भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ७ * ४५

ततोऽभिध्यायस्तस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्तदा।
प्रादुरासीत् तदाव्यक्तादर्वाक्स्रोतस्तु साधकः ॥ ९ ॥

तदनन्तर निरन्तर सत्यका ध्यान करनेवाले उन देवके चिन्तन करनेपर उसी समय अव्यक्त (प्रकृति)-से (सृष्टि-विस्तारका) साधक अर्वाक्स्रोतवाला साधक (सर्ग) उत्पन्न हुआ। वे (अर्वाक्स्रोत प्राणी) प्रकाश (ज्ञान)-के बाहुल्यवाले, तमोगुण तथा रजोगुणकी अधिकतावाले, अधिक दुःखवाले और सत्त्वगुणसे सम्पन्न मनुष्य नामसे कहे जाते हैं॥ ९-१०॥

ते च प्रकाशबहुलास्तमोद्रिक्ता रजोऽधिकाः।
दुःखोत्कटाः सत्त्वयुता मनुष्याः परिकीर्तिताः ॥ १० ॥
तं दृष्ट्वा चापरं सर्गममन्यद् भगवानजः।
तस्याभिधायतः सर्गं सर्गो भूतादिकोऽभवत् ॥ ११ ॥

उस (मानुष-सर्ग)-को देखकर अजन्मा भगवान्ने अन्य सर्गकी रचनाका विचार किया और उनके ऐसे सर्ग-विषयक ध्यान करते ही भूतादि सर्ग उत्पन्न हुआ।

तेऽपरिग्राहिणः सर्वे संविभागरताः पुनः।
खादनाश्चाप्यशीलाश्च भूताद्याः परिकीर्तिताः।
इत्येते पञ्च कथिताः सर्गा वै द्विजपुंगवाः ॥ १२ ॥

वे सभी संग्रह न करनेवाले, फिर भी बाँटनेके स्वभाववाले, उपभोग करनेवाले तथा शीलरहित 'भूतादि' इस नामसे कहे गये हैं। ब्राह्मणश्रेष्ठो! इस प्रकार ये पाँच सर्ग कहे गये हैं॥ ११-१२॥

प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः।
तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गो हि स स्मृतः ॥ १३ ॥
वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः।
इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतोऽबुद्धिपूर्वकः ॥ १४ ॥

ब्रह्माका वह पहला सर्ग महत्सर्ग कहा गया है। तन्मात्राओंका दूसरा सर्ग भूतसर्ग कहलाता है। तीसरा वैकारिक सर्ग ऐन्द्रियक सर्ग कहा जाता है। इस प्रकार यह प्राकृत सर्ग अबुद्धिपूर्वक हुआ। चौथा सर्ग मुख्य सर्ग है। स्थावर (जड पदार्थ) मुख्य कहलाते हैं।

मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः।
तिर्यक्स्रोतस्तु यः प्रोक्तस्तिर्यग्योन्यः स पञ्चमः ॥ १५ ॥
तथोर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः।
ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ॥ १६ ॥
अष्टमो भौतिकः सर्गो भूतादीनां प्रकीर्तितः।
नवमश्चैव कौमारः प्राकृता वैकृतास्त्विमे ॥ १७ ॥

तिर्यक्स्रोतसे जिस सर्गको बतलाया है वह तिर्यग्योनिवाला पाँचवाँ सर्ग है। तदनन्तर ऊर्ध्वस्रोतसोंका छठा सर्ग है जो देवसर्ग कहलाता है। तदनन्तर अर्वाक्स्रोतसोंका सातवाँ सर्ग है जो मानुष सर्ग है। भूतादिकोंका आठवाँ सर्ग भौतिक सर्ग कहा गया है। नवाँ सर्ग कौमार सर्ग है। इस प्रकार ये नवों सर्ग प्राकृत तथा वैकृत दोनों प्रकारके हैं॥ १३-१७॥

प्राकृतास्तु त्रयः पूर्वे सर्गास्तेऽबुद्धिपूर्वकाः।
बुद्धिपूर्वं प्रवर्तन्ते मुख्याद्या मुनिपुंगवाः ॥ १८ ॥

मुनिश्रेष्ठो! पहलेके तीन सर्ग (महत्सर्ग, भूतसर्ग तथा ऐन्द्रियक सर्ग) प्राकृत सर्ग हैं, जो अबुद्धिपूर्वक होते हैं। और मुख्य आदि सर्ग (अवशिष्ट ६ सर्ग) बुद्धिपूर्वक होते हैं॥ १८॥

अग्रे ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान्।
सनकं सनातनं चैव तथैव च सनन्दनम्।
ऋभुं सनत्कुमारं च पूर्वमेव प्रजापतिः ॥ १९ ॥
पञ्चैते योगिनो विप्राः परं वैराग्यमास्थिताः।
ईश्वरासक्तमनसो न सृष्टौ दधिरे मतिम् ॥ २० ॥

प्रजापति ब्रह्माजीने सबसे पहले अपने ही समान सनक, सनातन, सनन्दन, ऋभु तथा सनत्कुमार नामक मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया। हे ब्राह्मणो! ये पाँचों योगी थे, परम वैराग्यवान् थे और ईश्वरमें उनका मन आसक्त था। (इसलिये) उन्होंने सृष्टि (-के विस्तार)-में अपनी बुद्धि नहीं लगायी ॥ १९-२०॥