भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ७ *४९
उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>ब्रह्मणो हि प्रजासर्गं सृजतस्तु प्रजापतेः॥ ५८ ॥<br><br>सृष्ट्वा चतुष्टयं सर्गं देवर्षिपितृमानुषम्।<br>ततोऽसृजच्च भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ५९॥<br>यक्षान् पिशाचान् गन्धर्वांस्तथैवाप्सरसः शुभाः।<br>नरकिन्नररक्षांसि वयःपशुमृगोरगान्।<br>अव्ययं च व्ययं चैव द्वयं स्थावरजङ्गमम्॥ ६० ॥<br><br>तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्टौ प्रतिपेदिरे।<br>तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः॥ ६१॥<br><br>हिंस्त्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते।<br>तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात् तत् तस्य रोचते॥ ६२ ॥<br><br>महाभूतेषु नानात्वमिन्द्रियार्थेषु मूर्तिषु।<br>विनियोगं च भूतानां धातैव व्यदधात् स्वयम्॥ ६३ ॥<br><br>नामरूपं च भूतानां कृत्यानां च प्रपञ्चनम्।<br>वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः॥ ६४॥<br><br>आर्षाणि चैव नामानि याश्च वेदेषु दृष्टयः।<br>शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः॥ ६५ ॥<br><br>यथर्तवृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये।<br>दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु॥ ६६ ॥प्रजापति ब्रह्माके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि करते समय उनके शरीरसे उच्च एवं निम्न (कोटिक अन्य भी) प्राणियोंकी सृष्टि हुई। देवता, ऋषि, पितर तथा मनुष्य—इन चार प्रकारकी सृष्टि करके (ब्रह्माने) चर तथा अचर (सभी) प्राणियोंकी सृष्टि की॥ ५८-५९॥<br><br>यक्षों, पिशाचों, गन्धर्वों तथा शुभ अप्सराओं, नरों, किन्नरों, राक्षसों, पक्षियों, पशुओं, मृगों तथा सर्पोंको उत्पन्न किया। नित्य एवं अनित्य-भेदसे चर एवं अचर सृष्टि दो प्रकारकी है। पहलेकी सृष्टियोंमें उन (प्राणियों)-के जो-जो कर्म निश्चित थे अगली सृष्टियोंमें भी उत्पन्न होकर वे बार-बार उन्हीं कर्मोंको प्राप्त करते हैं॥ ६०-६१॥<br><br>इसीलिये उसी प्रकारकी भावना (संस्कार)-से प्रेरित होकर (वे प्राणी) हिंसक, अहिंसक, कोमल, क्रूर, धर्म-अधर्म तथा सत्य एवं असत्यकी प्रवृत्तियाँ प्राप्त करते हैं और वही (कर्म) उन्हें रुचिकर भी लगता है॥ ६२ ॥<br><br>विधाताने स्वयं ही प्राणियोंकी इन्द्रियोंके विषयों, महाभूतों एवं मूर्तियोंमें भिन्नता और विनियोगकी व्यवस्था की है। उन महेश्वरने प्रारम्भमें वेदके शब्दोंसे ही प्राणियोंके नाम और रूप तथा कर्मोंकी विविधताका निर्माण किया। वेदोंमें जिन सिद्धान्तों और आर्ष नामोंका प्रतिपादन हुआ है, उन्हीं नामोंको ब्रह्मा (प्रलयकालीन) रात्रिके अन्तमें उत्पन्न पदार्थोंको प्रदान करते हैं॥ ६३–६५॥<br><br>प्रलयकालसे पूर्व जो ऋतुएँ और ऋतुओंके चिह्न तथा अनेक प्रकारके रूप (आकार) दिखलायी देते थे, अगले युगोंमें वे उन्हीं-उन्हीं (नाम-रूपों तथा) भावोंमें प्रकट होकर दिखलायी देते हैं॥ ६६ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तमोऽध्यायः॥ ७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