भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२० * कूर्मपुराण *

अभ्यसेत् प्रयतो वेदं महायज्ञान् न हापयेत् ।<br>कुर्याद् गृह्याणि कर्माणि संध्योपासनमेव च ॥ १५ ॥<br><br>सख्यं समाधिकैः कुर्यादुपैयादीश्वरं सदा ।<br>दैवतान्यपि गच्छेत कुर्याद् भार्याभिपोषणम् ॥ १६ ॥<br><br>न धर्मं ख्यापयेद् विद्वान् न पापं गूहयेदपि ।<br>कुर्वीतात्महितं नित्यं सर्वभूतानुकम्पकः ॥ १७ ॥<br><br>वयसः कर्मणोऽर्थस्य श्रुतस्याभिजनस्य च ।<br>वेषवाग्बुद्धिसारूप्यमाचरन् विचरेत् सदा ॥ १८ ॥<br><br>श्रुतिस्मृत्युदितः सम्यक् साधुभिर्यश्च सेवितः ।<br>तमाचारं निषेवेत नेहेतान्यत्र कर्हिचित् ॥ १९ ॥<br><br>येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः ।<br>तेन यायात् सतां मार्गं तेन गच्छन् न रिष्यति ॥ २० ॥<br><br>नित्यं स्वाध्यायशीलः स्यान्नित्यं यज्ञोपवीतवान् ।<br>सत्यवादी जितक्रोधो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २१ ॥<br><br>संध्यास्नानपरो नित्यं ब्रह्मयज्ञपरायणः ।<br>अनसूयो मृदुर्दान्तो गृहस्थः प्रेत्य वर्धते ॥ २२ ॥<br><br>वीतरागभयक्रोधो लोभमोहविवर्जितः ।<br>सावित्रीजाप्यनिरतः श्राद्धकृन्मुच्यते गृही ॥ २३ ॥<br><br>मातापित्रोर्हिते युक्तो गोब्राह्मणहिते रतः ।<br>दान्तो यज्वा देवभक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ २४ ॥<br><br>त्रिवर्गसेवी सततं देवतानां च पूजनम्।<br>कुर्यादहरहर्नित्यं नमस्येत् प्रयतः सुरान् ॥ २५ ॥प्रयत्नपूर्वक वेदोंका अभ्यास करे। (पञ्च) महायज्ञोंका परित्याग न करे। अपने गृह्यसूत्रोंमें प्रतिपादित कर्मोंको करे और संध्योपासन कर्म करे ॥ १५ ॥<br><br>अपने समान अथवा श्रेष्ठ व्यक्तिसे मित्रता करे। ईश्वरकी आराधना करे। देवताओंकी भी पूजा करे और अपनी भार्याका भलीभाँति पोषण करे। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि (अपने द्वारा अनुष्ठित) धर्मका वर्णन न करे और न अपने द्वारा किये गये पापको ही छिपाये। आत्मकल्याणका प्रयत्न करे और सदैव सभी प्राणियोंपर दया करे। अपनी अवस्था, कर्म, सम्पत्ति, ज्ञान और कुलके अनुसार सदा वेष धारण करे तथा संयत-वाणी और बुद्धिसे यथोचित आचरण करते हुए लौकिक व्यवहारका निर्वाह करे। वेदों तथा धर्मशास्त्रोंमें जो कहा गया हो और जो सत्पुरुषोंसे भलीभाँति अनुष्ठित हो, उसी सदाचारका पालन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त कभी भी दूसरे आचारका पालन नहीं करना चाहिये ॥ १६–१९ ॥<br><br>यदि शास्त्रोंसे अपने मार्गका निर्धारण करनेमें किसी कारण असमर्थ्य हो तो (शास्त्रोक्त) जिस मार्गसे माता-पिता गये हों और पितामह आदिने जिस मार्गका अवलम्बन किया हो, उसी मार्गका स्वयं भी अनुसरण करना चाहिये। यही सज्जनोंका मार्ग है। इस मार्गका अवलम्बन करनेवालेका पतन नहीं होता ॥ २० ॥<br><br>नित्य स्वाध्यायपरायण रहे, नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहे। सत्य बोलनेवाला एवं क्रोधपर विजय प्राप्त करनेवाला, ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। नित्य स्नान और संध्या करनेवाला, ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याय)-परायण रहनेवाला, असूयारहित, मृदु तथा जितेन्द्रिय गृहस्थ परलोकमें अभ्युदय प्राप्त करता है। राग, भय और क्रोधसे रहित, लोभ एवं मोहसे शून्य, गायत्रीके जपमें तत्पर रहनेवाला और श्राद्ध करनेवाला गृहस्थ मुक्त हो जाता है। माता, पिता, गौ और ब्राह्मणके हित करनेमें निरत रहनेवाला, जितेन्द्रिय, यजन करनेवाला तथा देवताओंका भक्त ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। निरन्तर (धर्म, अर्थ एवं कामरूप) त्रिवर्गका पालन और देवताओंका पूजन करना चाहिये तथा प्रयत्नपूर्वक नित्य देवताओंको नमस्कार करना चाहिये ॥ २१–२५ ॥