भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 48

३८ * कूर्मपुराण *


एतावच्छक्यते वक्तुं मायैषा गहना द्विजाः।<br>एतत् प्राधानिकं कार्यं यन्मया बीजमीरितम्।<br>प्रजापतेः परा मूर्तिरितीयं वैदिकी श्रुतिः॥ ४७॥ब्राह्मणो! (इस विषयमें) केवल इतना ही कहा जा सकता है कि 'यह माया बहुत ही गहन है'। बीजरूपसे मैंने जिसका वर्णन किया वह सब प्रधान अर्थात् प्रकृतिका कार्य (व्यापार) है। यह (प्रकृति या माया अन्य और कोई नहीं) प्रजापतिकी (ही) परा मूर्ति है—ऐसा वेदोंका अभिमत है॥ ४७॥
ब्रह्माण्डमेतत् सकलं सप्तलोकतलान्वितम्।<br>द्वितीयं तस्य देवस्य शरीरं परमेष्ठिनः॥ ४८॥सात लोकोंके तलसे युक्त यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उन परमेष्ठी देवका दूसरा शरीर है। वेदोंके अर्थको ठीक-ठीक जाननेवाले बतलाते हैं कि सोनेके समान वर्णवाले पीत अण्डसे प्रादुर्भूत हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्मा भगवान्‌के तीसरे रूप (शरीर) हैं॥ ४८-४९॥
हिरण्यगर्भो भगवान् ब्रह्मा वै कनकाण्डजः।<br>तृतीयं भगवद्रूपं प्राहुर्वेदार्थवेदिनः॥ ४९॥
रजोगुणमयं चान्यद् रूपं तस्यैव धीमतः।<br>चतुर्मुखः स भगवान् जगत्सृष्टौ प्रवर्तते॥ ५०॥उन्हीं धीमान्‌का जो रजोगुणयुक्त अन्य रूप है, वे ही चतुर्मुख भगवान् ब्रह्मा हैं तथा संसारकी सृष्टि करते हैं। स्वयं विश्वेश्वर विश्वतोमुख विश्वात्मा भगवान् विष्णु सत्त्वगुणका आश्रय ग्रहणकर उत्पन्न हुए सम्पूर्ण (संसार)-का पालन-पोषण करते हैं। अन्तकालमें स्वयं परमेश्वर सर्वात्मा रुद्रदेव तमोगुणका समाश्रयणकर संसारका संहार करते हैं॥ ५०—५२॥
सृष्टं च पाति सकलं विश्वात्मा विश्वतोमुखः।<br>सत्त्वं गुणमुपाश्रित्य विष्णुर्विश्वेश्वरः स्वयम्॥ ५१॥
अन्तकाले स्वयं देवः सर्वात्मा परमेश्वरः।<br>तमोगुणं समाश्रित्य रुद्रः संहरते जगत्॥ ५२॥
एकोऽपि सन्महादेवस्त्रिधासौ समवस्थितः।<br>सर्गरक्षालयगुणैर्निर्गुणोऽपि निरञ्जनः।<br>एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः॥ ५३॥एक होनेपर भी वे निर्गुण-निरञ्जन महादेव सृष्टि, पालन और संहाररूपी तीन गुणोंके कारण तीन रूपोंमें स्थित हैं। वे कभी एक, कभी दो, कभी तीन तथा कभी अनन्त रूप धारण कर लेते हैं। वे योगेश्वर (परमात्मा) अपनी लीलासे अनेक आकार, क्रिया, रूप तथा नामवाले शरीरोंका निर्माण करते हैं और फिर संहार कर डालते हैं॥ ५३-५४॥
योगेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च।<br>नानाकृतिक्रियारूपनामवन्ति स्वलीलया॥ ५४॥
हिताय चैव भक्तानां स एव ग्रसते पुनः।<br>त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैकाल्ये सम्प्रवर्तते।<br>सृजते ग्रसते चैव वीक्षते च विशेषतः॥ ५५॥भक्तोंके कल्याणके लिये ही वे पुनः संहार करते हैं। अपनेको तीन रूपोंमें विभक्तकर तीनों कालोंमें प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार (वे) विशेष रूपसे सृष्टि, संहार और पालनका कार्य करते हैं॥ ५५॥
यस्मात् सृष्टाननुगृह्णाति ग्रसते च पुनः प्रजाः।<br>गुणात्मकत्वात् त्रैकाल्ये तस्मादेकः स उच्यते॥ ५६॥चूँकि वे (स्वयं ही) प्रजाकी सृष्टि करते हैं, उसका पालन करते हैं और (स्वयं उसका) पुनः संहार करते हैं, इसलिये तीनों कालोंमें (सत्त्व, रज तथा तमरूप) त्रिगुणात्मक होनेसे वे (परमात्मा) एक (अद्वैत) कहलाते हैं। प्रारम्भमें वे सनातन हिरण्यगर्भ प्रादुर्भूत हुए। आदिमें उत्पन्न होनेसे वे आदिदेव तथा अजन्मा होनेसे अज कहलाते हैं॥ ५६-५७॥
अग्रे हिरण्यगर्भः स प्रादुर्भूतः सनातनः।<br>आदित्वादादिदेवोऽसौ अजातत्वादजः स्मृतः॥ ५७॥