भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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  • कूर्मपुराण *

मनस्त्वव्यक्तजं प्रोक्तं विकारः प्रथमः स्मृतः ।<br>येनासौ जायते कर्ता भूतादींश्चानुपश्यति ॥ २१ ॥अव्यक्तसे उत्पन्न मनको प्रथम विकार माना गया है। इस कारण यह कर्ता एवं भूतादिकोंको देखनेवाला है। वैकारिक अहंकारसे वैकारिक सृष्टि उत्पन्न हुई। इन्द्रियाँ तैजस हैं और (उन इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) दस देवता वैकारिक हैं ॥ २१-२२ ॥
वैकारिकादहंकारात् सर्गो वैकारिकोऽभवत् ।<br>तैजसानीन्द्रियाणि स्युर्देवा वैकारिका दश ॥ २२ ॥<br>एकादशं मनस्तत्र स्वगुणेनोभयात्मकम् ।<br>भूततन्मात्रसर्गोऽयं भूतादेरभवन् प्रजाः ॥ २३ ॥उनमें (ग्यारहवाँ) इन्द्रिय मन अपने गुणके कारण उभयात्मक* है। यह भूततन्मात्राओंकी सृष्टि है। भूतादिकोंसे ही प्रजा उत्पन्न हुई। विकारप्राप्त भूतोंने शब्दतन्मात्राको उत्पन्न किया। उस (शब्द तन्मात्रा)-से शब्द लक्षण-वाले तथा अवकाशस्वरूप आकाशकी उत्पत्ति हुई। वैकारिक आकाशने स्पर्श तन्मात्राको उत्पन्न किया। उससे वायु उत्पन्न हुआ और वायुका गुण स्पर्श कहा गया है ॥ २३-२५ ॥
भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दमात्रं ससर्ज ह ।<br>आकाशं शुषिरं तस्मादुत्पन्नं शब्दलक्षणम् ॥ २४ ॥
आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह ।<br>वायुरुत्पद्यते तस्मात् तस्य स्पर्शो गुणो मतः ॥ २५ ॥
वायुश्चापि विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह ।<br>ज्योतिरुपद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते ॥ २६ ॥विकारप्राप्त वायुने रूप तन्मात्राको उत्पन्न किया, वायुसे तेज उत्पन्न हुआ और इसका 'रूप' गुण कहा जाता है। विकारको प्राप्त हुए तेजने भी रस तन्मात्राकी सृष्टि की और उससे फिर जलकी उत्पत्ति हुई, वह जल इस 'रस' गुणका आधार है। विकारको प्राप्त हो रहे जलने गन्ध तन्मात्राको उत्पन्न किया, उससे संघात (पृथ्वीतत्त्व) उत्पन्न हुआ और उसका गुण 'गन्ध' माना गया है ॥ २६-२८ ॥
ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह ।<br>सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि तु ॥ २७ ॥
आपश्चापि विकुर्वन्त्यो गन्धमात्रं ससर्जरे ।<br>संघातो जायते तस्मात् तस्य गन्धो गुणो मतः ॥ २८ ॥
आकाशं शब्दमात्रं यत् स्पर्शमात्रं समावृणोत् ।<br>द्विगुणस्तु ततो वायुः शब्दस्पर्शात्मकोऽभवत् ॥ २९ ॥आकाशकी शब्द नामक तन्मात्रा है, उसने स्पर्श नामक तन्मात्राको आवृत किया है, इसलिये वायु शब्द तथा स्पर्श—इन दो गुणोंवाला है। उसी प्रकार रूप (नामक) गुण, शब्द एवं स्पर्श दो गुणोंसे आविष्ट है, अतः तेज या अग्नि—शब्द, स्पर्श तथा रूप—इन तीन गुणोंवाला है। शब्द, स्पर्श तथा रूप एवं रस तन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, इसलिये रसात्मक जल-तत्त्वको चार गुणों (शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस)-से युक्त समझना चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस—ये चार गुण गन्ध तन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, इसलिये पञ्च स्थूल महाभूतसे युक्त पृथ्वी तत्त्व पाँच गुणोंवाला कहा गया है ॥ २९-३२ ॥
रूपं तथैवाविशतः शब्दस्पर्शौ गुणावुभौ ।<br>त्रिगुणः स्यात् ततो वह्निः स शब्दस्पर्शरूपवान् ॥ ३० ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसमात्रं समाविशन् ।<br>तस्माच्चतुर्गुणा आपो विज्ञेयास्तु रसात्मिकाः ॥ ३१ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धं समाविशन् ।<br>तस्मात् पञ्चगुणा भूमिः स्थूला भूतेषु शब्द्यते ॥ ३२ ॥
शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः ।<br>परस्परानुप्रवेशाद् धारयन्ति परस्परम् ॥ ३३ ॥इसी कारण ये शान्त, घोर, मूढ तथा विशेष कहलाते हैं। ये परस्पर एक-दूसरेमें प्रविष्ट होनेके कारण आपसमें एक दूसरेको धारण किये रहते हैं ॥ ३३ ॥

* हस्त आदि पाँच कर्मेन्द्रिय हैं तथा चक्षु आदि पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं। 'मन' उभयात्मक है अर्थात् संकल्प-विकल्प-रूप कर्म भी करता है तथा उसे सुख-दुःखका ज्ञान भी होता है।