संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५४ | * कूर्मपुराण * |
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अहं धाता विधाता च स्वयम्भूः प्रपितामहः।
मय्येव संस्थितं विश्वं ब्रह्माहं विश्वतोमुखः ॥ २० ॥
श्रुत्वा वाचं स भगवान् विष्णुः सत्यपराक्रमः।
अनुज्ञाप्याथ योगेन प्रविष्टो ब्रह्मणस्तनुम् ॥ २१ ॥
त्रैलोक्यमेतत् सकलं सदेवासुरमानुषम्।
उदरे तस्य देवस्य दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥ २२ ॥
तदास्य वक्त्रान्निष्क्रम्य पन्नगेन्द्रनिकेतनः।
अजातशत्रुर्भगवान् पितामहमथाब्रवीत् ॥ २३ ॥
भवानप्येवमेवाद्य शाश्वतं हि ममोदरम्।
प्रविश्य लोकान् पश्यैतान् विचित्रान् पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥
ततः प्रह्लादिनीं वाणीं श्रुत्वा तस्याभिनन्द्य च।
श्रीपतेरुदरं भूयः प्रविवेश कुशध्वजः ॥ २५ ॥
तानेव लोकान् गर्भस्थानपश्यत् सत्यविक्रमः।
पर्यटित्वा तु देवस्य ददृशेऽन्तं न वै हरेः ॥ २६ ॥
ततो द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि महात्मना।
जनार्दनेन ब्रह्मासौ नाभ्यां द्वारमविन्दत ॥ २७ ॥
तत्र योगबलेनासौ प्रविश्य कनकाण्डजः।
उज्जहारात्मनो रूपं पुष्कराच्चतुराननः ॥ २८ ॥
विरराजारविन्दस्थः पद्मगर्भसमद्युतिः।
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् जगद्योनिः पितामहः ॥ २९ ॥
स मन्यमानो विश्वेशमात्मानं परमं पदम्।
प्रोवाच पुरुषं विष्णुं मेघगम्भीरया गिरा ॥ ३० ॥
मैं ही धाता (धारण करनेवाला), विधाता (विधान बनानेवाला), स्वयम्भू (स्वयं ही उत्पन्न होनेवाला) और प्रपितामह हूँ। मुझमें ही (सम्पूर्ण) विश्व स्थित है। मैं सभी ओर मुखवाला ब्रह्मा हूँ॥ २०॥
सत्यपराक्रम वे भगवान् विष्णु (ब्रह्मा)-का वचन सुनकर (उनकी) आज्ञा लेकर योगबलसे ब्रह्माके शरीरमें प्रविष्ट हुए। उन देव (ब्रह्मा)-के उदरमें देवता, असुर तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको देखकर श्रीविष्णुको (अत्यन्त) आश्चर्य हुआ। तदनन्तर नागराजकी शय्यापर निवास करनेवाले अजातशत्रु वे भगवान् (विष्णु) उनके (ब्रह्माके) मुखसे बाहर निकलकर पितामह (ब्रह्मा)-से बोले- ॥ २१-२३॥
पुरुषश्रेष्ठ! आप भी अब इसी प्रकार मेरे उदरमें प्रविष्ट होकर सदा इन विचित्र लोकोंको देखें ॥ २४॥
तब भगवान् विष्णुकी यह आह्लाद प्रदान करनेवाली वाणी सुनकर और पुनः उनका (श्रीविष्णुका) अभिनन्दन कर कुशध्वज (ब्रह्मा)-ने लक्ष्मीपति (भगवान् विष्णु)-के उदरमें प्रवेश किया। सत्यविक्रम (ब्रह्मा)-ने उन्हीं लोकोंको (भगवान् विष्णुके) उदरमें स्थित देखा (जिन्हें श्रीविष्णुने ब्रह्माके उदरमें देखा था)। देवके (उदरमें) भ्रमण करते हुए उन्हें हरि (विष्णु)-का कोई अन्त न दिखायी दिया ॥ २५-२६॥
तदनन्तर महात्मा जनार्दनने (अपनी इन्द्रियोंके) सभी द्वारोंको बंद कर दिया, तब ब्रह्माने उनकी नाभिमें द्वार प्राप्त किया। सुवर्णमय अण्डसे उत्पन्न चतुर्मुख (ब्रह्मा)-ने योगबलसे उसमें (नाभिमें) प्रवेश कर (नाभिसे उत्पन्न) कमलसे अपने रूपको बाहर निकाला ॥ २७-२८॥
पद्मगर्भके समान* शोभावाले स्वयम्भू, जगद्योनि, पितामह भगवान् ब्रह्मा अरविन्द (रक्त कमल)-पर बैठे हुए शोभित होने लगे। अपनेको सम्पूर्ण विश्वका स्वामी तथा परम पद (आश्रय) मानते हुए उन्होंने (ब्रह्माने) मेघके समान गम्भीर वाणीमें पुरुषोत्तम विष्णुसे कहा- ॥ २९-३०॥
* रक्त कमलके भीतर जैसी अरुणिमा होती है वैसी अरुणिमा (लालिमा-ललाई)-से सुशोभित।