भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 57
  • अध्याय ७ * | ४७ ---|--- स्थानाभिमानिनः सृष्ट्वा साधकानसृजत् पुनः।<br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च धर्मं संकल्पमेव च॥ ३३॥ | स्थानाभिमानियोंकी सर्जना कर पुनः सृष्टिके सहायकों—मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ, धर्म एवं संकल्पको उत्पन्न किया॥ ३३॥ प्राणाद् ब्रह्मासृजद् दक्षं चक्षुषश्च मरीचिनम्।<br>शिरसोऽङ्गिरसं देवो हृदयाद् भृगुमेव च॥ ३४॥<br>श्रोत्राभ्यामत्रिनामानं धर्मं च व्यवसायातः।<br>संकल्पं चैव संकल्पात् सर्वलोकपितामहः॥ ३५॥<br>पुलस्त्यं च तथोदानाद् व्यानाच्च पुलहं मुनिम्।<br>अपानात् क्रतुमव्यग्रं समानाच्च वसिष्ठकम्॥ ३६॥ | सभी लोकोंके पितामह ब्रह्मदेवने प्राण (वायु)-से दक्षको उत्पन्न किया, इसी प्रकार नेत्रोंसे मरीचि, सिरसे अङ्गिरा, हृदयसे भृगु, कानोंसे अत्रि नामवाले (ऋषि)-को, व्यवसायसे धर्मको और संकल्पसे संकल्पको तथा ऐसे ही उदान (वायु)-से पुलस्त्य, व्यान (वायु)-से पुलह मुनि, अपान (वायु)-से शान्त स्वभाव क्रतु और समान (वायु)-से वसिष्ठको उत्पन्न किया॥ ३४–३६॥ इत्येते ब्रह्मणा सृष्टाः साधका गृहमेधिनः।<br>आस्थाय मानवं रूपं धर्मस्तैः सम्प्रवर्तितः॥ ३७॥ | ब्रह्माके द्वारा उत्पन्न ये सभी गृहस्थ हैं तथा (सृष्टि-विस्तारके) सहयोगी हैं। मनुष्यका रूप धारणकर इन्होंने धर्मका प्रवर्तन किया। तदनन्तर देवता, असुर, पितर तथा ततो देवासुरपितॄन् मनुष्यांश्च चतुष्टयम्।<br>सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत्॥ ३८॥ | मनुष्य—इन चारोंकी तथा जलकी सृष्टि करनेकी इच्छासे (ब्रह्माने) अपने-आपको नियुक्त किया॥ ३७-३८॥ युक्तात्मनस्तमोमात्रा उद्रिक्ताभूत् प्रजापतेः।<br>ततोऽस्य जघनात् पूर्वमसुरा जज्ञिरे सुताः॥ ३९॥ | संयुक्त आत्मरूपवाले प्रजापतिसे तमोगुणकी मात्राका उद्रेक हुआ। तदनन्तर उनकी जंघासे पहले (तमोगुणी) असुर (योनिके) पुत्र उत्पन्न हुए। असुरोंकी सृष्टिकर पुरुषोत्तमने उस (तमोमय) शरीरका परित्याग कर दिया। उनके द्वारा छोड़ा गया वह शरीर शीघ्र ही रात्रिके उत्ससर्जासुरान् सृष्ट्वा तां तनुं पुरुषोत्तमः।<br>सा चोत्सृष्टा तनुस्तेन सद्यो रात्रिरजायत।<br>सा तमोबहुला यस्मात् प्रजास्तस्यां स्वपन्त्यतः॥ ४०॥ | रूपमें परिवर्तित हो गया। वह (रात्रि) चूँकि अन्धकारकी अधिकतावाली रहती है, अतः उसमें (रात्रिमें) प्रजाएँ सोती हैं॥ ३९-४०॥ सत्त्वमात्रात्मिकां देवस्तनुमन्यामगृह्णत।<br>ततोऽस्य मुखतो देवा दीव्यतः सम्प्रजज्ञिरे॥ ४१॥ | (पुनः) देवने सत्त्वगुणात्मक दूसरे शरीरको धारण किया और तब उनके मुखसे दीप्तिमान् देवता प्रादुर्भूत हुए। उन्होंने (प्रजापतिने) वह शरीर भी छोड़ दिया। त्यक्ता सापि तनुस्तेन सत्त्वप्रायमभूद् दिनम्।<br>तस्मादहो धर्मयुक्ता देवताः समुपासते॥ ४२॥ | वह सत्त्वगुणकी अधिकतावाला शरीर दिन हुआ। धर्मात्मा देवता इसीलिये दिनका सेवन करते हैं॥ ४१-४२॥ सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां जगृहे तनुम्।<br>पितृवन्मन्यमानस्य पितरः सम्प्रजज्ञिरे॥ ४३॥ | पुनः (उन्होंने) सत्त्वगुणात्मक ही एक दूसरे शरीरको धारण किया। पिताके समान माननेवाले उनके द्वारा पितर उत्पन्न हुए। विश्वकी रचना करनेवाले उन्होंने (ब्रह्माने) पितरोंकी सृष्टिकर उस शरीरको भी छोड़ उत्ससर्ज पितॄन् सृष्ट्वा ततस्तामपि विश्वसृक्।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यः संध्या व्यजायत॥ ४४॥ | दिया। वह छोड़ा गया शरीर शीघ्र ही संध्याके रूपमें बदल गया॥ ४३-४४॥ तस्मादहर्देवतानां रात्रिः स्याद् देवविद्विषाम्।<br>तयोर्मध्ये पितॄणां तु मूर्तिः संध्या गरीयसी॥ ४५॥ | इसीलिये देवताओंके लिये दिन, देवविद्वेषी असुरोंके लिये रात तथा दिन और रातके मध्यकी संध्या जो पितरोंकी मूर्तिरूप है, वह प्रशस्त है॥ ४५॥