न कभी अँगुलीसे दतुअन करना चाहिये। (मुख) धोनेके उपरान्त उसे (दन्तकाष्ठको) तोड़कर सावधानीसे किसी पवित्र स्थानमें (यथास्थान) त्याग देना चाहिये॥ १८–२१॥<br><br>अनन्तर पवित्र देशमें स्नान करके आचमनपूर्वक देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको यथाधिकार मन्त्रपूर्वक यथाविधि तृप्त करना चाहिये॥ २२॥
* अध्याय १८ *३३९

| सम्मार्ज्य मन्त्रैरात्मानं कुशैः सोदकबिन्दुभिः।<br>आपो हि ष्ठा व्याहृतिभिः सावित्र्या वारुणैः शुभैः॥ २३॥<br><br>ओङ्कारव्याहृतियुतां गायत्रीं वेदमातरम्।<br>जप्त्वा जलाञ्जलिं दद्याद् भास्करं प्रति तन्मनाः॥ २४॥<br><br>प्राक्कूलेषु समासीनो दर्भेषु सुसमाहितः।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा ध्यायेत् संध्यामिति श्रुतिः॥ २५॥ | तदनन्तर पुनः आचमन करे और संयतवाणीवाला होकर 'आपो हि ष्ठा' इत्यादि मन्त्र, व्याहृतियों, गायत्रीमन्त्र तथा वरुण-सम्बन्धी शुभ मन्त्रोंका पाठ करते हुए जलबिन्दुओंसे युक्त कुशोंके द्वारा अपना मार्जन करे। ओंकार एवं व्याहृतियोंसे युक्त वेदमाता गायत्री (-मन्त्र)-का जप करके तन्मय होकर सूर्यको जलाञ्जलि देनी चाहिये। तदनन्तर पूर्वकी ओर बिछे हुए कुशासनपर सावधानीपूर्वक बैठकर तीन प्राणायाम करके संध्याका ध्यान करना चाहिये। ऐसा श्रुतिका विधान है॥ २३-२५॥ | | या संध्या सा जगत्सूतिर्मायातीता हि निष्कला।<br>ऐश्वरी तु पराशक्तिस्तत्त्वत्रयसमुद्भवा॥ २६॥<br><br>ध्यात्वार्कमण्डलगतां सावित्रीं वै जपन् बुधः।<br>प्राङ्मुखः सततं विप्रः संध्योपासनमाचरेत्॥ २७॥<br><br>संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु।<br>यदन्यत् कुरुते किञ्चिन्न तस्य फलमाप्नुयात्॥ २८॥<br><br>अनन्यचेतसः शान्ता ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>उपास्य विधिवत् संध्यां प्राप्ताः पूर्वं परां गतिम्॥ २९॥<br><br>योऽन्यत्र कुरुते यत्नं धर्मकार्ये द्विजोत्तमः।<br>विहाय संध्याप्रणतिं स याति नरकायुतम्॥ ३०॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन संध्योपासनमाचरेत्।<br>उपासितो भवेत् तेन देवो योगतनुः परः॥ ३१॥ | जो संध्या है वही जगत्को उत्पन्न करनेवाली है, मायातीत है, निष्कल है और तीन तत्त्वोंसे उत्पन्न होनेवाली ईश्वरकी पराशक्ति है। विद्वान् ब्राह्मण (द्विज)-को पूर्वाभिमुख होकर सूर्यमण्डलमें प्रतिष्ठित सावित्री (गायत्रीमन्त्र)-का ध्यानपूर्वक जप करते हुए संध्योपासना करनी चाहिये। संध्यासे हीन व्यक्ति (द्विज) नित्य अपवित्र और सभी कर्मोंको करनेके लिये अयोग्य होता है। वह जो भी कार्य करता है, उसका उसे कोई फल प्राप्त नहीं होता। पूर्वकालमें वेदके पारंगत शान्त ब्राह्मणोंने अनन्य-मनसे संध्योपासना करके परम गतिको प्राप्त किया था। जो द्विजोत्तम संध्यावन्दनको छोड़कर दूसरे धार्मिक कार्योंके लिये प्रयत्न करता है, वह सहस्रों नरकोंमें जाता है। इसलिये सभी प्रयत्नोंसे संध्योपासना करनी चाहिये। उस उपासनासे योगविग्रह परमदेवकी उपासना हो जाती है॥ २६-३१॥ | | सहस्रपरमां नित्यं शतमध्यां दशावराम्।<br>सावित्रीं वै जपेद् विद्वान् प्राङ्मुखः प्रयतः स्थितः॥ ३२॥<br><br>अथोपतिष्ठेदादित्यमुदयन्तं समाहितः।<br>मन्त्रैस्तु विविधैः सौरैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः॥ ३३॥<br><br>उपस्थाय महायोगं देवदेवं दिवाकरम्।<br>कुर्वीत प्रणतिं भूमौ मूर्ध्ना तेनैव मन्त्रतः॥ ३४॥ | विद्वान् व्यक्तिको नित्य पूर्वाभिमुख होकर सावित्री (-मन्त्र)-का सावधानीपूर्वक जप करना चाहिये। हजार बारका जप उत्कृष्ट, सौ बार किया गया जप मध्यम तथा दस बारका जप निम्नकोटिका होता है। इसके बाद खड़े होकर ध्यान लगाकर उदित होते हुए सूर्यकी ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें वर्णित सूर्य-सम्बन्धी विविध मन्त्रोंद्वारा उपासना करनी चाहिये। महायोगरूप देवाधिदेव दिवाकरका उपस्थान करके उसी मन्त्रद्वारा भूमिपर मस्तक झुकाकर प्रणाम करना चाहिये और निम्नलिखित मन्त्रोंसे प्रार्थना करनी चाहिये—॥ ३२-३४॥ |

