संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ४ * | ३९ ---|---
पाति यस्मात् प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः।<br>देवेषु च महादेवो महादेव इति स्मृतः॥ ५८॥ | वे समस्त प्रजाओंका पालन करते हैं, इसलिये 'प्रजापति' इस नामसे कहे जाते हैं और देवताओंमें सबसे बड़े देव हैं, इसलिये 'महादेव' कहलाते हैं॥ ५८॥ बृहत्त्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा परत्वात् परमेश्वरः।<br>वशित्वादप्यवश्यत्वादीश्वरः परिभाषितः॥ ५९॥ | बृहत् होनेसे वे ब्रह्मा तथा परम (श्रेष्ठ) होनेके कारण परमेश्वर कहे जाते हैं। सबको अपने वशमें रखनेवाले, परंतु स्वयं किसीके वशमें न रहनेके कारण वे ईश्वर (नामसे) परिभाषित किये जाते हैं। ऋषिः सर्वत्रगत्वेन हरिः सर्वहरो यतः।<br>अनुत्पादाच्च पूर्वत्वात् स्वयम्भूरिति स स्मृतः॥ ६०॥ | उनकी सर्वत्र गति होनेके कारण वे ऋषि और (प्रलयकालमें) सब कुछ हरण करनेके कारण हरि कहलाते हैं। किसीके द्वारा उत्पन्न न होने तथा सर्वप्रथम होनेके कारण 'स्वयम्भू' इस नामसे कहे जाते हैं। सभी मनुष्योंके वे अयन (आश्रय-स्थान) हैं, इसलिये नराणामयनो यस्मात् तेन नारायणः स्मृतः।<br>हरः संसारहरणाद् विभुत्वाद् विष्णुरुच्यते॥ ६१॥<br>भगवान् सर्वविज्ञानादवनादोमिति स्मृतः।<br>सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात् सर्वः सर्वमयो यतः॥ ६२॥ | नारायण कहे जाते हैं, संसारका संहार करनेसे हर तथा सर्वत्र व्यापक होनेसे विष्णु कहलाते हैं॥ ५९-६१॥<br>(वे) सब कुछ जाननेके कारण भगवान् तथा रक्षा-कार्य करनेसे ॐ कहलाते हैं। सभीका विशिष्ट ज्ञान होनेसे सर्वज्ञ तथा सभीके आत्मस्वरूप होनेके कारण वे सर्व कहे जाते हैं। वे मलशून्य हैं, इसलिये शिव और सर्वत्र व्याप्त होनेसे विभु तथा शिवः स निर्मलो यस्माद् विभुः सर्वगतो यतः।<br>तारणात् सर्वदुःखानां तारकः परिगीयते॥ ६३॥ | सभी प्रकारके कष्टोंका निवारण करनेसे 'तारक' कहलाते हैं॥ ६२-६३॥ बहुनात्र किमुक्तेन सर्वं ब्रह्ममयं जगत्।<br>अनेकभेदभिन्नस्तु क्रीडते परमेश्वरः॥ ६४॥ | और अधिक कहनेसे क्या लाभ! यह सारा जगत् ब्रह्ममय ही है और वे परमेश्वर अनेक रूपोंमें विभक्त होकर अनेक क्रीड़ाएँ (लीलाएँ) करते रहते हैं॥ ६४॥ इत्येष प्राकृतः सर्गः संक्षेपात् कथितो मया।<br>अबुद्धिपूर्वको विप्रा ब्राह्मीं सृष्टिं निबोधत॥ ६५॥ | हे ब्राह्मणो! मैंने संक्षेपमें इस अबुद्धिपूर्वक हुए प्राकृत सर्ग (प्राकृत सृष्टि)-का वर्णन किया है। अब आप लोग ब्रह्माकी सृष्टिके सम्बन्धमें सुनें॥ ६५॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ॥ ४॥