संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- अध्याय ६ * | ४३ ---|---:
| ऋषय ऊचुः<br>नमस्ते देवदेवाय ब्रह्मणे परमेष्ठिने ।<br>पुरुषाय पुराणाय शाश्वताय जयाय च ॥ ११ ॥<br>नमः स्वयम्भुवे तुभ्यं स्रष्ट्रे सर्वार्थवेदिने ।<br>नमो हिरण्यगर्भाय वेधसे परमात्मने ॥ १२ ॥<br>नमस्ते वासुदेवाय विष्णवे विश्वयोनये ।<br>नारायणाय देवाय देवानां हितकारिणे ॥ १३ ॥<br>नमोऽस्तु ते चतुर्वक्त्र शार्ङ्गचक्रासिधारिणे ।<br>सर्वभूतात्मभूताय कूटस्थाय नमो नमः ॥ १४ ॥ | ऋषि बोले—देवाधिदेव, पुराणपुरुष, सनातन, जयस्वरूप परमेष्ठी ब्रह्माको नमस्कार है। सृष्टि करनेवाले तथा सभी अर्थोंके ज्ञाता स्वयम्भू! आपको नमस्कार है। हिरण्यगर्भ, वेधा परमात्माको नमस्कार है। विश्वके उत्पत्ति-स्थान, देवोंके हितकारी, वासुदेव, नारायणदेव विष्णुको नमस्कार है। शार्ङ्ग (धनुष), चक्र (सुदर्शन) तथा तलवार (नन्दक) आदि धारण करनेवाले चतुर्मुख! आपको नमस्कार है। सभी प्राणियोंके आत्मरूप, कूटस्थको बार-बार नमस्कार है॥ ११—१४॥ |
| नमो वेदरहस्याय नमस्ते वेदयोनये ।<br>नमो बुद्धाय शुद्धाय नमस्ते ज्ञानरूपिणे ॥ १५ ॥<br>नमोऽस्त्वानन्दरूपाय साक्षिणे जगतां नमः ।<br>अनन्तायाप्रमेयाय कार्याय करणाय च ॥ १६ ॥<br>नमस्ते पञ्चभूताय पञ्चभूतात्मने नमः ।<br>नमो मूलप्रकृतये मायारूपाय ते नमः ॥ १७ ॥ | वेदके रहस्यरूपको नमस्कार है। वेद-योनिको नमस्कार है। शुद्ध-बुद्धको नमस्कार है। ज्ञानरूपको नमस्कार है। आनन्दस्वरूपको नमस्कार है। जगत्के साक्षी, अनन्त, अप्रमेय तथा कार्य एवं कारणरूपको नमस्कार है। पञ्चभूतरूपको नमस्कार है। पञ्चभूतात्मा (पञ्चभूतके अधिष्ठान आत्मा)-को नमस्कार है, मूलप्रकृतिको नमस्कार है। मायारूप आपको नमस्कार है॥ १५–१७॥ |
| नमोऽस्तु ते वराहाय नमस्ते मत्स्यरूपिणे ।<br>नमो योगाधिगम्याय नमः संकर्षणाय ते ॥ १८ ॥<br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं त्रिधाम्ने दिव्यतेजसे ।<br>नमः सिद्धाय पूज्याय गुणत्रयविभाविने ॥ १९ ॥<br>नमोऽस्त्वादित्यवर्णाय नमस्ते पद्मयोनये ।<br>नमोऽमूर्ताय मूर्ताय माधवाय नमो नमः ॥ २० ॥ | हे वराह! आपको नमस्कार है। मत्स्यरूप धारण करनेवालेको नमस्कार है। योगद्वारा जानने योग्यको नमस्कार है। संकर्षण! आपको नमस्कार है। तीन मूर्तियों एवं तीन धामों (स्थानों)-वाले दिव्य तेजःस्वरूप आपको नमस्कार है। तीन गुणोंको प्रवृत्त करनेवाले सिद्ध एवं पूज्य आपको नमस्कार है। आदित्यके समान वर्णवाले अर्थात् प्रकाशस्वरूप आपको नमस्कार है। पद्मयोनिको नमस्कार है। मूर्त एवं अमूर्तरूपको नमस्कार है। माधवको बारम्बार नमस्कार है॥ १८–२०॥ |
| त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव लयमेष्यति ।<br>पालयैतज्जगत् सर्वं त्राता त्वं शरणं गतिः ॥ २१ ॥ | आपके द्वारा ही सम्पूर्ण सृष्टि हुई है और आपमें ही (वह) विलीन भी हो जायगी। इस सम्पूर्ण जगत्का आप पालन करें। आप ही रक्षक हैं, आप ही शरण देनेवाले आश्रय-स्थान हैं॥ २१॥ |
| इत्थं स भगवान् विष्णुः सनकाद्यैरभिष्टुतः ।<br>प्रसादमकरोत् तेषां वराहवपुरीश्वरः ॥ २२ ॥ | सनक आदि (महर्षियों)-के द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वराह-शरीर धारण करनेवाले सर्वसमर्थ उन भगवान् विष्णुने उनपर कृपा की। इसके बाद पृथ्वीके स्वामी प्रजापतिने पृथ्वीको उसके स्थानमें प्रतिष्ठित कर दिया और मनसे उसको धारण करके अपने (वराह)-रूपको छोड़ दिया॥ २२-२३॥ |
| ततः संस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीपतिः ।<br>मुमोच रूपं मनसा धारयित्वा प्रजापतिः ॥ २३ ॥ | |
| तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता ।<br>विततत्वाच्च देहस्य न मही याति सम्प्लवम् ॥ २४ ॥ | उस महान् जलराशिके ऊपर विशाल नौकाके समान स्थित पृथ्वी अपने देहके विस्तारके कारण डूबती नहीं है॥२४॥ |
४४ * कूर्मपुराण *
पृथिवीं तु समीकृत्य पृथिव्यां सोऽचिनोद् गिरीन्।
प्राक्सर्गदग्धानखिलांस्ततः सर्गेऽदधन्मनः ॥ २५ ॥
तदनन्तर पृथ्वीको समतल बनाकर उन्होंने पहली सृष्टिके दग्ध हुए समस्त पर्वतोंको पृथ्वीपर स्थापित किया और सृष्टि (करने)-में अपना मन लगाया ॥ २५ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छठा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
नौ प्रकारकी सृष्टि, ब्रह्माजीके मानस पुत्रोंका आविर्भाव, ब्रह्माजीके चारों मुखोंसे चारों वेदोंकी उत्पत्ति इत्यादिका वर्णन
श्रीकूर्म उवाच
सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा।
अबुद्धिपूर्वकः सर्गः प्रादुर्भूतस्तमोमयः ॥ १ ॥
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः।
अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ॥ २ ॥
पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतः सोऽभिमानिनः।
संवृतस्तमसा चैव बीजकम्भुवनावृतः ॥ ३ ॥
बहिरन्तश्चाप्रकाशः स्तब्धो निःसंज्ञ एव च।
मुख्या नगा इति प्रोक्ता मुख्यसर्गस्तु स स्मृतः ॥ ४ ॥
तं दृष्ट्वासाधकं सर्गममन्यदपरं प्रभुः।
तस्याभिध्यायतः सर्गस्तिर्यक्स्रोतोऽभ्यवर्तत ॥ ५ ॥
यस्मात् तिर्यक् प्रवृत्तः स तिर्यक्स्रोतस्ततः स्मृतः।
पश्वादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणो द्विजाः ॥ ६ ॥
तमप्यसाधकं ज्ञात्वा सर्गमन्यं ससर्ज ह।
ऊर्ध्वस्रोत इति प्रोक्तो देवसर्गस्तु सात्त्विकः ॥ ७ ॥
ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तश्च नावृताः।
प्रकाशा बहिरन्तश्च स्वभावाद् देवसंज्ञिताः ॥ ८ ॥
श्रीकूर्म बोले— उनके (ब्रह्माके) द्वारा सृष्टिके विषयमें सोचते रहनेपर अबुद्धिपूर्वक अन्धकाररूप वैसी ही सृष्टि हुई जैसी कि पूर्वके कल्पोंमें हुई थी। उन महात्मासे तम, मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्ध नामवाली यह पञ्चपर्वा अविद्या उत्पन्न हुई। उस अभिमानी (देव)-के द्वारा ध्यान करते समय अन्धकारसे ढकी हुई बीज-सदृश तथा लोकोंसे आवृत्त वह सृष्टि पाँच भागोंमें विभाजित होकर स्थित हुई ॥ १–३ ॥
बाहर एवं भीतरके प्रकाश (ज्ञान)-से शून्य, स्तब्ध (जड) तथा संज्ञा (चेतना)-विहीन नग (अर्थात् पर्वत, वृक्ष आदि) 'मुख्य' इस नामसे कहे जाते हैं और वही मुख्य सर्ग (मुख्य सृष्टि) कहलाता है। प्रभुने उस (मुख्य सर्ग)-को (सृष्टिके विस्तारमें) साधक (समर्थ) न देखकर दूसरी सृष्टिके लिये विचार किया। उनके ऐसा विचार करते ही 'तिर्यक्स्रोत' नामक (पशु-पक्षियों आदिकी) सृष्टि हुई। हे ब्राह्मणो! क्योंकि वह सृष्टि तिर्यक् (तिरछी) चलनेवाली थी, इसलिये तिर्यक्स्रोत सृष्टि कहलाती है। वे (मार्गका उल्लंघन करनेवाले) पशु आदि उत्पथग्राही कहे जाते हैं ॥ ४–६ ॥
उस तिर्यक्स्रोत नामक सृष्टिको भी (सृष्टि-विस्तारके लिये) निष्प्रयोजन जानकर (उन देवने) अन्य सर्गको उत्पन्न किया। वह (सर्ग) ऊर्ध्वस्रोत सात्त्विक सर्ग 'देवसर्ग' नामसे कहा गया। इस देवसर्गके लोगोंमें सुख और प्रीतिकी अधिकता रहती है। वे अंदर तथा बाहर आवरणसे रहित होते हैं तथा स्वभावसे ही अंदर-बाहर प्रकाशसे परिपूर्ण रहते हैं, इसलिये वे देव कहलाते हैं ॥ ७-८ ॥
- अध्याय ७ * ४५
ततोऽभिध्यायस्तस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्तदा।
प्रादुरासीत् तदाव्यक्तादर्वाक्स्रोतस्तु साधकः ॥ ९ ॥
तदनन्तर निरन्तर सत्यका ध्यान करनेवाले उन देवके चिन्तन करनेपर उसी समय अव्यक्त (प्रकृति)-से (सृष्टि-विस्तारका) साधक अर्वाक्स्रोतवाला साधक (सर्ग) उत्पन्न हुआ। वे (अर्वाक्स्रोत प्राणी) प्रकाश (ज्ञान)-के बाहुल्यवाले, तमोगुण तथा रजोगुणकी अधिकतावाले, अधिक दुःखवाले और सत्त्वगुणसे सम्पन्न मनुष्य नामसे कहे जाते हैं॥ ९-१०॥
ते च प्रकाशबहुलास्तमोद्रिक्ता रजोऽधिकाः।
दुःखोत्कटाः सत्त्वयुता मनुष्याः परिकीर्तिताः ॥ १० ॥
तं दृष्ट्वा चापरं सर्गममन्यद् भगवानजः।
तस्याभिधायतः सर्गं सर्गो भूतादिकोऽभवत् ॥ ११ ॥
उस (मानुष-सर्ग)-को देखकर अजन्मा भगवान्ने अन्य सर्गकी रचनाका विचार किया और उनके ऐसे सर्ग-विषयक ध्यान करते ही भूतादि सर्ग उत्पन्न हुआ।
तेऽपरिग्राहिणः सर्वे संविभागरताः पुनः।
खादनाश्चाप्यशीलाश्च भूताद्याः परिकीर्तिताः।
इत्येते पञ्च कथिताः सर्गा वै द्विजपुंगवाः ॥ १२ ॥
वे सभी संग्रह न करनेवाले, फिर भी बाँटनेके स्वभाववाले, उपभोग करनेवाले तथा शीलरहित 'भूतादि' इस नामसे कहे गये हैं। ब्राह्मणश्रेष्ठो! इस प्रकार ये पाँच सर्ग कहे गये हैं॥ ११-१२॥
प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः।
तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गो हि स स्मृतः ॥ १३ ॥
वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः।
इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतोऽबुद्धिपूर्वकः ॥ १४ ॥
ब्रह्माका वह पहला सर्ग महत्सर्ग कहा गया है। तन्मात्राओंका दूसरा सर्ग भूतसर्ग कहलाता है। तीसरा वैकारिक सर्ग ऐन्द्रियक सर्ग कहा जाता है। इस प्रकार यह प्राकृत सर्ग अबुद्धिपूर्वक हुआ। चौथा सर्ग मुख्य सर्ग है। स्थावर (जड पदार्थ) मुख्य कहलाते हैं।
मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः।
तिर्यक्स्रोतस्तु यः प्रोक्तस्तिर्यग्योन्यः स पञ्चमः ॥ १५ ॥
तथोर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः।
ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ॥ १६ ॥
