संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ८ * | ५१ |
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| प्रजापतिरथाकूतिं मानसो जगृहे रुचिः ।<br>आकृत्यां मिथुनं जज्ञे मानसस्य रुचेः शुभम् ।<br>यज्ञश्च दक्षिणा चैव याभ्यां संवर्धितं जगत् ॥ १२ ॥ | आकूति नामक दूसरी कन्याको (ब्रह्माजीके) मानस पुत्र रुचि प्रजापतिने ग्रहण किया। मानस पुत्र रुचि प्रजापतिने आकूतिसे दो संतानें प्राप्त कीं—यज्ञ और दक्षिणा, जिनसे संसार वृद्धिको प्राप्त हुआ ॥ १२ ॥ |
| यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे ।<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥ १३ ॥<br>प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्रो विंशतिं तथा ।<br>ससर्ज कन्या नामानि तासां सम्यक् निबोधत ॥ १४ ॥<br>श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा क्रिया तथा ।<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी ॥ १५ ॥<br>पत्न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः शुभाः ।<br>ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः ॥ १६ ॥ | यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र उत्पन्न हुए जो स्वायम्भुव मन्वन्तरमें 'याम' इस नामसे प्रसिद्ध देवता हुए और दक्ष प्रजापतिने प्रसूतिसे चौबीस कन्याओंको उत्पन्न किया, उनके नामोंको भलीभाँति सुनो—(वे हैं—) श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि तथा तेरहवीं कन्याका नाम है कीर्ति ॥ १३-१५ ॥<br>दक्ष प्रजापतिकी इन (तेरह दाक्षायणी) मङ्गलमयी कन्याओंको धर्मने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। उन (तेरह कन्याओं)-के अतिरिक्त इनसे सुन्दर आँखोंवाली दक्षकी ग्यारह, अवस्थामें छोटी कन्याएँ और थीं (जिनके नाम हैं—) ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संतति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा तथा स्वधा ॥ १६-१७ ॥ |
| ख्यातिः सत्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा ।<br>संततिश्चानसूया च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा ॥ १७ ॥<br>भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः ।<br>पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुः परमधर्मवित् ॥ १८ ॥<br>अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम् ।<br>ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो मुनिसत्तमाः ॥ १९ ॥ | श्रेष्ठ मुनियो! ख्याति, सती आदि जो (ग्यारह) कन्याएँ थीं, उन्हें क्रमशः भृगु, मरीचि, अङ्गिरा मुनि, पुलस्त्य, पुलह, परम धर्मज्ञ क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ नामक मुनियों, अग्निदेव और पितरोंने ग्रहण किया ॥ १८-१९ ॥ |
| श्रद्धया आत्मजः कामो दर्पो लक्ष्मीसुतः स्मृतः ।<br>धृत्यास्तु नियमः पुत्रस्तुष्ट्याः संतोष उच्यते ॥ २० ॥ | श्रद्धाका पुत्र 'काम' तथा लक्ष्मीका पुत्र 'दर्प' नामसे कहा जाता है। धृतिका 'नियम' नामक पुत्र तथा तुष्टिका (पुत्र) 'संतोष' कहलाता है ॥ २० ॥ |
| पुष्ट्या लाभः सुतश्चापि मेधापुत्रः श्रुतस्तथा ।<br>क्रियायाश्चाभवत् पुत्रो दण्डः समय एव च ॥ २१ ॥ | पुष्टिका पुत्र 'लाभ' और मेधाका पुत्र 'श्रुत' हुआ। क्रियाका पुत्र 'दण्ड' हुआ और वही 'समय' भी कहलाता है। |
| बुद्ध्या बोधः सुतस्तद्वदप्रमादो व्यजायत ।<br>लज्जाया विनयः पुत्रो वपुषो व्यवसायकः ॥ २२ ॥ | बुद्धिसे 'बोध' नामक पुत्र और उसी प्रकार 'अप्रमाद' नामक पुत्र भी हुआ। लज्जाका 'विनय' नामक पुत्र और वपुका 'व्यवसायक' हुआ। |
| क्षेमः शान्तिसुतश्चापि सुखं सिद्धिरजायत ।<br>यशः कीर्तिसुतस्तद्वदित्येते धर्मसूनवः ॥ २३ ॥ | 'क्षेम' शान्तिका पुत्र और 'सुख' सिद्धिका पुत्र हुआ। इसी प्रकार कीर्तिका 'यश' नामक पुत्र हुआ। ये सभी धर्मके पुत्र हुए। |
| कामस्य हर्षः पुत्रोऽभूद् देवानन्दो व्यजायत ।<br>इत्येष वै सुखोदर्कः सर्गो धर्मस्य कीर्तितः ॥ २४ ॥ | कामका 'हर्ष' नामक पुत्र हुआ, जो देवताओंको आनन्द देनेवाला हुआ। यही (इतनी) धर्मकी सुखदायक सृष्टि कहलाती है ॥ २१-२४ ॥ |
| जज्ञे हिंसा त्वधर्माद् निकृतिं चानृतं सुतम् ।<br>निकृत्यनृतयोर्जज्ञे भयं नरक एव च ॥ २५ ॥ | अधर्मसे हिंसाने निकृति तथा अनृत नामक पुत्रको उत्पन्न किया। निकृति और अनृतसे भय तथा नरक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। |
| माया च वेदना चैव मिथुनं त्विदमेतयोः ।<br>भयाज्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् ॥ २६ ॥ | माया तथा वेदना—ये दो इनकी क्रमशः भय एवं नरककी पत्नियाँ हैं। मायाने भयसे समस्त प्राणियोंको मार देनेवाले मृत्युको उत्पन्न किया ॥ २५-२६ ॥ |