भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १५ * ३२१

विभागशीलः सततं क्षमायुक्तो दयालुकः।<br>गृहस्थस्तु समाख्यातो न गृहेण गृही भवेत्॥ २६॥<br><br>क्षमा दया च विज्ञानं सत्यं चैव दमः शमः।<br>अध्यात्मनिरतं ज्ञानमेतद् ब्राह्मणलक्षणम्॥ २७॥<br><br>एतस्मान्न प्रमाद्येत विशेषेण द्विजोत्तमः।<br>यथाशक्ति चरन् कर्म निन्दितानि विवर्जयेत्॥ २८॥<br><br>विधूय मोहकलिलं लब्ध्वा योगमनुत्तमम्।<br>गृहस्थो मुच्यते बन्धात् नात्र कार्या विचारणा॥ २९॥<br><br>विगर्हातिक्रमाक्षेपहिंसाबन्धवधात्मकम् ।<br>अन्यमन्युसमुत्थानां दोषाणां मर्षणां क्षमा॥ ३०॥<br><br>स्वदुःखेष्विव कारुण्यं परदुःखेषु सौहृदात्।<br>दयेति मुनयः प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य साधनम्॥ ३१॥<br><br>चतुर्दशानां विद्यानां धारणं हि यथार्थतः।<br>विज्ञानमिति तद् विद्याद् येन धर्मो विवर्धते॥ ३२॥<br><br>अधीत्य विधिवद् विद्यामर्थं चैवोपलभ्य तु।<br>धर्मकार्यान्निवृत्तश्चेन्न तद् विज्ञानमिष्यते॥ ३३॥<br><br>सत्येन लोकाञ्जयति सत्यं तत्परमं पदम्।<br>यथाभूतप्रवादं तु सत्यमाहुर्मनीषिणः॥ ३४॥<br><br>दमः शरीरोपरमः शमः प्रज्ञाप्रसादजः।<br>अध्यात्ममक्षरं विद्याद् यत्र गत्वा न शोचति॥ ३५॥अपनी सम्पत्तिका (शास्त्रानुसार यथायोग्य) सदा विभाग करनेवाला¹, क्षमावान्, दयायुक्त व्यक्ति ही गृहस्थ कहलाता है। केवल गृहमें रहनेसे कोई गृहस्थ नहीं कहलाता। क्षमा, दया, विशिष्ट ज्ञान (लौकिक एवं शास्त्रीय ज्ञान), सत्य, दम, शम और अध्यात्मज्ञानमें निरत होना—यह ब्राह्मणका लक्षण है। यथाशक्ति (विहित) कर्मोंको करते हुए निन्दित कर्मोंका परित्याग करना चाहिये॥ २६-२८॥<br><br>विशेषरूपसे श्रेष्ठ द्विजको इस सम्बन्धमें प्रमाद नहीं करना चाहिये। मोहरूपी कलिमषको धोकर और श्रेष्ठ योगको प्राप्तकर गृहस्थ बन्धनसे मुक्त हो जाता है। इसमें संशय नहीं करना चाहिये। दूसरेके क्रोधसे उत्पन्न अपनी निन्दा, अनादर, दोषारोपण, हिंसा, बन्धन और ताड़नस्वरूप दोषोंको सहना ही क्षमा है॥ २९-३०॥<br><br>सौहार्दवश अपने दुःखके समान ही दूसरोंके दुःखमें उनके प्रति करुणाभावको मुनियोंने 'दया' इस नामसे कहा है। यह धर्मका साक्षात् साधन है। चौदह² विद्याओंको यथार्थरूपसे धारण करनेको ही विज्ञान समझना चाहिये। इससे धर्मकी वृद्धि होती है। विधिपूर्वक विद्याको ग्रहण कर लेने और उसके अर्थको भलीभाँति जान लेनेपर भी यदि (कोई व्यक्ति) धर्म-कार्योंसे निवृत्त (विरत) रहता है, उन्हें नहीं करता तो उसका वह (अध्ययन) विज्ञान नहीं कहलाता है॥ ३१-३३॥<br><br>सत्यके आचरणसे लोकोंपर विजय प्राप्त होती है, सत्य ही वह (सर्वोच्च) परमपद है। जो जैसा है उसका उसी रूपमें कथन ही मनीषियोंने सत्य कहा है। शरीरका उपरम (शरीरकी चेष्टाओंका नियन्त्रण अर्थात् इन्द्रियोंका निग्रह) दम है और शम (मनका नियन्त्रण) प्रज्ञा (प्रकृष्ट ज्ञान)-के विशद अवभाससे उत्पन्न होता है। अध्यात्म (आत्म-सम्बन्धी) ज्ञानको ही अविनाश्वर तत्त्व समझना चाहिये जहाँ पहुँचनेपर शोक नहीं होता॥ ३४-३५॥

१-सम्पत्तिका पाँच भाग—(१) धर्मके लिये, (२) यशके लिये, (३) सम्पत्तिको बढ़ानेके लिये, (४) अपने भोगके लिये, (५) स्वजनके लिये—करनेसे इस लोक तथा परलोकमें सुख प्राप्त होता है।
२-चार वेद, छः वेदाङ्ग (—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दःशास्त्र, ज्योतिष), पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र—ये चौदह विद्याएँ हैं।