संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय ४ * | ३५ |
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| जगद्योन्निर्महाभूतं परं ब्रह्म सनातनम्।<br>विग्रहः सर्वभूतानामात्मनाधिष्ठितं महत्॥ ८ ॥<br><br>अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभवाप्ययम्।<br>असाम्प्रतमविज्ञेयं ब्रह्माग्ने समवर्तत॥ ९ ॥<br>गुणसाम्ये तदा तस्मिन् पुरुषे चात्मनि स्थिते।<br>प्राकृतः प्रलयो ज्ञेयो यावद् विश्वसमुद्भवः॥ १० ॥<br><br>ब्राह्मी रात्रिरियं प्रोक्ता अहः सृष्टिरुदाहृता।<br>अहर्न विद्यते तस्य न रात्रिर्ह्युपचारतः॥ ११ ॥<br>निशान्ते प्रतिबुद्धोऽसौ जगदादिरनादिमान्।<br>सर्वभूतमयोऽव्यक्त्तो ह्यन्तर्यामीश्वरः परः॥ १२ ॥<br><br>प्रकृतिं पुरुषं चैव प्रविश्याशु महेश्वरः।<br>क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः॥ १३ ॥<br>यथा मदो नरस्त्रीणां यथा वा माधवोऽनिलः।<br>अनुप्रविष्टः क्षोभाय तथासौ योगमूर्तिमान्॥ १४ ॥<br><br>स एव क्षोभको विप्राः क्षोभ्यश्च परमेश्वरः।<br>स संकोचविकासाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थितः॥ १५ ॥<br><br>प्रधानात् क्षोभ्यमाणाच्च तथा पुंसः पुरातनात्।<br>प्रादुरासीन्महद् बीजं प्रधानपुरुषात्मकम्॥ १६ ॥<br><br>महानात्मा मतिर्ब्रह्मा प्रबुद्धिः ख्यातिरीश्वरः।<br>प्रज्ञा धृतिः स्मृतिः संविदेतस्मादिति तत् स्मृतम्॥ १७ ॥<br><br>वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः।<br>त्रिविधोऽयमहंकारो महतः सम्बभूव ह॥ १८ ॥<br><br>अहंकारोऽभिमानश्च कर्ता मन्ता च स स्मृतः।<br>आत्मा च पुद्गलो जीवो यतः सर्वाः प्रवृत्तयः॥ १९ ॥<br><br>पञ्चभूतान्यहंकारात् तन्मात्राणि च जज्ञिरे।<br>इन्द्रियाणि तथा देवाः सर्वं तस्यात्मजं जगत्॥ २० ॥ | अपनी आत्मामें स्थित संसारका बीजरूप, महाभूत, सनातन, परब्रह्म, सभी प्राणियोंकी मूर्तिरूप, आत्मासे अधिष्ठित, महत्तत्त्व, अनादि, अनन्त, अजन्मा, सूक्ष्म, त्रिगुण, उत्पत्ति और प्रलयका स्थान, शाश्वत तथा अविज्ञेय ब्रह्म ही आदिमें विद्यमान था॥ ७—९॥<br>उस समय गुणोंकी साम्यावस्थारूप उस पुरुषके आत्मस्वरूपमें स्थित होनेपर जबतक विश्वकी सृष्टि नहीं हो जाती, प्राकृत प्रलय (-का समय) जानना चाहिये। यह ब्रह्माकी रात्रि कही गयी है और सृष्टिको ब्रह्माका दिन कहा गया है, (वास्तवमें) उसका न दिन होता है और न रात होती है॥ १०-११॥<br>आदिसे रहित वह जगत्का आदि कारण, सर्वभूतमय, अव्यक्त, अन्तर्यामी परात्पर ईश्वर रात्रि व्यतीत होनेपर जाग्रत् हुआ। परमेश्वर महेश्वरने प्रकृति एवं पुरुषमें शीघ्र ही प्रविष्ट होकर परम योगके द्वारा (उनमें) क्षोभ (गति) उत्पन्न किया॥ १२-१३॥<br>जैसे वसन्त ऋतुकी वायु अथवा मद पुरुष एवं स्त्रियोंको (क्षुब्ध करता है) वैसे ही वह योगविग्रह (योगबलसे विविध शरीर-धारणमें समर्थ ईश्वर) प्रकृति एवं पुरुषमें अनुप्रविष्ट होकर क्षोभका कारण बनता है। हे ब्राह्मणो! वही परमेश्वर क्षोभ उत्पन्न करनेवाला है एवं स्वयं क्षुब्ध होनेवाला है, वह प्रलय एवं सृष्टि करनेके कारण प्रधान भी कहलाता है। प्रधान पुरातनपुरुषके क्षुब्ध होनेसे प्रधान (प्रकृति) पुरुषात्मक महद् बीजका आविर्भाव हुआ॥ १४-१६॥<br>इसी कारणसे (वह महद्बीज) महान् आत्मा, मति, ब्रह्मा, प्रबुद्धि, ख्याति, ईश्वर, प्रज्ञा, धृति, स्मृति तथा संवित् कहलाता है॥ १७॥<br>महत्तत्त्वसे समस्त प्राणियोंकी सृष्टिका आदि कारण—वैकारिक, तैजस तथा तामस—यह तीन प्रकारका अहंकार उत्पन्न हुआ॥ १८॥<br>वह अहंकार अभिमान, कर्ता, मन्ता, आत्मा, पुद्गल तथा जीव (नामों)-से कहा गया है। उसी अहंकारसे सभी प्रवृत्तियाँ होती हैं। अहंकारसे पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश), पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), सभी इन्द्रियाँ तथा उन इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवता उत्पन्न हुए। यह सम्पूर्ण जगत् उससे ही उत्पन्न हुआ है॥ १९-२०॥ |