३४०* कूर्मपुराण *
ॐ खखोल्काय शान्ताय कारणत्रयहेतवे।<br>निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे।<br>नमस्ते घृणिने तुभ्यं सूर्याय ब्रह्मरूपिणे॥ ३५॥मैं ओंकाररूप शान्त, कारणत्रयके^१ हेतुरूप खखोल्क^२ (सूर्य)-के प्रति अपनेको समर्पित करता हूँ। ज्ञानरूपी आप (सूर्य)-को नमस्कार है। ब्रह्मरूपी घृणि^३ सूर्य! आपको नमस्कार है। आप ही परम ब्रह्म, अप्, ज्योति, रस और अमृतस्वरूप हैं। आप ही भूः, भुवः, स्वः, ओंकार तथा समस्त सनातन रुद्र हैं। आप सत्स्वरूप और महान् पुरुष हैं। आप कपर्दीको मैं प्रणाम करता हूँ। आप ही अनेक रूपवाले सत्-असत्-रूप समस्त विश्वको उत्पन्न करते हैं। सूर्यरूप रुद्रको नमस्कार है। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप प्रचेताको नमस्कार है। मीढुष्टम^४! आपको नमस्कार है। रुद्रके लिये वार-बार नमस्कार है। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप हिरण्यबाहु तथा हिरण्यपतिको नमस्कार हैं। अम्बिकाके पति तथा उमाके पति आपको नमस्कार है। नीलग्रीवको नमस्कार है तथा आप पिनाकीको नमस्कार है। विलोहित, भर्ग तथा सहस्राक्ष! आपको नमस्कार है॥ ३५–४०॥
त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोऽमृतम्।<br>भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वे रुद्राः सनातनाः।<br>पुरुषः सन्महोऽतस्त्वां प्रणमामि कपर्दिनम्॥ ३६॥
त्वमेव विश्वं बहुधा सदसत् सूयते च यत्।<br>नमो रुद्राय सूर्याय त्वामहं शरणं गतः॥ ३७॥
प्रचेतसे नमस्तुभ्यं नमो मीढुष्टमाय ते।<br>नमो नमस्ते रुद्राय त्वामहं शरणं गतः॥ ३८॥
हिरण्यबाहवे तुभ्यं हिरण्यपतये नमः।<br>अम्बिकापतये तुभ्यमुमायाः पतये नमः॥ ३९॥
नमोऽस्तु नीलग्रीवाय नमस्तुभ्यं पिनाकिने।<br>विलोहिताय भर्गाय सहस्राक्षाय ते नमः॥ ४०॥
नमो हंसाय ते नित्यमादित्याय नमोऽस्तु ते।<br>नमस्ते वज्रहस्ताय त्र्यम्बकाय नमोऽस्तु ते॥ ४१॥आप हंसको नित्य नमस्कार है। आदित्य ! आपको नमस्कार है। वज्रहस्त तथा त्र्यम्बक ! आपको नमस्कार है। मैं आप विरूपाक्ष महान् परमेश्वरकी शरणमें हूँ। सभी देहधारियोंके हिरण्मय गृहमें (हृदयमें) आप अपनेको गुह्यरूपसे प्रतिष्ठित किये हैं। परम ज्योतिरूप, परमगति, विश्वरूप, पशुपति, भीम तथा अर्ध-नारीश्वर-रूपवाले आप ब्रह्माको मैं नमस्कार करता हूँ। प्रकाशमान सूर्यरूप परमेष्ठी रुद्रको नमस्कार है। उग्र तथा सभीके भजनीय^५ आपकी मैं सदा ही शरण ग्रहण करता हूँ॥ ४१–४४॥
प्रपद्ये त्वां विरूपाक्षं महान्तं परमेश्वरम्।<br>हिरण्मयं गृहे गुह्यमात्मानं सर्वदेहिनाम्॥ ४२॥
नमस्यामि परं ज्योतिर्ब्रह्माणं त्वां परां गतिम्।<br>विश्वं पशुपतिं भीमं नरनारीशरीरिणम्॥ ४३॥
नमः सूर्याय रुद्राय भास्वते परमेष्ठिने।<br>उग्राय सर्वभक्ताय त्वां प्रपद्ये सदैव हि॥ ४४॥
एतद् वै सूर्यहृदयं जप्त्वा स्तवमनुत्तमम्।<br>प्रातःकालेऽथ मध्याह्ने नमस्कुर्याद् दिवाकरम्॥ ४५॥इस सूर्यहृदय (नामक) उत्तम स्तोत्रका प्रातः-काल तथा मध्याह्नकालमें जपकर दिवाकरको नमस्कार करना चाहिये॥ ४५॥

१- यहाँ कारणत्रयसे मन, बुद्धि एवं अहंकार विवक्षित हैं। इन तीनोंको क्रियाशील बनानेमें सूर्य एक महत्त्वपूर्ण कारण हैं।
२- खखोल्क—ख (आकाश) ख (इन्द्रियों)-में क्रमशः सूर्य तथा आत्मारूपसे जो उल्काके समान बाहर-भीतर प्रकाशक-रूपमें विद्यमान हैं, वे खखोल्क हैं। काशीखण्ड ५० वें अध्यायमें खखोल्क नामके सूर्यका वर्णन है। ये काशीमें स्थित हैं।
३-घृणि—सूर्यका नाम है—जिघर्ति दीप्यते इति घृणिः=दीप्तिशाली।
४-मीढुष्टम—शिवका नाम है (श्रीमद्भागवत स्कन्ध ४ अ० ६)। सूर्यमें सभी देवताओंकी भावना एवं उपासनाका विधान होनेसे सूर्यको मीढुष्टम कहा गया है। रुद्र आदिके रूपमें सूर्यके उल्लेखका भी यही कारण है।
५-'सर्वः भक्तः यस्य सः' बहुव्रीहि समास हुआ है। इससे अभिप्राय यह निकलता है कि रुद्र सबके लिये भजनीय हैं।

  • अध्याय १८ * ३४१
इदं पुत्राय शिष्याय धार्मिकाय द्विजातये ।<br>प्रदेयं सूर्यहृदयं ब्रह्मणा तु प्रदर्शितम् ॥ ४६ ॥<br><br>सर्वपापप्रशमनं वेदसारसमुद्भवम् ।<br>ब्राह्मणानां हितं पुण्यमृषिसङ्घैर्निषेवितम् ॥ ४७ ॥ब्रह्माके द्वारा प्रदर्शित, सभी पापोंका शमन करनेवाले, वेदोंके सारसे प्रकट हुए, ब्राह्मणोंके हितकारी, पवित्र और ऋषिसमूहोंद्वारा सेवित इस सूर्यहृदय (स्तोत्र)-का द्विजाति-कुलोत्पन्न धार्मिक पुत्र एवं शिष्यके लिये उपदेश करना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥
अथागम्य गृहं विप्रः समाचम्य यथाविधि ।<br>प्रज्वाल्य वह्निं विधिवज्जुहुयाज्जातवेदसम् ॥ ४८ ॥<br><br>ऋत्विक्पुत्रोऽथ पत्नी वा शिष्यो वापि सहोदरः ।<br>प्राप्यानुज्ञां विशेषेण जुहुयुर्वा यथाविधि ॥ ४९ ॥<br><br>पवित्रपाणिः पूतात्मा शुक्लाम्बरधरोत्तरः ।<br>अनन्यमानसो वह्निं जुहुयात् संयतेन्द्रियः ॥ ५० ॥तदनन्तर घर आकर ब्राह्मण (द्विज)-को विधिपूर्वक आचमन करके अग्नि प्रज्वलित कर यथाविधि अग्निमें हवन (अग्निहोत्र) करना चाहिये। (अग्न्याधान करनेवाला यजमान द्विजाति यदि किसी अपरिहार्य कारणवश स्वयं अग्निहोत्र नहीं कर सकता है तो उसके प्रतिनिधि-रूपमें) ऋत्विक्का पुत्र (यज्ञोपवीत-संस्कार-सम्पन्न पुत्र), पत्नी, शिष्य (यज्ञोपवीती) अथवा (यज्ञोपवीती) सहोदर भाई भी विशेषरूपसे आज्ञा प्राप्तकर विधिपूर्वक हवन (अग्निहोत्र) कर सकता है। हाथमें पवित्री धारणकर, पवित्रात्मा होकर, शुक्लवर्णका वस्त्र एवं उत्तरीय वस्त्र धारणकर एकाग्रमनसे इन्द्रियोंको संयमित करते हुए अग्निमें हवन करे ॥ ४८-५० ॥
विना दर्भेण यत्कर्म विना सूत्रेण वा पुनः ।<br>राक्षसं तद्भवेत् सर्वं नामुत्रेह फलप्रदम् ॥ ५१ ॥<br><br>दैवतानि नमस्कुर्याद् देयसारान्निवेदयेत् ।<br>दद्यात् पुष्पादिकं तेषां वृद्धांश्चैवाभिवादयेत् ॥ ५२ ॥<br><br>गुरुं चैवाप्युपासीत हितं चास्य समाचरेत् ।<br>वेदाभ्यासं ततः कुर्यात् प्रयत्नाच्छक्तितो द्विजः ॥ ५३ ॥<br><br>जपेदध्यापयेच्छिष्यान् धारयेच्च विचारयेत् ।<br>अवेक्षेत च शास्त्राणि धर्मादीनि द्विजोत्तमः ।<br>वैदिकांश्चैव निगमान् वेदाङ्गानि विशेषतः ॥ ५४ ॥बिना कुशके और बिना यज्ञोपवीतके जो भी कर्म किया जाता है, वह सब राक्षसी कर्म होता है, वह न इस लोकमें फल देता है और न परलोकमें ॥ ५१ ॥<br><br>देवताओंको नमस्कार करना चाहिये। उन्हें प्रदान की जानेवाली (शास्त्रविहित) वस्तुओंमें उत्तमोत्तम वस्तुओंको ही निवेदित करना चाहिये। उन्हें (देवताओंको) पुष्प आदि (पदार्थ) समर्पित करना चाहिये और वृद्धजनोंका अभिवादन करना चाहिये। गुरुकी भी उपासना करनी चाहिये, उनका हित करना चाहिये। तदनन्तर द्विजको यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक वेदोंका अभ्यास करना चाहिये। द्विजोत्तमको जप करना चाहिये। शिष्योंको पढ़ाना चाहिये। (पढ़े विषयोंको) धारण करना चाहिये और (उसपर) विचार करना चाहिये। शास्त्रोंका अवलोकन तथा धर्मका—विशेषरूपसे वैदिक तथा वेदसम्मत शास्त्रों और वेदाङ्गोंका चिन्तन करना चाहिये ॥ ५२-५४ ॥
उपेयादीश्वरं चाथ योगक्षेमप्रसिद्धये ।<br>साधयेद् विविधानर्थान् कुटुम्बार्थे ततो द्विजः ॥ ५५ ॥अनन्तर योग (अप्राप्तकी प्राप्ति), क्षेम (प्राप्तकी रक्षा)-के लिये ईश्वर (धार्मिक राजा अथवा श्रीमान्)-के समीप जाना चाहिये और द्विजको कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये विविध प्रकारकी सम्पत्तियोंका (न्यायपूर्वक) साधन (चिन्तन, अर्जन) करना चाहिये ॥ ५५ ॥
३४२* कूर्मपुराण *

