संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय ५ * | ४१ |
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| ब्रह्मणो दिवसे विप्रा मनवः स्युश्चतुर्दश।<br>स्वायम्भुवादयः सर्वे ततः सावर्णिकादयः ॥ १२ ॥<br><br>तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।<br>पूर्णं युगसहस्रं वै परिपाल्या नरेश्वरैः ॥ १३ ॥<br>मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि वै।<br>व्याख्यातानि न संदेहः कल्पं कल्पेन चैव हि ॥ १४ ॥<br><br>ब्राह्ममेकमहः कल्पस्तावती रात्रिरिष्यते।<br>चतुर्युगसहस्रं तु कल्पमाहुर्मनीषिणः ॥ १५ ॥<br>त्रीणि कल्पशतानि स्युस्तथा षष्टिर्द्विजोत्तमाः।<br>ब्रह्मणः कथितं वर्षं पराख्यं तच्छतं विदुः ॥ १६ ॥<br><br>तस्यान्ते सर्वतत्त्वानां स्वहेतौ प्रकृतौ लयः।<br>तेनायं प्रोच्यते सद्भिः प्राकृतः प्रतिसंचरः ॥ १७ ॥<br><br>ब्रह्मनारायणेशानां त्रयाणां प्रकृतौ लयः।<br>प्रोच्यते कालयोगेन पुनरेव च सम्भवः ॥ १८ ॥<br>एवं ब्रह्मा च भूतानि वासुदेवोऽपि शंकरः।<br>कालेनैव तु सृज्यन्ते स एव ग्रसते पुनः ॥ १९ ॥<br><br>अनादिरेष भगवान् कालोऽनन्तोऽजरोऽमरः।<br>सर्वगत्वात् स्वतन्त्रत्वात् सर्वात्मासौ महेश्वरः ॥ २० ॥<br><br>ब्रह्माणो बहवो रुद्रा ह्यन्ये नारायणादयः।<br>एको हि भगवान्नीशः कालः कविरिति श्रुतिः ॥ २१ ॥<br><br>एकमत्र व्यतीतं तु परार्धं ब्रह्मणो द्विजाः।<br>साम्प्रतं वर्तते तद्वत् तस्य कल्पोऽयमष्टमः ॥ २२ ॥<br><br>योऽतीतः सप्तमः कल्पः पाद्म इत्युच्यते बुधैः।<br>वाराहो वर्तते कल्पः तस्य वक्ष्यामि विस्तरम् ॥ २३ ॥ | ब्राह्मणो ! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु (मन्वन्तर) होते हैं। वे सभी स्वायम्भुव (प्रथम मनु) आदि तथा सावर्णिक (अष्टम मनु) आदि मनु हैं। उन नरेश्वरों (मन्वन्तराधिपों)-के द्वारा सात द्वीपों एवं पर्वतोंवाली इस पृथ्विका पूरे एक हजार युगोंतक पालन किया जाता है ॥ १२-१३ ॥<br><br>एक मन्वन्तरके वर्णनसे अन्य भी—सभी मन्वन्तरोंका वर्णन कर दिया गया है (ऐसा समझना चाहिये)। इसमें संदेह नहीं करना चाहिये। प्रत्येक कल्प (पूर्व) कल्पके समान ही होता है। ब्रह्माका एक दिन एक कल्पके बराबर और रात्रि भी उतनी (अर्थात् एक कल्पके बराबर) ही होती है। विद्वानोंने एक हजार चतुर्युगीका एक कल्प कहा है ॥ १४-१५ ॥<br><br>श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! तीन सौ साठ कल्पोंका ब्रह्माका एक वर्ष कहा गया है, उसके सौ गुने (अर्थात् ३६०×१०० = ३६,००० कल्पों या १०० वर्षोंके) कालको 'पर' इस नामसे जानना चाहिये। ('पर' नामक) उस कालके बीतनेपर सभी तत्त्वोंका अपने मूल कारण प्रकृतिमें लय हो जाता है। इसीलिये विद्वानोंने इसे प्राकृत प्रतिसञ्चर (प्राकृत प्रलय) कहा है। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनोंका प्रकृतिमें लय हो जाता है। पुनः कालयोगसे उनका आविर्भाव होना कहा जाता है ॥ १६-१८ ॥<br><br>इस प्रकार ब्रह्मा, जीव, वासुदेव तथा शंकरकी कालके द्वारा ही सर्जना होती है, पुनः वही काल इनका संहार भी करता है। यह काल भगवान् है, अनन्त है, अजर है, अमर है एवं अनादि है। सर्वव्यापी होनेसे, स्वतन्त्र होनेसे तथा सबका आत्मस्वरूप होनेसे यह महेश्वर कहलाता है ॥ १९-२० ॥<br><br>ब्रह्मा, रुद्र तथा नारायण आदि बहुत होते हैं, किंतु भगवान् एक ही है, जो ईश, काल तथा कवि कहलाता है—ऐसा वेदका अभिमत है ॥ २१ ॥<br><br>ब्राह्मणो ! इस समय ब्रह्माजीका एक परार्ध बीत चुका है, अब उनका दूसरा परार्ध चल रहा है, उस (द्वितीय परार्ध)-का यह आठवाँ कल्प चल रहा है। ब्रह्माजीका जो सातवाँ कल्प व्यतीत हो चुका है, विद्वानोंद्वारा वह 'पाद्म' (कल्प) कहा गया है। वर्तमानमें वाराह कल्प चल रहा है, इसके विस्तारका मैं वर्णन करूँगा ॥ २२-२३ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