भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १६ * ३२३

सोलहवाँ अध्याय

सदाचारका वर्णन

व्यास उवाच

न हिंस्यात् सर्वभूतानि नानृतं वा वदेत् क्वचित्।
नाहितं नाप्रियं वाक्यं न स्तेनः स्याद् कदाचन ॥ १ ॥

तृणं वा यदि वा शाकं मृदं वा जलमेव वा।
परस्यापहरञ्जन्तुर्नरकं प्रतिपद्यते ॥ २ ॥

न राज्ञः प्रतिगृह्णीयान्न शूद्रपतितादपि।
न चान्यस्मादशक्तश्च निन्दितान् वर्जयेद् बुधः ॥ ३ ॥

नित्यं याचनको न स्यात् पुनस्तं नैव याचयेत्।
प्राणानपहरत्येवं याचकस्तस्य दुर्मतिः ॥ ४ ॥

न देवद्रव्यहारी स्याद् विशेषेण द्विजोत्तमः।
ब्रह्मस्वं वा नापहरेदापद्यपि कदाचन ॥ ५ ॥

न विषं विषमित्याहुर्ब्रह्मस्वं विषमुच्यते।
देवस्वं चापि यत्नेन सदा परिहरेत् ततः ॥ ६ ॥

पुष्पे शाकोदके काष्ठे तथा मूले फले तृणे।
अदत्तादानमस्तेयं मनुः प्राह प्रजापतिः ॥ ७ ॥

गृहीतव्यानि पुष्पाणि देवार्चनविधौ द्विजाः।
नैकस्मादेव नियतमननुज्ञाय केवलम् ॥ ८ ॥

तृणं काष्ठं फलं पुष्पं प्रकाशं वै हरेद् बुधः।
धर्मार्थं केवलं विप्रा ह्यन्यथा पतितो भवेत् ॥ ९ ॥

**व्यासजीने कहा—**किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये और कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिये। अहितकर और अप्रिय वचन नहीं बोलना चाहिये और कभी भी चोरी नहीं करनी चाहिये। दूसरेके तृण, शाक, मिट्टी अथवा जलका भी अपहरण करनेवाला प्राणी नरक प्राप्त करता है। राजा^१, शूद्र तथा पतित व्यक्तिसे दान नहीं लेना चाहिये। अशक्त होनेपर भी दूसरेसे याचना नहीं करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्तिको निन्दितों (पापमें रत)-का परित्याग करना चाहिये ॥ १–३ ॥

नित्य याचना करनेवाला नहीं होना चाहिये और एक ही व्यक्तिसे दुबारा नहीं माँगना चाहिये। याचना करनेवाला दुर्बुद्धि व्यक्ति (दाताके) प्राणोंका ही हरण^२ करता है। विशेषरूपसे श्रेष्ठ ब्राह्मणको देवसम्बन्धी द्रव्यका अपहरण नहीं करना चाहिये। आपत्ति पड़नेपर भी ब्राह्मणके धनका कभी भी अपहरण न करे ॥ ४–५ ॥

विषको विष नहीं कहा जाता बल्कि ब्राह्मणका धन ही विष-रूप है। इसी प्रकार देवसम्बन्धी स्वत्वका भी प्रयत्नपूर्वक सदा त्याग करना चाहिये। प्रजापति मनुने पुष्प, शाक, जल, लकड़ी, मूल, फल तथा तृण—इन सभी पदार्थोंको (इनके स्वामीद्वारा) बिना दिये ग्रहण कर लेनेको अस्तेय कहा है (अर्थात् पुष्प, शाक आदि यदि दूसरेके हैं तब भी अत्यावश्यक होनेपर धर्मार्थ या प्राणरक्षार्थ इनका प्रयोजनानुसार ग्रहण करनेपर चोरीका दोष नहीं लगता) ॥ ६–७ ॥

द्विजो! देवपूजाके लिये अन्य स्वामीका पुष्प ग्रहण किया जा सकता है। परंतु केवल एक ही स्थानसे बिना आज्ञाके प्रतिदिन पुष्प नहीं ग्रहण करना चाहिये। विप्रो! विद्वान् व्यक्ति केवल धर्मकार्यके लिये तृण, काष्ठ, फल, पुष्प प्रकट-रूपसे ग्रहण कर सकता है, अन्य प्रकारसे ग्रहण करनेपर वह पतित हो जाता है ॥ ८–९ ॥


१-राजासे दान लेनेपर तेजका ह्रास होता है—'राजात्रं हरते तेजः'।
२-पुनः-पुनः याचनासे दाताको कष्ट होना स्वाभाविक है। अतः यहाँ दाताके प्राण-हरणसे तात्पर्य कष्ट पहुँचानेसे है।

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