| ततो मध्याह्नसमये स्नानार्थं मृदमाहरेत्।<br>पुष्पाक्षतान् कुशतिलान् गोमयं शुद्धमेव च॥ ५६ ॥<br><br>नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरस्सु च।<br>स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च॥ ५७॥<br><br>परकीयनिपानेषु न स्नायाद् वै कदाचन।<br>पञ्चपिण्डान् समुद्धृत्य स्नायाद् वाऽसम्भवे पुनः॥ ५८ ॥<br><br>मृदैक्या शिरः क्षाल्यं द्वाभ्यां नाभेस्तथोपरि।<br>अधश्च तिसृभिः कायं पादौ षड्भिस्तथैव च॥ ५९॥<br><br>मृत्तिका च समुद्दिष्टा त्वार्द्रामलकमात्रिका।<br>गोमयस्य प्रमाणं तत् तेनाङ्गं लेपयेत् ततः॥ ६०॥ | तदनन्तर मध्याह्न-समयमें स्नानके लिये मिट्टी, पुष्प, अक्षत, कुश, तिल तथा शुद्ध गोबर लाना चाहिये। नदियों (पुराण आदिमें प्रसिद्ध देव, ऋषिनिर्मित), अगाध जलवाले कुण्डों, (जलाशयों), सरोवरों, झरनों तथा बावलियोंमें नित्य स्नान करना चाहिये। दूसरोंके तालाब आदिमें कभी भी स्नान नहीं करना चाहिये। (अन्यत्र स्नान) असम्भव होनेपर (तालाब आदिमेंसे) मिट्टीके पाँच पिण्डोंको निकालकर स्नान करना चाहिये। मिट्टीसे एक बार सिर धोकर दो बार नाभिके ऊपर (-के अङ्गोंको) धोना चाहिये। नीचेका शरीर तीन बार तथा छः बार पाँवोंको धोना चाहिये। आँवलेके बराबर गीली मिट्टी लेनेका विधान है। गोबरका भी इतना ही प्रमाण है। उससे अङ्गोंका लेपन करे॥ ५६–६०॥ | | लेपयित्वा तु तीरस्थस्तल्लिङ्गैरैव मन्त्रतः।<br>प्रक्षाल्याचम्य विधिवत् ततः स्नायात् समाहितः॥ ६१॥ | (नदी आदिके) किनारे बैठकर तल्लिङ्गक* मन्त्रोंके द्वारा (अङ्गोंमें मृत्तिका आदिका यथाविधि) लेपकर विधिपूर्वक प्रक्षालन एवं आचमन करके सावधानी-पूर्वक स्नान करना चाहिये॥ ६१॥ | | अभिमन्त्र्य जलं मन्त्रैस्तल्लिङ्गैर्वारुणैः शुभैः।<br>भावपूतस्तदव्यक्तं ध्यायन् वै विष्णुमव्ययम्॥ ६२॥<br><br>आपो नारायणोद्भूतास्ता एवास्यायनं पुनः।<br>तस्मान्नारायणं देवं स्नानकाले स्मरेद् बुधः॥ ६३॥<br><br>प्रोच्य सोंकारमादित्यं त्रिर्निमज्जेज्जलाशये।<br>आचान्तः पुनराचामेन्मन्त्रेणानेन मन्त्रवित्॥ ६४॥<br><br>अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः।<br>त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥ ६५॥ | तल्लिङ्गक शुभ वरुण-सम्बन्धी मन्त्रोंके द्वारा जलका अभिमन्त्रणकर पवित्र भावसे उन अव्यक्त अविनाशी विष्णुका ध्यान करे। ‘जल’की उत्पत्ति नारायणसे ही हुई है, पुनः वही जल उन (नारायण)-का अयन (निवास) हुआ, अतः स्नानके समय विद्वान्को चाहिये कि वह नारायणदेवका स्मरण करे। ओंकारके साथ आदित्यका उच्चारण करके जलके भीतर तीन बार डुबकी लगानी चाहिये। आचमन किये रहनेपर भी मन्त्रवेत्ताको पुनः इस मन्त्रसे आचमन करना चाहिये—अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥ अर्थात् (हे भगवन्!) सभी ओर मुखवाले आप सभी प्राणियोंके भीतर (हृदयरूपी) गुहामें विचरण करते हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार, जल, ज्योति, रस तथा अमृतरूप हैं॥ ६२–६५॥ | | द्रुपदां वा त्रिरभ्यसेद् व्याहृतिप्रणवान्विताम्।<br>सावित्रीं वा जपेद् विद्वान् तथा चैवाघमर्षणम्॥ ६६ ॥ | अथवा विद्वान् व्यक्तिको तीन बार द्रुपदा (दो चरणवाली) या व्याहृति अथवा प्रणवसे युक्त गायत्री और अघमर्षण-मन्त्रका जप करना चाहिये॥ ६६॥ |


* स्मार्तकर्मोंमें वे मन्त्र गृह्यसूत्रानुसार विनियुक्त होते हैं, जिनमें स्मार्तकर्म-बोधक शब्द श्रुत हों। यह आवश्यक नहीं होता कि उन मन्त्रोंमें स्मार्तकर्मका प्रतिपादन हो। इसीलिये स्मार्तकर्मके मन्त्र स्मार्तकर्मविषयक नहीं, किंतु स्मार्तकर्मलिङ्गक होते हैं। 'अक्षन्मी०' मन्त्रमें 'अक्षत' शब्द कथञ्चित् श्रुत होनेसे उसका अक्षत चढ़ानेमें विनियोग होता है, वह 'अक्षत' चढ़ाने-रूप कर्मका प्रतिपादक नहीं है, अतएव 'अक्षत'-विषयक नहीं है। मात्र अक्षतलिङ्गक है।

