भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४ * कूर्मपुराण *


पृथिवीं तु समीकृत्य पृथिव्यां सोऽचिनोद् गिरीन्।
प्राक्सर्गदग्धानखिलांस्ततः सर्गेऽदधन्मनः ॥ २५ ॥

तदनन्तर पृथ्वीको समतल बनाकर उन्होंने पहली सृष्टिके दग्ध हुए समस्त पर्वतोंको पृथ्वीपर स्थापित किया और सृष्टि (करने)-में अपना मन लगाया ॥ २५ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छठा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥


सातवाँ अध्याय

नौ प्रकारकी सृष्टि, ब्रह्माजीके मानस पुत्रोंका आविर्भाव, ब्रह्माजीके चारों मुखोंसे चारों वेदोंकी उत्पत्ति इत्यादिका वर्णन

श्रीकूर्म उवाच

सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा।
अबुद्धिपूर्वकः सर्गः प्रादुर्भूतस्तमोमयः ॥ १ ॥
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः।
अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ॥ २ ॥
पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतः सोऽभिमानिनः।
संवृतस्तमसा चैव बीजकम्भुवनावृतः ॥ ३ ॥
बहिरन्तश्चाप्रकाशः स्तब्धो निःसंज्ञ एव च।
मुख्या नगा इति प्रोक्ता मुख्यसर्गस्तु स स्मृतः ॥ ४ ॥

तं दृष्ट्वासाधकं सर्गममन्यदपरं प्रभुः।
तस्याभिध्यायतः सर्गस्तिर्यक्स्रोतोऽभ्यवर्तत ॥ ५ ॥

यस्मात् तिर्यक् प्रवृत्तः स तिर्यक्स्रोतस्ततः स्मृतः।
पश्वादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणो द्विजाः ॥ ६ ॥
तमप्यसाधकं ज्ञात्वा सर्गमन्यं ससर्ज ह।
ऊर्ध्वस्रोत इति प्रोक्तो देवसर्गस्तु सात्त्विकः ॥ ७ ॥

ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तश्च नावृताः।
प्रकाशा बहिरन्तश्च स्वभावाद् देवसंज्ञिताः ॥ ८ ॥


श्रीकूर्म बोले— उनके (ब्रह्माके) द्वारा सृष्टिके विषयमें सोचते रहनेपर अबुद्धिपूर्वक अन्धकाररूप वैसी ही सृष्टि हुई जैसी कि पूर्वके कल्पोंमें हुई थी। उन महात्मासे तम, मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्ध नामवाली यह पञ्चपर्वा अविद्या उत्पन्न हुई। उस अभिमानी (देव)-के द्वारा ध्यान करते समय अन्धकारसे ढकी हुई बीज-सदृश तथा लोकोंसे आवृत्त वह सृष्टि पाँच भागोंमें विभाजित होकर स्थित हुई ॥ १–३ ॥

बाहर एवं भीतरके प्रकाश (ज्ञान)-से शून्य, स्तब्ध (जड) तथा संज्ञा (चेतना)-विहीन नग (अर्थात् पर्वत, वृक्ष आदि) 'मुख्य' इस नामसे कहे जाते हैं और वही मुख्य सर्ग (मुख्य सृष्टि) कहलाता है। प्रभुने उस (मुख्य सर्ग)-को (सृष्टिके विस्तारमें) साधक (समर्थ) न देखकर दूसरी सृष्टिके लिये विचार किया। उनके ऐसा विचार करते ही 'तिर्यक्स्रोत' नामक (पशु-पक्षियों आदिकी) सृष्टि हुई। हे ब्राह्मणो! क्योंकि वह सृष्टि तिर्यक् (तिरछी) चलनेवाली थी, इसलिये तिर्यक्स्रोत सृष्टि कहलाती है। वे (मार्गका उल्लंघन करनेवाले) पशु आदि उत्पथग्राही कहे जाते हैं ॥ ४–६ ॥

उस तिर्यक्स्रोत नामक सृष्टिको भी (सृष्टि-विस्तारके लिये) निष्प्रयोजन जानकर (उन देवने) अन्य सर्गको उत्पन्न किया। वह (सर्ग) ऊर्ध्वस्रोत सात्त्विक सर्ग 'देवसर्ग' नामसे कहा गया। इस देवसर्गके लोगोंमें सुख और प्रीतिकी अधिकता रहती है। वे अंदर तथा बाहर आवरणसे रहित होते हैं तथा स्वभावसे ही अंदर-बाहर प्रकाशसे परिपूर्ण रहते हैं, इसलिये वे देव कहलाते हैं ॥ ७-८ ॥

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