अष्टमो भौतिकः सर्गो भूतादीनां प्रकीर्तितः।
नवमश्चैव कौमारः प्राकृता वैकृतास्त्विमे ॥ १७ ॥
तिर्यक्स्रोतसे जिस सर्गको बतलाया है वह तिर्यग्योनिवाला पाँचवाँ सर्ग है। तदनन्तर ऊर्ध्वस्रोतसोंका छठा सर्ग है जो देवसर्ग कहलाता है। तदनन्तर अर्वाक्स्रोतसोंका सातवाँ सर्ग है जो मानुष सर्ग है। भूतादिकोंका आठवाँ सर्ग भौतिक सर्ग कहा गया है। नवाँ सर्ग कौमार सर्ग है। इस प्रकार ये नवों सर्ग प्राकृत तथा वैकृत दोनों प्रकारके हैं॥ १३-१७॥
प्राकृतास्तु त्रयः पूर्वे सर्गास्तेऽबुद्धिपूर्वकाः।
बुद्धिपूर्वं प्रवर्तन्ते मुख्याद्या मुनिपुंगवाः ॥ १८ ॥
मुनिश्रेष्ठो! पहलेके तीन सर्ग (महत्सर्ग, भूतसर्ग तथा ऐन्द्रियक सर्ग) प्राकृत सर्ग हैं, जो अबुद्धिपूर्वक होते हैं। और मुख्य आदि सर्ग (अवशिष्ट ६ सर्ग) बुद्धिपूर्वक होते हैं॥ १८॥
अग्रे ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान्।
सनकं सनातनं चैव तथैव च सनन्दनम्।
ऋभुं सनत्कुमारं च पूर्वमेव प्रजापतिः ॥ १९ ॥
पञ्चैते योगिनो विप्राः परं वैराग्यमास्थिताः।
ईश्वरासक्तमनसो न सृष्टौ दधिरे मतिम् ॥ २० ॥
प्रजापति ब्रह्माजीने सबसे पहले अपने ही समान सनक, सनातन, सनन्दन, ऋभु तथा सनत्कुमार नामक मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया। हे ब्राह्मणो! ये पाँचों योगी थे, परम वैराग्यवान् थे और ईश्वरमें उनका मन आसक्त था। (इसलिये) उन्होंने सृष्टि (-के विस्तार)-में अपनी बुद्धि नहीं लगायी ॥ १९-२०॥
४६ * कूर्मपुराण *
| तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ प्रजापतिः।<br>मुमोह मायया सद्यो मायिनः परमेष्ठिनः॥ २१॥ | लोकसृष्टिके कार्यमें उनके इस प्रकार निरपेक्ष (उदासीन) हो जानेपर प्रजापति (ब्रह्मा) मायापति परमेष्ठीकी* मायाके द्वारा तत्काल मोहित कर लिये गये। |
|---|---|
| तं बोधयामास सुतं जगन्मायो महामुनिः।<br>नारायणो महायोगी योगिचित्तानुरञ्जनः॥ २२॥ | योगियोंके चित्तका अनुरञ्जन करनेवाले जगत्कर्ता महायोगी, महामुनि नारायणने (अपने) उस पुत्र (ब्रह्मा)-को प्रबुद्ध किया। (तब) उनके द्वारा प्रबुद्ध किये गये विश्वात्मा (ब्रह्मा)-ने परम तप किया, (किंतु) तप करनेपर भी उन भगवान् ब्रह्माको कुछ प्राप्त नहीं हुआ॥ २१—२३॥ |
| बोधितस्तेन विश्वात्मा तताप परमं तपः।<br>स तप्यमानो भगवान् न किञ्चित् प्रत्यपद्यत॥ २३॥<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात् क्रोधो व्यजायत।<br>क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः॥ २४॥ | तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर (प्रयोजन सिद्ध न होनेके कारण उन्हें) दुःखके कारण क्रोध उत्पन्न हुआ। क्रोधसे आविष्ट उन (ब्रह्मा)-के नेत्रोंसे आँसूकी बूँदें गिरीं। उनके (क्रोधके कारण) टेढ़ी भ्रुकुटियोंवाले ललाटसे शरण देनेवाले नीललोहित परमेश्वर महादेव प्रकट हुए। वे ही तेजकी राशि सनातन भगवान् ईश हैं, जिन्हें विद्वान् लोग अपनी आत्मामें स्थित परमेश्वर (परमात्मा)-के रूपमें देखते हैं॥ २४—२६॥ |
| भ्रुकुटीकुटिलात् तस्य ललाटात् परमेश्वरः।<br>समुत्पन्नो महादेवः शरण्यो नीललोहितः॥ २५॥ | |
| स एव भगवानीशस्तेजोराशिः सनातनः।<br>यं प्रपश्यन्ति विद्वांसः स्वात्मस्थं परमेश्वरम्॥ २६॥ | |
| ओंकारं समनुस्मृत्य प्रणम्य च कृताञ्जलिः।<br>तमाह भगवान् ब्रह्मा सृजेमा विविधाः प्रजाः॥ २७॥ | ओंकारका सम्यक् रूपसे स्मरणकर और प्रणामकर हाथ जोड़ते हुए भगवान् ब्रह्माने उन (महादेव)-से कहा—इन अनेक प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करें॥ २७॥ |
| निशम्य भगवान् वाक्यं शंकरो धर्मवाहनः।<br>स्वात्मना सदृशान् रुद्रान् ससर्ज मनसा शिवः।<br>कपर्दिनो निरातङ्कांस्त्रिनेत्रान् नीललोहितान्॥ २८॥ | धर्म (वृषभ)-पर आरूढ़ होनेवाले धर्मवाहन मङ्गलकारी भगवान् शिवने (ब्रह्माके) वचनको सुनकर मनसे अपने ही समान जटाधारी, आतंकरहित, तीन नेत्रवाले एवं नीललोहित रुद्रोंको उत्पन्न किया॥ २८॥ |
| तं प्राह भगवान् ब्रह्मा जन्ममृत्युयुताः प्रजाः।<br>सृजेति सोऽब्रवीदीशो नाहं मृत्युजरान्विताः।<br>प्रजाः स्रक्ष्ये जगन्नाथ सृज त्वमशुभाः प्रजाः॥ २९॥ | उनसे भगवान् ब्रह्माने कहा—जन्म लेनेवाली और मृत्युको प्राप्त होनेवाली प्रजाकी सृष्टि करो। वे ईश बोले—हे जगन्नाथ! मैं मृत्यु एवं वृद्धावस्थाको प्राप्त होनेवाली प्रजाकी सृष्टि नहीं करूँगा। ऐसी अशुभ प्रजाओंको आप ही उत्पन्न करें॥ २९॥ |
| निवार्य च तदा रुद्रं ससर्ज कमलोद्भवः।<br>स्थानाभिमानिनः सर्वान् गदतस्तान् निबोधत॥ ३०॥ | तब कमलसे उत्पन्न ब्रह्माने (सृष्टि-विस्तारके कार्यसे) रुद्रको रोककर (स्वयं) सभी स्थानाभिमानियोंको उत्पन्न किया, मैं उन्हें बता रहा हूँ (आपलोग) सुनें॥ ३०॥ |
| आपोऽग्निरन्तरिक्षं च द्यौर्वायुः पृथिवी तथा।<br>नद्यः समुद्राः शैलाश्च वृक्षा वीरुध एव च॥ ३१॥<br>लवाः काष्ठाः कलाश्चैव मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।<br>अर्धमासाश्च मासाश्च अयनाब्दयुगादयः॥ ३२॥ | जल, अग्नि, अन्तरिक्ष, आकाश, वायु और पृथ्वी इसी प्रकार नदी, समुद्र, पर्वत, वृक्ष, वनस्पति, लव, काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन-रात, अर्धमास, मास, अयन, वर्ष तथा युग आदि॥ ३१-३२॥ |
* छठे अध्यायमें ब्रह्मा और नारायणमें अभेद माना गया है, अतः यहाँ परमेष्ठी शब्द 'नारायण' का वाचक है।
- अध्याय ७ * | ४७ ---|--- स्थानाभिमानिनः सृष्ट्वा साधकानसृजत् पुनः।<br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च धर्मं संकल्पमेव च॥ ३३॥ | स्थानाभिमानियोंकी सर्जना कर पुनः सृष्टिके सहायकों—मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ, धर्म एवं संकल्पको उत्पन्न किया॥ ३३॥ प्राणाद् ब्रह्मासृजद् दक्षं चक्षुषश्च मरीचिनम्।<br>शिरसोऽङ्गिरसं देवो हृदयाद् भृगुमेव च॥ ३४॥<br>श्रोत्राभ्यामत्रिनामानं धर्मं च व्यवसायातः।<br>संकल्पं चैव संकल्पात् सर्वलोकपितामहः॥ ३५॥<br>पुलस्त्यं च तथोदानाद् व्यानाच्च पुलहं मुनिम्।<br>अपानात् क्रतुमव्यग्रं समानाच्च वसिष्ठकम्॥ ३६॥ | सभी लोकोंके पितामह ब्रह्मदेवने प्राण (वायु)-से दक्षको उत्पन्न किया, इसी प्रकार नेत्रोंसे मरीचि, सिरसे अङ्गिरा, हृदयसे भृगु, कानोंसे अत्रि नामवाले (ऋषि)-को, व्यवसायसे धर्मको और संकल्पसे संकल्पको तथा ऐसे ही उदान (वायु)-से पुलस्त्य, व्यान (वायु)-से पुलह मुनि, अपान (वायु)-से शान्त स्वभाव क्रतु और समान (वायु)-से वसिष्ठको उत्पन्न किया॥ ३४–३६॥ इत्येते ब्रह्मणा सृष्टाः साधका गृहमेधिनः।<br>आस्थाय मानवं रूपं धर्मस्तैः सम्प्रवर्तितः॥ ३७॥ | ब्रह्माके द्वारा उत्पन्न ये सभी गृहस्थ हैं तथा (सृष्टि-विस्तारके) सहयोगी हैं। मनुष्यका रूप धारणकर इन्होंने धर्मका प्रवर्तन किया। तदनन्तर देवता, असुर, पितर तथा ततो देवासुरपितॄन् मनुष्यांश्च चतुष्टयम्।<br>सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत्॥ ३८॥ | मनुष्य—इन चारोंकी तथा जलकी सृष्टि करनेकी इच्छासे (ब्रह्माने) अपने-आपको नियुक्त किया॥ ३७-३८॥ युक्तात्मनस्तमोमात्रा उद्रिक्ताभूत् प्रजापतेः।<br>ततोऽस्य जघनात् पूर्वमसुरा जज्ञिरे सुताः॥ ३९॥ | संयुक्त आत्मरूपवाले प्रजापतिसे तमोगुणकी मात्राका उद्रेक हुआ। तदनन्तर उनकी जंघासे पहले (तमोगुणी) असुर (योनिके) पुत्र उत्पन्न हुए। असुरोंकी सृष्टिकर पुरुषोत्तमने उस (तमोमय) शरीरका परित्याग कर दिया। उनके द्वारा छोड़ा गया वह शरीर शीघ्र ही रात्रिके उत्ससर्जासुरान् सृष्ट्वा तां तनुं पुरुषोत्तमः।<br>सा चोत्सृष्टा तनुस्तेन सद्यो रात्रिरजायत।<br>सा तमोबहुला यस्मात् प्रजास्तस्यां स्वपन्त्यतः॥ ४०॥ | रूपमें परिवर्तित हो गया। वह (रात्रि) चूँकि अन्धकारकी अधिकतावाली रहती है, अतः उसमें (रात्रिमें) प्रजाएँ सोती हैं॥ ३९-४०॥ सत्त्वमात्रात्मिकां देवस्तनुमन्यामगृह्णत।<br>ततोऽस्य मुखतो देवा दीव्यतः सम्प्रजज्ञिरे॥ ४१॥ | (पुनः) देवने सत्त्वगुणात्मक दूसरे शरीरको धारण किया और तब उनके मुखसे दीप्तिमान् देवता प्रादुर्भूत हुए। उन्होंने (प्रजापतिने) वह शरीर भी छोड़ दिया। त्यक्ता सापि तनुस्तेन सत्त्वप्रायमभूद् दिनम्।<br>तस्मादहो धर्मयुक्ता देवताः समुपासते॥ ४२॥ | वह सत्त्वगुणकी अधिकतावाला शरीर दिन हुआ। धर्मात्मा देवता इसीलिये दिनका सेवन करते हैं॥ ४१-४२॥ सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां जगृहे तनुम्।<br>पितृवन्मन्यमानस्य पितरः सम्प्रजज्ञिरे॥ ४३॥ | पुनः (उन्होंने) सत्त्वगुणात्मक ही एक दूसरे शरीरको धारण किया। पिताके समान माननेवाले उनके द्वारा पितर उत्पन्न हुए। विश्वकी रचना करनेवाले उन्होंने (ब्रह्माने) पितरोंकी सृष्टिकर उस शरीरको भी छोड़ उत्ससर्ज पितॄन् सृष्ट्वा ततस्तामपि विश्वसृक्।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यः संध्या व्यजायत॥ ४४॥ | दिया। वह छोड़ा गया शरीर शीघ्र ही संध्याके रूपमें बदल गया॥ ४३-४४॥ तस्मादहर्देवतानां रात्रिः स्याद् देवविद्विषाम्।<br>तयोर्मध्ये पितॄणां तु मूर्तिः संध्या गरीयसी॥ ४५॥ | इसीलिये देवताओंके लिये दिन, देवविद्वेषी असुरोंके लिये रात तथा दिन और रातके मध्यकी संध्या जो पितरोंकी मूर्तिरूप है, वह प्रशस्त है॥ ४५॥
| ४८ | * कूर्मपुराण * |
