संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ९ * | ५५ |
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| किं कृतं भवतेदानीमात्मनो जयकाङ्क्षया।<br>एकोऽहं प्रबलो नान्यो मां वै कोऽभिभविष्यति ॥ ३१ ॥ | आपने अपनी विजयकी आकांक्षासे इस समय यह क्या किया (अपनी सभी इन्द्रियोंके द्वारोंको क्यों बंद कर दिया?)। एकमात्र मैं ही सबसे बड़ा बलशाली हूँ और कोई नहीं है, मुझे कौन पराजित कर पायेगा? ॥ ३१ ॥ | | श्रुत्वा नारायणो वाक्यं ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः।<br>सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं बभाषे मधुरं हरिः ॥ ३२ ॥ | लोकनियामक ब्रह्माका वचन सुनकर नारायण हरिने सान्त्वनापूर्वक यह मधुर वाक्य कहा— ॥ ३२ ॥ | | भवान् धाता विधाता च स्वयम्भूः प्रपितामहः।<br>न मात्सर्याभियोगेन द्वाराणि पिहितानि मे ॥ ३३ ॥<br><br>किन्तु लीलार्थमेवैतन्न त्वां बाधितुमिच्छया।<br>को हि बाधितुमन्विच्छेद देवदेवं पितामहम् ॥ ३४॥<br><br>न तेऽन्यथावगन्तव्यं मान्यो मे सर्वथा भवान्।<br>सर्वमन्वय कल्याणं यन्मयापहृतं तव ॥ ३५ ॥<br><br>अस्माच्च कारणाद् ब्रह्मन् पुत्रो भवतु मे भवान्।<br>पद्मयोनिरिति ख्यातो मत्प्रियार्थं जगन्मय ॥ ३६ ॥ | आप ही धाता, विधाता और स्वयम्भू पितामह हैं। (मैंने) ईर्ष्या-द्वेषके कारण अपने (शरीरके) द्वारोंको बंद नहीं किया, अपितु लीला करनेकी इच्छासे ही मैंने ऐसा किया न कि आपको बाधा पहुँचानेकी दृष्टिसे। देवाधिदेव पितामह आपको भला कौन बाधा पहुँचाना चाहेगा। आपको कुछ अन्यथा नहीं समझना चाहिये। आप मेरे लिये सभी प्रकारसे मान्य हैं। मेरे द्वारा जो आपका अपहरण हुआ है, उसमें आप सभी प्रकारसे अपना कल्याण ही समझें। इसी कारण ब्रह्मन्! मेरी प्रीतिका लिये आप मेरे पुत्र बनें। जगन्मूर्त्ति! आप 'पद्मयोनि' इस नामसे विख्यात हों ॥ ३३—३६ ॥ | | ततः स भगवान् देवो वरं दत्त्वा किरीटिने।<br>प्रहर्षमतुलं गत्वा पुनुर्विष्णुमभाषत ॥ ३७ ॥ | तदनन्तर भगवान् देव (ब्रह्मा)-ने किरीटी (विष्णु)-को वर देकर अत्यन्त प्रसन्न होकर पुनः विष्णुसे कहा— ॥ ३७ ॥ | | भवान् सर्वात्मकोऽनन्तः सर्वेषां परमेश्वरः।<br>सर्वभूतान्तरात्मा वै परं ब्रह्म सनातनम् ॥ ३८ ॥<br><br>अहं वै सर्वलोकानामात्मा लोकमहेश्वरः।<br>मन्मयं सर्वमेवेदं ब्रह्माहं पुरुषः परः ॥ ३९ ॥<br><br>नावाभ्यां विद्यते ह्यन्यो लोकानां परमेश्वरः।<br>एका मूर्त्तिर्द्विधा भिन्ना नारायणपितामहौ ॥ ४० ॥ | आप सभीके आत्मरूप हैं, अनन्त हैं और सभीके परम ईश्वर हैं। आप सभी प्राणियोंकी अन्तरात्मा हैं तथा आप ही सनातन परब्रह्म हैं। मैं ही सभी लोकोंकी आत्मा एवं लोकमहेश्वर हूँ। यह सब कुछ मेरा ही स्वरूप है। मैं परम पुरुष ब्रह्मा हूँ। हम दोनोंके अतिरिक्त लोकोंका परमेश्वर दूसरा अन्य कोई नहीं है, नारायण और पितामहके रूपमें एक मूर्ति ही दो भागोंमें विभक्त हुई है ॥ ३८—४० ॥ | | तेनैवमुक्तो ब्रह्माणं वासुदेवोऽब्रवीदिदम्।<br>इयं प्रतिज्ञा भवतो विनाशाय भविष्यति ॥ ४१ ॥<br><br>किं न पश्यसि योगेशं ब्रह्माधिपतिमव्ययम्।<br>प्रधानपुरुषेशानं वेदाहं परमेश्वरम् ॥ ४२ ॥<br><br>यं न पश्यन्ति योगीन्द्राः सांख्या अपि महेश्वरम्।<br>अनादिनिधनं ब्रह्म तमेव शरणं व्रज ॥ ४३ ॥ | उनके (ब्रह्माके) द्वारा ऐसा कहे जानेपर वासुदेव ब्रह्मासे इस प्रकार बोले—यह प्रतिज्ञा* आपके विनाशका कारण बनेगी। क्या आप ब्रह्माधिपति योगेश्वर, अव्यय एवं प्रधान पुरुष ईशान (शंकर)-को नहीं देख रहे हैं? मैं उन परमेश्वरको जानता हूँ। योगीन्द्र तथा सांख्यशास्त्रके ज्ञाता भी जिन महेश्वरका दर्शन नहीं कर पाते, आप उन्हीं अनादिनिधन ब्रह्मकी शरण ग्रहण करें ॥ ४१—४३ ॥ |
* हम दोनोंके अतिरिक्त दूसरा परमेश्वर नहीं है—यह प्रतिज्ञा।