भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५० * कूर्मपुराण *


आठवाँ अध्याय

सृष्टि-वर्णनमें ब्रह्माजीसे मनु और शतरूपाका प्रादुर्भाव, स्वायम्भुव मनुके वंशका वर्णन, दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंका वर्णन तथा उनका विवाह, धर्म तथा अधर्मकी संतानोंका विवरण

श्रीकूर्म उवाचश्रीकूर्मने कहा—
एवं भूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च।<br>यदा चास्य प्रजाः सृष्टा न व्यवर्धन्त धीमतः॥ १ ॥<br><br>तमोमात्रावृतो ब्रह्मा तदाशोचत दुःखितः।<br>ततः स विदधे बुद्धिमर्थनिश्चयगामिनीम्॥ २ ॥इस प्रकार स्थावर तथा जङ्गम प्राणियोंकी सृष्टि हुई, किंतु जब उन बुद्धिमान् (ब्रह्मा)-द्वारा उत्पन्न की गयी प्रजाओंमें वृद्धि नहीं हुई, तब तमोगुणकी अधिकतासे आवृत ब्रह्मा दुःखी होकर चिन्ता करने लगे और फिर उन्होंने अर्थका निश्चय करनेवाली बुद्धिको ग्रहण किया॥ १-२॥
अथात्मनि समद्राक्षीत् तमोमात्रां नियामिकाम्।<br>रजःसत्त्वं च संवृत्य वर्तमानां स्वधर्मतः॥ ३ ॥<br><br>तमस्तद् व्यनुदत् पश्चात् रजः सत्त्वेन संयुतः।<br>तत् तमः प्रतिनुन्नं वै मिथुनं समजायत॥ ४ ॥तदनन्तर उन्होंने स्वधर्मानुसार रजोगुण एवं सत्त्वगुणको आवृत कर स्थित रहनेवाली तथा (कर्मकी) नियामिका (तमोवृत्ति)-को अपनी आत्मामें देखा। तत्पश्चात् सत्त्वगुणसे संयुक्त रजोगुणने उस तमोगुणको दूर किया और दूर हुआ वह तम दो भागोंमें विभक्त हो गया॥ ३-४॥
अधर्माचरणो विप्रा हिंसा चाशुभलक्षणा।<br>स्वां तनुं स ततो ब्रह्मा तामपोहत् भास्वराम्॥ ५ ॥हे ब्राह्मणो ! (इस प्रकार दो भागोंमें विभक्त हुए तमसे) अधर्माचरण और अशुभ लक्षणोंवाली हिंसा उत्पन्न हुई। तब ब्रह्माजीने अपने उस प्रकाशमान शरीरको छोड़ दिया॥ ५॥
द्विधाकरोत् पुनर्देहमर्धेन पुरुषोऽभवत्।<br>अर्धेन नारी पुरुषो विराजमसृजत् प्रभुः॥ ६ ॥पुनः (पुरातन) पुरुष प्रभुने अपने शरीरको दो भागोंमें बाँटा। आधेसे पुरुष हुआ और आधेसे नारी। तत्पश्चात् (उन्होंने) विराट् पुरुषको उत्पन्न किया॥ ६॥
नारीं च शतरूपाख्यां योगिनीं ससृजे शुभाम्।<br>सा दिवं पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्य संस्थिता॥ ७ ॥उन्होंने 'शतरूपा' नामवाली कल्याणमयी योगिनी नारीको बनाया, वह पृथिवी-लोक तथा द्युलोकको अपनी महिमासे व्याप्तकर प्रतिष्ठित हुई॥ ७॥
योगैश्वर्यबलोपेता ज्ञानविज्ञानसंयुता।<br>योऽभवत् पुरुषात् पुत्रो विराडव्यक्तजन्मनः॥ ८ ॥<br><br>स्वायम्भुवो मनुर्देवः सोऽभवत् पुरुषो मुनिः।<br>सा देवी शतरूपाख्या तपः कृत्वा सुदुश्चरम्॥ ९ ॥<br><br>भर्तारं ब्रह्मणः पुत्रं मनुमेवान्वपद्यत।<br>तस्माच्च शतरूपा सा पुत्रद्वयमसूयत॥ १० ॥(वह शतरूपा नामवाली नारी) योगके ऐश्वर्य एवं बलसे सम्पन्न तथा ज्ञान-विज्ञानसे युक्त थी। (और) जो पुरुषसे अव्यक्तजन्मा ब्रह्माका विराट् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, वह देवपुरुष मुनि स्वायम्भुव मनुके रूपमें प्रसिद्ध हुआ। शतरूपा नामवाली उस देवीने अत्यन्त कठोर तप करके ब्रह्माजीके पुत्र (स्वायम्भुव) मनुको ही (अपना) पति बनाया और शतरूपाने उनसे (मनुसे) दो पुत्र उत्पन्न किये॥ ८-१०॥
प्रियव्रतोत्तानपादौ कन्याद्वयमनुत्तमम्।<br>तयोः प्रसूतिं दक्षाय मनुः कन्यां ददौ पुनः॥ ११ ॥(ये ही) प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामक दो पुत्र थे। (इनके अतिरिक्त) दो श्रेष्ठ कन्याएँ भी हुईं। उन दो कन्याओंमेंसे स्वायम्भुव मनुने प्रसूति नामक एक कन्या दक्ष प्रजापतिको प्रदान की॥ ११॥