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| तस्माद् देवासुराः सर्वे मनवो मानवास्तथा।<br>उपासते सदा युक्ता रात्र्यहोर्मध्यमां तनुम्॥ ४६॥ | इसलिये देवता, असुर, (स्वायम्भुव आदि) सभी मनु तथा सभी मनुष्य दिन और रातके मध्यमें सदा स्थित रहनेवाले (संध्यारूपी) शरीर (मूर्ति)-की उपासना करते हैं॥ ४६॥ |
| रजोमात्रात्मिकां ब्रह्मा तनुमन्यामगृह्णत।<br>ततोऽस्य जज्ञिरे पुत्रा मनुष्या रजसावृताः॥ ४७॥ | (तब) ब्रह्माने रजोगुणकी अधिकतावाले अन्य शरीरको धारण किया, जिससे रजोगुणसे आवृत उनके पुत्र उत्पन्न हुए, जो मनुष्य कहलाये॥ ४७॥ |
| तामप्याशु स तत्याज तनुं सद्यः प्रजापतिः।<br>ज्योत्स्ना सा चाभवद्विप्राः प्राक्संध्या याभिधीयते॥ ४८॥ | ब्राह्मणो! उन प्रजापतिने शीघ्र ही उस (रजोगुणात्मक) शरीरको भी छोड़ दिया। वह (छोड़ा गया शरीर) ज्योत्स्नाके रूपमें हो गया, जिसे प्राक्संध्या कहा जाता है॥ ४८॥ |
| ततः स भगवान् ब्रह्मा सम्प्राप्य द्विजपुंगवाः।<br>मूर्तिं तमोरजःप्रायां पुनरेवाभ्ययूयुजत्॥ ४९॥<br><br>अन्धकारे क्षुधाविष्टा राक्षसास्तस्य जज्ञिरे।<br>पुत्रास्तमोरजःप्राया बलिनस्ते निशाचराः॥ ५०॥<br><br>सर्पा यक्षास्तथा भूता गन्धर्वाः सम्प्रजज्ञिरे।<br>रजस्तमोभ्यामाविष्टांस्ततोऽन्यानसृजत् प्रभुः॥ ५१॥ | हे ब्राह्मणो! भगवान् ब्रह्मा फिर तम तथा रजोमयी मूर्ति (शरीर)-को धारण कर पुनः योगयुक्त हुए। इस शरीरसे अन्धकारमें भूखसे व्याकुल होनेवाले राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए। तमोगुण तथा रजोगुणकी अधिकतावाले वे महान् बलशाली पुत्र निशाचर कहलाये। ऐसे ही सर्प, यक्ष, भूत तथा गन्धर्व उत्पन्न हुए। तदनन्तर रजोगुण तथा तमोगुणसे आविष्ट अन्य प्राणियोंको भी प्रभुने उत्पन्न किया॥ ४९–५१॥ |
| वयांसि वयसः सृष्ट्वा अवयो वक्षसोऽसृजत्।<br>मुखतोऽजान् ससर्जान्यन् उदराद् गाश्च निर्ममे॥ ५२॥<br><br>पद्भ्यां चाश्वान् समातङ्गान्रासभान् गवयान् मृगान्।<br>उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यङ्कूंनन्यांश्च जातयः।<br>ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे॥ ५३॥ | वयः (अवस्था)-से पक्षियोंकी सृष्टि करनेके अनन्तर (ब्रह्माने) वक्षःस्थलसे भेड़ोंको उत्पन्न किया। मुखसे बकरोंको उत्पन्न किया और उदर-देशसे गौओंकी सृष्टि की। पैरोंसे हाथियोंसहित घोड़ों, गदहों, गायके समान ही दूसरे प्रकारकी गायों (नीलगाय आदि), मृगों, ऊँटों, खच्चरों, न्यङ्कुओं (मृग-विशेष) तथा अन्य (तिर्यक् आदि) योनियोंको उत्पन्न किया। फल-मूलवाली ओषधियाँ उनके रोमोंसे पैदा हुईं॥ ५२-५३॥ |
| गायत्रीं च ऋचं चैव त्रिवृत्साम रथन्तरम्।<br>अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात्॥ ५४॥ | (ब्रह्माजीने अपने) प्रथम (पूर्व) मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत्साम, रथन्तर (साम) और यज्ञोंमें अग्निष्टोम (नामक यज्ञ)-को उत्पन्न किया। दक्षिण |
| यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दः स्तोमं पञ्चदशं तथा।<br>बृहत्साम तथोक्थं च दक्षिणादसृजन्मुखात्॥ ५५॥ | मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुभ् छन्द, पञ्चदश स्तोम (मन्त्रोंका समूह-विशेष) बृहत्साम तथा उक्थ (नामक वेदमन्त्रों)-का सृजन किया। पश्चिम मुखसे सामवेद, जगती छन्द, |
| सामानि जागतं छन्दःस्तोमं सप्तदशं तथा।<br>वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात्॥ ५६॥ | सप्तदश स्तोम (मन्त्रोंका समूह-विशेष) और वैरूप तथा अतिरात्र नामक यज्ञोंको उत्पन्न किया। उत्तर मुखसे |
| एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।<br>अनुष्टुभं सवैराजमुत्तरादसृजन्मुखात्॥ ५७॥ | इक्कीस शाखाओंवाले अथर्ववेद, अनुष्टुप् छन्द और आप्तोर्याम तथा वैराज (नामक यज्ञ)-को उत्पन्न किया॥ ५४–५७॥ |
| * अध्याय ७ * | ४९ |
|---|---|
| उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>ब्रह्मणो हि प्रजासर्गं सृजतस्तु प्रजापतेः॥ ५८ ॥<br><br>सृष्ट्वा चतुष्टयं सर्गं देवर्षिपितृमानुषम्।<br>ततोऽसृजच्च भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ५९॥<br>यक्षान् पिशाचान् गन्धर्वांस्तथैवाप्सरसः शुभाः।<br>नरकिन्नररक्षांसि वयःपशुमृगोरगान्।<br>अव्ययं च व्ययं चैव द्वयं स्थावरजङ्गमम्॥ ६० ॥<br><br>तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्टौ प्रतिपेदिरे।<br>तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः॥ ६१॥<br><br>हिंस्त्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते।<br>तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात् तत् तस्य रोचते॥ ६२ ॥<br><br>महाभूतेषु नानात्वमिन्द्रियार्थेषु मूर्तिषु।<br>विनियोगं च भूतानां धातैव व्यदधात् स्वयम्॥ ६३ ॥<br><br>नामरूपं च भूतानां कृत्यानां च प्रपञ्चनम्।<br>वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः॥ ६४॥<br><br>आर्षाणि चैव नामानि याश्च वेदेषु दृष्टयः।<br>शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः॥ ६५ ॥<br><br>यथर्तवृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये।<br>दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु॥ ६६ ॥ | प्रजापति ब्रह्माके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि करते समय उनके शरीरसे उच्च एवं निम्न (कोटिक अन्य भी) प्राणियोंकी सृष्टि हुई। देवता, ऋषि, पितर तथा मनुष्य—इन चार प्रकारकी सृष्टि करके (ब्रह्माने) चर तथा अचर (सभी) प्राणियोंकी सृष्टि की॥ ५८-५९॥<br><br>यक्षों, पिशाचों, गन्धर्वों तथा शुभ अप्सराओं, नरों, किन्नरों, राक्षसों, पक्षियों, पशुओं, मृगों तथा सर्पोंको उत्पन्न किया। नित्य एवं अनित्य-भेदसे चर एवं अचर सृष्टि दो प्रकारकी है। पहलेकी सृष्टियोंमें उन (प्राणियों)-के जो-जो कर्म निश्चित थे अगली सृष्टियोंमें भी उत्पन्न होकर वे बार-बार उन्हीं कर्मोंको प्राप्त करते हैं॥ ६०-६१॥<br><br>इसीलिये उसी प्रकारकी भावना (संस्कार)-से प्रेरित होकर (वे प्राणी) हिंसक, अहिंसक, कोमल, क्रूर, धर्म-अधर्म तथा सत्य एवं असत्यकी प्रवृत्तियाँ प्राप्त करते हैं और वही (कर्म) उन्हें रुचिकर भी लगता है॥ ६२ ॥<br><br>विधाताने स्वयं ही प्राणियोंकी इन्द्रियोंके विषयों, महाभूतों एवं मूर्तियोंमें भिन्नता और विनियोगकी व्यवस्था की है। उन महेश्वरने प्रारम्भमें वेदके शब्दोंसे ही प्राणियोंके नाम और रूप तथा कर्मोंकी विविधताका निर्माण किया। वेदोंमें जिन सिद्धान्तों और आर्ष नामोंका प्रतिपादन हुआ है, उन्हीं नामोंको ब्रह्मा (प्रलयकालीन) रात्रिके अन्तमें उत्पन्न पदार्थोंको प्रदान करते हैं॥ ६३–६५॥<br><br>प्रलयकालसे पूर्व जो ऋतुएँ और ऋतुओंके चिह्न तथा अनेक प्रकारके रूप (आकार) दिखलायी देते थे, अगले युगोंमें वे उन्हीं-उन्हीं (नाम-रूपों तथा) भावोंमें प्रकट होकर दिखलायी देते हैं॥ ६६ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तमोऽध्यायः॥ ७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥
५० * कूर्मपुराण *
आठवाँ अध्याय
सृष्टि-वर्णनमें ब्रह्माजीसे मनु और शतरूपाका प्रादुर्भाव, स्वायम्भुव मनुके वंशका वर्णन, दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंका वर्णन तथा उनका विवाह, धर्म तथा अधर्मकी संतानोंका विवरण
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा— |
|---|---|
| एवं भूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च।<br>यदा चास्य प्रजाः सृष्टा न व्यवर्धन्त धीमतः॥ १ ॥<br><br>तमोमात्रावृतो ब्रह्मा तदाशोचत दुःखितः।<br>ततः स विदधे बुद्धिमर्थनिश्चयगामिनीम्॥ २ ॥ | इस प्रकार स्थावर तथा जङ्गम प्राणियोंकी सृष्टि हुई, किंतु जब उन बुद्धिमान् (ब्रह्मा)-द्वारा उत्पन्न की गयी प्रजाओंमें वृद्धि नहीं हुई, तब तमोगुणकी अधिकतासे आवृत ब्रह्मा दुःखी होकर चिन्ता करने लगे और फिर उन्होंने अर्थका निश्चय करनेवाली बुद्धिको ग्रहण किया॥ १-२॥ |
| अथात्मनि समद्राक्षीत् तमोमात्रां नियामिकाम्।<br>रजःसत्त्वं च संवृत्य वर्तमानां स्वधर्मतः॥ ३ ॥<br><br>तमस्तद् व्यनुदत् पश्चात् रजः सत्त्वेन संयुतः।<br>तत् तमः प्रतिनुन्नं वै मिथुनं समजायत॥ ४ ॥ | तदनन्तर उन्होंने स्वधर्मानुसार रजोगुण एवं सत्त्वगुणको आवृत कर स्थित रहनेवाली तथा (कर्मकी) नियामिका (तमोवृत्ति)-को अपनी आत्मामें देखा। तत्पश्चात् सत्त्वगुणसे संयुक्त रजोगुणने उस तमोगुणको दूर किया और दूर हुआ वह तम दो भागोंमें विभक्त हो गया॥ ३-४॥ |
| अधर्माचरणो विप्रा हिंसा चाशुभलक्षणा।<br>स्वां तनुं स ततो ब्रह्मा तामपोहत् भास्वराम्॥ ५ ॥ | हे ब्राह्मणो ! (इस प्रकार दो भागोंमें विभक्त हुए तमसे) अधर्माचरण और अशुभ लक्षणोंवाली हिंसा उत्पन्न हुई। तब ब्रह्माजीने अपने उस प्रकाशमान शरीरको छोड़ दिया॥ ५॥ |
| द्विधाकरोत् पुनर्देहमर्धेन पुरुषोऽभवत्।<br>अर्धेन नारी पुरुषो विराजमसृजत् प्रभुः॥ ६ ॥ | पुनः (पुरातन) पुरुष प्रभुने अपने शरीरको दो भागोंमें बाँटा। आधेसे पुरुष हुआ और आधेसे नारी। तत्पश्चात् (उन्होंने) विराट् पुरुषको उत्पन्न किया॥ ६॥ |
| नारीं च शतरूपाख्यां योगिनीं ससृजे शुभाम्।<br>सा दिवं पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्य संस्थिता॥ ७ ॥ | उन्होंने 'शतरूपा' नामवाली कल्याणमयी योगिनी नारीको बनाया, वह पृथिवी-लोक तथा द्युलोकको अपनी महिमासे व्याप्तकर प्रतिष्ठित हुई॥ ७॥ |
