भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 44
३४* कूर्मपुराण *
वीक्षते परमात्मानं परं ब्रह्म महेश्वरम्।<br>नित्यानन्दं निराभासं तस्मिन्नेव लयं व्रजेत्॥ २६॥<br><br>तस्मात् सेवेत सततं कर्मयोगं प्रसन्नधीः।<br>तृप्तये परमेशस्य तत् पदं याति शाश्वतम्॥ २७॥(ऐसा व्यक्ति) नित्यानन्दस्वरूप, निराभास (स्वतः-प्रकाश), महेश्वर, परम ब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर उसीमें लीन हो जाता है। इसलिये प्रसन्नचित्त होकर परमेश्वरकी संतुष्टिके लिये निरन्तर कर्मयोगका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। (इससे वह परमेश्वरके) उस सनातन पदको प्राप्त करता है॥ २६-२७॥
एतद् वः कथितं सर्वं चातुराश्रम्यमुत्तमम्।<br>न ह्येतत् समतिक्रम्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ २८॥इस प्रकार आप लोगोंको यह चारों आश्रमोंका सम्पूर्ण श्रेष्ठ क्रम बतलाया। इस क्रमका अतिक्रमण करके कोई भी मनुष्य सिद्धिको प्राप्त नहीं कर सकता॥ २८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तीसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ ३॥


चौथा अध्याय

सांख्य-सिद्धान्तके अनुसार ब्रह्माण्डकी सृष्टिका क्रम, पञ्चीकरण-प्रक्रिया तथा परमेश्वरके विविध नामोंका निरूपण

सूत उवाचसूतजीने कहा—आश्रमोंके सम्बन्धमें पूरे विधिविधानको सुनकर प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने भगवान् हृषीकेशको नमस्कार करके पुनः इस प्रकारका वचन कहा—॥ १॥
श्रुत्वाश्रमविधिं कृत्स्नमृषयो हृष्टमानसाः।<br>नमस्कृत्य हृषीकेशं पुनर्वचनमब्रुवन्॥ १॥
मुनय ऊचुःमुनिजन बोले—(भगवन्!) आपने श्रेष्ठ चारों आश्रमोंके विषयमें सब कुछ बतलाया, अब इस समय हमें यह सुननेकी इच्छा है कि इस जगत्की सृष्टि कैसे होती है। हे पुरुषोत्तम! यह सब (संसार) कहाँसे उत्पन्न हुआ, किसमें विलीन होगा और इन सबका नियामक कौन है? यह सब आप बतलायें। ऋषियोंका वचन सुनकर कूर्मरूप धारण करनेवाले तथा सभी भूत-प्राणियोंके उत्पत्ति और विनाशके स्थान भगवान् नारायण गम्भीर वाणीमें बोले—॥ २–४॥
भाषितं भवता सर्वं चातुराश्रम्यमुत्तमम्।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामो यथा सम्भवते जगत्॥ २॥
कुतः सर्वमिदं जातं कस्मिंश्च लयमेष्यति।<br>नियन्ता कश्च सर्वेषां वदस्व पुरुषोत्तम॥ ३॥
श्रुत्वा नारायणो वाक्यमृषीणां कूर्मरूपधृक्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा भूतानां प्रभवाप्ययौ॥ ४॥
श्रीकूर्म उवाच**श्रीकूर्मने कहा—**सर्वत्र (चारों ओर) मुखवाले महेश्वर (प्रकृतिसे) पर, अव्यक्त, चतुर्व्यूह, सनातन, अनन्त, अप्रमेय तथा (समस्त जगत्के) नियन्ता हैं। तत्त्वचिन्तक जिसे प्रधान और प्रकृति कहते हैं और जो सत्-असत्-रूप हैं, वही अव्यक्त नित्य कारण है॥ ५-६॥
महेश्वरः परोऽव्यक्तश्चतुर्व्यूहः सनातनः।<br>अनन्तश्चाप्रमेयश्च नियन्ता विश्वतोमुखः॥ ५॥
अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम्।<br>प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ६॥
गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।<br>अजरं ध्रुवमक्षय्यं नित्यं स्वात्मन्यवस्थितम्॥ ७॥गन्ध, वर्ण और रससे हीन, शब्द-स्पर्शसे रहित, अजर, ध्रुव, अक्षय्य (कभी नाश न होनेवाला), नित्य
संक्षिप्त कूर्मपुराण · पृष्ठ 44, कुल 506 में से · BharatKosha