संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 50, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 50
४० * कूर्मपुराण *
पाँचवाँ अध्याय
ब्रह्माजीकी आयुका वर्णन, युग, मन्वन्तर तथा कल्प आदि कालकी गणना, प्राकृत प्रलय तथा कालकी महिमाका वर्णन
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा— श्रेष्ठ ब्राह्मणो! स्वयम्भू-ब्रह्माके बीते हुए कालकी गणनाका वर्णन बहुत वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। संक्षेपमें कालकी गणना दो परार्ध कही गयी है। वही परम काल है और उसके बीत जानेपर प्रलय होता है॥ १-२॥ |
|---|---|
| स्वयम्भुवो विवृत्तस्य कालसंख्या द्विजोत्तमाः।<br>न शक्यते समाख्यातुं बहुवर्षैरपि स्वयम्॥ १ ॥ | |
| कालसंख्या समासेन परार्धद्वयकल्पिता।<br>स एव स्यात् परः कालः तदन्ते प्रतिसृज्यते॥ २ ॥ | |
| निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्।<br>तत् पराख्यं तदर्धं च परार्धमभिधीयते॥ ३ ॥ | अपने मानसे ब्रह्माकी एक सौ वर्षकी आयु कही गयी है। उसी (ब्रह्माकी एक सौ वर्षकी आयु)-को 'पर' नामसे कहा जाता है और उस परका आधा 'परार्ध' कहलाता है॥ ३॥ |
| काष्ठा पञ्चदश ख्याता निमेषा द्विजसत्तमाः।<br>काष्ठास्त्रिंशत् कला त्रिंशत् कला मौहूर्तकी गतिः॥ ४ ॥ | द्विजोत्तमो! पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा कही गयी है। तीस काष्ठाकी एक कला और तीस कलाका समय एक मुहूर्त-काल होता है। उतनी ही संख्या अर्थात् तीस मुहूर्तोंका एक मानवीय अहोरात्र (दिन-रात) होता है, उतने ही अर्थात् तीस अहोरात्रोंका एक मास होता है जो दो पक्षवाला है। छः मासोंका एक अयन तथा उत्तर एवं दक्षिण नामसे दो अयनोंका एक वर्ष होता है। दक्षिण अयन अर्थात् दक्षिणायन देवताओंकी रात्रि और उत्तर अयन अर्थात् उत्तरायण (देवताओंका) दिन होता है॥ ४–६॥ |
| तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्।<br>अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः॥ ५ ॥ | |
| तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे।<br>अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ ६ ॥ | |
| दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम्।<br>चतुर्युगं द्वादशभिः तद्विभागं निबोधत॥ ७ ॥ | (श्रीकूर्मने ब्राह्मणोंसे कहा—) दिव्य बारह हजार वर्षोंका सत्य, त्रेता इत्यादि नामसे एक चतुर्युग होता है। उसके विभागोंका वर्णन सुनें॥ ७॥ |
| चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च कृतस्य तु॥ ८ ॥ | चार हजार दिव्य वर्षोंका सत्ययुग होता है। सत्ययुगकी उतने ही सौ वर्षोंकी अर्थात् चार सौ वर्षोंकी संध्या तथा संध्यांश (त्रेतायुगका संधिकाल) होता है। सत्ययुगके संध्यांशको छोड़कर क्रमशः तीन सौ, दो सौ तथा एक सौ—इस प्रकार कुल मिलाकर दिव्य छः सौ वर्षोंके द्वापर तथा कलियुगके संध्या तथा संध्यांश होते हैं॥ ८-९॥ |
| त्रिशती द्विशती संध्या तथा चैकशती क्रमात्।<br>अंशकं षट्शतं तस्मात् कृतसंध्यांशकं विना॥ ९ ॥ | |
| त्रिद्व्येकसाहस्रमतो विना संध्यांशकेन तु।<br>त्रेताद्वापरतिष्याणां कालज्ञाने प्रकीर्तितम्॥ १०॥ | कालका ज्ञान करनेके लिये संध्यांशोंसे रहित त्रेता, द्वापर तथा कलियुग क्रमशः तीन, दो तथा एक हजार (दिव्य) वर्षोंके कहे गये हैं। कुछ अधिकता लिये यही (दिव्य) बारह हजार वर्षोंका कालपरिमाण कहा गया है। इसके इकहत्तर गुना कालको एक मनुका अन्तर अर्थात् एक मन्वन्तरका समय कहा गया है॥ १०-११॥ |
| एतद् द्वादशसाहस्रं साधिकं परिकल्पितम्।<br>तदेकसप्ततिगुणं मनोरन्तरमुच्यते॥ ११ ॥ |