| योगैश्वर्यबलोपेता ज्ञानविज्ञानसंयुता।<br>योऽभवत् पुरुषात् पुत्रो विराडव्यक्तजन्मनः॥ ८ ॥<br><br>स्वायम्भुवो मनुर्देवः सोऽभवत् पुरुषो मुनिः।<br>सा देवी शतरूपाख्या तपः कृत्वा सुदुश्चरम्॥ ९ ॥<br><br>भर्तारं ब्रह्मणः पुत्रं मनुमेवान्वपद्यत।<br>तस्माच्च शतरूपा सा पुत्रद्वयमसूयत॥ १० ॥ | (वह शतरूपा नामवाली नारी) योगके ऐश्वर्य एवं बलसे सम्पन्न तथा ज्ञान-विज्ञानसे युक्त थी। (और) जो पुरुषसे अव्यक्तजन्मा ब्रह्माका विराट् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, वह देवपुरुष मुनि स्वायम्भुव मनुके रूपमें प्रसिद्ध हुआ। शतरूपा नामवाली उस देवीने अत्यन्त कठोर तप करके ब्रह्माजीके पुत्र (स्वायम्भुव) मनुको ही (अपना) पति बनाया और शतरूपाने उनसे (मनुसे) दो पुत्र उत्पन्न किये॥ ८-१०॥ |
| प्रियव्रतोत्तानपादौ कन्याद्वयमनुत्तमम्।<br>तयोः प्रसूतिं दक्षाय मनुः कन्यां ददौ पुनः॥ ११ ॥ | (ये ही) प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामक दो पुत्र थे। (इनके अतिरिक्त) दो श्रेष्ठ कन्याएँ भी हुईं। उन दो कन्याओंमेंसे स्वायम्भुव मनुने प्रसूति नामक एक कन्या दक्ष प्रजापतिको प्रदान की॥ ११॥ |
| * अध्याय ८ * | ५१ |
|---|---|
| प्रजापतिरथाकूतिं मानसो जगृहे रुचिः ।<br>आकृत्यां मिथुनं जज्ञे मानसस्य रुचेः शुभम् ।<br>यज्ञश्च दक्षिणा चैव याभ्यां संवर्धितं जगत् ॥ १२ ॥ | आकूति नामक दूसरी कन्याको (ब्रह्माजीके) मानस पुत्र रुचि प्रजापतिने ग्रहण किया। मानस पुत्र रुचि प्रजापतिने आकूतिसे दो संतानें प्राप्त कीं—यज्ञ और दक्षिणा, जिनसे संसार वृद्धिको प्राप्त हुआ ॥ १२ ॥ |
| यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे ।<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥ १३ ॥<br>प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्रो विंशतिं तथा ।<br>ससर्ज कन्या नामानि तासां सम्यक् निबोधत ॥ १४ ॥<br>श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा क्रिया तथा ।<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी ॥ १५ ॥<br>पत्न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः शुभाः ।<br>ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः ॥ १६ ॥ | यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र उत्पन्न हुए जो स्वायम्भुव मन्वन्तरमें 'याम' इस नामसे प्रसिद्ध देवता हुए और दक्ष प्रजापतिने प्रसूतिसे चौबीस कन्याओंको उत्पन्न किया, उनके नामोंको भलीभाँति सुनो—(वे हैं—) श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि तथा तेरहवीं कन्याका नाम है कीर्ति ॥ १३-१५ ॥<br>दक्ष प्रजापतिकी इन (तेरह दाक्षायणी) मङ्गलमयी कन्याओंको धर्मने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। उन (तेरह कन्याओं)-के अतिरिक्त इनसे सुन्दर आँखोंवाली दक्षकी ग्यारह, अवस्थामें छोटी कन्याएँ और थीं (जिनके नाम हैं—) ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संतति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा तथा स्वधा ॥ १६-१७ ॥ |
| ख्यातिः सत्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा ।<br>संततिश्चानसूया च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा ॥ १७ ॥<br>भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः ।<br>पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुः परमधर्मवित् ॥ १८ ॥<br>अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम् ।<br>ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो मुनिसत्तमाः ॥ १९ ॥ | श्रेष्ठ मुनियो! ख्याति, सती आदि जो (ग्यारह) कन्याएँ थीं, उन्हें क्रमशः भृगु, मरीचि, अङ्गिरा मुनि, पुलस्त्य, पुलह, परम धर्मज्ञ क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ नामक मुनियों, अग्निदेव और पितरोंने ग्रहण किया ॥ १८-१९ ॥ |
| श्रद्धया आत्मजः कामो दर्पो लक्ष्मीसुतः स्मृतः ।<br>धृत्यास्तु नियमः पुत्रस्तुष्ट्याः संतोष उच्यते ॥ २० ॥ | श्रद्धाका पुत्र 'काम' तथा लक्ष्मीका पुत्र 'दर्प' नामसे कहा जाता है। धृतिका 'नियम' नामक पुत्र तथा तुष्टिका (पुत्र) 'संतोष' कहलाता है ॥ २० ॥ |
| पुष्ट्या लाभः सुतश्चापि मेधापुत्रः श्रुतस्तथा ।<br>क्रियायाश्चाभवत् पुत्रो दण्डः समय एव च ॥ २१ ॥ | पुष्टिका पुत्र 'लाभ' और मेधाका पुत्र 'श्रुत' हुआ। क्रियाका पुत्र 'दण्ड' हुआ और वही 'समय' भी कहलाता है। |
| बुद्ध्या बोधः सुतस्तद्वदप्रमादो व्यजायत ।<br>लज्जाया विनयः पुत्रो वपुषो व्यवसायकः ॥ २२ ॥ | बुद्धिसे 'बोध' नामक पुत्र और उसी प्रकार 'अप्रमाद' नामक पुत्र भी हुआ। लज्जाका 'विनय' नामक पुत्र और वपुका 'व्यवसायक' हुआ। |
| क्षेमः शान्तिसुतश्चापि सुखं सिद्धिरजायत ।<br>यशः कीर्तिसुतस्तद्वदित्येते धर्मसूनवः ॥ २३ ॥ | 'क्षेम' शान्तिका पुत्र और 'सुख' सिद्धिका पुत्र हुआ। इसी प्रकार कीर्तिका 'यश' नामक पुत्र हुआ। ये सभी धर्मके पुत्र हुए। |
| कामस्य हर्षः पुत्रोऽभूद् देवानन्दो व्यजायत ।<br>इत्येष वै सुखोदर्कः सर्गो धर्मस्य कीर्तितः ॥ २४ ॥ | कामका 'हर्ष' नामक पुत्र हुआ, जो देवताओंको आनन्द देनेवाला हुआ। यही (इतनी) धर्मकी सुखदायक सृष्टि कहलाती है ॥ २१-२४ ॥ |
| जज्ञे हिंसा त्वधर्माद् निकृतिं चानृतं सुतम् ।<br>निकृत्यनृतयोर्जज्ञे भयं नरक एव च ॥ २५ ॥ | अधर्मसे हिंसाने निकृति तथा अनृत नामक पुत्रको उत्पन्न किया। निकृति और अनृतसे भय तथा नरक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। |
| माया च वेदना चैव मिथुनं त्विदमेतयोः ।<br>भयाज्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् ॥ २६ ॥ | माया तथा वेदना—ये दो इनकी क्रमशः भय एवं नरककी पत्नियाँ हैं। मायाने भयसे समस्त प्राणियोंको मार देनेवाले मृत्युको उत्पन्न किया ॥ २५-२६ ॥ |
५२ * कूर्मपुराण *
वेदना च सुतं चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात्।
मृत्योर्व्याधिजराशोकसृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे ॥ २७ ॥
वेदनाने भी रौरव (नरक नामक पति)-से दुःख नामक पुत्र उत्पन्न किया। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा तथा क्रोध उत्पन्न हुए ॥ २७ ॥
दुःखोत्तराः स्मृता होते सर्वे चाधर्मलक्षणाः।
नैषां भार्यास्ति पुत्रो वा सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥ २८ ॥
ये सभी उत्तरोत्तर अधिक दुःखदायी कहे गये हैं और अधर्माचरण ही इनका लक्षण है। इनकी न कोई स्त्री है और न कोई पुत्र। ये सभी ऊर्ध्वरेता हैं ॥ २८ ॥
इत्येष तामसः सर्गो जज्ञे धर्मनियामकः।
संक्षेपेण मया प्रोक्ता विसृष्टिर्मुनिपुंगवाः ॥ २९ ॥
श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार धर्मनियामकने तामस सर्गकी सृष्टि की। मैंने संक्षेपमें इस विशिष्ट सृष्टिका वर्णन किया ॥ २९ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
नवाँ अध्याय
शेषशायी नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति तथा उसी कमलसे ब्रह्माका प्राकट्य, विष्णु-मायाद्वारा ब्रह्माका मोहित होकर विष्णुसे विवाद करना, भगवान् शंकरका प्राकट्य, विष्णुद्वारा ब्रह्माको शिवका माहात्म्य बताना, ब्रह्माद्वारा शिवकी स्तुति तथा शिव और विष्णुके एकत्वका प्रतिपादन
सूत उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नारदाद्या महर्षयः।
प्रणम्य वरदं विष्णुं पप्रच्छुः संशयान्विताः ॥ १ ॥
सूतजी बोले— नारद आदि महर्षियोंने यह वचन सुननेपर संशयग्रस्त होते हुए वरदाता विष्णुको प्रणामकर इस प्रकार पूछा— ॥ १ ॥
ऋषय ऊचुः
कथितो भवता सर्गो मुख्यादीनां जनार्दन।
इदानीं संशयं चेममस्माकं छेत्तुमर्हसि ॥ २ ॥
कथं स भगवानीशः पूर्वजोऽपि पिनाकधृक्।
पुत्रत्वमगमच्छम्भोर्ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥ ३ ॥
कथं च भगवाञ्जज्ञे ब्रह्मा लोकपितामहः।
अण्डजो जगतामीशस्तन्नो वक्तुमिहार्हसि ॥ ४ ॥
ऋषियोंने कहा— हे जनार्दन! आपने मुख्य आदिकी सृष्टिका वर्णन किया। अब इस समय जो संशय हमें हो रहा है, उसे आप दूर करें—(ब्रह्मासे) पूर्वमें उत्पन्न होनेपर भी पिनाक नामक धनुषको धारण करनेवाले ईश भगवान् शिव किस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके पुत्रत्वको प्राप्त हुए और कैसे जगत्के स्वामी लोकपितामह अण्डज (हिरण्यगर्भ) भगवान् ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई, उसे आप हमें बतायें ॥ २-४ ॥
श्रीकूर्म उवाच
शृणुध्वमृषयः सर्वे शांकरस्यामितौजसः।
पुत्रत्वं ब्रह्मणस्तस्य पद्मयोनित्वमेव च ॥ ५ ॥
श्रीकूर्म बोले— ऋषियो! आप सभी सुनें— अमित तेजस्वी शंकर ब्रह्माके पुत्र-रूपमें कैसे हुए और कैसे ब्रह्मा कमलसे उत्पन्न हुए ॥ ५ ॥
अतीतकल्पावसाने तमोभूतं जगत् त्रयम्।
आसीदेकार्णवं सर्वं न देवाद्या न चर्षयः ॥ ६ ॥
विगत कल्पकी समाप्तिपर तीनों लोकोंमें घोर अन्धकार व्याप्त हो गया। सर्वत्र केवल जल-ही-जल था। न कोई देवता आदि थे और न कोई ऋषिजन ॥ ६ ॥
| * अध्याय ९ * | ५३ |
|---|---|