* अध्याय १८ * ३४३


ततः सम्मार्जनं कुर्यादापो हि ष्ठा मयोभुवः।<br>इदमापः प्र वहत व्याहृतिभिस्तथैव च॥ ६७॥तदनन्तर 'आपो हि ष्ठा मयो- भुवः०'<sup></sup>, 'इदमापः प्र वहत०'<sup></sup> इन मन्त्रों और व्याहृतियोंद्वारा मार्जन करना चाहिये। तदनन्तर 'आपो हि ष्ठा०' इत्यादि मन्त्रोंसे उस जल (स्नानीय नदी आदिके जल)-का अभिमन्त्रण करके जलके भीतर डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण-मन्त्रका जप करना चाहिये। अथवा त्रिपदा गायत्री-मन्त्र 'तद्विष्णोः परमं पदम्०'<sup></sup>, इस मन्त्र या प्रणवका जप करे अथवा भगवान् विष्णुका स्मरण करे॥ ६७-६९॥
ततोऽभिमन्त्र्य तत् तीर्थमापो हि ष्ठादिमन्त्रकैः।<br>अन्तर्जलगतो मग्नो जपेत् त्रिर्घमर्षणम्॥ ६८॥
त्रिपदां वाथ सावित्रीं तद्विष्णोः परमं पदम्।<br>आवर्तयेद् वा प्रणवं देवं वा संस्मरेद्धरिम्॥ ६९॥
द्रुपदादिव यो मन्त्रो यजुर्वेदे प्रतिष्ठितः।<br>अन्तर्जले त्रिरावर्त्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७०॥यजुर्वेदमें 'द्रुपदादिव०'<sup></sup> इस प्रकारसे जो मन्त्र प्रतिष्ठित है, उसका जलके भीतर तीन बार जप करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। मार्जन करनेके बाद हाथमें जल लेकर मन्त्र (द्रुपदादिव०) जपपूर्वक उस जलको सिरपर रखनेसे (अघमर्षण करनेसे) सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति हो जाती है। जिस प्रकार अश्वमेध-यज्ञ समस्त यज्ञोंके राजाके समान है और समस्त पापोंको दूर करनेवाला है, उसी प्रकार अघमर्षणसूक्त<sup></sup> भी (सभी सूक्तोंका सम्राट् और) सभी पापोंको दूर करनेवाला है॥ ७०-७२॥
अपः पाणौ समादाय जप्त्वा वै मार्जने कृते।<br>विन्यस्य मूर्ध्नि तत् तोयं मुच्यते सर्वपातकैः॥ ७१॥
यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनः।<br>तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम्॥ ७२॥
अथोपतिष्ठेदादित्यं मूर्ध्नि पुष्पान्विताञ्जलिम्।<br>प्रक्षिप्यालोकयेद् देवमुद्वयं तमसस्परि॥ ७३॥इसके बाद सूर्योपस्थान करना चाहिये। (इसकी प्रक्रिया यह है—) पुष्पयुक्त अञ्जलि मस्तकसे लगाकर उस फूलको ऊपर (सूर्य)-की ओर उछालकर उन सूर्यका दर्शन करते हुए 'उद्वयं तमसस्परि'<sup></sup>, 'चित्रं०'<sup></sup>, 'उदु त्यं०'<sup></sup>, 'तच्चक्षुः०'<sup></sup>, 'हंसः शुचिषद'<sup>१०</sup> एवं विशेष-रूपसे सावित्री-मन्त्र और सूर्य-सम्बन्धी अन्य भी पापको नष्ट करनेवाले वैदिक मन्त्रोंके जपके द्वारा सूर्यको प्रसन्न किया जाय, यही सूर्योपस्थान है। इसके अनन्तर गायत्रीमन्त्रका जप करना चाहिये। इस (गायत्रीजपको) ही जपयज्ञ कहा गया है॥ ७३-७५॥
उदु त्यं चित्रमित्येते तच्चक्षुरिति मन्त्रतः।<br>हंसः शुचिषदेतेन सावित्र्या च विशेषतः॥ ७४॥
अन्यैश्च वैदिकैर्मन्त्रैः सौरैः पापप्रणाशनैः।<br>सावित्रीं वै जपेत् पश्चाज्जपयज्ञः स वै स्मृतः॥ ७५॥

१-आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥ (यजु० ११। ५०)
२-इदमापः प्र वहतावद्यं च मलं च यत्। यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम्। आपो मा तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु। (यजु० ६। १७)
३-तद्विष्णोः परमं पदᳵसदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (यजु० ६। ५)
४-द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥ (यजु० २०। २०)
५-ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः।..... मथो स्वः॥ (ऋग्वेद १०। १९०। १-३)
६-उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्यमन्म ज्योतिरुत्तमम्॥ (यजु० २०। २१)
७-उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यᳵस्वाहा॥ (यजु० ७। ४१)
८-चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षᳵसूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥ (यजु० ७। ४२)
९-तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम।
शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ (यजु० ३६। २४)
१०-हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्॥ (यजु० १०। २४)

