संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३२२ * कूर्मपुराण *
| यया स देवो भगवान् विद्यया वेद्यते परः।<br>साक्षाद् देवो महादेवस्तज्ज्ञानमिति कीर्तितम्॥ ३६॥<br><br>तन्निष्ठस्तत्परो विद्वान्नित्यमक्रोधनः शुचिः।<br>महायज्ञपरो विप्रो लभते तदनुत्तमम्॥ ३७॥<br><br>धर्मस्यायतनं यत्नाच्छरीरं परिपालयेत्।<br>न हि देहं विना रुद्रः पुरुषैर्विद्यते परः॥ ३८॥<br><br>नित्यं धर्मार्थकामेषु युञ्जीत नियतो द्विजः।<br>न धर्मवर्जितं काममर्थं वा मनसा स्मरेत्॥ ३९॥<br><br>सीदन्नपि हि धर्मेण न त्वधर्मं समाचरेत्।<br>धर्मो हि भगवान् देवो गतिः सर्वेषु जन्तुषु॥ ४०॥<br><br>भूतानां प्रियकारी स्यात् न परद्रोहकर्मधीः।<br>न वेददेवतानिन्दां कुर्यात् तैश्च न संवसेत्॥ ४१॥ | जिस विद्याके द्वारा वे परात्पर देवाधिदेव साक्षात् भगवान् महादेव जाने जाते हैं, उसे ही ज्ञान कहा गया है। उनमें निष्ठा रखनेवाला, उनके परायण रहनेवाला, कभी भी क्रोध न करनेवाला, पवित्र, (पञ्च) महायज्ञोंको करनेवाला विद्वान् विप्र उस श्रेष्ठ तत्त्वको प्राप्त करता है। धर्मके आयतन इस शरीरका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। बिना देहके मनुष्य उस परात्पर रुद्रको नहीं जान सकता। नियत (संयत) द्विजको नित्य धर्म, अर्थ एवं कामकी साधनामें लगे रहना चाहिये। धर्मसे रहित काम अथवा अर्थका मनसे भी स्मरण नहीं करना चाहिये। धर्मके पालनमें कष्ट पाते हुए भी (उसका परित्यागकर) अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये। धर्मदेवता ही सभी प्राणियोंके भगवान् और गति हैं। (इसलिये) प्राणियोंका प्रिय करनेवाला बनना चाहिये। दूसरोंसे द्रोह करनेकी बुद्धिवाला नहीं होना चाहिये। वेदकी तथा देवताओंकी निन्दा नहीं करनी चाहिये और (जो इनकी निन्दा करता है) उसके साथ रहना (भी) नहीं चाहिये॥ ३६—४१॥ |
| यस्त्विमं नियतं विप्रो धर्माध्यायं पठेच्छुचिः।<br>अध्यापयेत् श्रावयेद् वा ब्रह्मलोके महीयते॥ ४२॥ | जो विप्र पवित्रतापूर्वक नित्य इस धर्माध्यायका अध्ययन, अध्यापन अथवा उपदेश करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ४२॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १५॥