| तत्र नारायणो देवो निर्जने निरुपप्लवे।<br>आश्रित्य शेषशयनं सुष्वाप पुरुषोत्तमः ॥ ७ ॥ | उस जनशून्य अत्यन्त शान्त (समुद्रमें) पुरुषोत्तम नारायणदेव शेषनागकी शय्याका आश्रय लेकर सोये हुए थे ॥ ७ ॥ |
| सहस्रशीर्षा भूत्वा स सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>सहस्रबाहुः सर्वज्ञश्चिन्त्यमानो मनीषिभिः ॥ ८ ॥<br><br>पीतवासा विशालाक्षो नीलजीमूतसन्निभः।<br>महाविभूतिर्भोगात्मा योगिनां हृदयालयः ॥ ९ ॥<br><br>कदाचित् तस्य सुप्तस्य लीलार्थं दिव्यमद्भुतम्।<br>त्रैलोक्यसारं विमलं नाभ्यां पङ्कजमुद्बभौ ॥ १० ॥<br><br>शतयोजनविस्तीर्णं तरुणादित्यसंनिभम्।<br>दिव्यगन्धमयं पुण्यं कर्णिकाकेसरान्वितम् ॥ ११ ॥ | हजारों सिर, हजारों नेत्र, हजारों चरण, हजारों बाहुवाले होकर वे विद्वानोंके चिन्तनके विषयरूप, सर्वज्ञ, पीतवस्त्रधारी, विशाल नेत्रवाले, नीले बादलके समान वर्णवाले, महाविभूतिस्वरूप, योगियोंके हृदयमें निवास करनेवाले योगात्मा (नारायण) जब किसी समय शेषशय्यापर शयन कर रहे थे, तब उनकी नाभिसे लीला करनेके लिये दिव्य अद्भुत, तीनों लोकोंका साररूप, एक स्वच्छ कमल प्रकट हुआ। (वह कमल) सौ योजन विस्तारवाला, तरुण आदित्यके समान प्रकाशमान, पुण्यमय दिव्य गन्धसे सम्पन्न और कर्णिकाएँ तथा केसरसे समन्वित था ॥ ८-११ ॥ |
| तस्यैव सुचिरं कालं वर्तमानस्य शार्ङ्गिणः।<br>हिरण्यगर्भो भगवांस्तं देशमुपचक्रमे ॥ १२ ॥<br><br>स तं करेण विश्वात्मा समुत्थाप्य सनातनम्।<br>प्रोवाच मधुरं वाक्यं मायया तस्य मोहितः ॥ १३ ॥ | शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले शार्ङ्गधन्वा (नारायण) इसी रूपमें बहुत समयसे निवास कर रहे थे तभी एक समय भगवान् हिरण्यगर्भ उस स्थानपर गये। उनकी मायासे मुग्ध उन विश्वात्माने उन (सुप्त) सनातन (पुरुष)-को हाथसे उठाकर यह मधुर वचन कहा— ॥ १२-१३ ॥ |
| अस्मिन्नेकार्णवे घोरे निर्जने तमसावृते।<br>एकाकी को भवाञ्छेते ब्रूहि मे पुरुषर्षभ ॥ १४ ॥ | हे पुरुषश्रेष्ठ! अन्धकारसे आवृत इस घोर, निर्जन एकार्णवमें अकेले सोनेवाले आप कौन हैं? मुझे बतलायें ॥ १४ ॥ |
| तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विहस्य गरुडध्वजः।<br>उवाच देवं ब्रह्माणं मेघगम्भीरनिःस्वनः ॥ १५ ॥ | उनके इस वचनको सुनकर मेघके समान गम्भीर स्वरवाले गरुडध्वजने हँसकर ब्रह्मदेवसे कहा— ॥ १५ ॥ |
| भो भो नारायणं देवं लोकानां प्रभवाप्ययम्।<br>महायोगेश्वरं मां त्वं जानीहि पुरुषोत्तमम् ॥ १६ ॥<br><br>मयि पश्य जगत् कृत्स्नं त्वां च लोकपितामहम्।<br>सपर्वतमहाद्वीपं समुद्रैः सप्तभिर्वृतम् ॥ १७ ॥<br><br>एवमाभाष्य विश्वात्मा प्रोवाच पुरुषं हरिः।<br>जानन्नपि महायोगी को भवानिति वेधसम् ॥ १८ ॥ | (ब्रह्माजी आप) मुझे ही समस्त लोकोंकी उत्पत्ति एवं संहार करनेवाला महायोगेश्वर एवं पुरुषोत्तम नारायण-देव जानें। पर्वत और महान् द्वीपोंसे युक्त सात समुद्रोंसे घिरे हुए इस सम्पूर्ण जगत्के साथ ही समस्त लोकोंके पितामह (ब्रह्माजी) आप अपनेको भी मुझमें ही देखें। ऐसा कहकर विश्वात्मा महायोगी हरिने (सब कुछ) जानते हुए भी ब्रह्मारूपी पुरुषसे कहा—आप कौन हैं? ॥ १६-१८ ॥ |
| ततः प्रहस्य भगवान् ब्रह्मा वेदनिधिः प्रभुः।<br>प्रत्युवाचाम्बुजाभाक्षं सस्मितं श्लक्ष्णया गिरा ॥ १९ ॥ | तदनन्तर वेदनिधि प्रभु भगवान् ब्रह्माने हँसकर कमलकी आभाके समान नेत्रवाले तथा मन्द-मन्द मुसकानवाले (भगवान् विष्णुको इस प्रकार) मधुर वाणीमें उत्तर दिया— ॥ १९ ॥ |
| ५४ | * कूर्मपुराण * |
|---|
अहं धाता विधाता च स्वयम्भूः प्रपितामहः।
मय्येव संस्थितं विश्वं ब्रह्माहं विश्वतोमुखः ॥ २० ॥
श्रुत्वा वाचं स भगवान् विष्णुः सत्यपराक्रमः।
अनुज्ञाप्याथ योगेन प्रविष्टो ब्रह्मणस्तनुम् ॥ २१ ॥
त्रैलोक्यमेतत् सकलं सदेवासुरमानुषम्।
उदरे तस्य देवस्य दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥ २२ ॥
तदास्य वक्त्रान्निष्क्रम्य पन्नगेन्द्रनिकेतनः।
अजातशत्रुर्भगवान् पितामहमथाब्रवीत् ॥ २३ ॥
भवानप्येवमेवाद्य शाश्वतं हि ममोदरम्।
प्रविश्य लोकान् पश्यैतान् विचित्रान् पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥
ततः प्रह्लादिनीं वाणीं श्रुत्वा तस्याभिनन्द्य च।
श्रीपतेरुदरं भूयः प्रविवेश कुशध्वजः ॥ २५ ॥
तानेव लोकान् गर्भस्थानपश्यत् सत्यविक्रमः।
पर्यटित्वा तु देवस्य ददृशेऽन्तं न वै हरेः ॥ २६ ॥
ततो द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि महात्मना।
जनार्दनेन ब्रह्मासौ नाभ्यां द्वारमविन्दत ॥ २७ ॥
तत्र योगबलेनासौ प्रविश्य कनकाण्डजः।
उज्जहारात्मनो रूपं पुष्कराच्चतुराननः ॥ २८ ॥
विरराजारविन्दस्थः पद्मगर्भसमद्युतिः।
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् जगद्योनिः पितामहः ॥ २९ ॥
स मन्यमानो विश्वेशमात्मानं परमं पदम्।
प्रोवाच पुरुषं विष्णुं मेघगम्भीरया गिरा ॥ ३० ॥
मैं ही धाता (धारण करनेवाला), विधाता (विधान बनानेवाला), स्वयम्भू (स्वयं ही उत्पन्न होनेवाला) और प्रपितामह हूँ। मुझमें ही (सम्पूर्ण) विश्व स्थित है। मैं सभी ओर मुखवाला ब्रह्मा हूँ॥ २०॥
सत्यपराक्रम वे भगवान् विष्णु (ब्रह्मा)-का वचन सुनकर (उनकी) आज्ञा लेकर योगबलसे ब्रह्माके शरीरमें प्रविष्ट हुए। उन देव (ब्रह्मा)-के उदरमें देवता, असुर तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको देखकर श्रीविष्णुको (अत्यन्त) आश्चर्य हुआ। तदनन्तर नागराजकी शय्यापर निवास करनेवाले अजातशत्रु वे भगवान् (विष्णु) उनके (ब्रह्माके) मुखसे बाहर निकलकर पितामह (ब्रह्मा)-से बोले- ॥ २१-२३॥
पुरुषश्रेष्ठ! आप भी अब इसी प्रकार मेरे उदरमें प्रविष्ट होकर सदा इन विचित्र लोकोंको देखें ॥ २४॥
तब भगवान् विष्णुकी यह आह्लाद प्रदान करनेवाली वाणी सुनकर और पुनः उनका (श्रीविष्णुका) अभिनन्दन कर कुशध्वज (ब्रह्मा)-ने लक्ष्मीपति (भगवान् विष्णु)-के उदरमें प्रवेश किया। सत्यविक्रम (ब्रह्मा)-ने उन्हीं लोकोंको (भगवान् विष्णुके) उदरमें स्थित देखा (जिन्हें श्रीविष्णुने ब्रह्माके उदरमें देखा था)। देवके (उदरमें) भ्रमण करते हुए उन्हें हरि (विष्णु)-का कोई अन्त न दिखायी दिया ॥ २५-२६॥
तदनन्तर महात्मा जनार्दनने (अपनी इन्द्रियोंके) सभी द्वारोंको बंद कर दिया, तब ब्रह्माने उनकी नाभिमें द्वार प्राप्त किया। सुवर्णमय अण्डसे उत्पन्न चतुर्मुख (ब्रह्मा)-ने योगबलसे उसमें (नाभिमें) प्रवेश कर (नाभिसे उत्पन्न) कमलसे अपने रूपको बाहर निकाला ॥ २७-२८॥
पद्मगर्भके समान* शोभावाले स्वयम्भू, जगद्योनि, पितामह भगवान् ब्रह्मा अरविन्द (रक्त कमल)-पर बैठे हुए शोभित होने लगे। अपनेको सम्पूर्ण विश्वका स्वामी तथा परम पद (आश्रय) मानते हुए उन्होंने (ब्रह्माने) मेघके समान गम्भीर वाणीमें पुरुषोत्तम विष्णुसे कहा- ॥ २९-३०॥
* रक्त कमलके भीतर जैसी अरुणिमा होती है वैसी अरुणिमा (लालिमा-ललाई)-से सुशोभित।
| * अध्याय ९ * | ५५ |
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| किं कृतं भवतेदानीमात्मनो जयकाङ्क्षया।<br>एकोऽहं प्रबलो नान्यो मां वै कोऽभिभविष्यति ॥ ३१ ॥ | आपने अपनी विजयकी आकांक्षासे इस समय यह क्या किया (अपनी सभी इन्द्रियोंके द्वारोंको क्यों बंद कर दिया?)। एकमात्र मैं ही सबसे बड़ा बलशाली हूँ और कोई नहीं है, मुझे कौन पराजित कर पायेगा? ॥ ३१ ॥ | | श्रुत्वा नारायणो वाक्यं ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः।<br>सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं बभाषे मधुरं हरिः ॥ ३२ ॥ | लोकनियामक ब्रह्माका वचन सुनकर नारायण हरिने सान्त्वनापूर्वक यह मधुर वाक्य कहा— ॥ ३२ ॥ | | भवान् धाता विधाता च स्वयम्भूः प्रपितामहः।<br>न मात्सर्याभियोगेन द्वाराणि पिहितानि मे ॥ ३३ ॥<br><br>किन्तु लीलार्थमेवैतन्न त्वां बाधितुमिच्छया।<br>को हि बाधितुमन्विच्छेद देवदेवं पितामहम् ॥ ३४॥<br><br>न तेऽन्यथावगन्तव्यं मान्यो मे सर्वथा भवान्।<br>सर्वमन्वय कल्याणं यन्मयापहृतं तव ॥ ३५ ॥<br><br>अस्माच्च कारणाद् ब्रह्मन् पुत्रो भवतु मे भवान्।<br>पद्मयोनिरिति ख्यातो मत्प्रियार्थं जगन्मय ॥ ३६ ॥ | आप ही धाता, विधाता और स्वयम्भू पितामह हैं। (मैंने) ईर्ष्या-द्वेषके कारण अपने (शरीरके) द्वारोंको बंद नहीं किया, अपितु लीला करनेकी इच्छासे ही मैंने ऐसा किया न कि आपको बाधा पहुँचानेकी दृष्टिसे। देवाधिदेव पितामह आपको भला कौन बाधा पहुँचाना चाहेगा। आपको कुछ अन्यथा नहीं समझना चाहिये। आप मेरे लिये सभी प्रकारसे मान्य हैं। मेरे द्वारा जो आपका अपहरण हुआ है, उसमें आप सभी प्रकारसे अपना कल्याण ही समझें। इसी कारण ब्रह्मन्! मेरी प्रीतिका लिये आप मेरे पुत्र बनें। जगन्मूर्त्ति! आप 'पद्मयोनि' इस नामसे विख्यात हों ॥ ३३—३६ ॥ | | ततः स भगवान् देवो वरं दत्त्वा किरीटिने।<br>प्रहर्षमतुलं गत्वा पुनुर्विष्णुमभाषत ॥ ३७ ॥ | तदनन्तर भगवान् देव (ब्रह्मा)-ने किरीटी (विष्णु)-को वर देकर अत्यन्त प्रसन्न होकर पुनः विष्णुसे कहा— ॥ ३७ ॥ | | भवान् सर्वात्मकोऽनन्तः सर्वेषां परमेश्वरः।<br>सर्वभूतान्तरात्मा वै परं ब्रह्म सनातनम् ॥ ३८ ॥<br><br>अहं वै सर्वलोकानामात्मा लोकमहेश्वरः।<br>मन्मयं सर्वमेवेदं ब्रह्माहं पुरुषः परः ॥ ३९ ॥<br><br>नावाभ्यां विद्यते ह्यन्यो लोकानां परमेश्वरः।<br>एका मूर्त्तिर्द्विधा भिन्ना नारायणपितामहौ ॥ ४० ॥ | आप सभीके आत्मरूप हैं, अनन्त हैं और सभीके परम ईश्वर हैं। आप सभी प्राणियोंकी अन्तरात्मा हैं तथा आप ही सनातन परब्रह्म हैं। मैं ही सभी लोकोंकी आत्मा एवं लोकमहेश्वर हूँ। यह सब कुछ मेरा ही स्वरूप है। मैं परम पुरुष ब्रह्मा हूँ। हम दोनोंके अतिरिक्त लोकोंका परमेश्वर दूसरा अन्य कोई नहीं है, नारायण और पितामहके रूपमें एक मूर्ति ही दो भागोंमें विभक्त हुई है ॥ ३८—४० ॥ | | तेनैवमुक्तो ब्रह्माणं वासुदेवोऽब्रवीदिदम्।<br>इयं प्रतिज्ञा भवतो विनाशाय भविष्यति ॥ ४१ ॥<br><br>किं न पश्यसि योगेशं ब्रह्माधिपतिमव्ययम्।<br>प्रधानपुरुषेशानं वेदाहं परमेश्वरम् ॥ ४२ ॥<br><br>यं न पश्यन्ति योगीन्द्राः सांख्या अपि महेश्वरम्।<br>अनादिनिधनं ब्रह्म तमेव शरणं व्रज ॥ ४३ ॥ | उनके (ब्रह्माके) द्वारा ऐसा कहे जानेपर वासुदेव ब्रह्मासे इस प्रकार बोले—यह प्रतिज्ञा* आपके विनाशका कारण बनेगी। क्या आप ब्रह्माधिपति योगेश्वर, अव्यय एवं प्रधान पुरुष ईशान (शंकर)-को नहीं देख रहे हैं? मैं उन परमेश्वरको जानता हूँ। योगीन्द्र तथा सांख्यशास्त्रके ज्ञाता भी जिन महेश्वरका दर्शन नहीं कर पाते, आप उन्हीं अनादिनिधन ब्रह्मकी शरण ग्रहण करें ॥ ४१—४३ ॥ |