३४४ * कूर्मपुराण *


विविधानि पवित्राणि गुह्यविद्यास्तथैव च।<br>शतरुद्रीयमथर्वाशिरः सौरांश्च शक्तितः ॥ ७६ ॥<br><br>प्राक्कूलेषु समासीनः कुशेषु प्राङ्मुखः शुचिः।<br>तिष्ठंश्चेदीक्षमाणोऽर्कं जप्यं कुर्यात् समाहितः ॥ ७७ ॥<br><br>स्फाटिकेन्द्राक्षरुरुद्राक्षैः पुत्रजीवसमुद्भवैः।<br>कर्तव्या त्वक्षमाला स्यादुत्तरादुत्तमा स्मृता ॥ ७८ ॥<br>जपकाले न भाषेत नान्यानि प्रेक्षयेद् बुधः।<br>'न कम्पयेच्छिरोग्रीवां दन्तान् नैव प्रकाशयेत् ॥ ७९ ॥<br><br>गुह्यका राक्षसा सिद्धा हरन्ति प्रसभं यतः।<br>एकान्ते सुशुभे देशे तस्माज्जप्यं समाचरेत् ॥ ८० ॥<br>चण्डालाशौचपतितान् दृष्ट्वाचम्य पुनर्जपेत्।<br>तैरेव भाषणं कृत्वा स्नात्वा चैव जपेत् पुनः ॥ ८१ ॥<br><br>आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने।<br>सौराम् मन्त्रान् शक्तितो वै पावमानीस्तु कामतः ॥ ८२ ॥<br><br>यदि स्यात् क्लिन्नवासा वै वारिमध्यगतो जपेत्।<br>अन्यथा तु शुचौ भूम्यां दर्भेषु सुसमाहितः ॥ ८३ ॥<br>प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्या ततः क्षितौ।<br>आचम्य च यथाशास्त्रं शक्त्या स्वाध्यायमाचरेत् ॥ ८४ ॥<br><br>ततः संतर्पयेद् देवानृषीन् पितृगणांस्तथा।<br>आदावोंकारमुच्चार्य नमोऽन्ते तर्पयामि वः ॥ ८५ ॥<br><br>देवान् ब्रह्मर्षींश्चैव तर्पयेदक्षतोदकैः।<br>तिलोदकैः पितॄन् भक्त्या स्वसूत्रोक्तविधानतः ॥ ८६ ॥पूर्वाग्र कुशोंपर पूर्वाभिमुख पवित्र होकर बैठना चाहिये और सूर्यका दर्शन करते हुए समाहित-चित्त होकर विविध पवित्र मन्त्रों, गुह्यविद्याओं, शतरुद्रिय, अथर्वशिरस् एवं सूर्यदेवताके मन्त्रोंका जप करना चाहिये। स्फटिक, इन्द्राक्ष (इन्द्र वृक्ष-विशेषके फलकी माला), रुद्राक्ष तथा पुत्रजीवककी (वृक्ष-विशेषके फलकी माला*) अक्षमाला बनानी चाहिये। इनमें पूर्वसे बादवाली माला क्रमशः उत्तम कही गयी है॥ ७६-७८॥<br><br>बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि वह जप करते समय बोले नहीं, दूसरे लोगोंकी ओर न देखे। सिर और गरदनको न हिलाये और न ही दाँतोंको दिखलाये, क्योंकि (ऐसा करनेसे) गुह्यक, राक्षस तथा सिद्ध उस जपके फलका बलात् हरण कर लेते हैं, अतः किसी एकान्त अत्यन्त शुभ स्थानमें जप करना चाहिये ॥ ७९-८० ॥<br><br>चाण्डाल, आशौच-युक्त व्यक्ति तथा पतितको देखनेपर आचमन करके पुनः जप करना चाहिये। इनके साथ बात करनेपर स्नान करनेके बाद ही पुनः जप करना चाहिये। अपवित्र पदार्थके दिख जानेपर आचमन करके प्रयत्नपूर्वक यथाशक्ति नित्य सूर्यसम्बन्धी मन्त्रों और पावमानी मन्त्रोंका इच्छानुसार (मनस्तुष्टिपर्यन्त) जप करना चाहिये। यदि भींगे वस्त्र पहने हों तो जलके मध्य स्थित होकर जप करना चाहिये। अन्यथा पवित्र भूमिमें कुशासनके ऊपर बैठकर एकाग्रतापूर्वक जप करना चाहिये ॥ ८१-८३ ॥<br><br>(जप पूरा करनेके बाद) प्रदक्षिणा करके पृथ्वीपर नमस्कार करके और आचमन करके शास्त्रानुसार यथाशक्ति स्वाध्याय करना चाहिये, तदनन्तर देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। प्रारम्भमें ओंकारका उच्चारण कर और अन्तमें 'नमः' लगाकर 'आपका तर्पण करता हूँ' (वः तर्पयामि)-ऐसा कहना चाहिये ॥ ८४-८५ ॥<br><br>देवताओं तथा ब्रह्मर्षियोंका तर्पण अक्षत और जलसे करना चाहिये और अपने गृह्यसूत्रोक्त विधिके अनुसार पितरोंका तर्पण तिल और जलसे भक्तिपूर्वक करना चाहिये ॥ ८६ ॥

* माला-विशेषोंका विस्तृत वर्णन पद्मोत्तरखण्ड अध्याय १०८ में द्रष्टव्य है।

  • अध्याय १८ * | ३४५ ---|---

अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु।
देवर्षींस्तर्पयेद् धीमानुदकाञ्जलिभिः पितॄन्॥ ८७॥

यज्ञोपवीती देवानां निवीती ऋषितर्पणे।
प्राचीनावीती पित्र्ये तु स्वेन तीर्थेन भावतः॥ ८८॥
निष्पीड्य स्नानवस्त्रं तु समाचम्य च वाग्यतः।
स्वैर्मन्त्रैरर्चयेद् देवान् पुष्पैः पत्रैरथाम्बुभिः॥ ८९॥

ब्रह्माणं शंकरं सूर्यं तथैव मधुसूदनम्।
अन्यांश्चाभिमतान् देवान् भक्त्या चाक्रोधनोऽत्वरः॥ ९०॥
प्रदद्याद् वाथ पुष्पाणि सूक्तेन पौरुषेण तु।
आपो वा देवताः सर्वास्तेन सम्यक् समर्चितः॥ ९१॥

ध्यात्वा प्रणवपूर्वं वै दैवतानि समाहितः।
नमस्कारेण पुष्पाणि विन्यसेद् वै पृथक् पृथक्॥ ९२॥

न विष्ण्वाराधनात् पुण्यं विद्यते कर्म वैदिकम्।
तस्मादनादिमध्यान्तं नित्यमाराधयेद्धरिम्॥ ९३॥

तद्विष्णोरिति मन्त्रेण सूक्तेन पुरुषेण तु।
नैताभ्यां सदृशो मन्त्रो वेदेषूक्तश्चतुर्ष्वपि॥ ९४॥

| बुद्धिमान् (आस्तिक अधिकारी व्यक्ति)-को सव्य (बाँयें) हाथसे अन्वारब्ध (सम्बद्ध) दाहिने हाथसे अर्थात् दोनों हाथोंकी अञ्जलिद्वारा जलसे देवताओं, ऋषियों एवं पितरोंका तर्पण करना चाहिये। यज्ञोपवीती¹ अर्थात् सव्य होकर देवताओंका, निवीती² होकर अर्थात् मालाकी तरह कण्ठमें यज्ञोपवीत धारणकर ऋषियोंका और प्राचीनावीती³ अर्थात् अपसव्य होकर भक्तिभावसे (देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंके) अपने-अपने तीर्थोंसे⁴ तर्पण करना चाहिये॥ ८७-८८॥
| स्नानके वस्त्रको⁵ निचोड़कर संयतवाणीसे युक्त होकर आचमन करके तत्तद् मन्त्रोंसे पत्र, पुष्प तथा जलके द्वारा देवताओंका पूजन करना चाहिये। क्रोध और शीघ्रताका सर्वथा परित्यागकर भक्तिपूर्वक ब्रह्मा, शंकर, सूर्य, विष्णु तथा अन्य जो भी अभीष्ट देवता हों, उनकी पूजा करनी चाहिये॥ ८९-९०॥
| पुरुषसूक्तके द्वारा पुष्प अर्पित करना चाहिये। अथवा जल सभी देवताओंका स्वरूप है, अतः उसके द्वारा पूजन करनेसे सभी देवताओंकी भलीभाँति पूजा हो जाती है। एकाग्रमनसे प्रणवका उच्चारण कर देवताओंका ध्यान करना चाहिये। नमस्कारकर पृथक्-पृथक् देवोंपर पुष्प चढ़ाना चाहिये। विष्णुकी आराधनासे अधिक पुण्यप्रद और कोई वैदिक कर्म नहीं है। इसलिये आदि, मध्य और अन्तसे रहित विष्णुकी नित्य आराधना करनी चाहिये॥ ९१-९३॥
| 'तद्विष्णोः०'⁶ इस मन्त्रसे तथा पुरुषसूक्तसे श्रीविष्णुकी आराधना करनी चाहिये। चारों वेदोंमें भी इन दोनों ('तद्विष्णोः०' एवं 'पुरुष सूक्त') मन्त्रोंके सदृश अन्य कोई मन्त्र नहीं कहा गया है॥ ९४॥


