संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ * कूर्मपुराण *
वेदना च सुतं चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात्।
मृत्योर्व्याधिजराशोकसृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे ॥ २७ ॥
वेदनाने भी रौरव (नरक नामक पति)-से दुःख नामक पुत्र उत्पन्न किया। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा तथा क्रोध उत्पन्न हुए ॥ २७ ॥
दुःखोत्तराः स्मृता होते सर्वे चाधर्मलक्षणाः।
नैषां भार्यास्ति पुत्रो वा सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥ २८ ॥
ये सभी उत्तरोत्तर अधिक दुःखदायी कहे गये हैं और अधर्माचरण ही इनका लक्षण है। इनकी न कोई स्त्री है और न कोई पुत्र। ये सभी ऊर्ध्वरेता हैं ॥ २८ ॥
इत्येष तामसः सर्गो जज्ञे धर्मनियामकः।
संक्षेपेण मया प्रोक्ता विसृष्टिर्मुनिपुंगवाः ॥ २९ ॥
श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार धर्मनियामकने तामस सर्गकी सृष्टि की। मैंने संक्षेपमें इस विशिष्ट सृष्टिका वर्णन किया ॥ २९ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
नवाँ अध्याय
शेषशायी नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति तथा उसी कमलसे ब्रह्माका प्राकट्य, विष्णु-मायाद्वारा ब्रह्माका मोहित होकर विष्णुसे विवाद करना, भगवान् शंकरका प्राकट्य, विष्णुद्वारा ब्रह्माको शिवका माहात्म्य बताना, ब्रह्माद्वारा शिवकी स्तुति तथा शिव और विष्णुके एकत्वका प्रतिपादन
सूत उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नारदाद्या महर्षयः।
प्रणम्य वरदं विष्णुं पप्रच्छुः संशयान्विताः ॥ १ ॥
सूतजी बोले— नारद आदि महर्षियोंने यह वचन सुननेपर संशयग्रस्त होते हुए वरदाता विष्णुको प्रणामकर इस प्रकार पूछा— ॥ १ ॥
ऋषय ऊचुः
कथितो भवता सर्गो मुख्यादीनां जनार्दन।
इदानीं संशयं चेममस्माकं छेत्तुमर्हसि ॥ २ ॥
कथं स भगवानीशः पूर्वजोऽपि पिनाकधृक्।
पुत्रत्वमगमच्छम्भोर्ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥ ३ ॥
कथं च भगवाञ्जज्ञे ब्रह्मा लोकपितामहः।
अण्डजो जगतामीशस्तन्नो वक्तुमिहार्हसि ॥ ४ ॥
ऋषियोंने कहा— हे जनार्दन! आपने मुख्य आदिकी सृष्टिका वर्णन किया। अब इस समय जो संशय हमें हो रहा है, उसे आप दूर करें—(ब्रह्मासे) पूर्वमें उत्पन्न होनेपर भी पिनाक नामक धनुषको धारण करनेवाले ईश भगवान् शिव किस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके पुत्रत्वको प्राप्त हुए और कैसे जगत्के स्वामी लोकपितामह अण्डज (हिरण्यगर्भ) भगवान् ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई, उसे आप हमें बतायें ॥ २-४ ॥
श्रीकूर्म उवाच
शृणुध्वमृषयः सर्वे शांकरस्यामितौजसः।
पुत्रत्वं ब्रह्मणस्तस्य पद्मयोनित्वमेव च ॥ ५ ॥
श्रीकूर्म बोले— ऋषियो! आप सभी सुनें— अमित तेजस्वी शंकर ब्रह्माके पुत्र-रूपमें कैसे हुए और कैसे ब्रह्मा कमलसे उत्पन्न हुए ॥ ५ ॥
अतीतकल्पावसाने तमोभूतं जगत् त्रयम्।
आसीदेकार्णवं सर्वं न देवाद्या न चर्षयः ॥ ६ ॥
विगत कल्पकी समाप्तिपर तीनों लोकोंमें घोर अन्धकार व्याप्त हो गया। सर्वत्र केवल जल-ही-जल था। न कोई देवता आदि थे और न कोई ऋषिजन ॥ ६ ॥