* हम दोनोंके अतिरिक्त दूसरा परमेश्वर नहीं है—यह प्रतिज्ञा।
५६ * कूर्मपुराण *
| ततः क्रुद्धोऽम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा प्रोवाच केशवम्।<br>भवान् न नूनमात्मानं वेत्ति तत् परमक्षरम्॥ ४४॥<br><br>ब्रह्माणं जगतामेकमात्मानं परमं पदम्।<br>नावाभ्यां विद्यते ह्यन्यो लोकानां परमेश्वरः॥ ४५॥<br><br>संत्यज्य निद्रां विपुलां स्वमात्मानं विलोकय।<br>तस्य तत् क्रोधजं वाक्यं श्रुत्वा विष्णुर्भाषत॥ ४६॥<br><br>मा मैवं वद कल्याण परिवादं महात्मनः।<br>न मेऽस्त्यविदितं ब्रह्मन् नान्यथाहं वदामि ते॥ ४७॥<br><br>किन्तु मोहयति ब्रह्मन् भवन्तं पारमेश्वरी।<br>मायाशेषविशेषाणां हेतुरात्मसमुद्भवा॥ ४८॥ | तदनन्तर क्रुद्ध ब्रह्माने कमलकी आभाके समान नेत्रवाले केशवसे कहा—निश्चित ही आप अपने-आपको वह परम अक्षर, जगत्का एकमात्र आत्मरूप, ब्रह्मरूप, परम पद (शरण) नहीं जान रहे हैं। हम दोनोंके अतिरिक्त लोकोंका परमेश्वर और दूसरा कोई विद्यमान नहीं है। आप दीर्घ निद्राका परित्याग कर अपने-आपको देखें (पहचानें)। उनके (ब्रह्माके) इस क्रोधयुक्त वचनको सुनकर विष्णुने कहा—हे कल्याण! इस प्रकार न कहें, इस प्रकार न कहें, (यह उन) महात्माकी निन्दा है। ब्रह्मन्! मेरे लिये कुछ भी अज्ञात नहीं है, मैं आपसे असत्य नहीं कह रहा हूँ। किंतु ब्रह्मन्! आत्मासे समुद्भूत समस्त विशेषोंकी हेतुभूत परमेश्वरकी माया ही आपको मोहित कर रही है॥ ४४—४८॥ |
| एतावदुक्त्वा भगवान् विष्णुस्तूष्णीं बभूव ह।<br>ज्ञात्वा तत् परमं तत्त्वं स्वमात्मानं महेश्वरम्॥ ४९॥ | इतना कहकर भगवान् विष्णु अपने आत्मरूप महेश्वरको उस सर्वोत्कृष्ट परम तत्त्वके रूपमें जानकर चुप हो गये॥ ४९॥ |
| कुतोऽप्यपरिमेयात्मा भूतानां परमेश्वरः।<br>प्रसादं ब्रह्मणे कर्तुं प्रादुरासीत् ततो हरः॥ ५०॥<br><br>ललाटनयनोऽनन्तो जटामण्डलमण्डितः।<br>त्रिशूलपाणिर्भगवांस्तेजसां परमो निधिः॥ ५१॥<br><br>दिव्यां विशालां ग्रथितां ग्रहैः सार्केन्दुतारकैः।<br>मालामत्यद्भूताकारां धारयन् पादलम्बिनीम्॥ ५२॥ | तदनन्तर ब्रह्माके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये प्राणियोंके परम ईश्वर अपरिमेयात्मा (असीम सामर्थ्यसम्पन्न) हर (भगवान् शंकर) वहाँ प्रादुर्भूत हो गये। उन अनन्त (भगवान् शंकर)-के ललाटमें नेत्र था। वे जटामण्डलसे सुशोभित थे। तेजके परम निधि वे भगवान् हाथमें त्रिशूल लिये थे। उन्होंने सूर्य, चन्द्रमा, ग्रहों तथा नक्षत्रोंसे गूँथी हुई अद्भुत आकारवाली चरणोंतक लटकती हुई लम्बी दिव्य विशाल मालाको धारण कर रखा था॥ ५०—५२॥ |
| तं दृष्ट्वा देवमीशानं ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>मोहितो माययात्यर्थं पीतवाससमब्रवीत्॥ ५३॥<br><br>क एष पुरुषोऽनन्तः शूलपाणिस्त्रिलोचनः।<br>तेजोराशिरमेयात्मा समायाति जनार्दन॥ ५४॥ | उन ईशानदेवको देखकर मायासे अत्यन्त मोहित लोकपितामह ब्रह्माने (अपनी रक्षाके लिये) पीताम्बरधारी (विष्णु)-से कहा—हे जनार्दन! हाथमें त्रिशूल धारण किये, त्रिनेत्रधारी, तेजकी राशिरूप, अमेयात्मा यह कौन अनन्त पुरुष (यहाँ) चला आ रहा है॥ ५३—५४॥ |
| तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विष्णुर्दानवमर्दनः।<br>अपश्यदीश्वरं देवं ज्वलन्तं विमलेऽम्भसि॥ ५५॥<br><br>ज्ञात्वा तत्परमं भावमैश्वरं ब्रह्मभावनम्।<br>प्रोवाचोत्थाय भगवान् देवदेवं पितामहम्॥ ५६॥ | उनके (ब्रह्माके) इस वचनको सुनकर दानवोंका मर्दन करनेवाले विष्णुने निर्मल जलमें देदीप्यमान देव ईश्वरको देखा। ईश्वर-सम्बन्धी उस परम भावरूप ब्रह्मभावको जानकर (महेश्वरमें परम तत्त्वका दर्शनकर) भगवान् (विष्णु) उठकर गये और देवदेव पितामहसे कहने लगे—॥ ५५—५६॥ |
| अयं देवो महादेवः स्वयंज्योतिः सनातनः।<br>अनादिनिधनोऽचिन्त्यो लोकानामीश्वरो महान्॥ ५७॥ | ये देव स्वयं प्रकाशित होनेवाले, सनातन, आदि और अन्तसे रहित, अचिन्त्य, महान्, समस्त लोकोंके ईश्वर महादेव हैं॥ ५७॥ |
- अध्याय ९ * ५७
| शंकरः शम्भुरीशानः सर्वात्मा परमेश्वरः।<br>भूतानामधिपो योगी महेशो विमलः शिवः॥ ५८ ॥<br><br>एष धाता विधाता च प्रधानपुरुषेश्वरः।<br>यं प्रपश्यन्ति यतयो ब्रह्मभावेन भाविताः॥ ५९ ॥<br><br>सृजत्येष जगत् कृत्स्नं पाति संहरते तथा।<br>कालो भूत्वा महादेवः केवलो निष्कलः शिवः॥ ६० ॥<br><br>ब्रह्माणं विदधे पूर्वं भवन्तं यः सनातनः।<br>वेदांश्च प्रददौ तुभ्यं सोऽयमायाति शंकरः॥ ६१ ॥<br><br>अस्यैव चापरां मूर्तिं विश्वयोनिं सनातनीम्।<br>वासुदेवाभिधानां मामवेहि प्रपितामह॥ ६२॥<br><br>किं न पश्यसि योगेशं ब्रह्माधिपतिमव्ययम्।<br>दिव्यं भवतु ते चक्षुर्येन द्रक्ष्यसि तत्परम्॥ ६३॥<br><br>लब्ध्वा शैवं तदा चक्षुर्विष्णोर्लोकपितामहः।<br>बुबुधे परमेशानं पुरतः समवस्थितम्॥ ६४॥<br><br>स लब्ध्वा परमं ज्ञानमैश्वरं प्रपितामहः।<br>प्रपेदे शरणं देवं तमेव पितरं शिवम्॥ ६५ ॥<br><br>ओंकारं समनुस्मृत्य संस्तभ्यात्मानमात्मना।<br>अथर्वशिरसा देवं तुष्टाव च कृताञ्जलिः॥ ६६॥<br><br>संस्तुतस्तेन भगवान् ब्रह्मणा परमेश्वरः।<br>अवाप परमां प्रीतिं व्याजहार स्मयन्निव॥ ६७॥<br><br>मत्समस्त्वं न संदेहो मद्भक्तश्च यतो भवान्।<br>मयैवोत्पादितः पूर्वं लोकसृष्ट्यर्थमव्ययम्॥ ६८ ॥<br><br>त्वमात्मा ह्यादिपुरुषो मम देहसमुद्भवः।<br>वरं वरय विश्वात्मन् वरदोऽहं तवानघ॥ ६९ ॥<br><br>स देवदेववचनं निशम्य कमलोद्भवः।<br>निरीक्ष्य विष्णुं पुरुषं प्रणम्याह वृषध्वजम्॥ ७० ॥<br><br>भगवन् भूतभव्येश महादेवाम्बिकापते।<br>त्वामेव पुत्रमिच्छामि त्वया वा सदृशं सुतम्॥ ७१ ॥ | ये शंकर, शम्भु, ईशान, सर्वात्मा, परमेश्वर, समस्त प्राणियोंके एकमात्र स्वामी, योगी, महेश, विमल एवं शिवरूप (कल्याणरूप) हैं। ये ही धाता, विधाता, प्रधान पुरुष और ईश्वर हैं। यतिजन (संन्यासी लोग) ब्रह्मकी भावनासे भावित होकर जिनका दर्शन करते हैं वे ही केवल, निष्कल, महादेव शिव काल बनकर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार करते हैं॥ ५८-६० ॥<br><br>ये वे ही शंकर आ रहे हैं, जिन सनातन (देव)-ने पूर्वकालमें आप ब्रह्माको बनाया और आपको वेद प्रदान किया। प्रपितामह ! मुझे इनकी ही विश्वयोनि, सनातन एवं वासुदेव नामवाली दूसरी मूर्ति समझो। क्या आप ब्रह्माके भी अधिपति, अव्यय योगेश्वरको नहीं देख रहे हैं? आपकी दिव्य दृष्टि हो जाय, जिससे आप उस परम (तत्त्व)-को देख सकें ॥ ६१-६३ ॥<br><br>विष्णुसे इस प्रकार शैव-नेत्र (शिव-सम्बन्धी ज्ञान) प्राप्तकर लोक-पितामह (ब्रह्मा)-ने सामने अवस्थित परम ईशानको जाना। उन प्रपितामह (ब्रह्मा)-ने ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान प्राप्तकर उन्हीं पितृरूप देव शिवकी शरण ग्रहण की। ओंकार (तत्त्व)-का अनुस्मरणकर और आत्माद्वारा मनका निरोधकर उन्होंने अथर्ववेदके मन्त्रोंसे हाथ जोड़ते हुए (उन) देवकी प्रार्थना की ॥ ६४-६६ ॥<br><br>उन ब्रह्माके द्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् परमेश्वर (शिव)-को परम प्रीति प्राप्त हुई और वे मुसकराते हुए (इस प्रकार) बोले- ॥ ६७॥<br><br>तुम मेरे भक्त हो, इसलिये निःसंदेह तुम मेरे ही समान हो। मेरे द्वारा ही पहले संसारकी सृष्टि करनेके लिये तुम अव्ययको उत्पन्न किया गया था। मेरी देहसे उत्पन्न तुम (मेरी ही) आत्मा और आदि पुरुष हो। हे अनघ ! विश्वात्मन् ! वर माँगो। मैं तुम्हें वर प्रदान करूँगा ॥ ६८-६९ ॥<br><br>कमलसे उत्पन्न उन ब्रह्माने देवाधिदेव (शंकर)-के इस वचनको सुनकर विष्णुकी ओर देखा और उन (परम) पुरुष वृषध्वज (शंकर)-को प्रणामकर उनसे कहा- ॥ ७० ॥<br><br>हे भगवन् ! भूत एवं भविष्यके स्वामी ! महादेव ! अम्बिकाके पति ! मैं आपको ही पुत्र-रूपमें अथवा आपके ही समान पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छा करता हूँ ॥ ७१ ॥ |
५८
- कूर्मपुराण *
| मोहितोऽस्मि महादेव मायया सूक्ष्मया त्वया।<br>न जाने परमं भावं याथातथ्येन ते शिव ॥ ७२ ॥ | महादेव! मैं आपकी सूक्ष्म मायाद्वारा मोहित कर लिया गया हूँ। शिव! मैं आपके परम भावको यथार्थ-रूपमें नहीं जानता हूँ। देव! आप ही भक्तोंके माता-पिता, भाई तथा मित्र हैं। आप प्रसन्न हों। मैं आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करता हूँ और आपकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ७२-७३॥ |