१-बाँयें कंधेके ऊपर रखते हुए दाहिने हाथ (दाहिनी भुजा)-के नीचे रखे हुए ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)-को उपवीत या यज्ञोपवीत कहते हैं और इस प्रकार ब्रह्मसूत्र धारण करनेवालेको उपवीती या यज्ञोपवीती कहते हैं।
२-मालाकी तरह कण्ठसे सीधे वक्षःस्थलकी ओर लम्बित ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)-को निवीत कहते हैं और इस ब्रह्मसूत्र धारण करनेवालेको निवीती कहते हैं।
३-दाहिने कंधेके ऊपर रखते हुए बायें हाथ (बायीं भुजा)-के नीचे रखे हुए ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)-को प्राचीनावीत कहते हैं और इस प्रकार ब्रह्मसूत्र धारण करनेवालेको प्राचीनावीती कहते हैं।
४-देवताओंका तर्पण देवतीर्थ (अँगुलियोंके अग्रभाग)-से, ऋषियों-मनुष्योंका तर्पण काय-तीर्थ (कनिष्ठिका अँगुलीके मूल)-से और पितरोंका तर्पण पितृतीर्थ (अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अँगुलीके मूलों)-से करना चाहिये।
५-तर्पणके पूर्व स्नानके वस्त्रोंको सुखानेके लिये निचोड़ना नहीं चाहिये अन्यथा पितर निराश होकर चले जाते हैं। इसीलिये यहाँ तर्पणके अनन्तर स्नानके वस्त्रोंको निचोड़नेकी बात कही गयी है।
६-तद्विष्णोः परमं पदँ सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम् (यजु० ६। ५)।

३४६ * कूर्मपुराण *


निवेदयेत स्वात्मानं विष्णावमलतेजसि ।<br>तदात्मा तन्मनाः शान्तस्तद्विष्णोरिति मन्त्रतः ॥ ९५ ॥<br><br>अथवा देवमीशानं भगवन्तं सनातनम्।<br>आराधयेन्महादेवं भावपूतो महेश्वरम् ॥ ९६ ॥'तद्विष्णोः०' इस मन्त्रके द्वारा तदात्मा और तन्मय होकर शान्तिपूर्वक अपनेको विशुद्ध तेजः-स्वरूप विष्णुमें निवेदित करना चाहिये। अथवा पवित्र भावनासे सनातन भगवान् ईशान महेश्वरदेव महादेवकी आराधना करनी चाहिये ॥ ९५-९६ ॥
मन्त्रेण रुद्रगायत्र्या प्रणवेनाथ वा पुनः।<br>ईशानेनाथ वा रुद्रैस्त्र्यम्बकेन समाहितः ॥ ९७ ॥<br><br>पुष्पैः पत्रैस्तथाद्भिर्वा चन्दनाद्यैर्महेश्वरम्।<br>उक्त्वा नमः शिवायेति मन्त्रेणानेन योजयेत् ॥ ९८ ॥<br><br>नमस्कुर्यान्महादेवं ऋतं सत्यमितीश्वरम्।<br>निवेदयीत स्वात्मानं यो ब्रह्माणमितीश्वरम् ॥ ९९ ॥<br><br>प्रदक्षिणं द्विजः कुर्यात् पञ्च ब्रह्माणि वै जपन्।<br>ध्यायीत देवमीशानं व्योममध्यगतं शिवम् ॥ १०० ॥रुद्रगायत्री, प्रणव, ईशान-मन्त्र, रुद्र तथा त्र्यम्बक-मन्त्रसे एकाग्र-मन होकर पुष्प, पत्र, जल तथा चन्दन आदिके द्वारा महेश्वरकी आराधना करनी चाहिये और मन्त्रका उच्चारणकर मन्त्रके साथ 'नमः शिवाय' को जोड़ना चाहिये। तदनन्तर ऋत एवं सत्यस्वरूप ईश्वर महादेवको नमस्कार करना चाहिये और 'यो ब्रह्माणं० ¹' इस मन्त्रके द्वारा अपनेको ईश्वरके लिये समर्पित करे। द्विजको पाँच ब्रह्म (शिवके पाँच नामों²)-का जप करते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिये और आकाशके मध्य स्थित ईशानदेव शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ ९७-१०० ॥
अथावलोकयेदर्कं हंसः शुचिषदित्यृचा।<br>कुर्यात् पञ्च महायज्ञान् गृहं गत्वा समाहितः ॥ १०१ ॥<br><br>देवयज्ञं पितृयज्ञं भूतयज्ञं तथैव च।<br>मानुष्यं ब्रह्मयज्ञं च पञ्च यज्ञान् प्रचक्षते ॥ १०२ ॥इसके अनन्तर 'हंसः शुचिषद०' इस ऋचासे सूर्यका दर्शन करे और घर जाकर ध्यानपूर्वक पञ्चयज्ञोंको करे। देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ तथा ब्रह्मयज्ञ—ये पाँच (महा-) यज्ञ कहे गये हैं ॥ १०१-१०२ ॥
यदि स्यात् तर्पणादर्वाक् ब्रह्मयज्ञः कृतो न हि।<br>कृत्वा मनुष्ययज्ञं वै ततः स्वाध्यायमाचरेत् ॥ १०३ ॥<br><br>अग्नेः पश्चििमतो देशे भूतयज्ञान्त एव वा।<br>कुशपुञ्जे समासीनः कुशपाणिः समाहितः ॥ १०४ ॥<br><br>शालाग्नौ लौकिके वाग्नौ जले भूम्यामथापि वा।<br>वैश्वदेवं ततः कुर्याद् देवयज्ञः स वै स्मृतः ॥ १०५ ॥<br><br>यदि स्याल्लौकिके पक्वं ततोऽन्नं तत्र हूयते।<br>शालाग्नौ तन्न देवान्नं विधिरेश सनातनः ॥ १०६ ॥<br><br>देवेभ्यस्तु हुतादन्नाच्छेषाद् भूतबलिं हरेत्।<br>भूतयज्ञः स वै ज्ञेयो भूतिदः सर्वदेहिनाम् ॥ १०७ ॥<br><br>श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च पतितादिभ्य एव च।<br>दद्याद् भूमौ बलिं त्वन्नं पक्षिभ्योऽथ द्विजोत्तमः ॥ १०८ ॥यदि तर्पणसे पहले ब्रह्मयज्ञ न किया हो तो मनुष्ययज्ञ करनेके बाद स्वाध्याय (ब्रह्मयज्ञ) करना चाहिये अथवा भूतयज्ञके अन्तमें एकाग्रचित्त होकर हाथमें कुश लेकर अग्निके पश्चिमकी दिशामें कुशपुंजपर बैठकर यज्ञशालाकी अग्नि, लौकिकाग्नि अथवा जलमें या भूमिपर वैश्वदेव करना चाहिये। यह देवयज्ञ कहलाता है। यदि लौकिकाग्निमें अन्न पकाया गया हो तो उसीमें हवन किया जाता है और यदि शालाकी अग्निमें अन्न तैयार किया गया हो तो शालाग्निमें ही वैश्वदेव होम करना चाहिये। यही सनातन विधि है। वैश्वदेव होमके पश्चात् बचे हुए अन्नद्वारा भूतबलिकर्म करना चाहिये। इसे भूतयज्ञ जानना चाहिये। यह सर्वप्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करता है। द्विजोत्तमको (घरके बाहर) भूमिपर कुत्ता, चाण्डाल, पतित आदि तथा पक्षियोंको अन्नकी बलि देनी चाहिये ॥ १०३-१०८ ॥

१-यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ (श्वेताश्वतर० ६। १८)
२-ईशानः ¹ सर्वविद्यानाम् ईश्वरः ² सर्वभूतानाम्। ब्रह्माधिपतिः ³ ब्रह्मणोऽधिपतिः ⁴ ब्रह्मा ⁵ शिवो मे अस्तु सदा शिवोम् ॥

