संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय ६ * | ४३ ---|---:
| ऋषय ऊचुः<br>नमस्ते देवदेवाय ब्रह्मणे परमेष्ठिने ।<br>पुरुषाय पुराणाय शाश्वताय जयाय च ॥ ११ ॥<br>नमः स्वयम्भुवे तुभ्यं स्रष्ट्रे सर्वार्थवेदिने ।<br>नमो हिरण्यगर्भाय वेधसे परमात्मने ॥ १२ ॥<br>नमस्ते वासुदेवाय विष्णवे विश्वयोनये ।<br>नारायणाय देवाय देवानां हितकारिणे ॥ १३ ॥<br>नमोऽस्तु ते चतुर्वक्त्र शार्ङ्गचक्रासिधारिणे ।<br>सर्वभूतात्मभूताय कूटस्थाय नमो नमः ॥ १४ ॥ | ऋषि बोले—देवाधिदेव, पुराणपुरुष, सनातन, जयस्वरूप परमेष्ठी ब्रह्माको नमस्कार है। सृष्टि करनेवाले तथा सभी अर्थोंके ज्ञाता स्वयम्भू! आपको नमस्कार है। हिरण्यगर्भ, वेधा परमात्माको नमस्कार है। विश्वके उत्पत्ति-स्थान, देवोंके हितकारी, वासुदेव, नारायणदेव विष्णुको नमस्कार है। शार्ङ्ग (धनुष), चक्र (सुदर्शन) तथा तलवार (नन्दक) आदि धारण करनेवाले चतुर्मुख! आपको नमस्कार है। सभी प्राणियोंके आत्मरूप, कूटस्थको बार-बार नमस्कार है॥ ११—१४॥ |
| नमो वेदरहस्याय नमस्ते वेदयोनये ।<br>नमो बुद्धाय शुद्धाय नमस्ते ज्ञानरूपिणे ॥ १५ ॥<br>नमोऽस्त्वानन्दरूपाय साक्षिणे जगतां नमः ।<br>अनन्तायाप्रमेयाय कार्याय करणाय च ॥ १६ ॥<br>नमस्ते पञ्चभूताय पञ्चभूतात्मने नमः ।<br>नमो मूलप्रकृतये मायारूपाय ते नमः ॥ १७ ॥ | वेदके रहस्यरूपको नमस्कार है। वेद-योनिको नमस्कार है। शुद्ध-बुद्धको नमस्कार है। ज्ञानरूपको नमस्कार है। आनन्दस्वरूपको नमस्कार है। जगत्के साक्षी, अनन्त, अप्रमेय तथा कार्य एवं कारणरूपको नमस्कार है। पञ्चभूतरूपको नमस्कार है। पञ्चभूतात्मा (पञ्चभूतके अधिष्ठान आत्मा)-को नमस्कार है, मूलप्रकृतिको नमस्कार है। मायारूप आपको नमस्कार है॥ १५–१७॥ |
| नमोऽस्तु ते वराहाय नमस्ते मत्स्यरूपिणे ।<br>नमो योगाधिगम्याय नमः संकर्षणाय ते ॥ १८ ॥<br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं त्रिधाम्ने दिव्यतेजसे ।<br>नमः सिद्धाय पूज्याय गुणत्रयविभाविने ॥ १९ ॥<br>नमोऽस्त्वादित्यवर्णाय नमस्ते पद्मयोनये ।<br>नमोऽमूर्ताय मूर्ताय माधवाय नमो नमः ॥ २० ॥ | हे वराह! आपको नमस्कार है। मत्स्यरूप धारण करनेवालेको नमस्कार है। योगद्वारा जानने योग्यको नमस्कार है। संकर्षण! आपको नमस्कार है। तीन मूर्तियों एवं तीन धामों (स्थानों)-वाले दिव्य तेजःस्वरूप आपको नमस्कार है। तीन गुणोंको प्रवृत्त करनेवाले सिद्ध एवं पूज्य आपको नमस्कार है। आदित्यके समान वर्णवाले अर्थात् प्रकाशस्वरूप आपको नमस्कार है। पद्मयोनिको नमस्कार है। मूर्त एवं अमूर्तरूपको नमस्कार है। माधवको बारम्बार नमस्कार है॥ १८–२०॥ |
| त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव लयमेष्यति ।<br>पालयैतज्जगत् सर्वं त्राता त्वं शरणं गतिः ॥ २१ ॥ | आपके द्वारा ही सम्पूर्ण सृष्टि हुई है और आपमें ही (वह) विलीन भी हो जायगी। इस सम्पूर्ण जगत्का आप पालन करें। आप ही रक्षक हैं, आप ही शरण देनेवाले आश्रय-स्थान हैं॥ २१॥ |
| इत्थं स भगवान् विष्णुः सनकाद्यैरभिष्टुतः ।<br>प्रसादमकरोत् तेषां वराहवपुरीश्वरः ॥ २२ ॥ | सनक आदि (महर्षियों)-के द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वराह-शरीर धारण करनेवाले सर्वसमर्थ उन भगवान् विष्णुने उनपर कृपा की। इसके बाद पृथ्वीके स्वामी प्रजापतिने पृथ्वीको उसके स्थानमें प्रतिष्ठित कर दिया और मनसे उसको धारण करके अपने (वराह)-रूपको छोड़ दिया॥ २२-२३॥ |
| ततः संस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीपतिः ।<br>मुमोच रूपं मनसा धारयित्वा प्रजापतिः ॥ २३ ॥ | |
| तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता ।<br>विततत्वाच्च देहस्य न मही याति सम्प्लवम् ॥ २४ ॥ | उस महान् जलराशिके ऊपर विशाल नौकाके समान स्थित पृथ्वी अपने देहके विस्तारके कारण डूबती नहीं है॥२४॥ |