| त्वमेव देव भक्तानां भ्राता माता पिता सुहृत्।<br>प्रसीद तव पादाब्जं नमामि शरणं गतः॥ ७३॥ | |
| स तस्य वचनं श्रुत्वा जगन्नाथो वृषध्वजः।<br>व्याजहार तदा पुत्रं समालोक्य जनार्दनम्॥ ७४॥ | तदनन्तर जगत्के स्वामी वृषध्वज (शंकर)-ने उनके वचन सुनकर पुत्र (रूप) जनार्दन (विष्णु)-की ओर देखकर (ब्रह्मासे) कहा—॥ ७४॥ |
| यदर्थितं भगवता तत् करिष्यामि पुत्रक।<br>विज्ञानमैश्वरं दिव्यमुत्पत्स्यति तवानघ ॥ ७५ ॥ | हे पुत्रक! तुमने जैसी इच्छा की है मैं वैसा ही करूँगा। अनघ! तुम्हें ईश्वर-सम्बन्धी दिव्य ज्ञान प्राप्त होगा। मेरे द्वारा तुम्हीं सभी प्राणियोंके प्रथम स्रष्टाके रूपमें नियुक्त किये गये हो। अतः देवेश! लोकपितामह! तुम वैसा ही करो। ये नारायण एवं अनन्त (भगवान् विष्णु) मेरी ही श्रेष्ठ मूर्ति हैं। ये ईशान हरि तुम्हारे योग-क्षेमका वहन करनेवाले होंगे॥ ७५-७७॥ |
| त्वमेव सर्वभूतानामादिकर्ता नियोजितः।<br>तथा कुरुष्व देवेश मया लोकपितामह॥ ७६ ॥ | |
| एष नारायणोऽनन्तो ममैव परमा तनुः।<br>भविष्यति तवेशानो योगक्षेमवहो हरिः॥ ७७ ॥ | |
| एवं व्याहृत्य हस्ताभ्यां प्रीतात्मा परमेश्वरः।<br>संस्पृश्य देवं ब्रह्माणं हरिं वचनमब्रवीत् ॥ ७८ ॥ | ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त परमेश्वर (शिव)-ने हाथोंसे देव ब्रह्माका स्पर्शकर हरि (विष्णु)-से कहा—हे जगन्मूर्ति! तुम्हारी भक्तिसे मैं तुमपर सर्वथा प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तत्त्वतः हम दोनों भिन्न नहीं हैं॥ ७८-७९॥ |
| तुष्टोऽस्मि सर्वथाहं ते भक्त्या तव जगन्मय।<br>वरं वृणीष्व नह्यावां विभिन्नौ परमार्थतः॥ ७९ ॥ | |
| श्रुत्वाथ देववचनं विष्णुर्विश्वजगन्मयः।<br>प्राह प्रसन्नया वाचा समालोक्य चतुर्मुखम्॥ ८० ॥ | इसके बाद महादेवका वचन सुनकर विश्वमय, जगन्मय विष्णुने चतुर्मुख ब्रह्माकी ओर देखकर प्रीतियुक्त वाणीमें (महादेवसे) कहा—मेरे लिये यही श्लाघनीय वर है कि मैं आप परमेश्वर परमात्माका दर्शन कर रहा हूँ। मेरी आपमें भक्ति हो॥ ८०-८१॥ |
| एष एव वरः श्लाघ्यो यदहं परमेश्वरम्।<br>पश्यामि परमात्मानं भक्तिर्भवतु मे त्वयि॥ ८१ ॥ | |
| तथेत्युक्त्वा महादेवः पुनर्विष्णुमभाषत।<br>भवान् सर्वस्य कार्यस्य कर्ताहमधिदैवतम्॥ ८२ ॥ | 'ऐसा ही हो', यह कहकर महादेवने पुनः विष्णुसे कहा—आप सभी कार्योंके कर्ता हैं और मैं अधिदेवता हूँ। यह सब कुछ मेरा और आपका ही रूप है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आप चन्द्रमा हैं, मैं सूर्य हूँ। आप रात्रि हैं, मैं दिन हूँ। आप प्रकृति हैं और मैं ही अव्यक्त पुरुष हूँ। आप ज्ञानरूप हैं और मैं ज्ञाता हूँ, आप मायारूप हैं और मैं ईश्वर हूँ। आप विद्यात्मिका शक्ति हैं, मैं शक्तिमान् ईश्वर हूँ और निष्कल देव परस्वरूप नारायण भी मैं ही हूँ॥ ८२-८५॥ |
| मन्मयं त्वन्मयं चैव सर्वमेतन्न संशयः।<br>भवान् सोमस्त्वहं सूर्यो भवान् रात्रिरहं दिनम्॥ ८३ ॥ | |
| भवान् प्रकृतिरव्यक्तमहं पुरुष एव च।<br>भवान् ज्ञानमहं ज्ञाता भवान् मायाहमीश्वरः॥ ८४ ॥ | |
| भवान् विद्यात्मिका शक्तिः शक्तिमानहमीश्वरः।<br>योऽहं सुनिष्कलो देवः सोऽपि नारायणः परः॥ ८५ ॥ | |
| एकीभावेन पश्यन्ति योगिनो ब्रह्मवादिनः।<br>त्वामनाश्रित्य विश्वात्मन् न योगी मामुपैष्यति।<br>पालयैतज्जगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥ ८६ ॥ | ब्रह्मवादी योगी (हम दोनोंको) एक भावसे ही देखते हैं। हे विश्वात्मन्! बिना आपका आश्रय ग्रहण किये योगी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते हैं। आप देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त इस सम्पूर्ण जगत्का पालन करें॥ ८६॥ |
- अध्याय १० * ५९
इतीदमुक्त्वा भगवाननादिः
स्वमायया मोहितभूतभेदः।
जगाम जन्मर्धिविनाशहीनं
धामैकमव्यक्तमनन्तशक्तिः ॥ ८७ ॥
ऐसा कहकर अपनी मायासे सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेवाले अनादि एवं अनन्तशक्तिसम्पन्न भगवान् जन्म, विकास एवं विनाशसे रहित (अपने) अव्यक्त धाम (स्थान)-को चले गये॥ ८७ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय
विष्णुद्वारा मधु तथा कैटभका वध, नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा सनकादिकी सृष्टि, ब्रह्मासे रुद्रकी उत्पत्ति, रुद्रकी अष्टमूर्तियों, आठ नामों तथा आठ पत्नियोंका वर्णन, रुद्रके द्वारा अनेक रुद्रोंकी उत्पत्ति तथा पुनः वैराग्य ग्रहण करना, ब्रह्माद्वारा रुद्रकी स्तुति तथा माहात्म्य-वर्णन, रुद्रद्वारा ब्रह्माको ज्ञानकी प्राप्ति, महादेवका त्रिमूर्तित्व और ब्रह्माद्वारा अनेक प्रकारकी सृष्टि
श्रीकूर्म उवाच
गते महेश्वरे देवे स्वाधिवासं पितामहः।
तदेव सुमहत् पद्मं भेजे नाभिसमुत्थितम्॥ १॥
श्रीकूर्मने कहा—महेश्वर देवके अपने निवास-स्थानपर चले जानेके बाद पितामह (ब्रह्मा), (भगवान् विष्णुकी) नाभिसे उत्पन्न उसी विशाल सुन्दर कमलपर रहने लगे॥ १॥
अथ दीर्घेण कालेन तत्राप्रतिमपौरुषौ।
महासुरौ समायातौ भ्रातरौ मधुकैटभौ॥ २॥
क्रोधेन महताविष्टौ महापर्वतविग्रहौ।
कर्णान्तरसमुद्भूतौ देवदेवस्य शार्ङ्गिणः॥ ३॥
तावागतौ समीक्ष्याह नारायणमजो विभुः।
त्रैलोक्यकण्टकावेतावसुरौ हन्तुमर्हसि॥ ४॥
एक लम्बा समय व्यतीत हो जानेपर वहाँ अतुलित शक्तिवाले मधु तथा कैटभ नामक दो असुर आये, जो परस्पर भाई थे। देवोंके भी देव शार्ङ्गधारी भगवान् विष्णुके कानसे उत्पन्न तथा विशाल पर्वतके समान शरीरवाले और महान् क्रोधसे आविष्ट उन दोनों (मधु-कैटभ)-को आया हुआ देखकर अजन्मा, विभु (ब्रह्मा)-ने नारायणसे कहा—ये दोनों असुर तीनों लोकोंके लिये कण्टक हैं, आप इन्हें मारें॥ २—४॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हरिनारायणः प्रभुः।
आज्ञापयामास तयोर्वधार्थं पुरुषावुभौ॥ ५॥
उनके इस वचनको सुनकर प्रभु नारायण हरिने उन दोनोंका वध करनेके लिये (जिष्णु तथा विष्णु नामक) दो पुरुषोंको आज्ञा दी॥ ५॥
तदाज्ञया महद्युद्धं तयोस्ताभ्यामभूद् द्विजाः।
व्यनयत् कैटभं विष्णुर्जिष्णुश्च व्यनयन्मधुम्॥ ६॥
ततः पद्मासनासीनं जगन्नाथं पितामहम्।
बभाषे मधुरं वाक्यं स्नेहाविष्टमना हरिः॥ ७॥
हे ब्राह्मणो! उनकी आज्ञासे उन (विष्णु तथा जिष्णु)-से उन दोनों (मधु-कैटभ) असुरोंका महान् युद्ध हुआ। विष्णुने कैटभको जीता और जिष्णुने मधुको जीता। तदनन्तर स्नेहसे आविष्ट मनवाले हरिने कमलके आसनपर आसीन तथा जगन्नाथ पितामहसे मधुर वचन कहा—॥ ६-७॥
अस्मान्मयोच्यमानस्त्वं पद्मादवतर प्रभो।
नाहं भवन्तं शक्नोमि वोढुं तेजोमयं गुरुम्॥ ८॥
प्रभो! मेरे कहनेसे आप अब इस कमलसे नीचे उतरें। तेजोमय, बहुत भारी आपको ढोनेमें मैं असमर्थ हूँ॥ ८॥
६० * कूर्मपुराण *
| ततोऽवतीर्य विश्वात्मा देहमाविश्य चक्रिणः।<br>अवाप वैष्णवीं निद्रामेकीभूयाथ विष्णुना ॥ ९ ॥ | तब विश्वात्मा (ब्रह्मा) नीचे उतरे और चक्र धारण करनेवाले विष्णुकी देहमें प्रविष्ट होकर वैष्णवी निद्राको प्राप्त हो गये। इस प्रकार विष्णुसे उनकी एकात्मता हो गयी ॥ ९ ॥ |
|---|---|
| सहस्रशीर्षनयनः शङ्खचक्रगदाधरः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ सुष्वाप सलिले तदा ॥ १० ॥<br><br>सोऽनुभूय चिरं कालमानन्दं परमात्मनः।<br>अनाद्यनन्तमद्वैतं स्वात्मानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ११ ॥<br><br>ततः प्रभाते योगात्मा भूत्वा देवश्चतुर्मुखः।<br>ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां वैष्णवं भावमाश्रितः ॥ १२ ॥ | तब हजारों सिर तथा हजारों नेत्रवाले और शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले वे नारायण नामवाले ब्रह्मा जलमें सो गये। उन्होंने बहुत समयतक परमात्माके अनादि, अनन्त, आत्मस्वरूप, ब्रह्मसंज्ञक अद्वैत आनन्दका अनुभव किया। तदनन्तर प्रभातकाल होनेपर योगात्मा देव चतुर्मुख होकर और वैष्णव भावका आश्रय ग्रहणकर उसी प्रकारकी (वैष्णवी) सृष्टि करने लगे ॥ १०–१२ ॥ |
| पुरस्तादसृजद् देवः सनन्दं सनकं तथा।<br>ऋभुं सनत्कुमारं च पूर्वजं तं सनातनम् ॥ १३ ॥<br><br>ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः परं वैराग्यमास्थिताः।<br>विदित्वा परमं भावं न सृष्टौ दधिरे मतिम् ॥ १४ ॥<br><br>तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ पितामहः।<br>बभूव नष्टचेता वै मायया परमेष्ठिनः ॥ १५ ॥<br><br>ततः पुराणपुरुषो जगन्मूर्तिर्जनार्दनः।<br>व्याजहारात्मनः पुत्रं मोहनाशाय पद्मजम् ॥ १६ ॥ | उन देवने सर्वप्रथम पूर्वजोंके भी पूर्वज सनन्दन, सनक, ऋभु, सनत्कुमार तथा सनातनको उत्पन्न किया। (सुख-दुःख आदि) द्वन्द्व एवं मोह (आसक्ति)-से सर्वथा शून्य एवं परम वैराग्यभावमें स्थित इन सनक आदि ऋषियोंने परम तत्त्वको जानकर सृष्टिकार्यमें अपनी बुद्धि नहीं लगायी। उन (सनकादि)-के इस प्रकारके लोक-सृष्टिसे सर्वथा निरपेक्षभावको देखकर पितामह (ब्रह्मा) परमेष्ठी (परमात्मा—जनार्दन)-की मायासे मोहित हो गये। तब जगन्मूर्ति, पुराणपुरुष, जनार्दनने (नाभि) कमलसे उत्पन्न अपने पुत्र (ब्रह्मा)-का मोह नष्ट करनेके लिये उनसे कहा— ॥ १३–१६ ॥ |