  • अध्याय १८ * ३४७

सायं चान्नस्य सिद्धस्य पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत्। भूतयज्ञस्त्वयं नित्यं सायं प्रातर्विधीयते॥ १०९॥

एकं तु भोजयेद् विप्रं पितॄनुद्दिश्य सत्तमम्। नित्यश्राद्धं तदुद्दिष्टं पितृयज्ञो गतिप्रदः॥ ११०॥

उद्धृत्य वा यथाशक्ति किञ्चिदन्नं समाहितः। वेदतत्त्वार्थविदुषे द्विजायैवोपपादयेत्॥ १११॥

पूजयेदतिथिं नित्यं नमस्येदर्चयेद् द्विजम्। मनोवाक्कर्मभिः शान्तमागतं स्वगृहं ततः॥ ११२॥

हन्तकारमथाग्रं वा भिक्षां वा शक्तितो द्विजः। दद्यादतिथये नित्यं बुध्येत परमेश्वरम्॥ ११३॥

भिक्षामार्हुग्रासमात्रमग्रं तस्याश्चतुर्गुणम्। पुष्कलं हन्तकारं तु तच्चतुर्गुणमुच्यते॥ ११४॥

गोदोहमात्रं कालं वै प्रतीक्ष्यो ह्यतिथिः स्वयम्। अभ्यागतान् यथाशक्ति पूजयेदतिथिं यथा॥ ११५॥

भिक्षां वै भिक्षवे दद्याद् विधिवद् ब्रह्मचारिणे। दद्यादन्नं यथाशक्ति त्वर्थिभ्यो लोभवर्जितः॥ ११६॥

सर्वेषामप्यलाभे तु अन्नं गोभ्यो निवेदयेत्। भुञ्जीत बन्धुभिः सार्धं वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन्॥ ११७॥

अकृत्वा तु द्विजः पञ्च महायज्ञान् द्विजोत्तमाः। भुञ्जीत चेत् स मूढात्मा तिर्यग्योनिं स गच्छति॥ ११८॥

वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा। नाशयत्याशु पापानि देवानामार्चनं तथा॥ ११९॥

यो मोहादथवालस्यादकृत्वा देवतार्चनम्। भुङ्क्ते स याति नरकान् शूकStatus/शूकरेष्वभिजायते॥ १२०॥


पत्नी सायंकाल पके हुए अन्नकी बलि बिना मन्त्रके प्रदान करे, यही भूतयज्ञ है, जो नित्य सायंकाल और प्रातःकाल किया जाता है। पितरोंके उद्देश्यसे एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रतिदिन भोजन कराना चाहिये, इसे नित्य-श्राद्ध कहा गया है। यह पितृयज्ञ (उत्तम) गति प्रदान करनेवाला है॥ १०९-११०॥

अथवा यथाशक्ति कुछ अन्न निकालकर वेदके तत्त्वार्थको जाननेवाले ब्राह्मणको समाहित होकर देना चाहिये। तदनन्तर अपने घर आये हुए शान्त द्विज अतिथिका मन, वाणी तथा कर्मके द्वारा नित्य नमस्कार, पूजन एवं अर्चन करना चाहिये। द्विज अतिथिको यथाशक्ति नित्य 'हन्तकार', 'अग्र' अथवा भिक्षा प्रदान करे और उसे परमेश्वरका रूप समझे॥ १११-११३॥

ग्रासमात्र (अन्न)-को भिक्षा और उसके चौगुने अर्थात् चार ग्रासके बराबर अन्नको अग्र कहा जाता है। अग्रके चौगुने अर्थात् सोलह ग्रासके बराबर पर्याप्त अन्नको हन्तकार कहा जाता है। गोदोहनकाल-पर्यन्त अतिथिकी स्वयं प्रतीक्षा करनी चाहिये। जिस प्रकार अतिथिकी^१ पूजा की जाती है, उसी प्रकार अभ्यागतोंकी^२ भी यथाशक्ति पूजा (सेवा) करनी चाहिये॥ ११४-११५॥

ब्रह्मचारी भिक्षुकको विधिवत् भिक्षा प्रदान करे। लोभरहित होकर याचकोंको यथाशक्ति अन्न प्रदान करे, इन सभीके न मिलनेपर गौओंको अन्न निवेदित करे। तदनन्तर भोजनकी निन्दा न करते हुए बन्धुओंके साथ मौन होकर भोजन करे॥ ११६-११७॥

द्विजोत्तमो! यदि द्विज पञ्च महायज्ञोंको बिना किये ही भोजन करता है तो वह मूढात्मा तिर्यग्योनि प्राप्त करता है। प्रतिदिन यथाशक्ति किया गया वेदोंका अभ्यास, महायज्ञ कर्म, क्षमाका भाव और देवताओंका पूजन—ये शीघ्र ही पापोंका नाश करते हैं। जो मोहपूर्वक अथवा आलस्यसे देवताओंकी पूजा किये बिना भोजन करता है, वह नरकोंको प्राप्त करता है और बादमें शूकरकी योनिमें जन्म लेता है॥ ११८-१२०॥


१-अज्ञातपूर्वगृहागत व्यक्ति (अकस्मात् घरपर आ जानेवाला) अतिथि है। (श्रीधरस्वामी)
२-ज्ञातपूर्वगृहागत व्यक्ति (जिसका पहलेसे घरपर आना ज्ञात है ऐसा व्यक्ति) अभ्यागत है।

३४८ * कूर्मपुराण *


तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कृत्वा कर्माणि वै द्विजाः।<br>भुञ्जीत स्वजनैः सार्धं स याति परमां गतिम्॥ १२१॥द्विजो! इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा (नित्य) (अपने अधिकारानुसार शास्त्रविहित) कर्मोंको (श्रद्धापूर्वक) करनेके बाद स्वजनोंके साथ भोजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला परमगति प्राप्त करता है॥ १२१॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १८॥


उन्नीसवाँ अध्याय

भोजन-विधि, ग्रहणकालमें भोजनका निषेध, शयन-विधि, गृहस्थके नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका महत्त्व

