संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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४२ * कूर्मपुराण *
छठा अध्याय
'नारायण' नामका निर्वचन, वराहरूपधारी नारायणद्वारा पृथ्वीका उद्धार, सनकादि ऋषियोंद्वारा वराहकी स्तुति
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा—(सृष्टिके पूर्व) केवल एकमात्र समुद्र ही था अर्थात् सर्वत्र जल-ही-जल था और कुछ नहीं। कोई विभाग नहीं था, घोर अन्धकारमय था। उस समय वायु आदि सभी शान्त थे। कुछ भी जाना नहीं जाता था। स्थावर तथा जंगम (सम्पूर्ण सृष्टि)-के उस एकार्णवमें नष्ट हो जानेपर (विलीन हो जानेपर) उस समय हजार नेत्रों तथा हजार चरणोंवाले ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। हजार सिरवाले, सोनेके समान वर्णवाले, अतीन्द्रिय, ब्रह्मा जो नारायण नामवाले पुरुष कहलाते हैं, उस समय जलमें (एकार्णवमें) सोये हुए थे॥ १—३॥ |
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| आसीदेकार्णवं घोरमविभागं तमोमयम्।<br>शान्तवातादिकं सर्वं न प्रज्ञायत किञ्चन॥ १ ॥<br><br>एकार्णवे तदा तस्मिन् नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>तदा समभवद् ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥ २ ॥<br><br>सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णस्त्वतीन्द्रियः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुष्वाप सलिले तदा॥ ३ ॥ | |
| इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणम्प्रति।<br>ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवाप्ययम्॥ ४ ॥ | सम्पूर्ण संसारके सृष्टि एवं विनाशके कारण, ब्रह्मस्वरूप नारायणदेवके विषयमें यह श्लोक कहा जाता है—॥ ४ ॥ |
| आपो नारा इति प्रोक्ता नाम्ना पूर्वमिति श्रुतिः।<br>अयनं तस्य ता यस्मात् तेन नारायणः स्मृतः॥ ५ ॥<br><br>तुल्यं युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्य सः।<br>शर्वर्यन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात्॥ ६ ॥<br><br>ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतां महीम्।<br>अनुमानात् तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः॥ ७ ॥ | वेदमें 'अप्' अर्थात् 'जल' को 'नार' इस नामसे पहले कहा गया है और वह नार (जल) नरका अयन अर्थात् आश्रय-स्थान है, इस कारण वे 'नारायण' कहे जाते हैं। हजार युगोंके बराबर रात्रिका उपभोग करके वे नारायण (उस प्रलयकालीन) रात्रिके बीत जानेपर सृष्टि करनेके लिये ब्रह्मत्व ग्रहण करते हैं। तदनन्तर उस जल (एकार्णव)-में प्रलीन पृथ्वीको अनुमानद्वारा जानकर प्रजापतिने उसके उद्धारकी कामना की॥ ५—७॥ |
| जलक्रीडासु रुचिरं वाराहं रूपमास्थितः।<br>अधृष्यं मनसाप्यन्यैर्वाङ्मयं ब्रह्मसंज्ञितम्॥ ८ ॥<br><br>पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविश्य च रसातलम्।<br>दंष्ट्रयाभ्युज्जहारैनामात्माधारो धराधरः॥ ९ ॥<br><br>दृष्ट्वा दंष्ट्राग्रविन्यस्तां पृथिवीं प्रथितपौरुषम्।<br>अस्तुवञ्जनलोकस्थाः सिद्धा ब्रह्मर्षयो हरिम्॥ १० ॥ | जलमें क्रीडा करते समय (वे) अत्यन्त सुन्दर वराहरूपमें अवस्थित हो गये। (भगवान्का वह स्वरूप) अन्य लोगोंके द्वारा मनसे भी न जाना जा सकने योग्य, वाक्स्वरूप तथा ब्रह्मसंज्ञक है। धराको धारण करनेवाले (उन) धराधर एवं आत्माधारने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश करके अपनी दाढ़ (दंष्ट्रा)-द्वारा इसे (रसातलमें डूबी पृथ्वीको) ऊपर निकाला। (नारायणकी) दंष्ट्राके अग्रभागमें अवस्थित पृथ्वीको देखकर जनलोकमें रहनेवाले सिद्धों तथा ब्रह्मर्षियोंने अपने पौरुषको व्यक्त करनेवाले हरिकी (इस प्रकार) स्तुति की॥ ८—१०॥ |