| विष्णुरुवाच<br>कच्चिन्न विस्मृतो देवः शूलपाणिः सनातनः।<br>यदुक्तवानात्मनोऽसौ पुत्रत्वे तव शंकरः ॥ १७ ॥ | **विष्णु बोले—**कहीं आप शूलपाणि सनातन-देवको भूल तो नहीं गये? उन शंकरने अपनेको आपके पुत्र-रूपमें होनेकी बात कही थी ॥ १७ ॥ |
| अवाप्य संज्ञां गोविन्दात् पद्मयोनिः पितामहः।<br>प्रजाः स्रष्टुमनास्तेपे तपः परमदुश्चरम् ॥ १८ ॥<br><br>तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित् समवर्तत।<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात् क्रोधोऽभ्यजायत ॥ १९ ॥ | गोविन्दसे चेतना प्राप्तकर पद्मयोनि पितामह प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छासे परम दुश्चर तप करने लगे। उनके इस प्रकार (दीर्घकालतक) तप करनेपर (भी) किसी भी प्रकारकी सृष्टि नहीं हुई। बहुत समय बीत जानेपर उन्हें दुःखसे क्रोध उत्पन्न हुआ ॥ १८–१९ ॥ |
| क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः।<br>ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तथाभवन् ॥ २० ॥<br><br>सर्वांस्तानश्रुजान् दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिन्दत।<br>जहौ प्राणांश्च भगवान् क्रोधाविष्टः प्रजापतिः ॥ २१ ॥ | क्रोधाविष्ट उनके (ब्रह्माके) नेत्रोंसे आँसूकी बूँदें गिरीं। तब उन आँसुओंकी बूँदोंसे भूत-प्रेत उत्पन्न हुए। आँसुओंसे उत्पन्न उन सब (भूत-प्रेतों)-को देखकर क्रोधाविष्ट प्रजापति भगवान् ब्रह्माने अपनी ही निन्दा की और अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया ॥ २०–२१ ॥ |
| तदा प्राणमयो रुद्रः प्रादुरासीत् प्रभोर्मुखात्।<br>सहस्रादित्यसंकाशो युगान्तदहनोपमः ॥ २२ ॥ | तदनन्तर प्रभुके मुखसे हजारों सूर्यके समान देदीप्य-मान तथा प्रलयकालीन अग्निके सदृश प्राणमय रुद्र प्रकट हुए ॥ २२ ॥ |
* अध्याय १० *
६१
| रुरोद सुस्वरं घोरं देवदेवः स्वयं शिवः।<br>रोदमानं ततो ब्रह्मा मा रोदीरित्यभाषत।<br>रोदनाद् रुद्र इत्येवं लोके ख्यातिं गमिष्यसि ॥ २३॥ | देवोंके भी देव स्वयं शिव उच्च स्वरमें घोर रुदन करने लगे। तब रुदन करते हुए उनसे ब्रह्माने 'मत रोओ'—इस प्रकारसे कहा। तुम रुदन करनेके कारण 'रुद्र' इस नामसे संसारमें प्रसिद्धि प्राप्त करोगे ॥ २३॥ |
| अन्यानि सप्त नामानि पत्नीः पुत्रांश्च शाश्वतान्।<br>स्थानानि चैषामष्टानां ददौ लोकपितामहः ॥ २४॥ | लोकपितामहने (उन्हें रुद्रके अतिरिक्त) अन्य सात नाम, (आठ) पत्नियाँ, शाश्वत (दीर्घायु) पुत्र और आठ स्थानों* (मूर्तियों)-को प्रदान किया ॥ २४॥ |
| भवः शर्वस्तथेशानः पशूनां पतिरेव च।<br>भीमश्चोग्रो महादेवस्तानि नामानि सप्त वै॥ २५॥<br>सूर्यो जलं मही वह्निर्वायुराकाशमेव च।<br>दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येता अष्टमूर्तयः ॥ २६॥ | भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र तथा महादेव—ये सात नाम हैं। सूर्य, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र—ये (रुद्रकी) आठ मूर्तियाँ हैं ॥ २५-२६॥ |
| स्थानेष्वेतेषु ये रुद्रं ध्यायन्ति प्रणमन्ति च।<br>तेषामष्टतनुर्देवो ददाति परमं पदम् ॥ २७॥ | जो इन आठ स्थानों (मूर्तिरूपों)-में रुद्रका ध्यान करते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं, उन्हें अष्टमूर्तिरूप देव (भगवान् शिव अपना) परम पद देते हैं ॥ २७॥ |
| सुवर्चला तथैवोमा विकेशी च तथा शिवा।<br>स्वाहा दिशश्च दीक्षा च रोहिणी चेति पत्नयः ॥ २८॥ | सुवर्चला, उमा, विकेशी, शिवा, स्वाहा, दिशाएँ, दीक्षा तथा रोहिणी—ये ही (रुद्रकी आठ) पत्नियाँ हैं। |
| शनैश्चरस्तथा शुक्नो लोहिताङ्गो मनोजवः।<br>स्कन्दः सर्गोऽथ संतानो बुधश्चैषां सुताः स्मृताः ॥ २९॥ | शनैश्चर, शुक्र, लोहिताङ्ग (मंगल), मनोजव (कामदेव), स्कन्द, सर्ग, संतान तथा बुध—ये (आठ उनके) पुत्र कहे गये हैं ॥ २८-२९॥ |
| एवम्प्रकारो भगवान् देवदेवो महेश्वरः।<br>प्रजाधर्मं च कामं च त्यक्त्वा वैराग्यमाश्रितः ॥ ३०॥ | इस प्रकारके देवाधिदेव भगवान् महेश्वरने प्रजाधर्म (सृष्टिकार्य) एवं काम (वासना)-का परित्यागकर वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। उस शाश्वत, परम अमृतरूपी अक्षर ब्रह्मका आस्वादनकर और आत्मामें आत्मतत्त्वका आधानकर वे ईश्वरभावमें स्थित हो गये ॥ ३०-३१॥ |
| आत्मन्याधाय चात्मानमैश्वरं भावमास्थितः।<br>पीत्वा तदक्षरं ब्रह्म शाश्वतं परमामृतम् ॥ ३१॥ | |
| प्रजाः सृजेति चादिष्टो ब्रह्मणा नीललोहितः।<br>स्वात्मना सदृशान् रुद्रान् ससर्ज मनसा शिवः ॥ ३२॥ | ब्रह्माके द्वारा 'प्रजाकी सृष्टि करो' इस प्रकारका आदेश प्राप्तकर नीललोहित शिवने मनसे अपने ही समान रुद्रोंकी सृष्टि की ॥ ३२॥ |
| कपर्दिनो निरातङ्कान् नीलकण्ठान् पिनाकिनः।<br>त्रिशूलहस्तानृष्टिघ्नान् महानन्दांस्त्रिलोचनान् ॥ ३३॥ | प्रभुने सैकड़ों करोड़ जटाजूट धारण करनेवाले, भयरहित, नीलकण्ठ, पिनाकपाणि, हाथमें त्रिशूल धारण किये, ऋष्टिघ्न, महान् आनन्दस्वरूप, तीन नेत्रयुक्त, जरा-मरणसे रहित, विशाल वृषभोंको वाहनरूपमें स्वीकार करनेवाले सर्वज्ञ तथा वीतराग (रुद्रों)-को उत्पन्न किया ॥ ३३-३४॥ |
| जरामरणनिर्मुक्तान् महावृषभवाहनान्।<br>वीतरागांश्च सर्वज्ञान् कोटिकोटिशतान् प्रभुः ॥ ३४॥ | |
| तान् दृष्ट्वा विविधान् रुद्रान् निर्मलान् नीललोहितान्।<br>जरामरणनिर्मुक्तान् व्याजहार हरं गुरुः ॥ ३५॥ | गुरु (ब्रह्मा)-ने जरा-मरणसे रहित, नीललोहित एवं निर्मल उन अनेक रुद्रोंको देखकर हर (शिव)-से कहा ॥ ३५॥ |
* ये आठ स्थान सूर्य, जल आदि आगे गिनाये गये हैं। इनमें रुद्रका निवास है। इसीलिये ये आठ रुद्रकी मूर्ति माने जाते हैं।
६२ * कूर्मपुराण *
| मा स्त्राक्षीरीदृशीर्देव प्रजा मृत्युविवर्जिताः ।<br>अन्याः सृजस्व भूतेश जन्ममृत्युसमन्विताः ॥ ३६ ॥ | हे देव! मृत्युसे रहित इस प्रकारकी सृष्टि मत करो। भूतेश! जन्म एवं मृत्युवाली दूसरी प्रकारकी सृष्टि करो॥ ३६॥ |
| ततस्तमाह भगवान् कपर्दी कामशासनः ।<br>नास्ति मे तादृशः सर्गः सृज त्वमशुभाः प्रजाः ॥ ३७ ॥ | तदनन्तर कामपर शासन करनेवाले जटाजूटधारी भगवान् (शिव)—ने उनसे कहा—मेरे पास उस प्रकारकी (जन्म-मृत्युसे युक्त) सृष्टि नहीं है। (ऐसी) अशुभ प्रजाओंको आप ही उत्पन्न करें। तबसे उन देवने अशुभ प्रजाओंकी सृष्टि नहीं की। (और) अपने आत्मज उन रुद्रोंके साथ वे निवृत्तात्मा (क्रियारहित)—के रूपमें स्थित हो गये। इसी कारण देवोंमें देव उन शूलधारी (शंकर)—का स्थाणुत्व हुआ (अर्थात् वे ‘स्थाणु’^१ इस नामसे प्रसिद्ध हो गये) ॥ ३७-३८ ॥ |
| ततः प्रभृति देवोऽसौ न प्रसूतेऽशुभाः प्रजाः ।<br>स्वात्मजैरेव तै रुद्रैर्निवृत्तात्मा ह्यतिष्ठत ।<br>स्थाणुत्वं तेन तस्यासीद् देवदेवस्य शूलिनः ॥ ३८ ॥<br>ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं तपः सत्यं क्षमा धृतिः ।<br>स्रष्टृत्वमात्मसम्बोधो ह्यधिष्ठातृत्वमेव च ॥ ३९ ॥ | भगवान् शंकरमें ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, तप, सत्य, क्षमा, धृति, स्रष्टृत्व, आत्मज्ञान तथा अधिष्ठातृत्व—ये दस अव्यय (शाश्वत) गुण सदा प्रतिष्ठित रहते हैं। ये पिनाक धारण करनेवाले शंकर ही साक्षात् परमेश्वर हैं ॥ ३९-४० ॥ |
| अव्ययानि दशैतानि नित्यं तिष्ठन्ति शंकरे ।<br>स एव शंकरः साक्षात् पिनाकी परमेश्वरः ॥ ४० ॥<br>ततः स भगवान् ब्रह्मा वीक्ष्य देवं त्रिलोचनम् ।<br>सहैव मानसैः पुत्रैः प्रीतिविस्फारिलोचनः ॥ ४१ ॥ | तदनन्तर प्रीतिसे विकसित नेत्रवाले भगवान् ब्रह्माने तीन नेत्रोंवाले देव (शंकर)—को मानस पुत्रोंके साथ देखा। ब्रह्माने अपनी ज्ञान-दृष्टिसे ईश्वर-सम्बन्धी परात्पर भावको जानकर जगत्के एकमात्र स्वामी (भगवान् शंकर)—की अपने मस्तकपर हाथोंकी अंजलि बाँधकर स्तुति की ॥ ४१-४२ ॥ |
| ज्ञात्वा परतरं भावमैश्वरं ज्ञानचक्षुषा ।<br>तुष्टाव जगतामेकं कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम् ॥ ४२ ॥ | |
| ब्रह्मोवाच<br>नमस्तेऽस्तु महादेव नमस्ते परमेश्वर ।<br>नमः शिवाय देवाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे ॥ ४३ ॥<br><br>नमोऽस्तु ते महेशाय नमः शान्ताय हेतवे ।<br>प्रधानपुरुषेशाय योगाधिपतये नमः ॥ ४४ ॥<br><br>नमः कालाय रुद्राय महाग्रासाय शूलिने ।<br>नमः पिनाकहस्ताय त्रिनेत्राय नमो नमः ॥ ४५ ॥<br><br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं ब्रह्मणो जनकाय ते ।<br>ब्रह्मविद्याधिपतये ब्रह्मविद्याप्रदायिने ॥ ४६ ॥ | ब्रह्माने कहा—महादेव! आपको नमस्कार है। परमेश्वर! आपको नमस्कार है। शिवको नमस्कार है। ब्रह्मरूपी देवको नमस्कार है। महेश! आपको नमस्कार है। शान्तिके मूलहेतु! आपको नमस्कार है। प्रधान पुरुषेश! आपको नमस्कार है तथा योगाधिपति आपको नमस्कार है। काल, रुद्र, महाग्रास^२ तथा शूलीको नमस्कार है। हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। तीन नेत्रवालेको बार-बार नमस्कार है। त्रिमूर्तिस्वरूप आपको नमस्कार है। ब्रह्माके उत्पत्तिकर्ता आपके लिये नमस्कार है। ब्रह्मविद्याके अधिपति और ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ४३—४६ ॥ |
१-स्थाणु-ठूँठ। ठूँठकी ही तरह निष्क्रिय होनेसे शिवको स्थाणु कहा गया है।
२-महाप्रलयमें भगवान् शंकर समस्त प्राणियोंको अपनी गोदमें सुला लेते हैं—इसलिये महाग्रास कहे जाते हैं।