व्यास उवाचव्यासजीने कहा—पवित्र आसनपर बैठकर पाँवोंको भूमिपर रखकर पूर्वकी ओर अथवा सूर्याभिमुख होकर अन्न (भोजन) ग्रहण करना चाहिये। पूर्वाभिमुख होकर भोजन करनेसे लम्बी आयु, दक्षिणाभिमुख होकर भोजन करनेसे यश, पश्चिमाभिमुख होकर भोजन करनेसे सम्पत्ति और उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करनेसे सत्यकी प्राप्ति होती है॥ १-२॥
प्राङ्मुखोऽन्नानि भुञ्जीत सूर्याभिमुख एव वा।<br>आसीनस्त्वासने शुद्धे भूम्यां पादौ निधाय तु॥ १॥<br><br>आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः।<br>श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते उदङ्मुखः॥ २॥
पञ्चार्द्रो भोजनं कुर्याद् भूमौ पात्रं निधाय तु।<br>उपवासेन तत्तुल्यं मनुराह प्रजापतिः॥ ३॥<br><br>उपलिप्ते शुचौ देशे पादौ प्रक्षाल्य वै करौ।<br>आचम्यार्द्राननोऽक्रोधः पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्॥ ४॥<br><br>महाव्याहृतिभिस्त्वन्नं परिधायोदकेन तु।<br>अमृतोपस्तरणमसीत्यापोशानक्रियां चरेत्॥ ५॥पाँचों अङ्गों (दोनों हाथ, दोनों पैर तथा मुख)-का प्रक्षालनकर (भोजन) पात्रको भूमिपर रखकर भोजन करना चाहिये। प्रजापति मनुने इस प्रकारके भोजनको उपवासके समान बताया है। दोनों हाथ, पैर एवं मुखको धोनेके बाद आचमनकर (गोबर इत्यादिसे) लीपे गये पवित्र स्थानमें (बैठकर) क्रोधरहित होकर भोजन करना चाहिये। महाव्याहृतियोंका उच्चारण करते हुए जलसे अन्नको परिवेष्टितकर 'अमृतोपस्तरणमसि' ऐसा कहकर आपोशान¹ (आचमन) क्रिया (सम्पन्न) करे॥ ३-५॥
स्वाहाप्रणवसंयुक्तां प्राणायाद्याहुतिं ततः।<br>अपनाय ततो हुत्वा व्यानाय तदनन्तरम्॥ ६॥<br><br>उदानाय ततः कुर्यात् समानायेति पञ्चमीम्।<br>विज्ञाय तत्त्वमेतेषां जुहुयादात्मनि द्विजः॥ ७॥तदनन्तर स्वाहा एवं प्रणवके साथ 'प्राणाय' का उच्चारण कर (ॐ प्राणाय स्वाहा) कहकर पहली आहुति देनी चाहिये। तदुपरान्त 'ॐ अपानाय स्वाहा' और फिर 'ॐ व्यानाय स्वाहा', पुनः 'ॐ उदानाय स्वाहा' और अन्तमें 'ॐ समानाय स्वाहा' कहकर पाँचवीं आहुति देनी चाहिये। इनका रहस्य समझते हुए द्विजको आत्मामें आहुति देनी चाहिये²॥ ६-७॥

१-भोजनके आरम्भ एवं अन्तमें आपोशान (आचमन) करके अन्नको अनग्र एवं अमृत किया जाता है।
२-आत्मामें आहुति देनेकी भावनासे भोजनके प्रारम्भमें छोटे-छोटे पाँच ग्रास मुखमें 'प्राणाय स्वाहा' आदि पाँच मन्त्रोंसे देना चाहिये।

* अध्याय १९ *३४९
शेषमन्नं यथाकामं भुञ्जीतव्यं जनैर्युतम्।<br>ध्यात्वा तन्मनसा देवमात्मानं वै प्रजापतिम्॥ ८॥<br><br>अमृतापिधानमसीत्युपरिष्टादपः पिबेत्।<br>आचान्तः पुनराचामेदायं गौरिति मन्त्रतः॥ ९॥<br><br>द्रुपदां वा त्रिरावर्त्य सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>प्राणानां ग्रन्थिरसीत्यालभेद हृदयं ततः॥ १०॥<br>आचम्याङ्गुष्ठमात्रेति पादाङ्गुष्ठेऽथ दक्षिणे।<br>निःस्रावयेद् हस्तजलमूर्ध्वहस्तः समाहितः॥ ११॥<br><br>हुतानुमन्त्रणं कुर्यात् श्रद्धायामिति मन्त्रतः।<br>अथाक्षरेण स्वात्मानं योजयेद् ब्रह्मणोति हि॥ १२॥<br><br>सर्वेषामेव यागानामात्मयागः परः स्मृतः।<br>योऽनेन विधिना कुर्यात् स याति ब्रह्मणः क्षयम्॥ १३॥<br>यज्ञोपवीती भुञ्जीत स्रग्गन्धालङ्कृतः शुचिः।<br>सायंप्रातर्नान्तरा वै संध्यायां तु विशेषतः॥ १४॥<br><br>नाद्यात् सूर्यग्रहात् पूर्वमह्नि सायं शशिग्रहात्।<br>ग्रहकाले च नाश्नीयात् स्नात्वाश्नीयात् तु मुक्तयोः॥ १५॥<br><br>मुक्ते शशिनि भुञ्जीत यदि न स्यान्महानिशा।<br>अमुक्तयोरस्तंगतयोर्दृष्ट्वा दृष्ट्वा परेऽहनि॥ १६॥<br>नाश्नीयात् प्रेक्षमाणानामप्रदायैव दुर्मतिः।<br>न यज्ञशिष्टादन्यद् वा न क्रुद्धो नान्यमानसः॥ १७॥<br><br>आत्मार्थं भोजनं यस्य रत्यर्थं यस्य मैथुनम्।<br>वृत्त्यर्थं यस्य चाधीतं निष्फलं तस्य जीवितम्॥ १८॥फिर देव प्रजापति तथा आत्माका मनसे ध्यान करते हुए अवशिष्ट अन्न (भोजन)-का बन्धुओंके साथ इच्छानुसार भोजन करना चाहिये। (भोजन कर लेनेके बाद) 'अमृतापिधानमसि' यह मन्त्र पढ़कर जल पीना (आचमन करना) चाहिये। आचमनके उपरान्त पुनः 'आयं गौः*०' इस मन्त्रको पढ़ते हुए आचमन करना चाहिये। तदनन्तर सभी प्रकारके पापोंका नाश करनेवाली 'द्रुपदा०' का तीन बार पाठकर 'प्राणानां ग्रन्थिरसि' इस मन्त्रसे हृदयका स्पर्श करे॥ ८-१०॥<br><br>ऊपर हाथ किये हुए समाहितमन होकर आचमन करके 'अङ्गुष्ठमात्रेति' मन्त्रद्वारा दाहिने पैरके अँगुठेपर हाथका जल गिराना चाहिये। 'श्रद्धायाम्०' इस मन्त्रसे हुतानुमन्त्रण करे। तदनन्तर 'ब्रह्मण०' इस मन्त्रसे अपनी आत्माका अक्षर-तत्त्वसे योग करना चाहिये। सभी यागोंमें आत्मयाग श्रेष्ठ कहा गया है। जो इस विधिसे (आत्मयाग) करता है, वह ब्रह्मधाममें जाता है॥ ११-१३॥<br><br>यज्ञोपवीती होकर अर्थात् सव्य होकर तथा माला (एवं चन्दनकी) सुगन्धिसे अलंकृत होकर पवित्रतापूर्वक भोजन करना चाहिये। सायंकाल, प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और विशेषरूपसे संध्याकाल (प्रदोषकाल)-के समय भोजन नहीं करना चाहिये। सूर्यग्रहणसे पहले दिनमें, चन्द्रग्रहणसे पूर्व सायंकालमें तथा ग्रहणकालमें भोजन नहीं करना चाहिये। ग्रहणकी मुक्ति हो जानेपर स्नान करनेके अनन्तर भोजन करना चाहिये। चन्द्रमाके ग्रहणसे मुक्त हो जानेपर यदि अर्धरात्रि न हो तो भोजन करना चाहिये। बिना ग्रहणसे मुक्त हुए चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके अस्त हो जानेपर दूसरे दिन उनका दर्शन करके भोजन करना चाहिये॥ १४-१६॥<br><br>देखनेवालों (भूखे व्यक्तियों)-को बिना दिये हुए तथा दुर्मना होकर भोजन नहीं करना चाहिये। यज्ञसे अवशिष्ट अन्नसे भिन्न अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। अन्यमनस्क होकर तथा क्रुद्ध होकर भोजन नहीं करना चाहिये। जो केवल अपने लिये ही भोजन बनाता है, जो केवल कामसुखके लिये ही मैथुन करता है और जो केवल आजीविका प्राप्त हो जाय-इस उद्देश्यसे अध्ययन करता है, उसका जीवन निष्फल ही है॥ १७-१८॥

  • आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदनू मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः। (यजु० ३। ६)