संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय ९ * | ५३ |
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| तत्र नारायणो देवो निर्जने निरुपप्लवे।<br>आश्रित्य शेषशयनं सुष्वाप पुरुषोत्तमः ॥ ७ ॥ | उस जनशून्य अत्यन्त शान्त (समुद्रमें) पुरुषोत्तम नारायणदेव शेषनागकी शय्याका आश्रय लेकर सोये हुए थे ॥ ७ ॥ |
| सहस्रशीर्षा भूत्वा स सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>सहस्रबाहुः सर्वज्ञश्चिन्त्यमानो मनीषिभिः ॥ ८ ॥<br><br>पीतवासा विशालाक्षो नीलजीमूतसन्निभः।<br>महाविभूतिर्भोगात्मा योगिनां हृदयालयः ॥ ९ ॥<br><br>कदाचित् तस्य सुप्तस्य लीलार्थं दिव्यमद्भुतम्।<br>त्रैलोक्यसारं विमलं नाभ्यां पङ्कजमुद्बभौ ॥ १० ॥<br><br>शतयोजनविस्तीर्णं तरुणादित्यसंनिभम्।<br>दिव्यगन्धमयं पुण्यं कर्णिकाकेसरान्वितम् ॥ ११ ॥ | हजारों सिर, हजारों नेत्र, हजारों चरण, हजारों बाहुवाले होकर वे विद्वानोंके चिन्तनके विषयरूप, सर्वज्ञ, पीतवस्त्रधारी, विशाल नेत्रवाले, नीले बादलके समान वर्णवाले, महाविभूतिस्वरूप, योगियोंके हृदयमें निवास करनेवाले योगात्मा (नारायण) जब किसी समय शेषशय्यापर शयन कर रहे थे, तब उनकी नाभिसे लीला करनेके लिये दिव्य अद्भुत, तीनों लोकोंका साररूप, एक स्वच्छ कमल प्रकट हुआ। (वह कमल) सौ योजन विस्तारवाला, तरुण आदित्यके समान प्रकाशमान, पुण्यमय दिव्य गन्धसे सम्पन्न और कर्णिकाएँ तथा केसरसे समन्वित था ॥ ८-११ ॥ |
| तस्यैव सुचिरं कालं वर्तमानस्य शार्ङ्गिणः।<br>हिरण्यगर्भो भगवांस्तं देशमुपचक्रमे ॥ १२ ॥<br><br>स तं करेण विश्वात्मा समुत्थाप्य सनातनम्।<br>प्रोवाच मधुरं वाक्यं मायया तस्य मोहितः ॥ १३ ॥ | शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले शार्ङ्गधन्वा (नारायण) इसी रूपमें बहुत समयसे निवास कर रहे थे तभी एक समय भगवान् हिरण्यगर्भ उस स्थानपर गये। उनकी मायासे मुग्ध उन विश्वात्माने उन (सुप्त) सनातन (पुरुष)-को हाथसे उठाकर यह मधुर वचन कहा— ॥ १२-१३ ॥ |
| अस्मिन्नेकार्णवे घोरे निर्जने तमसावृते।<br>एकाकी को भवाञ्छेते ब्रूहि मे पुरुषर्षभ ॥ १४ ॥ | हे पुरुषश्रेष्ठ! अन्धकारसे आवृत इस घोर, निर्जन एकार्णवमें अकेले सोनेवाले आप कौन हैं? मुझे बतलायें ॥ १४ ॥ |
| तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विहस्य गरुडध्वजः।<br>उवाच देवं ब्रह्माणं मेघगम्भीरनिःस्वनः ॥ १५ ॥ | उनके इस वचनको सुनकर मेघके समान गम्भीर स्वरवाले गरुडध्वजने हँसकर ब्रह्मदेवसे कहा— ॥ १५ ॥ |
| भो भो नारायणं देवं लोकानां प्रभवाप्ययम्।<br>महायोगेश्वरं मां त्वं जानीहि पुरुषोत्तमम् ॥ १६ ॥<br><br>मयि पश्य जगत् कृत्स्नं त्वां च लोकपितामहम्।<br>सपर्वतमहाद्वीपं समुद्रैः सप्तभिर्वृतम् ॥ १७ ॥<br><br>एवमाभाष्य विश्वात्मा प्रोवाच पुरुषं हरिः।<br>जानन्नपि महायोगी को भवानिति वेधसम् ॥ १८ ॥ | (ब्रह्माजी आप) मुझे ही समस्त लोकोंकी उत्पत्ति एवं संहार करनेवाला महायोगेश्वर एवं पुरुषोत्तम नारायण-देव जानें। पर्वत और महान् द्वीपोंसे युक्त सात समुद्रोंसे घिरे हुए इस सम्पूर्ण जगत्के साथ ही समस्त लोकोंके पितामह (ब्रह्माजी) आप अपनेको भी मुझमें ही देखें। ऐसा कहकर विश्वात्मा महायोगी हरिने (सब कुछ) जानते हुए भी ब्रह्मारूपी पुरुषसे कहा—आप कौन हैं? ॥ १६-१८ ॥ |
| ततः प्रहस्य भगवान् ब्रह्मा वेदनिधिः प्रभुः।<br>प्रत्युवाचाम्बुजाभाक्षं सस्मितं श्लक्ष्णया गिरा ॥ १९ ॥ | तदनन्तर वेदनिधि प्रभु भगवान् ब्रह्माने हँसकर कमलकी आभाके समान नेत्रवाले तथा मन्द-मन्द मुसकानवाले (भगवान् विष्णुको इस प्रकार) मधुर वाणीमें उत्तर दिया— ॥ १९ ॥ |