संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४६ * कूर्मपुराण *
| तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ प्रजापतिः।<br>मुमोह मायया सद्यो मायिनः परमेष्ठिनः॥ २१॥ | लोकसृष्टिके कार्यमें उनके इस प्रकार निरपेक्ष (उदासीन) हो जानेपर प्रजापति (ब्रह्मा) मायापति परमेष्ठीकी* मायाके द्वारा तत्काल मोहित कर लिये गये। |
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| तं बोधयामास सुतं जगन्मायो महामुनिः।<br>नारायणो महायोगी योगिचित्तानुरञ्जनः॥ २२॥ | योगियोंके चित्तका अनुरञ्जन करनेवाले जगत्कर्ता महायोगी, महामुनि नारायणने (अपने) उस पुत्र (ब्रह्मा)-को प्रबुद्ध किया। (तब) उनके द्वारा प्रबुद्ध किये गये विश्वात्मा (ब्रह्मा)-ने परम तप किया, (किंतु) तप करनेपर भी उन भगवान् ब्रह्माको कुछ प्राप्त नहीं हुआ॥ २१—२३॥ |
| बोधितस्तेन विश्वात्मा तताप परमं तपः।<br>स तप्यमानो भगवान् न किञ्चित् प्रत्यपद्यत॥ २३॥<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात् क्रोधो व्यजायत।<br>क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः॥ २४॥ | तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर (प्रयोजन सिद्ध न होनेके कारण उन्हें) दुःखके कारण क्रोध उत्पन्न हुआ। क्रोधसे आविष्ट उन (ब्रह्मा)-के नेत्रोंसे आँसूकी बूँदें गिरीं। उनके (क्रोधके कारण) टेढ़ी भ्रुकुटियोंवाले ललाटसे शरण देनेवाले नीललोहित परमेश्वर महादेव प्रकट हुए। वे ही तेजकी राशि सनातन भगवान् ईश हैं, जिन्हें विद्वान् लोग अपनी आत्मामें स्थित परमेश्वर (परमात्मा)-के रूपमें देखते हैं॥ २४—२६॥ |
| भ्रुकुटीकुटिलात् तस्य ललाटात् परमेश्वरः।<br>समुत्पन्नो महादेवः शरण्यो नीललोहितः॥ २५॥ | |
| स एव भगवानीशस्तेजोराशिः सनातनः।<br>यं प्रपश्यन्ति विद्वांसः स्वात्मस्थं परमेश्वरम्॥ २६॥ | |
| ओंकारं समनुस्मृत्य प्रणम्य च कृताञ्जलिः।<br>तमाह भगवान् ब्रह्मा सृजेमा विविधाः प्रजाः॥ २७॥ | ओंकारका सम्यक् रूपसे स्मरणकर और प्रणामकर हाथ जोड़ते हुए भगवान् ब्रह्माने उन (महादेव)-से कहा—इन अनेक प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करें॥ २७॥ |
| निशम्य भगवान् वाक्यं शंकरो धर्मवाहनः।<br>स्वात्मना सदृशान् रुद्रान् ससर्ज मनसा शिवः।<br>कपर्दिनो निरातङ्कांस्त्रिनेत्रान् नीललोहितान्॥ २८॥ | धर्म (वृषभ)-पर आरूढ़ होनेवाले धर्मवाहन मङ्गलकारी भगवान् शिवने (ब्रह्माके) वचनको सुनकर मनसे अपने ही समान जटाधारी, आतंकरहित, तीन नेत्रवाले एवं नीललोहित रुद्रोंको उत्पन्न किया॥ २८॥ |
| तं प्राह भगवान् ब्रह्मा जन्ममृत्युयुताः प्रजाः।<br>सृजेति सोऽब्रवीदीशो नाहं मृत्युजरान्विताः।<br>प्रजाः स्रक्ष्ये जगन्नाथ सृज त्वमशुभाः प्रजाः॥ २९॥ | उनसे भगवान् ब्रह्माने कहा—जन्म लेनेवाली और मृत्युको प्राप्त होनेवाली प्रजाकी सृष्टि करो। वे ईश बोले—हे जगन्नाथ! मैं मृत्यु एवं वृद्धावस्थाको प्राप्त होनेवाली प्रजाकी सृष्टि नहीं करूँगा। ऐसी अशुभ प्रजाओंको आप ही उत्पन्न करें॥ २९॥ |
| निवार्य च तदा रुद्रं ससर्ज कमलोद्भवः।<br>स्थानाभिमानिनः सर्वान् गदतस्तान् निबोधत॥ ३०॥ | तब कमलसे उत्पन्न ब्रह्माने (सृष्टि-विस्तारके कार्यसे) रुद्रको रोककर (स्वयं) सभी स्थानाभिमानियोंको उत्पन्न किया, मैं उन्हें बता रहा हूँ (आपलोग) सुनें॥ ३०॥ |
| आपोऽग्निरन्तरिक्षं च द्यौर्वायुः पृथिवी तथा।<br>नद्यः समुद्राः शैलाश्च वृक्षा वीरुध एव च॥ ३१॥<br>लवाः काष्ठाः कलाश्चैव मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।<br>अर्धमासाश्च मासाश्च अयनाब्दयुगादयः॥ ३२॥ | जल, अग्नि, अन्तरिक्ष, आकाश, वायु और पृथ्वी इसी प्रकार नदी, समुद्र, पर्वत, वृक्ष, वनस्पति, लव, काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन-रात, अर्धमास, मास, अयन, वर्ष तथा युग आदि॥ ३१-३२॥ |
* छठे अध्यायमें ब्रह्मा और नारायणमें अभेद माना गया है, अतः यहाँ परमेष्ठी शब्द 'नारायण' का वाचक है।