संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४८ | * कूर्मपुराण * |
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| तस्माद् देवासुराः सर्वे मनवो मानवास्तथा।<br>उपासते सदा युक्ता रात्र्यहोर्मध्यमां तनुम्॥ ४६॥ | इसलिये देवता, असुर, (स्वायम्भुव आदि) सभी मनु तथा सभी मनुष्य दिन और रातके मध्यमें सदा स्थित रहनेवाले (संध्यारूपी) शरीर (मूर्ति)-की उपासना करते हैं॥ ४६॥ |
| रजोमात्रात्मिकां ब्रह्मा तनुमन्यामगृह्णत।<br>ततोऽस्य जज्ञिरे पुत्रा मनुष्या रजसावृताः॥ ४७॥ | (तब) ब्रह्माने रजोगुणकी अधिकतावाले अन्य शरीरको धारण किया, जिससे रजोगुणसे आवृत उनके पुत्र उत्पन्न हुए, जो मनुष्य कहलाये॥ ४७॥ |
| तामप्याशु स तत्याज तनुं सद्यः प्रजापतिः।<br>ज्योत्स्ना सा चाभवद्विप्राः प्राक्संध्या याभिधीयते॥ ४८॥ | ब्राह्मणो! उन प्रजापतिने शीघ्र ही उस (रजोगुणात्मक) शरीरको भी छोड़ दिया। वह (छोड़ा गया शरीर) ज्योत्स्नाके रूपमें हो गया, जिसे प्राक्संध्या कहा जाता है॥ ४८॥ |
| ततः स भगवान् ब्रह्मा सम्प्राप्य द्विजपुंगवाः।<br>मूर्तिं तमोरजःप्रायां पुनरेवाभ्ययूयुजत्॥ ४९॥<br><br>अन्धकारे क्षुधाविष्टा राक्षसास्तस्य जज्ञिरे।<br>पुत्रास्तमोरजःप्राया बलिनस्ते निशाचराः॥ ५०॥<br><br>सर्पा यक्षास्तथा भूता गन्धर्वाः सम्प्रजज्ञिरे।<br>रजस्तमोभ्यामाविष्टांस्ततोऽन्यानसृजत् प्रभुः॥ ५१॥ | हे ब्राह्मणो! भगवान् ब्रह्मा फिर तम तथा रजोमयी मूर्ति (शरीर)-को धारण कर पुनः योगयुक्त हुए। इस शरीरसे अन्धकारमें भूखसे व्याकुल होनेवाले राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए। तमोगुण तथा रजोगुणकी अधिकतावाले वे महान् बलशाली पुत्र निशाचर कहलाये। ऐसे ही सर्प, यक्ष, भूत तथा गन्धर्व उत्पन्न हुए। तदनन्तर रजोगुण तथा तमोगुणसे आविष्ट अन्य प्राणियोंको भी प्रभुने उत्पन्न किया॥ ४९–५१॥ |
| वयांसि वयसः सृष्ट्वा अवयो वक्षसोऽसृजत्।<br>मुखतोऽजान् ससर्जान्यन् उदराद् गाश्च निर्ममे॥ ५२॥<br><br>पद्भ्यां चाश्वान् समातङ्गान्रासभान् गवयान् मृगान्।<br>उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यङ्कूंनन्यांश्च जातयः।<br>ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे॥ ५३॥ | वयः (अवस्था)-से पक्षियोंकी सृष्टि करनेके अनन्तर (ब्रह्माने) वक्षःस्थलसे भेड़ोंको उत्पन्न किया। मुखसे बकरोंको उत्पन्न किया और उदर-देशसे गौओंकी सृष्टि की। पैरोंसे हाथियोंसहित घोड़ों, गदहों, गायके समान ही दूसरे प्रकारकी गायों (नीलगाय आदि), मृगों, ऊँटों, खच्चरों, न्यङ्कुओं (मृग-विशेष) तथा अन्य (तिर्यक् आदि) योनियोंको उत्पन्न किया। फल-मूलवाली ओषधियाँ उनके रोमोंसे पैदा हुईं॥ ५२-५३॥ |
| गायत्रीं च ऋचं चैव त्रिवृत्साम रथन्तरम्।<br>अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात्॥ ५४॥ | (ब्रह्माजीने अपने) प्रथम (पूर्व) मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत्साम, रथन्तर (साम) और यज्ञोंमें अग्निष्टोम (नामक यज्ञ)-को उत्पन्न किया। दक्षिण |
| यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दः स्तोमं पञ्चदशं तथा।<br>बृहत्साम तथोक्थं च दक्षिणादसृजन्मुखात्॥ ५५॥ | मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुभ् छन्द, पञ्चदश स्तोम (मन्त्रोंका समूह-विशेष) बृहत्साम तथा उक्थ (नामक वेदमन्त्रों)-का सृजन किया। पश्चिम मुखसे सामवेद, जगती छन्द, |
| सामानि जागतं छन्दःस्तोमं सप्तदशं तथा।<br>वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात्॥ ५६॥ | सप्तदश स्तोम (मन्त्रोंका समूह-विशेष) और वैरूप तथा अतिरात्र नामक यज्ञोंको उत्पन्न किया। उत्तर मुखसे |
| एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।<br>अनुष्टुभं सवैराजमुत्तरादसृजन्मुखात्॥ ५७॥ | इक्कीस शाखाओंवाले अथर्ववेद, अनुष्टुप् छन्द और आप्तोर्याम तथा वैराज (नामक यज्ञ)-को उत्पन्न किया॥ ५४–५७॥ |